प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान – How to Deal with Pregnancy Discomforts in Hindi

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान – How to Deal with Pregnancy Discomforts in Hindi | गर्भावस्था की परेशानियां 

गर्भावस्था के दौरान बहुत सी स्त्रियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी छोटी सी परेशानी भी मानसिक तनाव का कारण बन जाती है। गर्भ में स्थित शिशु का विकास प्रसवकाल तक होता रहता है। ऐसे में स्त्री को अपना बहुत अधिक ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि तनिक सी असावधानी भी गर्भस्थ शिशु को हानि पहुंचा सकती है। यदि गर्भावस्था में किसी भी परेशानी का शीघ्र निदान कर लिया जाए, तो यह मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए अच्छा होता है। गर्भावस्था में परिवर्तन के कारण भी स्त्री को परेशानी होती है।

 प्रेगनेंसी में  मल निकासी की समस्याएं

गर्भवती स्त्री को मल निकासी की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसका मल सामान्य होना आवश्यक है। यदि मल असामान्य हो, तो उसे हल्का और सात्विक भोजन लेना चाहिए, जिससे भोजन का पाचन शीघ्र हो जाए। मल सामान्य अथवा ठीक रखने के लिए पानी ज्यादा पीना चाहिए। इससे मूत्र तो ज्या आता है, लेकिन स्त्री को कब्ज की शिकायत नहीं होती। उसे भोजन में हो वाली सब्जियों और फलों का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए। जिस स्त्री ही कब्ज की वजह से परेशानी हो, वह मैग्नीशियम सल्फेट का प्रयोग कर सकती है। उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी दवा को लगातार न खाए और न वह किसी दवा की आदी बने। गर्भावस्था में कैस्टर ऑयल का प्रयोग न करे। अधिक परेशानी होने पर अपनी लेडी डॉक्टर से परामर्श करे। 

प्रेगनेंसी में अतिसार (दस्त)  की समस्याएं

कई बार स्त्रियों को गर्भावस्था में अतिसार (दस्त) की शिकायत हो जाती है। यदि पेट साफ होकर दस्त बंद हो जाए तो कोई बात नहीं। किंतु यदि वह कई दिनों तक बना रहे तो डॉक्टर के पास अवश्य जाना चाहिए। ऐसी स्त्रियों को उतना ही भोजन करना चाहिए, जितना कि वे भली-भांति पचा सकें। कुछ स्त्रियों को शक्तिवर्धक औषधियों, लौह पदार्थों या अधिक प्रोटीन के सेवन से भी दस्त लग जाते हैं। इस अवस्था में भोजन के साथ दही लेना चाहिए। 

वस्तुतः बंधा हुआ मल आना सामान्य सी बात है और उत्तम स्वास्थ्य की निशानी है, किंतु दस्त सदा हानिकारक और स्वास्थ्य का नाश करने वाला होता है। बहुत सी स्त्रियां अपने आहार में अनेक फलों और सब्जियों का समावेश करती हैं। उनके मल थोड़े ढीले होते हैं या उन्हें दिन में दो-तीन बार मल उत्सर्जित होता है। इसे दस्त समझकर दस्त की औषधि लेना हानिकारक है। ज्यादा परेशानी होने पर लेडी डॉक्टर की शरण में जाना अच्छा रहता है। 

 प्रेगनेंसी में कब्ज  की समस्याएं

अनेक स्त्रियों को गर्भावस्था के अंतिम मास में कब्ज की शिकायत हो जाती है। दरअसल गर्भावस्था में शरीर द्वारा रिलेक्सिन नामक हारमोन स्रवित होता है। इससे मांसपेशियां ढीली हो जाती हैं, पाचन तंत्र शिथिल पड़ जाता है और आंतों में समयानुसार भोजन आगे नहीं बढ़ पाता। इस कारण कब्ज हो जाता है। 

इसके निदान स्वरूप अधिक मात्रा में रेशेयुक्त भोजन लेना चाहिए। रेशे आंतों में भोजन को गतिशील कर देते हैं। वैसे गर्भावस्था में कब्ज होना एक सामान्य बात है। किंतु जो स्त्री यह समझती है कि उसे कब्ज हो गया है, वह ब्रेड (डबलरोटी), चावल एवं मैदे की बनी वस्तुएं कम प्रयोग करे तथा बिना छने आट की रोटी और दाल खाए। फल, सलाद और हरी सब्जियां अधिक मात्रा में ले। एक मुनक्का गरम दूध के साथ खाए। इसबगोल की भूसी (एक बड़ा चम्मच) का प्रयोग करे। सूखे अंजीर और भिंडी खाए। तरी वाली सब्जियां लाभप्रद रहती हैं। पानी अधिक पिए तथा प्रसव से पहले ही कब्ज की शिकायत दूर कर ले। 

प्रेगनेंसी में वायु विकार की समस्याएं

यदि वायु निकलने के समय कोई आवाज हो या बदबू फैल जाए, तो स्त्री को लज्जा का सामना करना पड़ता है। उस समय आसपास बैठे लोगों से नजरें मिलाना मुश्किल हो जाता है। गर्भावस्था में स्त्री की आंतों पर दबाव और हारमोंस के कारण गैस बनने लगती है। चूंकि आंतों में भोजन धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, इस कारण गैस बनना स्वाभाविक है। ऐसे में गर्भवती स्त्री को चाहिए कि जब उसके गैस पास होने वाली हो तो लोगों के पास से हटकर एकांत में चली जाए और वायु को बहुत धीरे से निकाले। जिस गर्भवती स्त्री को अधिक वायु बनती हो, उसे भारी भोजन नहीं करना चाहिए। वह हल्के और तरल भोजन को प्राथमिकता दे।

प्रेगनेंसी में  पैरों में सूजन की समस्याएं

गर्भावस्था में स्त्री का वजन काफी बढ़ा हुआ होता है। सामान्य स्त्री का वजन भी पांच-छह किलो तक बढ़ जाता है। बहुत सी स्त्रियां अपने शरीर का वजन दस-बारह किलो तक बढ़ाने में सफल हो जाती हैं। इस अतिरिक्त वजन के बढ़ जाने से अनेक स्त्रियों के पैरों में कुछ सूजन आ जाती है, जो कष्टकारी तो होती ही है, उससे उन्हें चलने में परेशानी भी होती है। 

सजन से ग्रस्त स्त्री को अपने शरीर का सतुलन बनाए रखना चाहिए। अवस्था में चलते समय गिर जाना हानिकारक हो सकता है। पैरों में ऊंची है बजाय सपाट चप्पल पहनना अच्छा रहता है, ताकि शरीर का बैलेंस बना रहे को वह नंगे पांव चले, खुली हवा में घूमे और लंबी सांसें ले तथा पैरों का हल्का व्यायाम करे। किंतु चलने या व्यायाम से थकान नहीं होनी चाहिए। 

प्रेगनेंसी में अम्लशूल  की समस्याएं

जब भोजन का थोड़ा सा भी अंश भोजन की नली में पुनः प्रवेश कर जाता है, तब अम्लशूल या जलन का अनुभव होता है। इसके निदान हेतु यह आवश्यक है कि भरपेट भोजन न किया जाए, अर्थात उदर को पूरी तरह न भरा जाए और उसे एकदम खाली भी न रखा जाए। रात में भरे पेट सोने से बेचैनी बढ़ती है। यदि अधिक बेचैनी हो तो टेक लेकर सोने का प्रयास करें। रात्रि का भोजन शाम साढ़े सात बजे तक कर लें। भोजन में सलाद और पत्तेदार हरी सब्जियों का प्रयोग न करें। पेट भरकर कुछ न खाएं और दूध ठंडा करके धीरे-धीरे पिएं। 

प्रेगनेंसी में उल्टी की समस्याएं

समयानुसार भोजन का आंतों में न बढ़ना, पेट में अफरा, वायु विकार और पाचन शक्ति का कमजोर होना, शरीर से पाचक द्रव अधिक निकलना, अम्ल का होना, भोजन से कम मात्रा में लाभदायक पदार्थों का शोषण होना और सदा कब्ज बना रहना आदि उल्टी होने के मुख्य कारण हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के शुरू में गोनेडोट्रॉपिन हारमोंस के शीघ्रता से बढ़ने के कारण भी उल्टियां होती हैं।

मुख्यतया गर्भावस्था में आंतों तथा आमाशय का आकुंचन घट जाता है, जिससे पाचन तंत्र से भोजन के चलने की गति धीमी पड़ जाती है। इससे पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है तथा उल्टी होने लगती है। दूसरी ओर गर्भावस्था के शुरू और गर्भावस्था के अंत में कब्ज का होना भी उल्टी का कारण बन जाता है। 

गर्भवती स्त्री प्रायः दिन या रात में किसी भी समय उल्टी का अनुभव कर सकती है। यह सामान्यत: तब होता है, जब पेट बहुत खाली हो या आवश्यकता से अधिक भरा हो अथवा पेट या स्तनों पर वस्त्र बहुत कसा हुआ हो या बहुत तीव्र सुगंध हो। ये सब कारण भी उल्टी को बुलावा देने वाले हैं। 

लेकिन समयानुसार उल्टियां कम हो जाती हैं। क्योंकि शरीर में हारमोंस की मात्रा शुरू के मुकाबले कम होने लगती है, इसीलिए उल्टियां कम हो जाती है। प्रायः गर्भावस्था के तीन-चार मास बाद भी गंभीर उल्टियों का जारी रहना आत वमन’ या हाइपरमेसिस कहलाता है। बहत ज्यादा उल्टियां करने वाली स्त्री का बीमार ही कहा जाएगा, क्योंकि वह खाया हुआ कुछ भी नहीं पचा पाती। 

यद्यपि उल्टियों से गर्भस्थ शिशु को कोई हानि नहीं पहुंचती, किंतु इससे स्त्री के शरीर में दुर्बलता आ जाती है तथा शरीर का वजन कम हो जाता है। यदि बह तरल पदार्थों को भी न पचा पा रही हो, तो उसे ग्लूकोज चढ़ाया जाना अनिवार्य हो जाता है। इसके लिए तुरंत डॉक्टर की सहायता ली जानी चाहिए। 

 प्रेगनेंसी में पैरों में ऐंठन की समस्याएं

यदि शरीर में मिनरल, विटामिन-बी और ई तथा कैल्शियम आदि की कमी हो जाए, तो गर्भवती स्त्री के पैरों की मांसपेशियों में ऐंठन होने लगती है। यह ऐंठन अत्यधिक पीड़ा पहुंचाने वाली होती है। इस प्रकार की ऐंठन अधिकतर गर्भावस्था के अंतिम समय में होती है। इस ऐंठन का प्रकोप पैरों में ही अधिक होता है। इसके निदान हेतु पैरों में रक्त प्रवाह बनाए रखना बहुत आवश्यक है। 

पैरों में ऐंठन होने पर व्यायाम आदि से बहुत सहायता मिलती है। जब भी गर्भवती स्त्री को समय मिले या रात्रि में सोते समय वह घुटने और पैर के जोड़ों से कई बार पैरों को मोड़ने का व्यायाम करे। पैर के जोड़ से मांसपेशियों का पूर्ण व्यायाम हो जाता है। फिर एड़ी के बल चलना, पंजों पर शरीर का भार डालकर चलने का प्रयास करना तथा पैरों के किनारों पर चलने से भी बहुत लाभ होता है। प्रत्येक अवस्था में दस से बारह कदम चलना ही काफी होता है। 

यदि मांसपेशियों में ऐंठन अधिक हो, तो हल्की मालिश करने से आराम मिलता है। इसके साथ ही पंजों को चेहरे की ओर अंदर की तरफ ले जाने से भी आराम हो जाता है। इसके अलावा दोनों पैरों के अंगूठों को अंदर की तरफ मोड़कर धीरे-धीरे मांसपेशियों को दबाना और मोड़ना भी लाभदायक है। गरम पानी की बोतल से सिंकाई करने से भी आराम पहुंचता है। यह सिंकाई रात को बिस्तर पर जाने के समय करनी चाहिए। अपने भोजन में कैल्शियम, विटामिन, दूध, दूध से बने पदार्थ, दाल, सलाद और सब्जियों का प्रयोग अधिक करें। पानी में नमक मिलाकर और उसमें नींबू निचोड़कर पीने से भी काफी लाभ होता है। 

प्रेगनेंसी में नाक सूजना  की समस्याएं                 

गर्भावस्था में प्रसव की तैयारी के निमित्त कुछ हारमोन स्रवित होने लगते हैं। इस कारण कभी-कभी नासिका के अंदर की श्लेष्म झिल्ली में सूजन आ जाती है। एसे में यह प्रतीत होता है, जैसे नाक अंदर से सूज गई हो। इससे नाक का स्पर्श करने से भी पीड़ा होती है। इस हारमोन का स्राव बच्चेदानी का मुख और योनि को मुलायम करने के निमित्त होता है। गर्भावस्था के अंतिम दिनों में कुछ स्त्रियों को जुकाम की भी शिकायत हो जाती है। इन व्याधियों के होने से प्रसवकाल में कोई परेशानी नहीं होती। सूजन या जुकाम की अवस्था में किसी दवा का प्रयोग कर करना चाहिए। अगर परेशानी ज्यादा हो, तो डॉक्टर को अवगत कराएं। 

प्रेगनेंसी में  कमर दर्द  की समस्याएं 

ऐसी बहुत कम स्त्रियां होती हैं, जो गर्भावस्था में कमर दर्द से परेशान न हो वरना अधिकतर स्त्रियां कमर दर्द से पीड़ित रहती हैं। इसका एक कारण यह है कि गर्भावस्था में स्त्री के शरीर का वजन काफी बढ़ जाता है, दूसरे पेट व कमर की मांसपेशियों की सहायता से गर्भस्थ शिशु के भार को संभाला जाता है। यदि मांसपेशियां दुर्बल होती हैं, तो बैकबोन (कमर की हड्डी) पर बहुत ज्यादा दबाव रहता है। यदि ये मांसपेशियां मजबूत होती हैं और तनी रहती हैं, तो कमर की हड्डी पर शिशु का दबाव कम रहता है। इस अवस्था में कमर दर्द नहीं होता। 

दरअसल गर्भवती स्त्री के शरीर का बढ़ा हुआ भार मांसपेशियों और कमर की हड्डियों पर सर्वाधिक पड़ता है और यही भार कमर दर्द का कारण बन जाता है। दूसरे यदि शरीर में कैल्शियम या प्रोटीन की कमी हो, तो इसकी वजह से भी कमर दर्द हो जाया करता है। कुर्सी पर गलत तरीके से बैठने पर भी कमर दर्द होता है। लेकिन यदि सही स्थिति में बैठा जाता है, तो कमर दर्द नहीं होता। यदि पहले से कमर दर्द होता है, तो उसमें भी आराम हो जाता है। 

बैठने की सही और गलत स्थिति

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान

जब कोई स्त्री खड़ी होती है, तो गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव उसको पूरे समय नीचे की ओर खींचता है, किंतु वह गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध अपनी मांसपेशिया योग द्वारा अपने आपको सीधा रखती है। यदि स्त्री अपनी कुछ मांसपेशियों शिथिल करती है, तो इस शिथिलता से उसकी दूसरी मांसपेशियां समायोजन निमित्त कस जाती हैं। इसके परिणाम स्वरूप खड़े होने का गलत ढंग शरीर के दूसरे भागों तथा कमर में दर्द उत्पन्न कर देता है। 

खड़े होने की सही और गलत स्थिति

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान

जो गर्भवती स्त्री अपने नितंबों को बाहर करके खड़ी होती है, उसकी रीढ़ पर अधिक दबाव पड़ता है, अतः एकदम सीधे खड़े होना चाहिए, कुछ तनकर! उसे चाहिए कि वह अपने नितंबों को खींचकर अंदर रखे तथा अतिरिक्त वजन को ऐसे ही छोड़कर अधिक खिंचाव देने की अपेक्षा पेट की मांसपेशियों द्वारा सहारा दे। इससे वह दिखने में भी अच्छी लगेगी तथा स्वयं भी अच्छा अनुभव करेगी। दूसरे थकान या कमर दर्द भी उसे परेशान नहीं करेंगे। इस प्रकार खड़े होने का दूसरा लाभ यह है कि प्रसव के बाद उसका पेट शीघ्र ही चपटा और समतल हो जाएगा। 

उदरीय मांसपेशियों को कसकर रखने से गर्भस्थ शिशु को कोई हानि नहीं पहुंचती। गर्भाशय में शिशु एम्निओटिक तरल द्वारा बड़ी सुविधा के साथ रहता है। उसे नाभि नाल द्वारा ऑक्सीजन मिलती है तथा वह आंतों, मूत्राशय, यकृत एवं अन्य अंगों को धकेलकर अपने लिए स्वयं स्थान बना लेता है।

प्रत्येक गर्भवती स्त्री को अपने भोजन में कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा अधिक लेनी चाहिए। उसे ऐसी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए, जिसमें ये पदार्थ भरपूर हों। साथ ही समय के अनुसार कोई हल्का व्यायाम करे। शरीर से इतना आधक कार्य न करे, जिससे अत्यधिक थकान का अनुभव हो। उपरोक्त चित्र में खड़ होने की स्थिति को दर्शाया गया है। एक स्थिति गलत है और दूसरी स्थिति सही है। अत: वह सदैव सही स्थिति में खड़ी हो। जब भी झुककर किसी वस्तु को उठा हो अथवा झुककर कोई कार्य करना हो तो सही स्थिति में बैठकर करे या भार उठा क्योंकि गलत स्थिति में किया गया कार्य कमर दर्द उत्पन्न कर सकता है। गर्भावस्था में दोनों पैरों पर शरीर का भार डालना चाहिए और समय-समय पर मांसपेशियों को तनाव भी देते रहना चाहिए। उन्हें शिथिल नहीं करना चाहिए। 

भार उठाने की सही और गलत स्थिति

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान

जब भी कमर दर्द हो तो आराम करिए। घर का कार्य करते समय भी बीच बीच में थोड़ा आराम करती रहिए। लेटते या सोते समय एक छोटा सा पतला तकिया कमर के नीचे कुछ समय के लिए लगाया जा सकता है, जिससे कमर को आराम मिल सके। यदि स्त्री को कमर दर्द हो, तो चारपाई पर नहीं लेटना चाहिए। लकड़ी के प्लाईवुड वाले पलंग पर बिछे गद्दे पर लेटना अच्छा रहता है। वह पीठ के बल लेटकर एक छोटे तकिये या कुशन को अपनी पीठ की अवतलता में रखे तथा पैरों को समतल रखते हुए पैरों को घुटनों तक झुकाए। यदि करवट लेकर सोना हो तो एक तकिये को पैरों के बीच में तथा एक को पेट और बिस्तर के बीच में रखे। गर्भवती स्त्री सोते समय ढीले सूती वस्त्र धारण करे अथवा गाउन पहने। 

जैसे-जैसे प्रसवकाल समीप आने लगता है, वैसे-वैसे कूल्हे की हड्डिया के लिगामेंट जो दो जोड़ों को बांधते हैं, ढीले पड़ने लगते हैं। इस कारण स्त्री के कूल्हे में दर्द रहने लगता है। जब भी इस दर्द का अनुभव हो, तो स्त्री को आराम करना चाहिए। कई बार दर्द कूल्हे की हड्डियों से पैर के पिछली ओर चला जात है। इसमें भी आराम करने से लाभ होता है। कभी-कभी गलत ढंग से उठने बैठने लेटने या खड़े होने से गर्भवती स्त्री की पीठ में दर्द होने लगता है। यह दर्द भारी स्तनों के लटकने से होता है। इसके निदान के लिए स्त्री को ऐसी ब्रा पहननी चाहिए, जिससे उसके स्तनों में कसाव तो न हो, अपितु वह उनके भार को अच्छी तरह से साध ले। यदि परेशानी ज्यादा हो, तो अपनी डॉक्टर की राय ले। 

प्रेगनेंसी में  स्तन पीड़ा की समस्याएं 

जैसे-जैसे गर्भस्थ शिशु का आकार बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे स्तनों या स्तनों के नीचे पसलियों में पीड़ा का आभास होने लगता है। यह एक सामान्य बात है, इसमें घबराना नहीं चाहिए। इस पीड़ा का कारण यह है कि गर्भ में शरीर की वृद्धि होने के साथ ही शिशु नीचे से ऊपर की ओर वक्षस्थल के निकट तक के स्थान को घेर लेता है तथा मां के यकृत, उदर आदि को वस्तिगुहा की ओर सरका देता है। जब भी इस प्रकार की पीड़ा हो, तो गर्भवती स्त्री अपने हाथों को अपने सिर की सीध में ऊपर की ओर फैलाए। इस क्रिया से आराम महसूस होने लगेगा। 

प्रेगनेंसी में  दर्द एवं थकान  की समस्याएं 

गर्भ में शिशु के विकास के साथ कूल्हे की हड्डियों के जोड़ भी मुलायम होते जाते हैं, जिससे प्रसव के समय शिशु को अधिकाधिक स्थान मिल जाए तथा हड्डियां आसानी से पीछे की ओर धकेली जा सकें। जब ऐसा होता है, तो पेट और टांगों में दर्द की अनुभूति होने लगती है। इसी प्रकार कभी-कभी प्रसव के भय, शरीर की चिंता, पारिवारिक या मानसिक तनाव अथवा उच्च रक्तचाप के कारण सिर दर्द भी हो जाता है। इस अवस्था में अपना रक्तचाप चैक कराकर डॉक्टर के निर्देशानुसार कोई हल्की दर्द निवारक गोली ले लेनी चाहिए। 

कई बार किसी स्त्री के दाईं ओर की पसलियों के ऊपरी तरफ दर्द हो जाता है। इसका कारण यह है कि गर्भावस्था के अंतिम दिनों में बच्चेदानी की ऊपरी सतह पसलियों के नीचे की सतह को दबाने लगती है, जिससे स्त्री दर्द महसूस करती है। चूंकि बच्चेदानी दाईं तरफ अधिक बढ़ती है, इसलिए दर्द भी पसलियों में दाईं ओर होता है। यह दर्द लेटने या चलने की अपेक्षा बैठने से अधिक होता है।

इस दर्द से पीड़ित गर्भवती स्त्री को चाहिए कि वह मूत्र-त्याग करती रहे और मूत्राशय को कभी मूत्र से भरा न रखे ताकि बच्चेदानी का दबाव पसलियों पर कम हो जाए। बच्चे का सिर जैसे ही कूल्हे की हड्डियों में जाकर जमता है, दर्द स्वय ही कम हो जाता है। इस अवस्था में बच्चेदानी कुछ नीचे की ओर आ जाती है। यह दर्द पहली गर्भावस्था में ही महसूस होता है। इसके बाद की गर्भावस्था में यह दर्द बहुत कम अनुभव होता है या होता ही नहीं है। संतुलित भोजन, गहरी निद्रा और शांत चित्त गर्भवती स्त्री के लिए लाभप्रद है। यदि शरीर में रक्त की कमी अथवा थकान के कारण दर्द रहता हो, तो वह भी इससे दूर हो जाता है। 

 प्रेगनेंसी में  अनिद्रा की समस्याएं

गर्भवती स्त्री के गर्भ के पहले तीन मास दिल घबराने, उल्टी होने अथवा जी मिचलाने में निकल जाते हैं, क्योंकि इस समय उसके शरीर में हारमोंस का तेजी से स्राव होता है। इस कारण उसके सम्मुख निद्रा न आने की समस्या उठ खड़ी होती है। फिर आगे के तीन मास में स्त्री को शिशु की हलचल का अनुभव होने लगता है। इस कारण उसे निद्रा नहीं आती। यदि वह निद्रालीन हो तो भी उसकी आंखें खुल जाती हैं और पेट पर हाथ रखकर वह इस हलचल का आनंद लेने लगती है। तब निद्रा उसकी आंखों से कोसों दूर हो जाती है। 

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता रहता है, वैसे-वैसे गर्भवती स्त्री की निद्रा भी दूर होती जाती है। इस समय उसके शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। पेट का बढ़ना, अधिक मूत्र आना, सांस लेने में सुविधा होना, अत्यधिक अपान वायु निकलना, भूख की अधिकता, दस्त लग जाना, खुजली, थकान तथा दर्द आदि के कारण वह रात में अच्छी तरह नहीं सो पाती। इससे मस्तिष्क की नसों में शिथिलता आ जाती है। कभी-कभी किन्हीं चिंताओं के कारण भी निद्रा नहीं आती। रात्रि में बार-बार मूत्र के लिए उठना भी अनिद्रा का एक कारण है। 

 ऐसी स्थिति में निद्रालीन होने के लिए किसी दवा का प्रयोग कतई न करे, बल्कि लेटे-लेटे टी.वी. देखें, कोई गीत सुनें या गुनगुनाएं अथवा कोई पुस्तक या पत्रिका पढ़ें।  बिस्तर पर जाने से पहले गुनगुने जल में थोड़ा सा नमक डालकर में गहरी सांस लें, योग-क्रिया या कोई ऐसा आसन करें, जो निद्रा लाने में मक हो, लेकिन गर्भ के बच्चे को कोई हानि न पहुंचे। लेटने से पहले थोडा सा गरम दूध पीने से भी आराम मिलता है और निद्रा आ जाती है। 

प्रेगनेंसी में  झनझनाहट, सुन्नपन एवं सूजन  की समस्याएं 

प्रेगनेंसी में होने वाली समस्याएं और उनका समाधान

कई बार देखने में आया है कि प्रात: के समय गर्भवती स्त्री के हाथों में वयनाहट सी होती है, साथ ही उनमें सुन्नपन भी आ जाता है। ऐसा हाथों एवं कलाइयों में द्रव संचित हो जाने तथा शिराओं पर दबाव पड़ने के कारण होता है। ऐसी स्थिति में हल्का व्यायाम करने से लाभ हो जाता है। 

इसके अलावा गर्भवती स्त्री अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर करके रखे तथा उंगलियों को छत की ओर करे। फिर अपनी मुट्ठियों को बारी-बारी से खोले और बंद करे। आहार में नमक की मात्रा कम कर दे। इसी से झनझनाहट और सुन्नपन में आराम हो जाएगा। रक्त संचार सुचारु रूप से हो, इसके लिए कुछ व्यायाम करना आवश्यक होता है। बहुत से डॉक्टर फिजियो थेरैपी कराने की राय देते हैं, किंतु गर्भावस्था में इस बारे में विचार तक नहीं करना चाहिए। 

गर्भावस्था में गर्भवती स्त्री के शरीर में रक्त का संचार कम हो जाता है तथा शरीर का भार भी बढ़ जाता है। इस कारण हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है। यह सूजन पानी की अधिक मात्रा के कारण आती है। गरमी में एवं अत्यधिक श्रम करने के कारण भी सूजन आ सकती है, किंतु आराम करने अथवा ठंडा मौसम आते ही सूजन दूर हो जाती है। यदि आराम करने से लाभ न हो और मौसम का भी कोई प्रभाव न पड़े, तो तुरंत अपनी डॉक्टर के पास जाना चाहिए। 

इस अवस्था में ज्यादा देर तक खड़े नहीं रहना चाहिए। बैठी अवस्था में भी पैरों पर अधिक जोर नहीं डालना चाहिए। आहार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाकर नमक की मात्रा कम कर देनी चाहिए। मांस, मछली, अचार और सिरका आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो परहेज डॉक्टर बताए, उस पर अमल करना चाहिए। 

प्रेगनेंसी में  रक्त की कमी  की समस्याएं

शरीर को चलायमान रखने वाला रक्त ही है, इसी से जीवन है। रक्त के अभाव में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। गर्भस्थ शिशु को ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुचाने का कार्य रेड सेल्स (लाल कोशिकाओं) का होता है। यदि ये (हीमोग्लोबिन) ना प्रतिशत से कम हो जाएं, तो स्त्री को एनीमिक कहते हैं। रक्त की कमी । क शरीर में सूजन आना, सांस फूलना, शरीर में दुर्बलता, जरा सी बात पर । आ जाना एवं थकान आदि हो जाती है। रक्त की कमी वाली स्त्रियों को अपना वजन बढ़ाने का प्रयास नहीं करना चाहिए, क्योंकि वजन बढ़ने से शरीर को अधिक ऑक्सीजन युक्त रक्त की आवश्यकता होती है।

डॉक्टर गर्भवती स्त्री के रक्त की जांच बार-बार इसलिए कराती है कि कहीं उसके शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी तो नहीं है। यदि शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होती है, तो वह स्त्री को रक्त बढ़ाने के उपाय सुझाती है। भोजन में ऐसे लौह पदार्थ लेने की हिदायत देती है, जिससे रक्त की मात्रा बढ़े। कभी-कभी गर्भवती स्त्री को अलग से रक्त चढ़ाना भी आवश्यक हो जाता है। 

प्रेगनेंसी में  श्वास अवरोध की समस्याएं

गर्भावस्था बढ़ने के साथ-साथ बच्चेदानी का आकार भी बढ़ता जाता है तथा गर्भाशय फेफड़ों की ओर दबाव डालने लगता है। फेफड़ों पर दबाव बढ़ने के कारण सांस लेने में बाधा उत्पन्न होने लगती है। यदि गर्भवती स्त्री अधिक कार्य करती है या सीढ़ियां चढ़ती-उतरती है, तो उसे सांस में अवरोध का अनुभव होने लगता है। ऐसे में गहरी सांस लेने की जरूरत पड़ती है। यदि गर्भ में जुड़वां बच्चे हों, तो श्वास अवरोध की समस्या अधिक बढ़ जाती है।

गर्भवती स्त्री को जब भी श्वास संबंधी समस्या आए तो उसे पलंग आदि पर लेटकर आराम करना चाहिए। उसे अधिक श्रम नहीं करना चाहिए और न ही भार उठाने की कोशिश करनी चाहिए। सीढ़ियां भी अधिक बार नहीं चढ़नी चाहिए। प्रसव के बाद श्वास अवरोध की समस्या अपने आप समाप्त हो जाती है।

प्रेगनेंसी में मूत्र विकार  की समस्याएं

गर्भवती स्त्री को दिन-रात में अनेक बार मूत्र-त्याग करने जाना पड़ता है, क्योंकि विकसित गर्भाशय यूरिनरी ब्लेडर (मूत्र की थैली) पर दबाव डालता है तथा मूत्र को एकत्र करने वाले स्थान को संकुचित कर देता है। इस कारण बार-बार मूत्र आने लगता है। गर्भवती स्त्री को मूत्र रोकने का प्रयास कभी नहीं करना चाहिए। प्रसव के बाद यह परेशानी स्वतः दूर हो जाती है। यदि गर्भवती स्त्री मूत्र से ज्यादा परेशान हो, तो उसे तरल पदार्थ कम मात्रा में लेना चाहिए। 

कभी-कभी गर्भावस्था में मूत्राशय अथवा मूत्र नलिका में इंफेक्शन (संक्रमण) हो जाता है। इसका कारण सफाई आदि में त्रुटि होती है। स्त्री के मूत्रद्वार, योनि और गुदा पास-पास होते हैं। किसी भी एक की सफाई में कमी रह जाने से संक्रमण अपने पांव पसार लेता है। संक्रमण की अवस्था में मूत्र-त्याग की इच्छा बार-बार होती है तथा मूत्र करते समय जलन और पीड़ा का अनुभव होता है। मूत्र भी गाढ़ पीले रंग का होता है। सूजन आदि होने पर धारीदार रक्तयुक्त मूत्र आता है। 

कई गर्भवती स्त्रियां मल विसर्जन के बाद अपनी गुदा को अच्छी तरह नहीं धोती हैं, इसलिए मल के रोगाणु शीघ्रता से योनि या मूत्रद्वार में चले जाते हैं। इसी से मूत्रनली आदि में संक्रमण हो जाता है। संक्रमण होने पर तत्काल डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए, क्योंकि समय रहते इसका उपचार आवश्यक है। 

यदि समय रहते संक्रमण का उपचार न किया जाए, तो यह अत्यधिक पीडायुक्त तथा खतरनाक हो जाता है। जैसे ही संक्रमण के लक्षण दिखाई दें, वैसे ही हर आधे घंटे बाद आधा लीटर जल पीती रहें। इसके अलावा नींबू और जौ का पानी या लस्सी भी ली जा सकती है। एक कप जल में एक चम्मच सोडा बाई कॉर्ब घोलकर पीने से भी लाभ होता है। इसके अतिरिक्त प्रात:काल उठकर दो गिलास जल पिएं और मूत्रद्वार, योनि तथा गुदा को जल द्वारा अच्छी तरह धोएं। संक्रमण की हालत में गुदा को साबुन लगाकर धोना चाहिए। 

योनि संक्रमण 

गर्भवती स्त्री की योनि से स्राव होना एक सामान्य बात है। यह स्राव योनि की सफाई करने तथा उसे संक्रमण से बचाए रखने के लिए होता है। ऐसे में बच्चेदानी साफ तथा चिकनी बनती है, जिससे प्रसव के समय कोई परेशानी नहीं होती। किंतु यदि गर्भवती स्त्री यह देखे कि योनि से निकलने वाला स्राव हरे या पीले रंग का है, जिसके निकलने से जलन एवं खुजली होती है और उस गाढ़े स्राव के निकलते समय दुर्गंध भी आती है, तो उसे समझ लेना चाहिए कि योनि संक्रमण हो गया है। तब डॉक्टर की राय लेना आवश्यक हो जाता है। 

बवासीर

गर्भवती स्त्री को बवासीर की वजह से काफी परेशानी होती है। जब गर्भावस्था में बच्चे के सिर का दबाव रक्त धमनियों पर पड़ता है अथवा पेट की धमनियों पर बच्चेदानी का दबाव पड़ता है तो बवासीर की शिकायत हो जाती है। इस रोग का दूसरा कारण अधिक मात्रा में प्रोजेस्ट्रॉन हारमोंस का उत्पादन भी है। इससे मांसपेशियां ढाली और कमजोर हो जाती हैं। इस कारण रक्त का संचार सुचारु रूप से नहीं होता। ऐसी स्थिति में गर्भवती स्त्री को बवासीर हो जाती है। 

जब बवासीर रोग का आरंभ होता है तो स्त्री को मलद्वार पर अधिक जलन र खुजली अनुभव होती है तथा गुदा के अंदर मस्से उभर आते हैं। ऐसी स्थिति मल निष्कासन के समय अत्यधिक पीडा होती है। कब्ज को भी इसका एक कारण माना गया है, अतएव इसके निदान के लिए कब्ज को दूर करना आवश्यक हैं| मामूली बवासीर गर्भावस्था के बाद स्वत: ठीक हो जाती है। ज्यादा साना की हालत में डॉक्टर से परामर्श करना अच्छा रहता है। 

हृदय की धड़कन 

कभी-कभी गर्भवती स्त्री के हृदय की धड़कन असाधारण रूप से तेज हो जाती है और कभी धड़कन इतनी मंद हो जाती है कि लोप हुई प्रतीत होती है। हृदय का मुख्य कार्य ऑक्सीजनयुक्त रक्त को स्त्री और उसके शिशु के शरीर तक पहुंचाना होता है। इस कारण हृदय की धड़कनें तेज हो जाती हैं। इसमें परेशानी वाली कोई बात नहीं है। यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसकी वजह से डॉक्टर के पास जाना पड़े। गर्भावस्था में स्त्री का हृदय तेज ही धड़कता है। 

मधुमेह 

गर्भावस्था के दौरान मधुमेह यानी डायबिटीज होने पर चिकित्सकीय भाषा में ‘गैस्टेशनल डायबिटीज’ कहते हैं। यह शिकायत गर्भावस्था के बाद स्वतः दूर हो जाती है, परंतु गर्भवती स्त्री को उपचार की आवश्यकता होती है। 

कारण-गर्भ में पल रहे शिशु के विकास के लिए आवश्यक पोषक पदार्थ उपलब्ध करना प्लेसेंटा (ओवल) का काम है। प्लेसेंटा इस कार्य के निमित्त कई प्रकार के हारमोन बनाता है। कभी-कभी ये हारमोन ग्लूकोज उपभोग की क्षमता को प्रभावित करते हैं जिससे गर्भवती स्त्री गैस्टेशनल डायबिटीज भी हो को डायबिटीज हो सकती है। 

खतरा किसमें है-यों तो किसी भी स्त्री को गर्भावस्था के दौरान मधुमेह हो सकता है, परंतु निम्नलिखित स्थितियों में खतरा बढ़ जाता है 

 30 वर्ष से अधिक आयु होना। 

मधुमेह की आनुवंशिक समस्या। 

अधिक वजन (भार) का होना।

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज (अंडाशय का रोग)। 

लक्षण-मधुमेह के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

भूख अधिक लगना। 

प्यास अधिक लगना। 

बार-बार मूत्र-त्याग के लिए जाना। 

कभी-कभी कोई भी लक्षण न मिलना। 

मधमेह के खतरे-निम्नवत स्थितियों में खतरे की आशंका होती है- 

शिशु जन्म के तुरंत बाद मां के शरीर में शुगर की कमी।

प्रसव के दौरान अधिक वजन से होने वाली परेशानियां।

बच्चों को जन्मजात अपंगता। 

मां और बच्चे को आजीवन मधुमेह का खतरा। 

मधुमेह की पहचान-गर्भावस्था के दौरान ब्लड ग्लूकोज स्क्रीनिंग टेस्ट से मधुमेह की पहचान संभव है। इस टेस्ट में स्त्री को 50 ग्राम ग्लूकोज पिलाकर एक घंटे के बाद ब्लड में ग्लूकोज की जांच की जाती है। इसे गर्भ के 24 से 28 सप्ताह के बीच किया जा सकता है। किंतु जिन स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान मधुमेह होने का खतरा ज्यादा हो, उनकी जांच 20 से 32 सप्ताह के बीच की जा सकती है। 

परामर्श-जिन स्त्रियों को गर्भावस्था के पहले से मधुमेह हो, वे नीचे दी जा रही बातों का ध्यान अवश्य रखें- 

गर्भावस्था से पूर्व चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। 

ग्लाइकोसालेटेड हीमोग्लोबिन की जांच करानी चाहिए। इस जांच से पिछले 3 माह में शुगर कंट्रोल का अंदाजा लग जाता है। 

चिकित्सकीय परामर्श से गर्भधारण करने से पूर्व ओरल हाइपोग्लाइसेमिक दवाइयां लेने वाली स्त्रियों को इंसुलिन का इंजेक्शन लेना आरंभ कर देना चाहिए। 

मधुमेह के निदान हेतु ब्लड शुगर की जांच कराएं। डॉक्टर से परामर्श लेकर नियमित रूप से व्यायाम करें। संतुलित और पौष्टिक आहार लें। ब्लड शुगर की जांच कराती रहें और आवश्यकता के अनुसार इंसुलिन भी लें। 

बेहोशी और चक्कर आना 

रक्त की कमी तथा निम्न रक्तचाप के कारण मस्तिष्क को ऑक्सीजनयुक्त रक्त जितनी मात्रा में मिलना चाहिए जब वह उतनी मात्रा में नहीं मिलता तो चक्कर आते हैं और कभी-कभी बेहोशी भी छा जाती है। गर्भावस्था के प्रथम तीन मासों में स्त्री का रक्तचाप सामान्य से कम होता है। इसलिए जो स्त्रियां पहली बार गभवती हुई होती हैं, उन्हें चक्कर आते हैं और कभी-कभी वे बेहोशी की हालत नभा पहुंच जाती हैं। इससे गर्भवती स्त्री या उसके गर्भ के बच्चे को कोई हानि 18 पहुचती। लेकिन ऐसी स्त्री को लेटने या बैठने की स्थिति से अचानक माल नहीं होना चाहिए। इसके अलावा प्रदूषण से बचना चाहिए तथा अकेले यात्रा नहीं  करनी चाहिए। जहां तक हो, उसे आराम करना चाहिए। 

खुजली 

गर्भवती स्त्री की त्वचा पर खुजली होना एक सामान्य बात है। यह कोई ऐसी बात नहीं है, जिससे घबराया जाए। यह खुजली पेट तथा स्तनों पर अधिक होती है। स्तनों पर तो लाल-लाल घमोरियां सी दिखाई पड़ती हैं। गर्भ की आरंभिक अवस्था में स्त्री की त्वचा में खिंचाव सा होता है, जिस कारण खुजली होने लगती है। अधिक पसीना आने अथवा तनाव होने पर खुजली बढ़ जाती है। 

बड़े स्तनों वाली गर्भवती स्त्रियों के स्तनों के नीचे बहुत खुजली होती है। कैलाड्रिन अथवा कैलामाइन लोशन लगाने से खुजली में आराम हो जाता है। यदि भग, योनि या कूल्हों में खुजली हो तो भग और योनि को गुनगुने पानी में डिटॉल मिलाकर धोएं तथा कूल्हे पर तेल या लोशन मलें। इससे खुजली में आराम हो जाएगा। यदि आवश्यकता पड़े, तो डॉक्टर से परामर्श किया जा सकता है। 

हाई ब्लडप्रेशर 

गर्भावस्था के दौरान कई कारणों से ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, जो मां और गर्भस्थ शिशु के लिए खतरनाक भी हो सकता है। सामान्यत: सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 100 से 130 और डायस्टोलिक ब्लडप्रेशर 60 से 90 मि.मी. मरकरी तक हो | 

गर्भावस्था में हाई ब्लडप्रेशर से बचना चाहिए सकता है। यदि ब्लडप्रेशर 130-90 की सीमा से ऊपर है, तो यह उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) कहलाता है। ऐसे में उपचार कराना आवश्यक है। 

कारण-हाई ब्लडप्रेशर के निम्नलिखित कारण होते हैं- 

गर्भावस्था के कारण उच्च रक्तचाप होना।

गर्भावस्था में टॉक्सीमिया (रक्त का विषैला होना) रोग होना।

कुछ स्त्रियों को गर्भावस्था के पूर्व हाई ब्लडप्रेशर होना। 

कई बार गर्भावस्था में हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत किडनी से संबंधित रोग अत्यधिक मोटापा, चिंता और डायबिटीज आदि के कारण होती है। 

यदि गर्भवती स्त्री को थोड़ा बहुत हाई ब्लडप्रेशर हो तो कुछ देर आराम करने और बाईं करवट लेटने से कम हो जाता है। किंतु यदि ब्लडप्रेशर के साथ सिर दर्द, मिचली, उल्टी, आंख से धुंधला दिखना, पैरों में सूजन और सांस फूलना आदि में से कोई समस्या हो, तो बात गंभीर हो जाती है। 

आहार-यदि कोई स्त्री गर्भावस्था से पूर्व ही हाई ब्लडप्रेशर से ग्रस्त है, तो उसे हृदय रोग विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञ दोनों की सेवाएं प्राप्त करनी चाहिए। हाई ब्लडप्रेशर होने पर गर्भवती स्त्री निम्नवत आहार ले 

गर्भवती स्त्री भोजन में नमक कम ले। वह लो सोडियम साल्ट (जैसे सेंधा नमक) का उपयोग कर सकती है। 

मलाईदार दूध, मक्खन, घी, तेल एवं मांसाहार से परहेज करना चाहिए। 

गर्भवती महिलाओं को पॉली अनसैचुरेटेड तेल (जैसे-सूरजमुखी के तेल) का प्रयोग करना चाहिए। 

ताजे लहसुन और अदरक के सेवन से क्लॉट्स (रक्त के थक्के) भी नहीं बनते तथा कोलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित होता है। 

प्रमुख सावधानियां 

गर्भावस्था में स्त्री निम्नवत सावधानियों की ओर विशेष ध्यान दे- 

यात्रा-सामान्य व स्थिर गर्भावस्था में स्त्री को यात्रा करने में कोई परेशानी नहीं होती। किंतु लंबी दूरी की यात्रा बस या कार से करने की अपेक्षा ट्रेन से करना बेहतर है। यात्रा में अधिक समय तक पैरों को लटकाकर नहीं बैठना चाहिए, क्योंकि इससे पैर अत्यधिक भारी हो जाते हैं तथा सूज भी सकते हैं। 

ट्रेन से यात्रा करने का एक लाभ यह है कि गर्भवती स्त्री बर्थ पर पैर फैला सकता है, थकान अनुभव होने पर लेट सकती है तथा इधर-उधर थोड़ी चहलकदमी सकता है। ऐसी बहुत सी सुविधाएं ट्रेन में यात्रा करते हुए मिल सकती हैं। 

गर्भवती स्त्री को अनेक बार मत्र-त्याग के लिए भी जाना पड़ता है, जो ट्रेन ही सभंव  है। यदि गर्भवती स्त्री को साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा अथवा किसी टू व्हीलर पर कहीं जाना हो, तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर जाने से बचना चाहिए। इन पर अधिक दूरी भी तय नहीं करनी चाहिए, थोड़ी दूर जा सकती है। 

यदि गर्भावस्था में हाई ब्लडप्रेशर है अथवा पहले कभी गर्भपात हो चुका है या गर्भावस्था के आरंभ में रक्तस्राव हआ है, तो गर्भावस्था का पसवकाल तक विमान आटि से भी यात्रा नहीं करनी चाहिए। एसा सा रखकर ही अपने गर्भ की रक्षा की जा सकती है। 

वाहन चलाना-गर्भवती स्त्री को सावधानीपूर्वक तथा निम्न गति से वाहन चलाना चाहिए ताकि अचानक ब्रेक न लगाना पड़े। अकस्मात धक्का लगने से गर्भ को हानि पहुंच सकती है। जिस स्त्री को गर्भपात का खतरा हो, उसे कभी वाहन चलाने की बात सोचना भी नहीं चाहिए। अचानक ब्रेक लगाने अथवा पहिये किसी गड्ढे में चले जाने पर रक्तस्राव हो सकता है, एम्निओटिक थैली से द्रव निकल सकता है तथा गर्भपात भी संभव है। इसलिए वाहन कदापि न चलाएं। 

तैराकी-गर्भावस्था के आरंभ में तैराकी की जा सकती है। किंतु ऊंचाई से जल में कूदना अथवा अधिक देर तक तैरना मना है। तैरते हुए शरीर को थकान का अनुभव नहीं होना चाहिए तथा अधिक ठंडे जल में नहीं तैरना चाहिए। जो स्त्री 

 पहले से तैरती आ रही हो, वह तैराकी कर सकती है। लेकिन का ईच्छा से स्विमिंग पूल में उतरना हानिकारक हो सकता है। गर्भवती स्त्री को अपने  साथ-साथ गर्भस्थ शिशु की रक्षा की बात सदैव स्मरण रहनी चाहिए |

 

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