गर्भावस्था की समस्याएं | गर्भावस्था की विभिन्न समस्याएं | 

गर्भावस्था की विभिन्न समस्याएं

गर्भावस्था की समस्याएं | गर्भावस्था की विभिन्न समस्याएं | 

गर्भावस्था में बहुत सी समस्याएं हो सकती हैं, जिनका अनेक स्त्रियों को शिकार होना पड़ता है। प्राय: दूसरी गर्भावस्था में कई स्त्रियां यह सोचती हैं कि उनकी पहली गर्भावस्था से यह कितनी अलग होगी। उनका ऐसा सोचना गलत भी नहीं है, क्योंकि कोई भी दो गर्भावस्थाएं सदैव एक समान नहीं होतीं। फिर भी कुछ सामान्य बातों का अंदाजा तो उन्हें हो ही जाता है। जैसे पहले के मुकाबले दूसरी गर्भावस्था की जानकारी जल्दी हो जाएगी। 

मुख्यत: दूसरी बार में गर्भावस्था के लक्षण पहचानना आसान होता है, हालांकि वे पहले से काफी घटे हुए होंगे। दूसरी गर्भावस्था में प्रात:काल अधिक जी नहीं मिचलाएगा और पाचन की गड़बड़ी भी ज्यादा नहीं होगी। यह अवश्य है कि पहले के मुकाबले इस गर्भावस्था में आलस्य और थकान का अनुभव आपको कुछ ज्यादा होगा।

किसी खास चीज को खाने की इच्छा या खाने में एकदम अरुचि जैसे लक्षण भी दूसरी गर्भावस्था में नहीं दिखाई देते। वक्षस्थल में भी ज्यादा बदलाव नहीं आएगा। चिंता, तनाव और संवेदनशीलता भी पहले जैसी नहीं होगी। जो स्त्री पहला प्रसव आसानी से झेल लेती है, उसे दूसरे गर्भावस्था में विभिन्न प्रसव में ज्यादा तकलीफ नहीं उठानी पड़ती। 

समस्याएं हो सकती हैं पहले की अपेक्षा दूसरा गर्भ शीघ्र स्पष्ट हो जाता है। पेट में उभार साफ दिखने लगता है। ऐसी स्त्री को स्वयं यह आभास हो जाता है कि पहले की अपेक्षा यह भावस्था कुछ अलग हटकर है। इस बार पेट का उभार पहले से बड़ा हो सकता है, लेकिन पेट दर्द और पीठ दर्द तथा गर्भावस्था की बाकी तकलीफें पर कम होंगी। इस बार शिशु की हलचल शीघ्र और स्पष्ट सुनाई देगी।

दूसरी गर्भावस्था में पहले जैसी उत्तेजना भी नहीं होगी। मांसपेशियों ढीलापन रहेगा। शिशु गर्भ में है, इस बात से रोमांच अवश्य होगा। शिश का देखने की उमंग भी कम नहीं होगी। प्रसव भी दूसरी बार आसानी से हो जाता चूंकि पहले शिशु के जन्म के बाद मांसपेशियों में ढीलापन आ जाता है, इसलि दूसरे शिशु के जन्म में अधिक समय भी नहीं लगता। प्रसव के समय पीडा एहसास भी कम होता है और शिशु को बाहर धकेलने में भी अधिक श्रम नहीं करना पडता। सबसे अच्छी बात यह है कि इस बार पहले की अपेक्षा अधिक सोच-विचार भी नहीं करना पड़ेगा और देखभाल भी अच्छी ही होगी।

जिन स्त्रियों का पहला प्रसव बड़ी मुश्किल से हुआ हो, वे दूसरी गर्भावस्था आने पर थोड़ी डरी हुई होती हैं और पहले कष्ट को याद कर सिहर उठती हैं। दरअसल पहले प्रसव से ही आने वाले प्रसव की सूचना मिल जाती है, इसलिए हो सकता है कि दूसरा प्रसव भी तकलीफदेह साबित हो। लेकिन ऐसा ही हो, यह आवश्यक भी नहीं है। समय के साथ इसमें कुछ बदलाव भी आ सकते हैं।

गर्भावस्था की विभिन्न समस्याएं

यह जरूरी नहीं है कि स्त्री की सारी गर्भावस्थाएं एक समान ही हों। इस बार की गर्भावस्था में पहले के समान जी कम मिचलाएगा और खाने में अरुचि की मात्रा भी कम होगी। यों स्त्री के जेनेटिक (आनुवंशिक) अनुभवों से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह गर्भावस्था कितनी तकलीफदेह या आरामदेह होगी। इसमें कुछ ऐसे कारण सम्मिलित हैं, जिस पर स्त्री स्वयं नियंत्रण कर सकती है। यथा-यदि स्त्री पूर्णतया स्वस्थ होगी तो गर्भावस्था काफी आरामदेह हो जाएगी, अत: उसे अपने स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान देना चाहिए। 

यदि स्त्री गर्भवती डॉक्टर के परामर्श से धीरे-धीरे अपना वजन बढ़ाएगी या शरीर की फालतू चर्बी को कम करेगी तो उसे पीठ दर्द, थकान, अपच व सांस लेने में तकलीफ जैसी परेशानियों से छुटकारा मिल जाएगा। वह जितना अच्छा आहार लेगी, उतना ही स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना बढ़ जाएगी। साथ ही साथ गर्भावस्था भी काफी आरामदेह रहेगी। इससे न केवल उल्टी तथा जी मिचलाने जैसी तकलीफों से छुटकारा मिलेगा अपितु थकान, कब्ज, योनि संक्रमण, एनीमिया और सिर दर्द आदि भी परेशान नहीं करेंगे। यदि गर्भावस्था के दौरान कोई परेशानी आई, तो भी स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना बनी रहेगी। अतएव उसे अपन स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना होगा। थोड़ा बहुत व्यायाम करना भी अच्छा रहता है। व्यायाम करने से पेट के निचले भाग की मांसपेशियों में लोच आ जाती है। 

यदि गर्भवती स्त्री भरे-पूरे घर की हो, बहत से लोगों की उसे देखभाल करनी पड़ती हो और आराम करने का समय अधिक नहीं मिलता हो, तो इस आपाधापी से भरी जीवन-शैली में उसे गर्भावस्था के तकलीफदेह लक्षणों का सामना करना पड़ सकता है। अत: उसे थकान देने वाले कामों से बचना चाहिए। काम के बीच थोड़ा आराम जरूर करना चाहिए। तनाव की स्थिति में मन को शांत रखने का प्रयास करें। इससे परिवर्तन का अनुभव शीघ्र ही हो जाएगा। 

कई गर्भवती स्त्रियां घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती हैं कि उन्हें अपनी गर्भावस्था से जुड़ी तकलीफों का एहसास ही नहीं होता, जबकि कुछ अन्य स्त्रियों को इस प्रकार की व्यस्तता से मानसिक तनाव, जी मिचलाने व थकान की शिकायत हो जाती है। उनकी पीठ में दर्द रहने लगता है तथा कब्ज आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतः अपनी देखरेख आपको स्वयं करनी होगी। जब भी काम से निपटें तो थोडा आराम जरूर करें। यदि निद्रा आए तो थोड़ी झपकी ले लें। गर्भावस्था की जरा सी परेशानी भी कष्ट का कारण बन सकती है। 

यदि किसी स्त्री को पहली गर्भावस्था में कुछ जटिलताएं आई होती हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरी बार भी वे जटिलताएं आएंगी। संभव है, छोटी मोटी कोई समस्या सामने आ भी जाए, तो इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। योग्य डॉक्टर इस प्रकार की समस्या का निदान समय से पहले ही कर देती है। 

कभी-कभी किसी स्त्री की स्थिति बड़ी दयनीय हो जाती है। वह पति की बात को न तो टाल सकती है और न ही उसे नाराज करना चाहती है। ऐसी स्त्री शिशु के जन्म के 10-12 सप्ताह बाद ही पुनः गर्भवती हो जाती है। इतनी जल्दी दोबारा गर्भवती होना तनाव का कारण बन सकता है। कोई भी स्त्री इतनी जल्दी गर्भधारण करना नहीं चाहती। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

अब जो हो गया, उसे तो आसानी से टाला नहीं जा सकता। इतनी जल्दी एबॉर्शन भी नहीं कराया जा सकता। फिर इसमें पति की रजामंदी सबसे पहले होती है। जो स्त्री इस दौर से गुजर रही है अर्थात जैसे ही गर्भावस्था का पता चले, उसे गर्भावस्था संबंधी देखभाल शुरू कर देनी चाहिए। अपने खानपान की आदतों में बदलाव लाना चाहिए, क्योंकि पहले शिशु को अपना दूध पिलाने के कारण जितना पोषण उसके शरीर को चाहिए, वह उसे नहीं मिल रहा होगा। इसके साथ-साथ गर्भस्थ शिशु के लिए भी उसे आहार की भरपूर मात्रा लेनी होगी, इसलिए स्त्री को अपनी खुराक में प्रोटीन, आयरन और विभिन्न विटामिनों को शामिल करना होगा। इस बारे में डॉक्टर की राय बहुत महत्वपूर्ण होगी। 

यदि स्त्री का वजन कम है, तो उसे थोड़ा वजन भी बढ़ाना होगा और प्रति माह अपना वजन करना होगा। वजन बढ़ाने के लिए पोषण युक्त आहार ही उत्तम है। अत: वह ऐसा आहार ले. जिसमें कैलोरी की मात्रा अधिक हो। इसके लिए वह अपनी लेडी डॉक्टर से परामर्श करे। यदि उसकी आज्ञा हो, तो अपने शिशु को अपना दूध न पिलाकर डिब्बे वाला दूध पिलाए। चूंकि उसे पैदा हुए शिशु और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना है, इसलिए जितना संभव हो, आराम करे तथा अनावश्यक कार्यों में हाथ न लगाए। यदि थकान मिटाने के लिए वह थोड़ा-बहुत व्यायाम कर सके, तो बहुत अच्छा है। 

यदि प्रथम प्रसव से पहले उसे पूरी देखभाल और चिकित्सीय देखभाल मिलती रही है तो इस बात की आशा की जा सकती है कि आगे भी स्वस्थ शिशु ही पैदा होगा। इस दौर से गुजरने वाली स्त्री को तनाव आदि से दूर रहना, चिंता न करना और गर्भावस्था में अपना विशेष ध्यान रखना होगा। 

एक स्त्री गर्भवती हुई तो यह सोचकर कम वजन वाली स्त्री को परेशान होने लगी कि इससे पहले वह दो अपना वजन बढ़ाना चाहिए बार एबॉर्शन करा चुकी है, कहीं उसका प्रभाव इस गर्भ पर तो नहीं पड़ेगा। उस स्त्री के लिए यह जान लेना महत्वपूर्ण होगा कि इस गर्भ पर पहली तिमाही में किए जाने वाले एबॉर्शन का कोई प्रभाव नहीं होता। यदि उसका दूसरा एबॉर्शन चौदह सप्ताह से पहले हुआ था, तो इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। चौदह से सत्ताईस सप्ताह के मध्य होने वाले एबॉर्शन से पहले प्रसव का थोड़ा खतरा बढ़ जाता है। यदि उसने अपना डॉक्टर बदल दिया है या अपना चैकअप किसी जच्चा बच्चा केंद्र में करा रही है, तो वहां की लेडी डॉक्टर को इन एबॉर्शनों के बारे में पहले ही बता दे, ताकि उसकी पूरी चिकित्सीय देखभाल समय पर हो जाए। 

किसी भी स्त्री का अत्यधिक मोटा होना भी एक समस्या है। वैसे तो मोटी गर्भवती स्त्रियां भी स्वस्थ शिशुओं को जन्म देती हैं, किंतु बहुत मोटापा स्वास्थ्य के लिए खतरा हो सकता है तथा गर्भावस्था में समस्या उत्पन्न कर सकता है। यदि गर्भवती स्त्री बहुत अधिक मोटी है तो उसे गैस्टेशनल डायबिटीज के अतिरिक्त हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत भी हो सकती है। साथ ही कई प्रकार की व्यावहारिक गर्भावस्था की समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। 

अल्ट्रासाउंड के बिना ऐसी स्त्री के प्रसव की अनुमानित तिथि का पता नही लगाया जा सकता, क्योंकि मोटी स्त्रियों में ओव्यूलेशन का समय अनियमित होता कई डॉक्टर गर्भाशय के आकार, स्थिति या हृदय की धड़कन को सुनकर जो मान लगाती है, वह चर्बी की परतों के कारण नहीं लगाया जा सकता। दरअसल अधिक चर्बी के कारण डॉक्टर भ्रूण के आकार व स्थिति का सही पता नहीं लगा सकती और स्त्री को स्वयं शिशु की हलचल का सरलता से पता नहीं चलता। 

यदि भ्रूण एक औसत साइज से बड़ा हुआ तो प्रसवकाल में कठिनाई आ सकती है। मुख्यत: अधिक मोटी स्त्रियों के साथ ऐसा ही होता है। यदि स्त्री को डायबिटीज हो या वह गर्भावस्था में कम आहार लेती हो तो यह स्थिति अधिक जटिल हो जाती है। कभी-कभी इसमें सिजेरियन की आवश्यकता पड़ जाती है, किंतु सर्जरी के समय अथवा उसके पश्चात भी कठिनाई सामने आ सकती है। 

मोटी स्त्री गर्भावस्था के समय होने वाली परेशानी व असहजता का अनुमान स्वयं भी लगा सकती है। अधिक भार बढ़ने से पीठ में पीड़ा और छाती में जलन होगी। किंतु डॉक्टर के परामर्श से स्त्री शिशु की तरफ बढ़ने वाले इस खतरे को बचा सकती है। लेकिन इस ओर ज्यादा ध्यान देना होगा, डॉक्टर के परामर्श की भी आवश्यकता होगी तथा चैकअप भी बार-बार कराना पड़ेगा। 

अल्ट्रासाउंड कराकर प्रसव की अनुमानित तिथि भी ज्ञात करनी होगी तथा ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट और स्क्रीनिंग भी करानी होगी, ताकि यह पता लग सके कि गर्भवती स्त्री गैस्टेशनल डायबिटीज की रोगी तो नहीं है। इसके साथ ही शिशु की सही अवस्था जानने के लिए नॉनस्ट्रेस व दूसरे टेस्ट भी कराने होंगे। फिजीशियन एवं सर्जन से परामर्श करना होगा। इसके अतिरिक्त अपने प्रतिदिन के भोजन में अधिक पोषक तत्व सम्मिलित करने होंगे, कैलोरी पर विशेष ध्यान देना होगा तथा भोजन की मात्रा के बजाय उसकी गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा, ताकि शरीर का वजन न बढ़े और गर्भस्थ शिशु को पूरा भोजन भी मिलता रहे।

यदि किसी स्त्री का वजन आवश्यकता से अधिक कम हो तो उसे गर्भावस्था में भरपूर भोजन लेना चाहिए ताकि उसके साथ-साथ शिशु को भी कोई हानि न पहुंचे। उसे अपने आहार की मात्रा में वृद्धि करनी होगी। ताजा फल-सब्जियों का उपयोग करना चाहिए। दूध, घी और मक्खन नित्य लेना चाहिए। शरीर का वजन बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यदि दुबली-पतली और कम वजन वाली स्त्री अपनी आदतें बदल लेती है तथा उन्हें नियमित कर लेती है तो निश्चय ही वह एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है। उसे समय-समय पर डॉक्टर की सलाह लेनी होगी। गर्भावस्था के बाद तो यह अनिवार्य हो जाता है। 

 गर्भावस्था में उचित ढंग से वजन न बढ़ने पर अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। हो सकता है, शिशु अपने स्वाभाविक आकार से छोटा उत्पन्न हा, इसलिए कमजोर बदन वाली स्त्री को पहले सही कदम उठाना होगा, ताकि उस गर्भावस्था में वजन ल आकार इस बात का अजन्मे शिशु के प्रति अपना फर्ज अच्छी तरह निभा सके। गर्भावस्था में बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। गर्भावस्था में शरीर का गोल आकार इस संकेत देता है कि गर्भस्थ शिशु का शरीर ठीक तरह से वृद्धि कर रहा है। 

सही समय पर सही आहार लेने से वजन बढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हो इस बारे में भी निश्चित रहना चाहिए कि प्रसव के बाद शरीर पुन: अपने आ में आ जाएगा और शिशु भी स्वस्थ पैदा होगा। किसी भी स्त्री को यह नहीं भला चाहिए कि शिशु को भी भूख लगती है। वह पोषक तत्वों के लिए अपनी मां पर निर्भर रहता है। यदि स्त्री भूखी रहेगी तो शिशु भी भूखा रहेगा और जितने पोषक तत्व उसे मिलने चाहिए, वह नहीं मिल पाएंगे। 

व्यायाम भी वजन बढ़ाने में सहयोग कर सकता है, किंतु व्यायाम ऐसा होना चाहिए कि गर्भस्थ शिशु को कोई नुकसान न हो। इसके लिए डॉक्टर से परामर्श करना आवश्यक है। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रसव के तत्काल बाद वजन नहीं घटता, बल्कि इसे धीरे-धीरे घटाया जाता है। अपने पुराने फिगर में लौटने के लिए कुछ अधिक समय भी लग सकता है। 

गर्भावस्था में मां के स्वास्थ्य से ही शिशु का स्वास्थ्य जुड़ा होता है। यदि मां स्वस्थ नहीं है, तो शिशु भी स्वस्थ नहीं हो सकता। इसलिए स्त्री को सदा ऐसे पोषक तत्व लेने चाहिए, जिनकी पहुंच उसके शिशु तक हो। स्वस्थ शिशु को जन्म देना मां के हाथ में है और एक मां को यह अवसर नहीं खोना चाहिए।

गर्भावस्था में परामर्श 

गर्भावस्था में डॉक्टर से परामर्श करने के कई लाभ हैं। माना पति-पत्नी को जब पता चलता है कि उनके यहां आने वाला शिशु स्वस्थ व सामान्य नहीं है और चूंकि पत्नी पहली बार गर्भवती हुई होती है, इसलिए दोनों गर्भपात नहीं कराना चाहते, तो स्वयं को उस स्थिति के लिए पहले से तैयार करने लगते हैं। 

माता-पिता अपने शिशु के जीवन की बेहतरी के तरीके जान सकते हैं। उसकी समस्याओं से निपटने के लिए साहस पैदा कर सकते हैं और भावनात्मक व व्यावहारिक रूप से चुनौती का सामना कर सकते हैं। किंतु कभी-कभी शिशु की विकृति माता के लिए जानलेवा सिद्ध हो सकती है, तब एक ही उपाय होता है कि वह विशेषज्ञ के परामर्श से गर्भपात के लिए तैयार हो जाए। यद्यपि इससे पहले वे ऑटोप्सी की राय दे सकते हैं, जिसमें भ्रूण की कोशिका की सावधानीपूर्वक जांच की जाती है, ताकि अगली गर्भावस्था में इस प्रकार की असमानता न आए। 

वे इस जांच तथा विशेषज्ञ की राय के पश्चात स्वयं को अगली सामान्य गर्भावस्था के लिए तैयार करते हैं। ज्यादातर मामलों में अगली बार स्वस्थ शिशु का दी आगमन होता है। याद रखें, ऐसा हजारों में ही कोई एक केस होता है, जब शिश को कोई समस्या हो, अन्यथा स्वस्थ मां स्वस्थ शिशु को ही जन्म देती है।

अधेड़ आयु में गर्भधारण 

मौज-मस्ती में जीवन व्यतीत करने वाली तथा शीघ्र बच्चे न चाहने वाली बहत सी स्त्रियां अधेड़ायु में गर्भधारण करती हैं, मुख्यतः पैंतीस-छत्तीस वर्ष के बाद। यद्यपि गर्भावस्था में इतने खतरे नहीं रहते, लेकिन आयु बढ़ने के साथ-साथ समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। यों बहुत सी समस्याओं को मेडिकल सुविधाओं ने काफी कम कर दिया है। इस आयु की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बहुत सी अधेड़ आयु में गर्भधारण करना घातक हो सकता है स्त्रियां गर्भधारण ही नहीं कर पातीं। यदि गर्भवती हो भी जाती हैं तो यह खतरा बढ़ जाता है कि कहीं वे डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु को जन्म न दें। एक विश्लेषण से यह ज्ञात हुआ है कि अधेड़ायु की गर्भवती स्त्रियों में क्रोमोसोमल असामान्यताएं अधिक पाई जाती हैं। वे तब तक गर्भपात, अत्यधिक दवाओं का सेवन, एक्स-रे एवं संक्रमण आदि के संपर्क में आ चुकी होती हैं। कई बार अधेड़ पति के स्पर्म की वजह से भी स्त्रियों को कुछ परेशानियां हो जाती हैं।

आयु की वृद्धि के साथ समस्याओं की भी वृद्धि होती जाती है। अधिक भार हो जाने के कारण इस आयु में स्त्री हाई ब्लडप्रेशर की शिकार भी हो सकती है। यही नहीं, वह एबॉर्शन (गर्भपात), प्रीएक्लैंपसिया और प्रीटर्म लेबर की समस्या से भी जूझ सकती है। प्राय: इस आयु में प्रसव-पीड़ा (लेबर) और प्रसव (डिलीवरी) का समय भी लंबा हो जाता है। अर्थात मांसपेशियों में लोच की कमी के कारण प्रसव में काफी कठिनाई हो सकती है। लेकिन जिस स्त्री का फिगर एकदम सही है तथा वह नित्य योग और व्यायाम करती है, उसे इस बारे में कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। डाउन सिंड्रोम से बचाव तो नहीं हो सकता, लेकिन कई तरह की स्क्रीनिंग और टेस्ट ऐसे हैं, जिसमें सर्जरी की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

अधिक आयु की गर्भवती स्त्रियों में कई प्रकार के दीर्घकालीन रोगों पर सरलतापूर्वक काबू पाया जा सकता है। दवाओं और चिकित्सकीय देखभाल से संभावित खतरों को टाला जा सकता है। किंतु स्त्री स्वयं भी गर्भावस्था को सुरक्षित एवं स्वस्थ बनाने के लिए बहुत कुछ कर सकती है। यदि वह अपनी गर्भावस्था, अपने शरीर और आहार पर पूरा ध्यान रखे तथा कोई हल्का-फुल्का व्यायाम नित्य करे तो बहुत सी परेशानियों से स्वयं को सुरक्षित रख सकती है। 

यहां यह बताना आवश्यक है कि हर बात या हर जांच केवल स्त्री पर आकर ही नहीं टिक जाती, पुरुष भी इसमें भागीदार होते हैं। कोई भी स्त्री पुरुष के द्वारा ही गर्भधारण करने में सफल होती है। अनेक परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि पुरुष (पिता) के स्पर्म से ही यह निर्णय किया जाता है कि पैदा होने वाले शिशु का लिंग क्या होगा-वह लड़का होगा या लड़की! यह भी पता लगा है कि पचास वर्षाय के पिता के शुक्राणुओं (स्पर्म) के कारण जन्मजात विकृति तथा गर्भपात का खतरा काफी बढ़ जाता है। यदि पिता की आयु पचास वर्ष या उससे अधिक हो, तो डाउन सिंडोम की समस्याएं भी विकसित हो जाती हैं। यही कारण है कि डॉक्टर अधेडाय की गर्भवती स्त्री को स्क्रीनिंग का परामर्श देते हैं। स्वस्थ संतान के लिए स्त्री की आयु बाईस से पच्चीस वर्ष और पुरुष की आयु सत्ताईस से तीस वर्ष मानी जाती है, जबकि अधेड़ायु अनेक समस्याएं पैदा करती है। 

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