भारत में उच्च शिक्षा का निजीकरण पर निबंध | Essay on Privatization of Higher Education in India in Hind

भारत में उच्च शिक्षा का निजीकरण पर निबंध

निजी विश्वविद्यालय अथवा भारत में उच्च शिक्षा का निजीकरण पर निबंध  (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2002) 

हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं। वैश्वीकरण में निजीकरण की निर्णायक भूमिका है। इसीलिए जैसे पहले राष्ट्रीयकरण को रामबाण समझा जाता था वैसे ही आज निजीकरण को। बीच का रास्ता निकालने वाले दोनों के समन्वय यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टीसिपेशन (PPP) की बात करते हैं। 

बढ़ते निजीकरण के दौर में शिक्षा कैसे चपेट में आने से बच सकती थी? प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में तो यह प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी। पिछले दशक में उच्च शिक्षा का तेजी से निजीकरण शुरू हुआ है। जबसे ‘सेल्फ फाइनेंसिंग का उपाय ढूंढा गया है, तब से देश के विभिन्न प्रांतों में हर जिले में कई-कई निजी विद्यालय खुलते जा रहे हैं। अब यह बाढ़ निजी विश्वविद्यालयों तक पहुंच गई है। 

वस्तुस्थिति का अंदाजा कुछ आंकड़ों से लग सकता है। ‘नेशनल नॉलेज कमीशन’ के अनुसार 2020 ई. तक भारत की आवश्यकताओं को देखते हुए 1500 नए विश्वविद्यालयों की जरूरत पड़ेगी। विद्यार्थियों और अभिभावकों की मांग है कि नए-नए विषय पढ़ाएं जायं ताकि नौकरी पाने की संभावनाएं बढ़ती जायं। भारत में मध्यवर्ग और उसकी सही-गलत आमदनी का विस्तार होता जा रहा है। इस वर्ग के विद्यार्थी विदेशों के निजी विश्वविद्यालयों की ओर मुड़ चुके हैं। जो विदेश में शिक्षा ग्रहण करने का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिए ही भारत में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ आई है। यहां वादा किया जा रहा है कि विदेशों जैसी ही गुणवत्ता 3-5 लाख रुपया सालाना में उपलब्ध करा दी जाएगी। 

जब तक सरकार समाजवाद के रास्ते पर चलने का दावा करती थी शिक्षा और स्वास्थ्य को अपनी जिम्मेदारी समझती थी। पश्वाकरण की राह पकड लेने के बाद सरकारों ने इन जैसे जन-कल्याण के क्षेत्रों से हाथ खींचना शुरू कर दिया। तब से शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में भारी पैमाने पर निजी उपक्रम शुरू हो गया। तब से भारत के उद्यमी इन क्षेत्रों में भी उसी तरह धन लगाने लगे जैसे किसी भी क्षेत्र में। यहां पुण्य कमाने, यानी जन-कल्याण करने का अतिरिक्त हथकण्डा भी उपलब्ध है। 

 “प्राचीनकाल में जब पहली बार विवविद्यालय की अवधारणा चरितार्थ हुई तो दुनिया की सभी सभ्यताओं में विवविद्यालयों में वैविकता (यूनिवर्सल) पर जोर था” 

मुद्दा बन गई है गुणात्मकता- अब क्वालिटी एजुकेशन की बात की जा रही है और मान कर चला जा रहा है कि भारत के नामी विश्वविद्यालयों में भी अपेक्षित गुणात्मकता वाली शिक्षा उपलब्ध नहीं है। यह एक बहुप्रचारित तथ्य है कि दुनिया की 50 बेहतरीन संस्थाओं में भारत की एक भी संस्था का नाम नहीं | है। ऐसे में प्राइवेट विश्वविद्यालय इसी वादे और दावे के साथ खोले जा रहे हैं कि वहां बेहतरीन शिक्षा दी जाएगी।

पहले विश्वविद्यालय का मतलब होता था जहां हर तरह की शिक्षा उपलब्ध हो। उन्नीसवीं शताब्दी तक दुनिया में विश्वविद्यालयों में मानविकी, समाज-विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान और नए-नए विषयों की भी शिक्षा भी दी जाती थी। बीसवीं सदी में नौकरी की गांरटी देने वाले विषयों यानी पेशेवर (प्रोफेशनल) विषयों का महत्व बढ़ा तो ऐसी संस्थाओं को भी विश्वविद्यालय घोषित कर दिया गया जहां कुछ विशिष्ट विषयों की ही पढ़ाई होती थी, जैसे रुड़की के भारत के पहले इंजीनियरिंग कॉलेज को विश्वविद्यालय घोषित कर दिया गया। कुछ संस्थाओं को ‘डीम्ड यूनीवर्सिटी’ यानी विश्वविद्यालय जैसी संस्था कहा जाने लगा। कुछ को ‘सेंटर ऑफ एक्सेलेंस यानी उत्कृष्टता के केन्द्र बना दिया गया। इस प्रकार शिक्षण संस्थाओं में भी जाति भेद जैसा विभेदीकरण लागू हो गया। 

प्राइवेट संस्थाएं और विश्वविद्यालय अब इसी उत्कृष्टता के दावे के साथ खुलते जा रहे हैं, विशेषकर तकनीकी यानी नौकरी देने वाली संस्था के रूप में। 

प्राचीन काल में जब पहली बार विश्वविद्यालय की अवध पारणा चरितार्थ हुई तो दुनिया की सभी सभ्यताओं में विश्वविद्यालयों में वैश्विकता (यूनिवर्सल) पर जोर था तब भी जब विश्वविद्यालयों में धर्म प्रधानता थी, चाहे नालन्दा और तक्षशिला के विश्वविद्यालय हों या आक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, सारबान्न और लाइपत्सिग के। यह बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रतीक सूत्र- आ नो भद्राः कतवो यन्तु विश्वतः’ में अभिव्यक्त है। 

“वस्तुस्थिति का अंदाजा कुछ आंकड़ों से लग सकता है। ‘नेशनल नॉलेज कमीन’ के अनुसार 2020 ई. तक भारत की आवयकताओं को देखते हुए 1500 नए विवविद्यालयों की जरूरत पड़ेगी।” 

अब मानविकी (हयूमैनिटीज) की पढ़ाई को लगाता नजरअंदाज किया जा रहा है। जब इस तरह की मानसिकता क प्रारंभ ही हो रहा था तब किसी ने रवीन्द्र नाथ टैगोर से पूछा थ ‘व्हाई हयूमैनिटीज ?’ (मानविकी क्यों)। उनका सटीक और द टूक उत्तर थाः ‘बिकाज वी आर ह्यूमन्स (क्योंकि हम मानव हैं) यह विडंबनापूर्ण सत्य है कि ज्यों-ज्यों हम कमतर मानव होते ज रहे हैं त्यों-त्यों मानविकी का तिरस्कार बढ़ता जा रहा है। 

नए-नए खुलते जा रहे निजी विश्वविद्यालयों में व्यवसायपरकता पर जोर है। यह स्वाभविक है कि व्यवसायिक संस्थाओं में व्यवसाय पर जोर हो। इससे व्यवसाय केन्द्रित समस्याएं भी पैदा होती जा रही हैं। यहां हम देख लें कि निजी विश्वविद्यालयों की लाक्षणिकताएं क्या हैं।

1. ये संस्थाएं पूरी तरह निजी पूंजी द्वारा संचालित है और प्रायः इनमें किसी एक व्यक्ति या परिवार की पूंजी लगी है।

2. कुछ विश्वविद्यालय किसी ट्रस्ट द्वारा संचालित है जिसे कुछ व्यक्ति संचालित करते हैं।

3. इस प्रकार इनके संचालन में जनतंत्र और जनहित की कोई भूमिका नहीं होती।

4.इसमें उत्कृष्टता पर जोर दिया जाता है-उत्कृष्ट परिसर, उत्कृष्ट शिक्षक, उत्कृष्ण उपकरण (प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय आदि) और मुख्यतः नौकरी की उत्कृष्ट संभावनाएं।

5.कमतर सरकारी हस्तक्षेप जैसे यू.जी.सी. की कोई निर्णायक भूमिका नहीं। 

6.फीस इतनी कि सामान्य नागरिक और निम्न मध्यवर्ग तक की, यानी देश के बहुमत की, पहुंच के बाहर ।

7. अमरीकी निजी विश्वविद्यालयों के पास भारी अनुदान होता है, उदाहरण के लिए विख्यात येल विश्वविद्यालय के पास 26 अरब से अधिक का अनुदान उपलब्ध है। इसलिए वे विद्यार्थियों को रियायतें दे सकते हैं। भारत के विश्वविद्यालयों के पास ऐसे अनुदान उपलब्ध नहीं हैं। 

निजी विश्वविद्यालय के संचालकों की अपने पक्ष में दो दलीलें हैं :

1. उच्च शिक्षा के लिए जितने संस्थाओं की आवश्यकता है भारत की सरकारें उतने संस्थान और विश्वविद्यालय उपलब्ध कराने में पूरी तरह असमर्थ हैं। और

2.सरकार समर्थित संस्थाओं का स्तर गिरता जा रहा है। वर्ष 1947 तक भारत में कुछ विद्यालयों-जैसे कलकत्ता, बाम्बे और मद्रास विश्वविद्यालय, का विश्वव्यापी महत्व था। अब उनका कोई नामलेवा नहीं रहा। ।

ये तर्क वाजिब और मुनासिब हैं। परंतु इस मुद्दे पर भी वही तर्क लागू होता है, जो विकास के मुद्दे पर लागू है-विकास किसके लिए? कहा जाता है कि वह विकास जनसाधारण के किस काम का जिससे उसकी दैनंदिन समस्याएं हल ही न हो पाएं। इसी तरह उत्कृष्ट शिक्षा उनके किस काम की जिनक लिए सामान्य उपलब्ध प्राथमिक शिक्षा भी उपयोग नहीं हो पा रही। 

परंतु इसी नाते उत्कृष्ट शिक्षा को एकदम से नकारा नहा जा सकता। आवश्यकता इस समाधान की है कि वह साधार नागरिक को भी कैसे उपलब्ध कराई जा सके। लक्ष्य ता होना चाहिए कि समस्त शिक्षा उत्कृष्ट हो और वह स उपलब्ध हो। यह कठिन तो है पर असंभव नहीं। 

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