पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी-1

पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी-1

पौराणिक प्रेम कहानियां:पुरुरवा-उर्वशी की प्रेम कहानी

प्राचीन काल में एक महान प्रतापी राजा हुए हैं, पुरुरवा । पुरुरवा का जन्म चंद्रवंश में हुआ था। अपने बाहुबल से उन्होंने अनेक युद्धों में विजय पाई और अनेक देशों को जीता। उस समय उनकी टक्कर का कोई और राजा भूमंडल पर नहीं था। कई बार देवासुर संग्रामों में उन्होंने देवराज इंद्र की सहायता भी की थी, अतः देवराज इंद्र उन्हें अपना मित्र मानते थे। 

एक दिन वे किसी युद्ध से विजयी होकर लौट रहे थे कि तभी एक वन के निकट उन्होंने ‘बचाओ…बचाओ’ का एक स्त्री स्वर सुना। ‘जरूर कोई स्त्री संकट में है’, ऐसा समझकर उन्होंने अपना रथ मोड़ा और तेजी से आवाज की दिशा में चल पड़े। उन्होंने देखा कि कुछ असुर दो स्त्रियों को जबरदस्ती खींचकर अपने रथ में डाल रहे हैं। स्त्रियां लगातार सहायता के लिए चिल्ला रही थीं। 

यह दृश्य देखकर पुरुरवा का क्षत्रिय खून खौल उठा। उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाकर, शत्रु के रथ की ओर छोड़ दिया। वह रथ असुर केशी का था और उसी के आदेश पर उसके असुर सैनिक उन दोनों स्त्रियों का अपहरण कर रहे थे। पुरुरवा के धनुष की टंकार से समूचा वन प्रांत थर्रा उठा। बाण केशी के कान को हवा देता हुआ सर्राटे के साथ आगे निकल गया। केशी बाल-बाल बचा। वह अभी संभल भी नहीं पाया था कि पुरुरवा के छोड़े हुए बाण ने उन स्त्रियों को पकड़ने वाले असुरों में से एक की छाती फाड़ डाली। असुर ‘हाय’ कहकर जमीन पर गिर गया।

यह देखकर केशी भयभीत हो गया। वह पुरुरवा को पहचान गया था। पिछले देवासुर संग्राम में पुरुरवा ने उसकी सेना की जैसी दुर्गति की थी, उसे याद आते ही उसका सारा शरीर झनझना उठा। उसने अपने सैनिकों को स्त्रियों को छोड़कर तुरंत रथ पर चढ़ने का आदेश दिया और इसके पहले कि पुरुरवा के धनुष से और बाण छूटे, अपना रथ तेजी से आगे भगा दिया।

पुरुरवा स्त्रियों के पास पहुंचे। वे भूमि पर गिरकर अचेत हो गई थीं। जैसे ही उनकी दृष्टि उन स्त्रियों पर पड़ी, वे उन दोनों को पहचान गए। उनमें से एक थी, इंद्रलोक की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी और दूसरी उसकी सहेली थी। अपने रथ में से पानी की छागल निकालकर पुरुरवा ने दोनों के मुख पर जल के छींटे मारे। काठ ही समय बाद दोनों ने अपनी आंखें खोल दीं। उर्वशी की सहेली पहले उठी और उसने उर्वशी के वस्त्रों को व्यवस्थित किया। फिर वह उर्वशी से बोली-‘उर्वशी, उठो! असर पराजित होकर भाग चुके हैं। 

‘सच! किसने पराजित किया उन्हें ?’ उर्वशी ने पूछा। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह असुरों के पंजे से आजाद हो चुकी है। 

‘इन्होंने।’ कहकर उसकी सहेली ने पुरुरवा की ओर संकेत कर दिया। उर्वशी की आंखें ऊपर उठीं और पुरुरवा की आंखों से जा मिलीं। बस, उस पहली ही नजर में दोनों के बीच प्रेम का अंकुर फूट पड़ा। उर्वशी मन-ही-मन पुरुरवा के चेहरे को देखते हुए सोचने लगी-‘आह! कितना दिव्य रूप है इसका। असुरों ने मेरा अपहरण करके अच्छा ही किया। नहीं तो इस दिव्य पुरुष के दर्शन कैसे कर पातीं?’ 

उधर पुरुरवा भी कुछ ऐसा ही सोच रहे थे-‘कितना अनुपम रूप है इसका। ऐसा सौंदर्य मैं पहली बार देख रहा हूं।’ 

चुप्पी पुरुरवा ने ही तोड़ी-‘देवी! मैं चंद्रवंशीय राजा पुरुरवा हूं। आप कौन हैं? कोई वन देवी या कोई अप्सरा?’ 

‘आपने ठीक ही अनुमान लगाया है।’ चंचल चितवन से उसकी ओर देखती हुई उर्वशी ने उत्तर दिया- ‘मैं देवलोक की अप्सरा उर्वशी हूं।’ 

‘देवलोक तो यहां से बहुत दूर है। आप यहां कैसे पहुंच गईं?’ पुरुरवा ने पूछा। 

‘मैं अन्य अप्सराओं के साथ कुबेर की नाट्यशाला से लौट रही थी कि न जाने कहां से दानव पुलकेशी आ पहुंचा। उसे देखकर मेरे साथ की शेष अप्सराएं तो इधर-उधर भाग गईं, किंतु मैं और मेरी यह सहेली उन दानवों के हाथ लग गईं। दानव हम दोनों को अपने रथ में डालकर तेजी से अपने निवास स्थान की ओर ले चला। हम सहायता के लिए चिल्लाने लगीं और उन असुरों के पंजों से छूटने का प्रयास करने लगीं।

तभी नीचे हमें आपका रथ जाता दिखाई पड़ा। आपके रथ को देखकर हमारे मन में आशा जाग उठी। हमने और भी जोर से सहायता के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया। असुर सैनिक हमारी बेबसी पर ठहाके लगाते रहे। ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद है कि उसने हमारी पुकार सुन ली और सहायता के लिए आपको भेज दिया। यदि आप समय पर न पहुंचे होते तो वे दुष्ट अपने कुत्सित इरादों में कामयाब हो गए होते। बस इतनी-सी कहानी है हमारी ।’ उर्वशी ने बताया। 

‘उर्वशी! अब भय त्यागकर निश्चित हो जाओ।’ पुरुरवा बोले- ‘मेरे रहते कोई भी असुर तुम्हारा अहित नहीं कर सकता। ये लोग मेरे बाहुबल का स्वाद चख चुके हैं। इसीलिए मुझसे भयभीत रहते हैं। देखा, कैसे वे मेरे एक-दो बाणों के चलते ही 

भयभीत होकर भाग खड़े हुए।’ 

उर्वशी के चेहरे पर पुरुरवा के प्रति प्रशंसा और अनुराग के मिले-जुले भाव पैदा हए। उसकी आसक्ति पुरुरवा के प्रति और भी बढ़ गई। 

‘चलो, मैं तुम्हें देवलोक पहुंचाने का प्रबंध कर दूं।’ पुरुरवा ने कहा। वैसे यह बात कहने में उनका हृदय फटा जा रहा था। वे सोच रहे थे-‘काश! यह रूप की रानी सदैव ही मेरे रनिवास में महारानी बनकर रह पाती।’ 

‘हां-हां चलिए! देवेंद्र हमारे लिए चिंतित हो रहे होंगे। उर्वशी ने कहा। 

वैसे मन में उसके भी कुछ ऐसे ही उद्गार उठ रहे थे-‘काश! मेरे मन-मंदिर के स्वामी! मैं तुम्हें हमेशा के लिए पा सकती।’ 

उदास भाव से उठकर वह रथ में जा बैठी। उसकी सहेली भी उसके समीप बैठ गई। राजा ने घोड़ों की लगाम हिलाकर घोड़ों को चलने का संकेत दिया। घोड़े वायु वेग से दौड़ पड़े। 

पुरुरवा ने अप्सराओं को गंधर्वराज को सौंप दिया और उसे आदेश दिया कि वह उन्हें सुरक्षित देवलोक में पहुंचा आए, फिर वह अपने नगर की ओर लौट पड़े। 

पुरुरवा अपने महल में लौट तो आए, परंतु उस दिन के बाद वे व्याकुल रहने लगे। एक पल के लिए भी उर्वशी की स्मृति उन्हें भूलती नहीं थी। सोते-बैठते हर समय उनकी आंखों में उर्वशी की छवि घूमने लगती थी। 

पुरुरवा का मानवक नामक एक मित्र और सलाहकार था। उससे राजा की यह हालत देखी नहीं गई। उसने पूछ ही लिया-‘मित्र! आजकल तुम इतने व्याकुल क्यों रहते हो?’ 

इस पर पुरुरवा ने उसे सब कुछ बता दिया। फिर वे बोले-‘मित्र! अब मैं उस परम सुंदरी अप्सरा के लिए व्याकुल हूं।’ 

‘ठीक है, सोचते हैं कोई उपाय, पर पहले आप महारानी से तो मिल लीजिए। वह बड़ी बेचैनी से आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं।’ 

पुरुरवा को अपनी भूल का अहसास हुआ। वहां से लौटने के बाद वह अपनी पत्नी औशीनरी से एक बार भी मिलने के लिए नहीं पहुंचे थे। वे तत्काल उठ खड़े हुए और महारानी के कक्ष में जा पहुंचे।

महारानी औशीनरी ने उनका हार्दिक स्वागत किया, और बोलीं-‘स्वामी आप ठीक तो हैं! क्या देवराज इंद्र से भेंट हुई? असुर उन्हें अब तो परेशान नहीं करते?’ 

प्रिय उर्वशी! वहां सब ठीक है, पर अभी मुझे राज्य के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य पूरे करने हैं। उन्हें पूरा करके मैं जल्दी ही लौट आऊंगा, तब तक तुम मेरी प्रतीक्षा करो।’ यह कहकर पुरुरवा वहां से चले आए। 

परुरवा के ऐसे रूखे व्यवहार से महारानी औशीनरी के दिल को ठेस पहुंची। उन्हें उन पर गुस्सा भी आया। वे सोचने लगीं- ‘उन्होंने मुझे ‘उर्वशी’ कहकर क्यों पुकारा। क्या मेरे स्वामी किसी अन्य स्त्री से प्रेम करने लगे हैं? 

रानी ने तत्काल अपनी अंतरंग सहेली निपुणिका को बुलाया और उससे कहा-‘निपुणिका! हमारे महाराज इन दिनों कुछ भुलक्कड़-से हो गए हैं। तुम उनके परममित्र मानवक के पास जाकर इस रहस्य का पता लगाकर आओ।’ 

‘जैसी आपकी आज्ञा।’ कहकर निपुणिका मानवक से मिलने के लिए चल पड़ी। वैसे उसने यह अनुमान लगा लिया था कि बात क्या है। 

रास्ते में वह सोचने लगी-‘मानवक मुझे महाराज के विषय में कभी कुछ नहीं बताएंगे। वह महाराज के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हैं। मुझे उनसे सारा रहस्य जानने के लिए कोई और ही उपाय करना पड़ेगा।’ 

 इधर मानवक भी स्वयं चिंतातुर था। उसके मन में विचारों का झंझावात चल रहा था। वह सोच रहा था-‘पुरुरवा के कारण से मेरा मन भारी हो उठा है। इस भेद को छिपाए रखने के लिए उचित यही रहेगा कि मैं दूसरे लोगों से कम ही मिलूं।’ 

जब मानवक इस रहस्य को छिपाने की चिंता में डूबा हुआ था, उसी समय निपुणिका उसके पास जा पहुंची। उसने मानवक से कहा-‘श्रीमन् ! महारानी के हृदय को आघात पहुंचा है और मुझे उनको सांत्वना देने में कठिनाई आ रही है। क्या आप मेरी कुछ सहायता कर सकेंगे?’ 

‘क्यों भला? महारानी के हृदय को आघात क्यों पहुंचा है? क्या मेरे मित्र ने उन्हें नाराज कर दिया है?’ मानवक ने पूछा। 

‘यह मैं क्या जानूं?’ चतुर निपुणिका ने कहा- ‘मुझे तो ऐसा लगता है कि उन्होंने महारानी को उसी नाम से पुकार लिया है, जिसके प्रेम में वे आकंठ डूबे हुए हैं।’ 

‘क्या उन्होंने महारानी को उर्वशी के नाम से पुकारा था?’ मानवक ने पूछा। ‘हां श्रीमन्! वैसे यह उर्वशी है कौन?’ 

है एक अप्सरा।’ मानवक ने बताया-‘महाराज उसके प्रेम के चक्कर में पड़ गए हैं। उनकी इस दशा के कारण मैं स्वयं भी बहुत चिंतित हूं।’ 

तो मेरा अनुमान सही निकला।’ निपुणिका ने सोचा, फिर उसने मानवक से पूछा-‘तो अब मैं महारानी के पास जाकर क्या बताऊं?’ 

‘उनसे यही कहना कि मैं उर्वशी से उनका ध्यान बंटाने के लिए भरसक चेष्टा करूंगा और सफल होते ही उनके सामने प्रस्तुत हो जाऊंगा।’ 

निपुणिका वहां से चली गई। निपुणिका के जाते ही पुरुरवा वहां आ पहुंचे। उन्होंने मानवक से पूछा-‘मानवक। तुमने मेरा भेद किसी को बता तो नहीं दिया?’ 

कैसा भेद राजन! मुझे तो कुछ याद नहीं है। आप किस भेद के बारे में पूछ रहे हैं?’ 

पुरुरवा ने संतोष की सांस ली, फिर बोले-‘मैं शांति चाहता हूं। चलो. हम अपनी वाटिका में घूमने के लिए चलें।। 

वाटिका में पहुंचकर मानवक ने कहा-‘देखिए! कितना सुहाना दृश्य है। चारों ओर सुगंधित पुष्प खिले हुए हैं। यहां बैठकर प्रकृति के सौंदर्य का रसास्वादन कीजिए, भूल जाइए उस उर्वशी को।’ 

यह असंभव है मानवक! मैं उसे कभी भूल नहीं सकता।’ पुरुरवा बोले-‘तुम मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मै निरंतर उसकी याद में डूबा रहूं।’ 

जिस प्रकार महाराज पुरुरवा उर्वशी से मिलने के लिए व्याकुल हो रहे थे, वैसी ही हालत उर्वशी की भी थी। जिस दिन से उसकी मुलाकात पुरुरवा से हुई थी, उसी दिन से वह उनके वियोग में व्याकुल हो रही थी। जब वह बहुत बेचैन हो गई तो वह अपनी सखी चित्रलेखा के साथ इंद्रलोक से निकलकर धरती पर जाने के लिए निकल पड़ी। उसने राजा को अपनी वाटिका में बैठे देख लिया, अतः वे दोनों वहीं पहुंच गईं, लेकिन दोनों अदृश्य ही रहीं। 

 ‘आह! कैसा अद्भुत आकर्षक व्यक्तित्व है।’ पुरुरवा को देखकर उर्वशी के मुंह से एक आह-सी निकली। 

तो चलो, प्रकट हो जाएं उनके सामने।’ चित्रलेखा बोली। 

‘नहीं सखी, अभी नहीं।’ उर्वशी जल्दी से बोल उठी-‘पहले ज़रा यह तो सुन लूं कि ये दोनों किस विषय में बात कर रहे हैं!’ 

वाटिका में बैठा मानवक पुरुरवा को सलाह दे रहा था-‘राजन! मेरी नजर में दो उपाय हैं, जिनसे आप अपनी उस दुर्लभ प्रेमिका को सदा के लिए अपने पास रख सकते हैं। 

यह सुनते ही उर्वशी का हृदय बैठने लगा। उसके मुंह से एक कराह-सी निकली-‘हाय! मैं भी कितनी हतभागी हूं। ये तो किसी अन्य सुंदरी से प्रेम करते हैं।’ 

तभी उसकी सखी ने उसे टोका-‘यह क्या उर्वशी! तुम तो मृत्युलोक की किसी स्त्री की तरह ईर्ष्या करने लगीं। मत भूलो कि हम देवलोक की अप्सराएं हैं। 

उर्वशी एक आह भरकर खामोश हो गई। वह फिर से मानवक और पुरुरवा की बातें सुनने लगी। मानवक कह रहा था-‘राजन! वे दोनों उपाय हैं कि या तो आप नींद अधिक लें, ताकि स्वप्न में उर्वशी के दर्शन कर सकें, या फिर उसका चित्र बनाकर उसके ध्यान में मग्न रहें। 

दोनों ही बातें असंभव हैं, मानवक। नींद मुझे आएगी नहीं, क्योंकि मेरी व्यथा मुझे नींद नहीं लेने देगी और चित्र आधा बनने से पहले ही मेरी दृष्टि धुंधली पड जाएगी। काश! वह जान पाती मेरी पीड़ा को। संभवतः वह जानती है, फिर भी न जाने क्यों उसका हृदय इतना कठोर है।’ 

चित्रलेखा ने उर्वशी को कोहनी मारी और बोली- ‘सुना आपने?’ 

‘मैं अब और अधिक सहन नहीं कर सकती।’ बड़े ही पीड़ा-भरे स्वर में उर्वशी ने कहा- ‘जा, एक पत्ता ले आ, ताकि उस पर मैं अपनी व्यथा-कथा लिखकर उन्हें बता सकें।……(आगे पढ़े- पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कहानी-2)

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