पुल का आविष्कार कैसे हुआ?-Pul ka aavishkar kaise hua

पुल का आविष्कार कैसे हुआ

कैसे हुआ पुल का आविष्कार? 

पुल का आविष्कार कैसे हुआ– कभी आपने सोचा है कि विकास की धुरी बन चुके पुलों का निर्माण कैसे और किसने किया होगा। संभवतः संसार में सबसे पहले बनने वाले पुल का निर्माण प्रकृति ने ही किया होगा। अचानक नदी की किसी धारा पर कोई पेड़ गिरा होगा और लोगों को इस तरह धारा के इस या उस पार जाने का रास्ता मिल गया होगा। लेकिन यह तो सिर्फ एक अनुमान और धारणा है। 

लिखित प्रमाणों के अनुसार ईसा से 2,230 वर्ष पूर्व बेबीलोन की युफ्रेटीज नदी पर लकड़ी के शहतीरों का पुल बनाया गया था, जो विश्व का सबसे पहला पुल माना जाता है। इसके बाद ईसा से 600 वर्ष पूर्व ईटली की आनियों नदी पर पत्थरों का पुल बनाया गया।

भारत में पहला पुल कब बना, इस बारे में कोई निश्चित मत नहीं है, लेकिन 5000 और 3500 वर्ष ई.पू. के ग्रंथ रामायण में सेतु निर्माण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट है कि भारत में पुल के निर्माण की कला का इस्तेमाल प्राचीन काल से होता आ रहा है। 

पेरू की प्राचीन इंका सभ्यता के जमाने में भी पुलों के निर्माण का प्रचलन था, यह भी मान्यता है। लेकिन उस जमाने में पुल करीब दो सौ फुट तक लंबे हुआ करते थे। रोमनों ने भी सड़कों के निर्माण के साथ-साथ पुल-निर्माण का कार्य विकसित किया। सड़क निर्माण के दौरान रास्ते में जो भी नदी-नाले आए, उन बाधाओं को उन्होंने पुल बनाकर दूर किया।

pul ka aavishkar kaise hua

रोमनों ने 100 ई. के लगभग डैन्यूब नदी पर एक पुल बनाया था, जो 150 फुट ऊंचे खम्बों पर अवस्थित था, जिसके दोनों ओर लकड़ी की मेहराबें लगी हुई थीं। रोमन साम्राज्य के समाप्त होने के बाद लगभग एक हजार वर्ष तक यूरोप में पुल-निर्माण का कार्य गति नहीं पकड़ सका। बारहवीं शताब्दी में कुछ पुल बने, जो आर्ना , फ्लोरेंट और एल्ब नदी पर बनाए गए। इंग्लैंड में बने पहले पुल का निर्माण संभवतः रोमनो ने ही किया था। 

1176 में पीटर द कोलचर्च ने इग्लैंड में एक पत्थर के पुल का निर्माण कराया, जो लगभग 900 फुट चौड़ा था और इसमें उन्नीस मेहराबें थीं। जहाजों को रास्ता देने के लिए पुल का एक हिस्सा ऊपर खींचकर उठाया जा सकता था। 

पुलों के निर्माण में पूरी तरह लोहे का इस्तेमाल अठारवीं सदी के अंत में हुआ। 1770 में ढलवा लोहे का पहला मेहराबदार पुल बनाया गया। इसके बाद जर्मनी और फ्रांस में ऐसे पुल बनाए गए। झूलों के पुल बनाने का भी एक दौर आया, जो जंजीरों के सहारे बनाए जाते थे। मेसाचुसेट्स में मेरिमाक नदी पर सन् 1809 में बना 240 फुट लंबा झूला पुल आज भी मौजूद है। 

टासम टल्फोर्ड ने बंगोर में मेनार्ड का झूला पुल सन् 1819 से 1825 के दौरान बनाया, जो 580 फुट लंबा था। कुछ क्षेत्रों में कैंचीदार पुल भी बनाए गए। इस ढंग के पुलों के दोनों ओर, जिनकी लंबाई 1,800 फुट है, की कैंचियां दोनों किनारों पर शुरू होती हैं। 

गर्डर पुलों की शुरुआत तब हुई, जब पिटवां लोहे की तकनीक का विकास हुआ। जार्ज स्टीफेंसन के पुत्र रॉबर्ट ने सबसे पहले इस नई तकनीक के आधार पर मेनाई जलसंधि पर ब्रिटानिया गर्डर पुल का निर्माण किया। 

यह पुल 1846 से 1850 के बीच की अवधि में बनकर तैयार हुआ। इस पुल के निर्माण में पिटवा लोहे की प्लेटों और ऐगलेरन से बने नलीदार गर्डरों का उपयोग किया जाता है। गर्डर के पुल वहां बहुत उपयोगी रहते हैं, जिस जगह बहुत ज्यादा विस्तार की जरूरत नहीं होती।

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