पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी-2

पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी-2

पौराणिक प्रेम कथा:पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी-2

चित्रलेखा उसके लिए एक पत्ता ले आई, जिस पर उर्वशी ने अपना संदेश लिखा, फिर उसने वह पत्ता धीरे-से पुरुरवा की गोद में गिरा दिया। पत्ता गिरते ही पुरुरवा चौंके। पत्ता उठाया और उस पर लिखा संदेश पढ़ा। वह असमंजस में पड़ गए और बोले-‘इस पर तो किसी ने कुछ संदेश लिखा है।’ 

 इसे भी पढ़े-पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कहानी-1

 ‘महाराज! शायद यह संदेश उर्वशी का है। उसने आपकी पीड़ा से द्रवित होकर यह संदेश भेजा है। मानवक ने कहा। 

‘संदेश को संभालकर रखो।’ पुरुरवा ने उसे वह पत्ता सौंपते हुए कहा-‘कहीं मेरे खुरदरे हाथों से इस पर लिखे प्रेम के अक्षर मिट न जाएं।’ 

परंतु महाराज! आपकी प्रेयसी सामने क्यों नहीं आती?’ मानवक के इतना कहते ही उर्वशी और चित्रलेखा उनके सामने प्रकट हो गईं। प्रेयसी को सामने पाकर पुरवा भाव-विभोर हो उठे और बोले-‘उर्वशी! मैं इस जगत में सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हूं, जो मुझे तुम्हारा प्रेम जीतने का अवसर मिला।’ 

जैसे ही पुरुरवा ने उर्वशी का हाथ अपने हाथ में लेना चाहा, उसी समय देवराज इंद्र का दूत उनके समने आ खड़ा हुआ और बोला-‘चित्रलेखा! देवराज इंद्र तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनकी इच्छा है कि आज तुम उनकी सभा में ‘लक्ष्मी-स्वयंवर’ नृत्य प्रस्तुत करो। 

उर्वशी के चेहरे पर उदासी छा गई। पुरुरवा का चेहरा भी मलिन पड़ गया, लेकिन दूत की मौजूदगी में वे कुछ नहीं कह सके। बस, इतना ही कहा- ‘जाओ उर्वशी! जब देवेंद्र ने तुम्हें बुलाया है तो मैं तुम्हें कैसे रोक सकता हूं। बस, इतना ही कह सकता हूं कि कभी-कभी मुझे याद अवश्य कर लेना।’ 

आंखों में आंसू लिए उर्वशी उदास मन से वहां से विदा हो गई। देवेंद्र द्वारा भेजे गए रथ में बैठकर वह तब तक पुरुरवा की ओर ही टकटकी लगाए देखती रही, जब तक वह उसकी दृष्टि से ओझल न हो गए। 

उर्वशी के जाने के बाद पुरुरवा की आंखें नम हो गईं। उर्वशी द्वारा भेजा हुआ प्रेम के प्रतीक का वह पत्ता भी न जाने कहां उड़ गया था। वह पागलों की तरह उस पत्ते की तलाश करने लगे। 

जब वे दोनों उस पत्ते को ढूंढ रहे थे, उसी समय निपुणिका और महारानी औशीनरी वाटिका में आ पहुंचीं। वे एक वृक्ष के पीछे छिपकर पुरुरवा के क्रिया-कलापों को देखने लगीं, तभी वह पत्ता अचानक उड़कर महारानी के पैरों के पास पहुंच गया। महारानी ने उस पत्ते को उठाया और उस पर लिखे संदेश को देखकर बोलीं- ‘देखना तो निपुणिका, इस पत्ते पर तो कुछ लिखा है?’ 

निपुणिका ने उस पर लिखा संदेश पढ़ा। वह तत्काल समझ गई कि यह संदेश उसी अप्सरा का है। वह बोली-‘महारानी! यह प्रेम-पत्र निःसंदेह उसी अप्सरा का है। वह देखो, महाराज इस पत्ते को कैसी व्याकुलता के साथ खोज रहे हैं।’ 

 महारानी पत्ता हाथ में लिए पुरुरवा के पास पहुंची। पत्ता उनकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं-‘महाराज शायद इस पत्ते को खोज रहे हैं। लीजिए यह रहा आपका अमूल्य प्रेम-पत्र। 

पुरुरवा की हालत उस चोर जैसी हो गई, जो रंगे हाथों पकड़ा गया हो। पत्ता उन्होंने रानी के हाथ से ले लिया, फिर बोले-‘प्रिय महारानी! मैं दोषी हूं। मुझे क्षमा कर दो।’ 

लेकिन औशीनरी तो ईर्ष्या से धधक रही थी। उसने एक शब्द भी न बोला और तेजी से मुड़कर राजमहल की ओर चल पड़ी। उसके जाने के बाद पुरुरवा सोच में पड़ गए-‘मेरे ऊपर उसका आक्रोश स्वाभाविक ही है। यद्यपि मैं उर्वशी से प्रेम करता हूं, पर मैं उसे भी चाहता हूं और उसे उदास नहीं देख सकता। तब तक उसका क्रोध शांत नहीं हो जाता, मुझे धैर्य रखना ही होगा।’ 

उधर महल में पहुंचकर रानी का आक्रोश भी कुछ कम हुआ। उसने ठंडे मन से सोचा-‘मुझे इतना दुर्बल नहीं होना चाहिए। यद्यपि मैं उनके हृदय को ठेस पहुंचाना नहीं चाहती, किंतु इस विषय में कोई-न-कोई ठोस निर्णय तो लेना ही पड़ेगा।’ 

उधर देवलोक में उर्वशी के नृत्य का आयोजन हुआ। उर्वशी ने लक्ष्मी की भूमिका की। जब नृत्य तेज हुआ तो उसकी सह-नर्तकी ने एक संवाद बोला, जो नृत्य का ही एक अंग था। सह-नर्तकी ने पूछा- ‘उर्वशी! यहां जितने भी देवता उपस्थित हैं, उनमें से तुम किसे चाहती हो?’ 

सहसा ही उर्वशी के मुंह से निकला-‘पुरुरवा को। 

प्रेम से पीड़ित उर्वशी के मुंह से ‘पुरुषोत्तम’ कहने के बदले अपने प्रेमी का नाम निकल गया था। इससे उसके गुरु ऋषि भरत क्रोध से भड़क उठे। वे क्रोध से दहाड़े-‘उर्वशी! तुमने मुझे इतने देवताओं के सम्मुख लज्जित कर दिया है। मैं तुम्हें स्वर्ग से निष्कासित करता हूं। जाओ, मेरी नजरों से दूर हो जाओ।’ 

जब नृत्य पूर्ण हुआ, तो इंद्र ने उर्वशी की ओर देखा। वह एक कोने में अकेली सिर झुकाए खड़ी थी। अपनी सबसे प्रिय अप्सरा को उदास देखकर वे द्रवित हो उठे और बोले-‘उर्वशी! तुम मेरी सबसे प्रिय नर्तकी हो और पुरुरवा मेरे परममित्र हैं। तुम उनके पास जाकर रह सकती हो, परंतु यदि तुम्हें उनसे कोई संतान पैदा हो जाए और ज्यों ही उस पर पुरुरवा की दृष्टि पड़े तो तुम्हें उसी समय मेरे दरबार में लौट आना होगा। 

जिस समय देवलोक में यह घटना घट रही थी, लगभग उसी समय महाराज पुरुरवा के राजमहल में महारानी औशीनरी के मन में अपने पति के साथ किए गए व्यवहार पर पश्चाताप हो रहा था। जब उसके मन की तड़पन कुछ ज्यादा ही बढ़ गई तो उसने एक प्रहरी को बुलाया- ‘प्रहरी, जाकर अपने महाराज से कहो कि आज रात मैं छत पर उनकी प्रतीक्षा करूंगी। मैं एक व्रत लेने जा रही हूं, जिसके लिए उनकी उपस्थिति आवश्यक है।’ 

प्रहरी ने महाराज पुरुरवा को जब यह संदेश दिया तो उन्होंने कहा-‘अपनी महारानी से कहना कि मैं वहां अवश्य आऊंगा। मैंने सदा ही उनकी इच्छाओं का आदर किया है। 

पुरुरवा और मानवक निश्चित समय से पहले ही वहां पहुंच गए और महारानी के पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगे। 

उसी समय देवलोक से निष्कासित उर्वशी चित्रलेखा के साथ पुरुरवा से मिलने आई। दूर से उसने पुरुरवा को अपने मित्र के साथ खड़ा हुआ देखा। वह उनके सामने प्रकट होने का विचार कर ही रही थी कि उसकी नजर महारानी औशीनरी पर पड़ गई। तब वह अदृश्य रहकर यह देखने लगी कि देखें रानी क्या करने जा रही है। 

महारानी वहां पहुंची तो पुरुरवा ने उसका भावभीना स्वागत किया। औशीनरी के प्रभावशाली व्यक्तित्व और उसके सौंदर्य से उर्वशी अत्यंत प्रभावित हुई। उसने दिल खोलकर अपनी सखी चित्रलेखा से उसकी प्रशंसा की। औशीनरी ने अपने पति के सम्मुख व्रत लिया- ‘मैं औशीनरी, देवताओं को साक्षी मानकर संकल्प ले रही हूं कि मैं किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं रसुंगी और आज से हर उस स्त्री को, जिसे मेरे पति प्यार करेंगे, मैं बहन मानकर उसका स्वागत करूंगी।’ 

पुरुरवा भाव-विभोर हो गए और बोले-‘प्रिय महारानी! इस प्रतिज्ञा की क्या आवश्यकता थी। मैं कभी भी तुमसे अलग नहीं हूं।’ 

‘मैं जानती हूं महाराज! पर मैं तो संकल्प कर चुकी।’ महारानी औशीनरी ने कहा। फिर वह अपनी सखियों के साथ वापस लौट गई। 

पुरुरवा उससे बातें करना चाहते थे, किंतु जबान जैसे गूंगी हो गई थी, वे चाहकर भी कुछ कह न सके। उर्वशी उलझन में पड़ गई। सोचने लगी- ‘मैं समझ नहीं पा रही हूं कि यह सब क्या हो रहा है, परंतु उसके शब्दों ने मुझे पवित्र-भाव से भर दिया है और मुझमें विश्वास जगा दिया है। मैं जानती हूं कि वे अपनी महारानी से भी प्यार करते हैं, तथापि मैं भी उनका वियोग सहन नहीं कर सकती।’ 

उर्वशी में नए उत्साह की लहर दौड़ गई। अब वह पुरुरवा के सामने प्रकट हो गई। उर्वशी को सामने पाकर पुरुरवा का रोम-रोम पुलकित हो उठा। उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपनी भुजाओं में जकड़ दिया। उर्वशी भी बेताबी से उनके गले लग गई। दोनों ऐसी हालत में बहुत देर तक खड़े रहे, फिर जैसे ही पुरुरवा को होश आया, बोले-‘चलो प्रिय! गंधमादन उद्यान में चलें और कुछ समय वहीं आनंद से बिताएं।’ 

पुरुरवा उर्वशी को लेकर गंधमादन उद्यान में पहुंच गए, जहां उन्होंने कई दिन बहुत उल्लासपूर्वक बिताए। 

एक दिन पुरुरवा ने नदी किनारे एक सुंदर युवती को देखा। उस नवयौवना का स्वरूप देखकर वह उसकी ओर देखते ही रह गए। यह देखकर उर्वशी ईर्ष्या की आग में भड़क उठी। वह सोचने लगी-‘मेरे प्रियतम अब मुझसे प्रेम नहीं करते। वे किसी अन्य लड़की के मोहजाल में फंस गए हैं।’ 

उर्वशी ने उनकी ओर क्रोध-भरी दृष्टि से देखा और बोली-‘आप खुशी से उसे अपना सकते हैं। मैं जाती हूं।’ 

‘अरे ठहरो तो उर्वशी! जरा सुनो तो!’ पुरुरवा ने उसे समझाना चाहा, किंतु वह उनकी बातों को अनसुना कर शीघ्रता से निकट के लताकुंज में चली गई। वह लताकुंज युद्ध के देवता कार्तिकेय का था जिसमें स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध था। जो भी स्त्री उसमें प्रवेश करती थी, वह तत्काल ही लता में बदल जाती थी। लताकुंज में प्रवेश करते ही उर्वशी भी एक लता बन गई, तब वह देवताओं से अपनी मुक्ति की प्रार्थना करने लगी। लता से मुक्त होने का सिर्फ एक ही उपाय था, जो स्वयं कार्तिकेय ने बताया था और वह उपाय यह था कि यदि कोई व्यक्ति उनकी माता पार्वती के चरणों से निकले रक्तवर्ण बिंदु से निर्मित मणि को लाकर लता से स्पर्श करा दे तो वह लता बनी स्त्री फिर से अपने स्वरूप में आ जाएगी।

उधर उर्वशी के वियोग में पुरुरवा का बुरा हाल हो गया। वह पागलों की भांति इधर-उधर भटककर अपनी प्रेयसी को खोजने लगे। एक दिन जब वे इसी प्रकार भटक रहे थे तो एकाएक मां पार्वती की प्रतिमा के नीचे उन्हें एक रक्तमणि दिखाई दी, किंतु उन्होंने उसे यह सोचकर नहीं उठाया कि जब उसे पहनने वाली मेरी प्रेयसी ही नहीं है, तो अब मैं इस रक्तमणि का क्या करूंगा। 

परुरवा थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि अचानक आकाशवाणी हई-‘यह मणि बड़े काम की है पुरुरवा। इसे उठा लो। इसके प्रभाव से बिछुड़े हए प्रेमी फिर से मिल जाएंगे। 

पुरुरवा को अपने कानों पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने सोचा-‘आखिर किसी ने मेरा आर्तनाद सुना तो सही, पर यह कौन हो सकता है?’ तभी उनकी दृष्टि 

ऊपर की ओर उठी। सामने देखा तो एक पुष्परहित लता उन्हें उदास-सी दिखाई पड़ी। फिर जैसे ही पुरुरवा ने हाथ बढ़ाकर लता का स्पर्श किया, लता उर्वशी में बदल गई। पुरुरवा को यह सब देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। वे प्रसन्न होकर बोले-‘उर्वशी! मेरी प्यारी उर्वशी! तुम कहां चली गई थीं। तुमने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?’ 

उर्वशी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी उसकी दृष्टि मणि पर जा पड़ी। मणि को देखकर वह हर्षित हो उठी और बोली-‘मेरे प्रियतम! आज मैं जो पुनः अपने स्वरूप में आपके सामने खड़ी हूं, वह इस मणि के कारण ही संभव हुआ है। उस दिन क्रोध में भरी मैं अनजाने में ही स्त्रियों के लिए निषिद्ध भगवान कार्तिकेय के इस लताकुंज में आ गई थी। परिणामस्वरूप मैं लता में बदल गई। आज इस मणि के प्रभाव से ही मुझे अपना स्वरूप वापस मिल सका है।’ 

उर्वशी के मुख से यह सब सुनकर पुरुरवा भी आश्चर्यचकित रह गए। फिर वे बड़े प्रेम से उसे अपने साथ लेकर अपने नगर में चले गए। लंबे समय के बाद राजा के वापस लौटने पर नगर में उनका भव्य स्वागत हुआ। उस रात सारे नगर में उत्सव मनाया गया। नगरवासी राजमार्गों पर खुशी से झूमते-नाचते गाते रहे। 

उर्वशी राजा के महल में रहती रही। दोनों का जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हो रहा था कि अचानक एक दिन एक घटना घट गई। उस दिन जब उर्वशी स्नान कर रही थी, तो उसके वस्त्रों के ऊपर रखी वह मणि एक कौआ उड़ा ले गया। सेविकाओं ने ये देखकर शोर मचा दिया। सैनिक कौए को मारने के लिए दौड़े, किंतु वह कौआ हाथ नहीं आया। निराश होकर सैनिक लौट आए और सेनापति को आकर यह खबर बता दी। इस पर सेनापति ने उस कौए की तलाश में कई खोजी नियुक्त कर दिए और उन्हें आदेश दे दिया कि आसपास के सभी क्षेत्रों के कौओं के घोंसलों को तलाशा जाए। शायद किसी घोंसले में रखी हुई मणि मिल जाए। 

तीसरे दिन एक खोजी मणि को लेकर राजा के पास पहुंचा। उसके हाथ में एक तीर था। उसने मणि राजा को सौंप दी और कहा कि इस तीर से किसी ने कौए को मार डाला था। 

‘यह तीर किसका है?’ राजा ने पूछा। ‘महाराज! इस तीर पर नाम तो अंकित है, किंतु मेरी आंखें तनिक कमजोर हैं. इसलिए मैं ठीक से पढ़ नहीं सका।’ खोजी ने कहा। 

राजा ने तीर पर लिखा नाम पढ़ा तो चौंक उठे और बोले-‘महान आश्चर्य है! यह तीर तो उर्वशी और पुरुरवा के पुत्र ‘आयुष’ के द्वारा छोड़ा गया है।’ 

‘यह तो और भी सुखद समाचार है महाराज।’ मानवक ने प्रसन्न होकर कहा-‘आपका उत्तराधिकारी मिल गया। अब और क्या चाहिए? 

‘परंतु यह असंभव है।’ पुरुरवा ने कहा- ‘मैं एक दिन के लिए भी उर्वशी से अलग नहीं हुआ, सिवाय उन दिनों के जब वह कार्तिकेय के लताकुंज में समा गई थी। उसके पुत्र कैसे हुआ, मैं कुछ नहीं जानता।’ 

उसी समय एक प्रतिहारी वहां पहुंचा, उसने राजा से कहा- ‘महाराज! च्यवन आश्रम की संन्यासिनी सत्यवती आपसे मिलना चाहती हैं। उनके साथ एक छोटा-सा बालक भी है।’ 

‘उन्हें शीघ्र यहां ले आओ।’ राजा ने कहा। 

जैसे ही संन्यासिनी उस बालक को लेकर वहां पहुंची, मानवक बालक को देखकर बोल उठा-‘महाराज! यह बालक तो बिल्कुल आपकी प्रतिमूर्ति है। तीर चलाने वाला यही बालक होना चाहिए-आपका पुत्र!’ 

‘वही होगा। मैं उसे बांहों में भरने के लिए बेचैन हो रहा हूं। 

राजा ने संन्यासिनी का स्वागत किया और पूछा-‘कहिए माता, कैसे आना हुआ? साथ में यह बालक कौन है?’ 

‘राजन! इस बारे में मैं कुछ नहीं बता सकती।’ संन्यासिनी बोली-‘मैं तो सिर्फ इतना ही जानती हूं कि उर्वशी ने इस बालक आयुष को जन्म देते ही मुझे लालन-पालन के लिए सौंप दिया था। च्यवन ऋषि इसके गुरु हैं, पर आयुष ने आज एक पक्षी को मारकर आश्रम के नियमों का उल्लंघन कर दिया है, इसलिए ऋषि ने मुझे आज्ञा दी है कि मैं इसे इसकी माता को लौटा दूं। मैं उर्वशी से मिलना चाहती हूं। 

राजा ने उर्वशी को बुलाया। बालक पर निगाह पड़ते ही उर्वशी बांहें फैलाकर उसे गोद में उठाने के लिए लपकी और गोद में उठाकर उसका चुंबन लेने लगी। 

बालक को उसकी माता को सौंपकर संन्यासिनी चली गई। संन्यासिनी के जाते ही उर्वशी के चेहरे पर उदासी छा गई। इस पर राजा ने पूछा-‘उर्वशी! क्या बात है? मेरे जीवन के इस परमसुख के क्षणों में भी तुम्हारे मुख पर उदासी क्यों?’ 

‘स्वामी: अब हमारे मिलन की अंतिम बेला आ गई।’ उर्वशी ने कहा-‘मुझे अब देवलोक में लौट जाना होगा।’ 

‘वह क्यों भला?’ 

इस पर उर्वशी ने पुरुरवा को इंद्र द्वारा रखी हुई शर्त बता दी। 

यह सुनकर राजा पुरुरवा स्तब्ध रह गए। वे बोले- ‘देवता भी कितने ईर्ष्याल होते हैं, उर्वशी! पुत्र पाकर आज मैं कितना खुश हूं, पर अब यह वज्रपात…क्या तम सचमुच ही चली जाओगी?’ 

‘यह बिछोह मेरे लिए भी असहनीय है, मेरे प्रियतम!’ उर्वशी भीगे नयनों से बोली-‘पर करूं क्या? मैं वचनबद्ध जो हूं।’ 

राजा के मुख से एक लंबी सांस निकली। वे बोले- ‘मैं समझता हूं, इंद्र की आज्ञा का पालन तो तुम्हें करना ही पड़ेगा और मैं…मैं अब आयुष का राज्याभिषेक करके वन में चला जाऊंगा।’ 

तभी अचानक आकाश में बिजली चमकी और देवर्षि नारद आकाश से उतरकर पृथ्वी पर आ पहुंचे। राजा, उर्वशी और नन्हे आयुष ने उन्हें सम्मानपूर्वक प्रणाम किया। 

‘आप दोनों का दाम्पत्य-प्रेम चिरकाल तक बना रहे। नारद ने आशीर्वाद दिया। 

‘काश! ऐसा हो सकता। राजा ने एक लंबी सांस खींचकर कहा, फिर पूछा-‘देवर्षि, अब आप अपने यहां पधारने का कारण बताइए? 

‘मैं प्रभुत्वशाली देवेंद्र का संदेश लेकर आया हूं।’ नारद बोले- ‘उन्हें असुरों को पराजित करने के लिए आपकी सहायता की आवश्यकता है। वह नहीं चाहते कि 

आप वैराग्य लेकर वन में जाएं। उन्होंने सदा के लिए उर्वशी आपको भेंट कर दी है।’

 यह सुनकर पुरुरवा खुशी से झूम उठे। उर्वशी का मुरझाया चेहरा भी एक नवीन कांति से भर गया। राजा और उर्वशी दोनों ने देवर्षि का आभार व्यक्त किया, जो उनके लिए यह खुशखबरी लेकर आए थे। फिर वे दोनों चिरकाल तक सुखपूर्वक जीवन का आनंद लेते रहे। (इसे भी पढ़े-पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कहानी-1)

 

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

twenty + 19 =