प्रेरक कहानियां-मन की शांति- अशांति

प्रेरक कहानियां-मन की शांति- अशांति

 मन की शांति- अशांति

प्रेरक कहानियां- एक सेठ के पास अपार संपत्ति थी, लेकिन वह अशांत रहता था। सख सुविधा के मध्य में रहने के बावजूद उसका मन बहुत बेचैन था। 

एक दिन वह एक महात्मा जी के पास पहुंचा और कहने लगा, “मेरे पास पैसे की कमी नहीं है, पर मेरा मन बहुत अशांत रहता है। आप कुछ ऐसा उपाय कर दीजिए कि मेरा मन शांत हो जाए।” 

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तभी महात्मा ने कहा आज तो शाम हो रही है। तुम थोड़ा विश्राम कर लो कल सुबह आना।

दूसरे दिन सेठ महात्मा जी के यहां पहुंचा। 

महात्मा ने कहा, “आज तुम्हें सारा दिन धूप में बैठना होगा।” इतना कहकर महात्मा स्वयं कुटिया में चले गए और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए। सूर्य की तपती किरणों से सेठ का बुरा हाल हो रहा था। सेठ को महात्मा से ऐसे व्यवहार की आशा न थी। उसे क्रोध आ रहा था, किंतु वह कुछ पाने की अभिलाषा में मौन रहा। 

तीसरे दिन सेठ को महात्मा जी ने आदेश दिया, “आज सारा दिन तुम्हें भूखा रहना पड़ेगा।” 

 शाम तक भूख के कारण सेठ की दशा दयनीय हो गई। सुबह से शाम तक अन्न का एक दाना भी नहीं मिला और महात्माजी ने बड़े आनंद से भोजन किया। उस रात सेठ को नींद नहीं आई। वह सोचता रहा कि मैं कहां फंस गया। महात्माजी से कुछ मिलना-मिलाना नहीं है, कल वापस चला जाऊंगा। 

प्रात: सेठ महात्मा जी के पास आकर बोला, “मैं यहां बड़ी आशा लेकर आया था, लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला। मैं तो यहां आया था कुछ पाने के लिए, किंतु मुझे जो चाहिए, वह शायद आपके पास भी नहीं है। अत: मेरा यहां रहना व्यर्थ है।” 

इस बात को सुनकर महात्मा जी ने बोला मैंने तुम्हें बहुत कुछ दिया है लेकिन तुमने कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाए तो इसमें मेरा क्या दोष है? पहले दिन मैंने तुम्हें धूप में बैठाया था और मैं खुद छाया में बैठा था। लेकिन मेरी यह बात तुम्हें समझ में नहीं आई। फिर दूसरे दिन मैंने तुमको भूखा रखा था और स्वयं खूब भोजन किया।

इस बात से मैंने तुम्हें यह समझाने का प्रयास किया कि मेरे भोजन कर लेने से तुम्हारा पेट नहीं भर सकता। अत: याद रखना कि मेरे कुछ कहने से या मेरी साधना से तुम्हें सिद्धि नहीं मिल सकती। जैसे तुमने अपने ही पुरुषार्थ से धन कमाया है तो शांति भी तुम्हें अपने ही पुरुषार्थ और साधना से मिलेगी।” 

शांति-अशांति मन के भीतर होती है, जो व्यक्ति इस बात को समझ लेता है, वह कभी दुखी नहीं होता। 

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