प्रेरणादायक कहानियां-आपस की एकता,संत की सरलता,जमीन से जुड़े रहना ही श्रेयस्कर,पश्चाताप की आग

प्रेरणादायक कहानियां- आपस की एकता

 प्रेरणादायक कहानियां- आपस की एकता

पानीपत की तीसरी लड़ाई अहमदशाह अब्दाली और मराठों के मध्य पूरे जोर-शोर से चल रही थी। दोनों पक्ष वीरता के साथ विजय के लिए लड़ रहे थे। अब्दाली के पास आधुनिक हथियार थे। उसकी बंदूकें काफी घातक थीं। हालांकि मराठा सैनिक भी पूरी दिलेरी और बहादुरी से लड़ रहे थे ताकि अब्दाली पर शीघ्रातिशीघ्र जीत हासिल कर लें। 

ऐसे ही युद्ध जारी रहने के दौरान अब्दाली अपने सैनिक शिविर में बैठा था और अपने मंत्री और सेनापति से युद्ध-नीति के बारे में चर्चा कर रहा था, तभी उसके एक मुलाजिम ने उसके पास आकर सूचना दी कि रसद समाप्त हो रही है। यदि जंग जल्दी ही समाप्त न हुई तो हम भारी विपत्ति में फंस जाएंगे। 

अब्दाली पहले तो चिंतित हुआ, फिर कुछ देर सोचने के बाद बोला. “चिंता मत करो। हम यह जंग जल्दी ही जीत लेंगे। वहां देखो, उस पहाड़ी पर मराठे सैनिकों के अलग-अलग तबके अपना भोजन अलग-अलग बना रहे हैं। इतना ही नहीं, वे अपना पानी भी अलग-अलग ही रखते हैं। ऐसे में वे कब तक एक होकर युद्ध कर पाएंगे? जबकि उनमें एकता ही नहीं है।” 

 और वास्तव में ऐसा हुआ भी। मराठे उस युद्ध में अब्दाली से पराजित हो गए। कहने का मतलब यह है कि ईश्वर ने सभी इंसानों को जिस एक सांचे से बनाया है, उसी के अनुसार हमारे मन, वचन और कर्म रहने पर सफलता सुनिश्चित रहती है। इसके विपरीत तुच्छ स्तरों पर भेदभाव निर्मित कर लेने से पराजय ही हाथ लगती है। 

प्रेरक कहानियां-संत की सरलता

काशी में संत कबीरदास की ख्याति चरम पर थी। फिर भी वह एक अत्यंत साधारण व्यक्ति की तरह बिना किसी तामझाम के रहते थे। वह दिन भर करघे पर बुनाई करते और स्वयं में मस्त रहते थे। कोई उनसे मिलने आता तो बड़ी सहजता से बात करते थे, लेकिन बातचीत में अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते थे। उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वे इतने बड़े संत हैं। 

प्रेरक कहानियां-संत की सरलता

एक दिन काफी दूर से एक व्यक्ति उनसे दीक्षा लेने के लिए आया। शहर से दूर रहने के कारण उसने जगह-जगह कबीरदास का पता पूछा, किंतु किसी ने सही पता नहीं बताया। अंत में निराश होकर वह एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां से कबीर बीच चौराहे पर बैठे दिखाई पड़ रहे थे। वहां पहुंचकर उसने किसी से कबीर के बारे में जानकारी ली। उस व्यक्ति ने कहा कि सामने चले जाओ। बीच चौराहे पर मुंह नीचा किए जो व्यक्ति बैठा है, वही कबीरदास हैं। वह व्यक्ति 

चौराहे पर गया और कबीरदास के सिर को जोर से हिलाते हुए उसने पूछा, “क्या आप ही संत कबीर हैं?” 

कबीरदास कुछ नहीं बोले । वह दोबारा निकटवर्ती एक दुकानदार के पास पहुंचा और उससे पूछा कि क्या वाकई जो व्यक्ति चौराहे पर बैठा है, वही कबीरदास है ? दुकानदार ने आश्वस्त करते हुए उससे कहा कि हां, वही है। यह सुनकर वह व्यक्ति पश्चाताप की मुद्रा में भागता हुआ कबीरदास के पास आया और उनके पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाते हुए बोला कि संत मुझसे गलती हो गई। मैंने आपके सिर को हिलाया, उससे आपके सिर में चोट तो नहीं आई? मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं तो आपसे दीक्षा लेने आया था। कबीर ने शांत भाव से उस साधक की ओर देखा और हंसते हुए कहा कि मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। आदमी जो दस पैसे की हांड़ी लेता है, उसे भी कई बार ठोक बजाकर खरीदता है। तुम तो मुझे पूरे जीवन के लिए गुरु बनाने आए हो। इसके बाद कबीरदास ने उस व्यक्ति को अपना शिष्य बना लिया। 

जमीन से जुड़े रहना ही श्रेयस्कर

विद्वानों और कलाकारों ने कभी भी समाज के ऐसे वर्ग की परवाह नहीं की है, जो उन्हें एक वस्तु की तरह धन से खरीद कर अपने ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाना चाहता है। आम लोगों के बीच जाने और उन्हें अपना बनाने से ही उन्हें ख्याति प्राप्त हुई है। 

जमीन से जुड़े रहना ही श्रेयस्कर

चार्ल्स डिकेंस इंग्लैंड के विख्यात कथाकार हुए हैं। अपने श्रेष्ठतम मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्होंने काफी संघर्ष किया था। धीरे-धीरे डिकेंस की रचनाएं विभिन्न समाचार-पत्रों में प्रकाशित होना आरंभ हुईं और उनका एक पाठक वर्ग विकसित होने लगा। 

चार्ल्स इस प्रकाशन के सिलसिले को निरंतर बढ़ाते हुए देश के विभिन्न स्थानों पर स्वयं भी जाते और अपनी रचनाएं लोगों को सुनाते। लोग उनके मुख से उनकी रचनाएं सुनकर खुश होते। इस प्रकार धीरे-धीरे डिकेंस की ख्याति बढ़ने लगी। उनके श्रोताओं की संख्या हजारों में पहुंच गई। 

इंग्लैंड की तत्कालीन महारानी विक्टोरिया तक भी चार्ल्स की प्रशंसा पहुंची, जिसे सुनकर उन्होंने चार्ल्स की रचनाएं सुनने का निश्चय किया। महारानी के सेवक चार्ल्स को बुलाने के लिए भेजे गए। डिकेंस उनके साथ राजमहल पहुंचे तो महारानी ने उनका यथोचित सत्कार करने के बाद उनसे उनकी रचनाएं सुनने की इच्छा व्यक्त की। 

यह सुनकर डिकेंस विनम्रतापूर्वक बोले, “महारानी जी! यदि आप मेरी रचनाएं सुनना चाहती हैं तो कृपया उस समय आइएगा जब मैं लोगों को उन्हें सुना रहा होऊं। मैं राजमहल के लिए नहीं, आम लोगों के लिए लिखता हूं।” यह कहकर स्वाभिमानी डिकेंस राजमहल से चले आए। राणा इस कथा का सार यही है कि रचना और रचनाकार वास्तविक रूप से तभी कालजयी हो सकते हैं, जब वे जमीन से जुड़े हुए हों। श्रेष्ठ साहित्य महलों के आश्रय की अपेक्षा जनता की कुटिया में बेहतर ढंग से पल्लवित होता है। 

 प्रेरणादायक प्रसंगपश्चाताप की आग

स्टॉकहोम में पैदा हुए अल्फ्रेड नोबेल बचपन से ही अत्यंत जिज्ञासु और प्रतिभाशाली थे। उन्होंने डायनामाइट नामक विस्फोटक का आविष्कार किया जो चट्टानें तोड़ने और बंदूक आदि की गोलियां बनाने में काम आया। नोबेल ने इस विस्फोटक को बनाने में बहुत मेहनत की थी। 

प्रेरणादायक प्रसंग-पश्चाताप की आग

इस विस्फोटक के उत्पादन के लिए उन्होंने एक कारखाना लगाया था। अचानक एक दिन उस कारखाने में विस्फोट हो गया और पूरा कारखाना उड़ गया। इस दुर्घटना में नोबेल के भाई की भी मृत्यु हो गई। नोबेल को अपने भाई से गहरा लगाव था। वह उसके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। भाई की मौत ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। कई दिनों तक वे पागलों जैसी स्थिति में बैठे रहते थे। 

धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को संभाला। एक दिन वह अपने एक मित्र से बोले. “काश! मैं विध्वंस के साधन की जगह किसी रोग या महामारी से बचाने वाले जीवन रक्षक साधन का आविष्कार करता। ऐसे में मेरे भाई के साथ-साथ अनगिनत निर्दोष लोग असमय ही मौत का शिकार तो नहीं बनते।” 

मित्र ने उन्हें समझाया और आगे बढ़ने को प्रेरित किया। किंतु वे कारखाने में हुई मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार समझने लगे थे। उन्होंने अपने जीवन में लगभग 90 लाख डॉलर की राशि अर्जित की थी। 

मृत्यु से पहले उन्होंने इस राशि से शांति के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए पुरस्कार देने की घोषणा की। इस तरह विश्व के सबसे बड़े सम्मान नोबेल पुरस्कार की शुरुआत हुई। 

प्रेरणा वाली कहानी- नैतिक और मर्यादित समाज

घटना उन दिनों की है जब विंस्टन चर्चिल राजनीति में काफी प्रतिष्ठित हो चुके थे। वे इंग्लैंड के प्रधानमंत्री तो नहीं बने थे किंतु जाने-माने नेता अवश्य हो चुके थे। अखबार और पत्रिकाओं की सुर्खियों में उनके भाषण और चित्र प्रकाशित होने लगे थे। 

प्रेरणा वाली कहानी- नैतिक और मर्यादित समाज

एक बार चर्चिल को भाषण देने के लिए कहीं जाना था। वे अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए रेलगाड़ी में सवार हुए। थोड़ी देर बाद टिकट निरीक्षक टिकट चैक करने के लिए उनके डिब्बे में आया। वह यात्रियों के टिकट चैक करने लगा। 

जब चर्चिल की बारी आई तो उसने उनसे भी टिकट दिखाने का आग्रह किया। चर्चिल ने जेब में हाथ डाला तो परेशान हो गए, क्योंकि टिकट जेब में नहीं था। उन्होंने सभी जेबों की तलाशी ली। जब टिकट किसी भी जेब में नहीं मिला तो उन्होंने अपने साथ लाए सामान को खोजना शुरू किया। 

इस बीच टिकट निरीक्षक उन्हें पहचान चुका था। वह नम्रतापूर्वक बोला, “रहने दीजिए। मैं जानता हूं कि टिकट आपने अवश्य खरीदा होगा, किंतु उसे कहीं रखकर भूल गए हैं। कुछ देर ढूंढ़ने की कोशिश कर लीजिए। हो सकता है आपको याद आ जाए।” 

उसकी बात सुनकर चर्चिल बोले, “टिकट निरीक्षक के मांगने पर टिकट दिखाना हर यात्री का कर्तव्य है। इसमें किसी प्रकार की कोताही बरतना ठीक है।” इतना कहकर वह पुनः टिकट खोजने में लग गए। कहने का अर्थ यह है कि कर्तव्य पालन में छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं होना चाहिए। इससे एक नैतिक व पर्यादित समाज के निर्माण में मदद मिलती है। 

प्रेरणादायक धार्मिक कहानी-सद्गुरु की इच्छा

एक व्यक्ति ने गुरु नानक देव के पास पहुंचकर अपनी इच्छा जताई कि वह किसी महात्मा की संगति करना चाहता है, इसलिए वे किसी योग्य महात्मा का नाम बताएं। गुरु नानक ने उसे लालो बढ़ई के पास भेज दिया। वह व्यक्ति जब लालो के पास गया तो उसने देखा कि लालो चारपाई के पायों की सीढ़ी बना रहा है और अन्तिम संस्कार का सामान पास में ही पड़ा है। 

प्रेरणादायक धार्मिक कहानी-सद्गुरु की इच्छा

उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ कि यह व्यक्ति महात्मा कैसे हो सकता है। उसने जिज्ञासावश लालो से पूछा, “किसके अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही है?” 

तब लालो ने उसे बताया, “उसके लड़के के शरीर पर से गाड़ी का पहिया उतर जाने से उसकी मृत्यु हो गई।” 

“ऐसा कैसे हो गया?” उस व्यक्ति ने प्रश्न किया। 

लालो ने उत्तर दिया, “जो भाग्य में लिखा होता है, वही होता है। शायद सद्गुरु की यही मर्जी थी।” 

“यह तो बहुत बुरा हुआ।” उस व्यक्ति ने कहा। 

“सद्गुरु की यही इच्छा थी। अब देखो न। सद्गुरु की इच्छा से ही तुम्हें आज से आठवें दिन फांसी पर चढ़ाया जाएगा।” लालो ने कहा। 

ऐसा सुनते ही वह व्यक्ति डर के मारे सातवें दिन जंगल की ओर रवाना हो गया। रास्ते में वह एक पेड़ के नीचे सो गया। संयोग से रात को वहां कुछ चोर आए और चोरी का माल आपस में बांटने लगे। जब केवल एक माला बची तो उस माला को सोए हुए उस व्यक्ति के गले में डालकर वहां से भाग गए। 

थोड़ी ही देर में चोरों का पीछा करते हुए वहां कुछ सिपाही आए तथा चोरी की माला उस व्यक्ति के गले में पड़ी देख उसे चोर समझकर पकड ले गए। राजा ने उसे फांसी की सजा सुना दी। उस व्यक्ति से जब उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने लालो बढ़ई से मिलने की इच्छा व्यक्त की। 

उसे जब लालो बढ़ई के पास ले जाया गया तो उसने उसके पैर पकड़े और फांसी से बचाने के लिए उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा। तब लालो ने उससे कहा, “देखो। भाग्य में जो लिखा रहता है वह होता है या नहीं? अब तो गुरु नानक देव का स्मरण करो। यदि उनकी इच्छा होगी तो बच जाओगे।” 

 उस व्यक्ति ने नानक देव का स्मरण किया और थोड़ी देर में खबर आई कि असली चोर पकड़े गए हैं। तब राजा ने उस व्यक्ति को छोड़ दिया। उसे महसूस हो गया कि जो भाग्य में लिखा होता है, वह होकर रहता है। लालो के प्रति श्रद्धावान होकर उसने सत्संग करना आरंभ कर दिया। 

प्रेरक कहानियां हिंदी असली उत्तराधिकारी

प्रेरक कहानियां हिंदी- असली उत्तराधिकारी

एक व्यापारी चाहता था कि उसका इकलौता पुत्र उच्च शिक्षा प्राप्त करे। उसने अपने पुत्र को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से दूर किसी बड़े शहर में भेज दिया। कुछ दिनों बाद उस व्यापारी की पत्नी की मृत्यु हो गई। व्यापारी को अपनी पत्नी की मृत्यु से गहरा झटका लगा। वह बीमार रहने लगा। उसे इस बात का अहसास हो गया कि अब वह ज्यादा दिन जीवित नहीं रहेगा। उसने अपनी सारी संपत्ति अपने पुत्र के नाम कर दी और उसके पास समाचार भेज दिया। उसने संपत्ति संबंधी तात्कालिक व्यवस्था अपने शहर के एक पुजारी को सौंप दी। उसके कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। उधर, समाचार मिलते ही उसका पुत्र घर लौटा। रास्ते में उसे एक युवक मिला जिसने सहानुभूति दिखाते हुए उसके उत्तराधिकारी होने तथा परिवार में अकेला होने का सारा भेद मालूम कर लिया। वह उसके साथ ही हो लिया। दोनों में गाढ़ी मित्रता हो गई, किंतु उस व्यापारी के घर पहुंचते ही वह व्यापारी के पुत्र के साथ स्वयं भी रोने लगा और स्वयं को व्यापारी का उत्तराधिकारी बताने लगा। पुजारी चकराया। 

फिर उसने एक युक्ति निकाली। उसने व्यापारी का एक चित्र मंगवाकर उसकी छाती की ओर इशारा करके एक-एक तीर-कमान उनके हाथ में देकर निशाना लगाने को कहा। उसने यह भी कहा कि जो ठीक से निशाना लगाएगा, उसे ही उत्तराधिकारी माना जाएगा। व्यापारी के पुत्र के साथी ने तो तीर ठीक निशाने पर छोड़ दिया किंतु व्यापारी का पुत्र तीर कमान को फेंक अपने पिता के चित्र से लिपट गया। उसने पुजारी से कहा कि उसे अपने पिता की धन-संपत्ति नहीं चाहिए। सुनकर पुजारी मुस्कराया। उसने वणिक्-पुत्र से कहा, “बेटे ! मैं समझ गया हूं कि असली उत्तराधिकारी कौन है ? पुत्र! तुम्ही अपने पिता के असली उत्तराधिकारी हो। तुम्हारे लिए पिता के प्रति स्नेह और श्रद्धा महत्वपूर्ण है। यह लड़का ठग है। यह तुम्हारी संपत्ति पर कब्जा करना चाहता है।” पुजारी ने व्यापारी के पुत्र को उसके पिता द्वारा छोड़े गए संपत्ति संबंधी सभी कागजात सौंप दिए और दूसरे युवक को राज-सैनिक बुलवाकर गिरफ्तार करा दिया। 

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