पुस्तकों का चुनाव पर निबंध-Essay on choice of books

पुस्तकों का चुनाव पर निबंध-Essay on choice of books

पुस्तकों का चुनाव पर निबंध

पुस्तकें समय के महासागर में प्रकाश-सदन की भाँति होती हैं। उनके बिना ईशवर भी  मूक है, न्याय भी निद्रित है, प्राकतिक विज्ञान स्तब्ध है, दर्शन पंगु है, शब्द निर्वाह हैं और सारी वस्तुएँ अंधकारपूर्ण हैं। हम केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक तृषा की भी तृप्ति  चाहते हैं। इस प्रकार, पुस्तकों के बिना जीवनधारण कठिन है, कालयापन कष्टप्रद है।

किंतु, आजकल मुद्राराक्षस के करिश्मे के कारण संसार में प्रतिदिन हजारों पुस्तकें छपती रहती हैं। वे सारी-की-सारी अच्छी-ही-अच्छी हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। बहुत पुस्तकें तो केवल अश्लीलता की पिटारी होती हैं, तिलस्मों का तहखाना होती हैं, कामलिप्सा की उत्तेजक कहानियाँ होती हैं। कुछ पुस्तकों का पढ़ना जहर पीने के समान है-ऐसा टॉल्सटाय ने कहा है। 

दूसरी बात यह है कि मनुष्य अनंत काल के लिए पृथ्वी पर नहीं आता है उसका जीवन बड़ा ही क्षणभंगुर हैअतः वह चाह कर भी बहुत अधिक पुस्तकें पढ़ नहीं सकता समय की सीमा के साथ-साथ पैसे को भी सीमा है बहुत सारी पुस्तकें खरीद कर पढ़ना भी संभव नहीं है 

इसके अतिरिक्त, रुचिवैभित्र्य और वयोवैभित्र्य आदि अनके कारण हैं, जिनके कारण पुस्तकों का चुनाव करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य हो जाता है। बर्नार्ड शॉ ने ठीक ही कहा था कि आज पढ़ना तो सब कोई जानता है, किंतु क्या पढ़ना है, यह कोई नहीं जानता। 

प्रसिद्ध निबंध-लेखक बेकन ने लिखा है- “कुछ पुस्तकें चखने के लिए होती हैं, कुछ निगलने के लिए होती है तथा कुछ चबा-चबाकर पचाने योग्य होती हैं।” हाँ ! इतना निश्चित है कि बहुत कम पुस्तकें बिलकुल आत्मसात् करने योग्य होती हैं। ऐसी पुस्तकों में हम श्रेण्य साहित्य को ले सकते हैं। ये पुस्तकें काल की कठिन अग्निपरीक्षा में भी कुंदन की भाँति दमकती रही हैं। इनमें कुछ ऐसे वैशिष्ट्य एवं विलक्षण तत्त्व हैं, जो दूर से ही पहचान में आ जाती हैं। ये पुस्तकें कालपथ पर वज्रस्तंभ की तरह खड़ी रहती हैं। न हम सहस्राक्ष हैं, न कालिदास की तरह देवी-वरदानप्राप्त, न अश्वत्थामा की तरह अपरिमितायु हैं कि सारी मुद्रित-अमुद्रित पुस्तकें पढ़ जाएँ।

अतः, हमारा पहला प्रयास विशिष्ट पुस्तकें पढ़ लेना आवश्यक होता है। इनमें कुछ भी हम पढ़ लेते हैं, तो हमें जीवन का लाभ प्रतीत होता है। इन पुस्तकों में हम वाल्मीकि रामायण, महाभारत, उपनिषद, तुलसीकृत रामायण, रघुवंश, शेक्सपियर, मिल्टन, दाँते, वर्जिल की रचनाएँ, बाइबिल, कुरान, भगवद्गीता आदि को रख सकते हैं। इन पुस्तकों ने संसार के महत्तम पुरुषों के जीवन को सँवारा है, इन्हीं ग्रंथों के नवनीत से उनका चिंतन परिपुष्ट हुआ है; अतः इन पुस्तकों के लिए किसी की राय लेने की आवश्यकता नहीं है। वस्तुतः, ये जीवनोपयोगी ग्रंथ स्वयंसिद्ध हो चुके हैं। 

इन ग्रंथों के सतत अध्ययन से रुचि निर्मित नहीं होती विकसित एवं परिष्कृत भी होती है|हम किसी पुस्तक की उत्तमता-अनुत्तमता का फैसला करने में समर्थ हो पाते हैं। अल्पायु में ही श्रेष्ठ पुरुषों के साहचर्य से, उनके वैयक्तिक पुस्तकागार से, उनके साथ बातचीत से हम उत्तम पुस्तकों की जानकारी प्राप्त कर ले सकते हैं। अंधकार में टटोलते रहने की अपेक्षा बत्ती जलाकर ढूँढ़ना अच्छा है। अतः, अनुमान-पद्धति के द्वारा समय नष्ट करना ठीक नहीं। 

अँगरेजी में एक कहावत है-

Never read any but famous books. 

यह भी कहा गया है 

जब साहित्य पढ़ो तब पढ़ो पहले ग्रंथ प्राचीन ।

पढ़ना हो विज्ञान अगर तो पोथी पढ़ो नवीन ।। 

-दिनकर ।

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि नवीन पुस्तकें समय की सरिता में बुदबुदों की भाँति अपना अस्तित्व शीघ्र खो देती हैं, समय का ब्लीचिंग पाउडर उनकी चटक को जल्द ही मिटा देता है। फिर, केवल सुप्रसिद्ध पस्तकें पढने से बहत सारी अच्छी पुस्तका के छूट जाने की संभावना है। प्रतिभा एवं पांडित्य किसी एक युग एवं स्थान की विरासत नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता, तो नवीन रचनाओं का आगमन ही नहीं होता। केवल प्राचीन श्रेण्य रचनाओं को पढ़ने से बौद्धिक बढ़ोतरी हो, ऐसी बात नहीं; नई-नई रचनाओं की अपेक्षा भी हो सकती है। 

अतः, पुस्तकों के चयन में संकुचित दृष्टिकोण का त्याग होना चाहिए। यदि ऐसा न हो, तो शेक्सपियर के पश्चात् गॉल्सवर्दी, बर्नार्ड शॉ, टी० एस० इलियट और गेटेल के पश्चात् टॉमस मान, कॉफ्का, तुलसी-सूर के पश्चात् रवींद्रनाथ, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, पंत, प्रसाद, निराला, दिनकर, अज्ञेय आदि के पठन की गुंजाइश ही न रह जाती। पुस्तक-चयन में वृत्ति का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

किसी चिकित्सक के लिए चिकित्साशास्त्र की पुस्तकें उसके ज्ञानक्षितिज का विस्तार करने में समर्थ हो सकती हैं, तो किसी विधिवेत्ता के लिए विधि की पुस्तकें। एक इतिहासज्ञ के लिए इतिहास की नई-नई पुस्तकों का अध्ययन लाभकर है, तो साहित्यकार के लिए साहित्य की अधुनातन पुस्तकों का अध्ययन श्रेयस्कर है। विज्ञान के छात्र यदि केवल कविता की पुस्तकें पढ़ते रहें और कला के छात्र केवल वाणिज्य की पुस्तक, तो उनकी प्रगति रुक जाएगी, उनकी सफलता का पथ अवरुद्ध हो जाएगा। जिसका जो कार्यक्षेत्र है, उस क्षेत्र की नवीनतम पुस्तकों का चयन-पठन उसके लिए जरूरी है। 

अध्ययन का अर्थ केवल पदोन्नति नहीं है, स्ववृति का विकास भी नहीं है, वरन् ज्ञान की परिधि का विस्तार है, अंतर्वृत्तियों का उन्नयन है। अध्ययन का उद्देश्य निरानंद जीवन में आनंद की खोज है, ‘स्व’ का अभिज्ञान है, सृष्टि के रहस्य की जिज्ञासा है। इसके लिए आवश्यक होगा कि हम संसार के महान साहित्यकार, इतिहासकार, विचारक, राजनीतिज्ञ, धर्मपंडित आदि की भी चुनी हुई पुस्तकें पढ़ें। 

Some books are to be tasted, others to be swallowed and some few to be chewed and digested.”-BACON 

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