Positive thoughts in hindi about life-अपने शब्दों एवम् कार्यों के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहें

positive thoughts in hindi about life-

Positive thoughts in hindi about life-अपने शब्दों एवम् कार्यों के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहें (Be Committed To Your Word & Work) 

1.आप सब कुछ पचा सकते हैं, किन्तु अपने शब्दों को नहीं पचा सकते. अगर अपने शब्दों पर कायम नहीं रहे तो खुद को भी नहीं बचा सकते. आपका सम्मान तब तक ही है, जब तक कि आप अपने शब्दों पर कायम हैं. इसलिए कम से कम बोलें, जो बोलें, उस पर कायम रहें. यह भी अपेक्षित नहीं है कि हर बात बोल कर ही समझायी जाय. बिना बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है. याद रखें, सही शब्द प्रभावी हो सकता है, किन्तु सही समय पर प्रयुक्त विराम उससे भी अधिक प्रभावी होता है.

2. आप अपने शब्दों के प्रति, अपने व्यवसाय के प्रति जितने प्रतिबद्ध रहेंगे, उतने ही आपके सहयोगी व्यवहारी भी प्रतिबद्ध रहेंगे. थोड़ी नम्रता, थोड़ी कठोरता, थोड़ी नजदीकी, थोड़ी दूरी, थोड़ी जिम्मेदारी, थोड़ी समझदारी का समन्वय करके तो देखिए, लोग आपके प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहेंगे, दूसरों को प्रेरित करने एवम् दूसरों से काम लेने के लिए आवश्यक है कि आप अपने शब्दों व कार्यों के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता दिखायें.

3. अपने व्यवसाय के प्रति स्वार्थी बनिए, किन्तु अपने परिवार, संगठन और राष्ट्र के प्रति परार्थी बनिए. अपने वचनों, कर्तव्यों एवम् सिद्धान्तों पर सदैव अडिग रहें. लाभार्थी बनें, स्वार्थी बनें, कुछ भी बनें, किन्तु अपनी बात के धनी बनें, याद रखें, धुन के पक्के और बात के धनी लोगों के कारण ही दुनिया में इतनी तरक्की हुई है.

4. दीवारों के कान भी होते हैं और आँखें भी होती हैं. इसलिए अपने विचारों, अपने शब्दों एवम् समस्त कार्य-कलापों के प्रति सदैव सतर्क रहें. तर्क करें, वितर्क करें, किन्तु कुतर्क न करें, जो कहें, उस पर कायम रहें. जो कहें, वही करें. जो करें, वही कहें. याद रखें, अच्छाई को फैलने में बहुत वक्त लगता है, किन्तु बुराई को फैलने में कोई वक्त नहीं लगता. बुराई का प्रचार तो बुराई से आगे चलता है.

5. पहले तोलो, फिर बोलो. जो भी बोलो, उसमें अन्तस की मिठास घोलो. कडुआहट तो यहाँ पहले से ही काफी है, कम से कम आप तो कडुआहट मत घोलो. बोलने से पहले याद रखने की योग्यता पैदा करो, ताकि निभा सको. यदि किसी बात को किसी कारणवश निभा न सके तो यथा समय क्षमा याचना के साथ सम्बन्धित को सूचित करने की आदत बना लें. बात को याद रखने, निभाने और सही ढंग से सम्प्रेषित करने के कारण ही आपकी साख बनेगी. और यह साख ही आपकी सफलता बनेगी.

6. याद रखें, दूसरों के प्रति जैसे आपके विचार होंगे, जैसे आपके शब्द होंगे, वैसे ही विचार, वैसे ही शब्द आपको प्रतिकार में प्राप्त होंगे. आज तक जितने भी युद्ध, महायुद्ध और महाभारत हुए हैं, वे सब शब्दों के कारण ही हुए हैं. और आगे भी शब्दों के कारण ही होंगे. जितने भी विवाद और उपद्रव उत्पन्न होते हैं, वे सब शब्दों के गलत प्रयोग के कारण ही होते हैं. इसलिए संभल कर बोलें, नियमबद्ध बोलें, नियमबद्ध रहें.

7. समाज सब तरह का कचरा बर्दाश्त कर सकता है, किन्तु शब्दों का कचरा बर्दाश्त नहीं कर सकता. व्यक्ति सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, किन्तु वादा खिलाफी बर्दाश्त नहीं कर सकता, जब आप कोई फालतू चीज अपने पास रखना पसंद नहीं करते, तब फालतू शब्द कैसे पसंद कर सकते हैं. जब आप अपने पास फालतू शब्द ही नहीं रखेंगे, तब ही आप फालतू शब्दों से बचे रह सकेंगे. इसलिए सदैव चयनित एवम् नपे-तुले शब्दों का ही प्रयोग करें, शब्दों में पूरी मितव्ययता बरतें. तब आप कई कठिनाईयों से बचे रहेंगे और कीमती समय भी बचा लेंगे.

8. कर्म से बढ़कर कोई धर्म नहीं, प्रतिबद्धता से बढ़कर कोई कर्म नहीं. अपनी बात पर कायम न रहने से बढ़कर कोई शर्म नहीं. जरा ठण्डे दिमाग से सोचिए, अपनी बात पर कायम न रहने के कारण दूसरों को कितनी असुविधायें होती हैं. जब दूसरे भी आपके साथ ऐसा ही करते हैं, तब आपको कितनी दुविधायें होती हैं. इसलिए बेहतर तो यही है कि न खुद दुविधा में रहें और न किसी को दुविधा में रखें.

9. अपने शब्दों, परिजनों, सहयोगियों व्यवहारियों के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहें. स्वयम् के प्रति अपने समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति एवम् नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें. याद रखें, समयबद्धता, योजनाबद्धता, नियमबद्धता, आचरण शुद्धता के माध्यम से ही आप सफलता के सौपान चढ़ सकते हैं. किन्तु इन सबसे ऊपर है, वचनबद्धता, जिसके बिना आप कुछ भी नहीं कर सकते.

दृष्टान्त- एक शिक्षक को क्लास में पढ़ाते-पढ़ाते सो जाने की आदत थी. विद्यार्थी शोरगुल करते, शिक्षक की नींद खुल जाती. एक दिन एक विद्यार्थी ने साहस करके पूछ लिया-‘गुरुजी, आप पढ़ाते-पढ़ाते अक्सर सो जाते हो, आखिर क्यों ?’ गुरुजी ने सफाई दी-‘मैं सोता नहीं हूँ. मैं तो आँखें बन्द करके स्वर्ग जाता हूँ और वहाँ से तुम्हारे लिए ज्ञान लेकर आता हूँ.’ बात बच्चों के गले नहीं उतरी. एक दिन उस साहसी विद्यार्थी ने कक्षा में सोने का नाटक किया. शिक्षक ने उसे डांट दिया. इस पर विद्यार्थी बोला-‘सर, मैं सो नहीं रहा था. मैं तो आँखें बन्द करके स्वर्ग गया था.’ गुरुजी ने गुस्से में पूछा-‘अच्छा, वहाँ क्या देखा ?’ विद्यार्थी-‘सर, मैं वहाँ देखने नहीं, यह पूछने गया था कि हमारे गुरुजी आते हैं न यहाँ ?’ गुरुजी-‘वहाँ से क्या जवाब मिला ?’ विद्यार्थी-‘सर, मुझे बताया गया कि आज तक तुम्हारे गुरुजी, इधर नहीं आये.’ यह सुनकर गुरुजी की स्थिति देखने लायक थी. जो अपने शब्दों एवम् कृत्यों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहते, उन्हें ऐसे ही उपहासों का पात्र बनना पड़ता है, 

Positive thinking in Hindi-नम्रता एवं अपनत्व भरे शब्दों में जादू होता है (To Be Humble and Affectionate is Charismatic) 

Positive thinking in Hindi-

1.जिस प्रकार पत्थर काटने वाले मशीनी पहिए पर लगातार जल धार प्रवाहित करते हुए कठोर से कठोर पत्थर को भी आसानी से काटा जा सकता है, उसी प्रकार नम्रता एवम् अपनत्व भरी वाणी के प्रवाह से कठोर से कठोर व्यक्ति से भी कार्य करवाया जा सकता है. नम्रता की बून्दें कठोर से कठोर व्यक्ति को भी पिघला देती है.

2. दूध में जितना पानी मिलाओ, उतना ही मीठा डाल कर देखो, लोग बड़े मजे से पी लेंगे और आसानी से पचा भी लेंगे. यह भी सच है कि पानी मिला दूध स्वास्थ्य के लिए कम हानिप्रद होता है, बशर्ते कि पानी शुद्ध हो. शुद्ध दूध को हजम करने के लिए आज कल हाजमा बचा ही कहाँ है. यानी मीठे वचन दिल की गहराई से निकलेंगे, तब ही पानीदार होंगे.

3. जिस प्रकार छायादार एवम् फलदार वृक्ष धरती की ओर नम्रता से झुक जाते हैं, उसी प्रकार समझदार एवम् ‘सफल’ व्यक्ति विनम्रता से भरकर झुक जाते हैं, किसी भी कामयाब व्यक्ति की पहली पहचान नम्रता ही होती है. वस्तुतः नम्रता तो हर व्यक्ति की परीक्षा होती है, नम्रता, प्रेमपूर्ण व्यवहार, अपनत्व एवम् सहनशीलता से मानव ही नहीं, दानव भी आपके वश में हो सकता है, यानी किसी से काम लेने से पहले उसका दिल जीतना जरूरी है.

4. व्यक्ति जितना नम्रता से भरा होगा, उतना ही उदार एवं खरा होगा, व्यक्ति जितना अपनत्व से भरा होगा, उतना ही लोकप्रिय एवम् बड़ा होगा. व्यक्ति जितना अहम् से भरा होगा, उतना ही नम्रता से दूर होगा. जो अहम् से खाली होगा, वही नम्रता से भरपूर होगा. याद रखें, अहम् और नम्रता का साथ रहना जरा कठिन है. अपने आपको ‘अहम्’ से खाली करके तो देखो, खालीपन नम्रता से अपने आप ही भर जायेगा.

5. अपने को जहर से नहीं, अमृत से भरिए. नफरत से नहीं, प्रेम से भरिए. अहम से नहीं, नेह से भरिए. नजर से होकर लोगों के दिलों में उतरिए. अपने शब्दों में सच्चाई की मिठास भरिए, तब यह संसार कितना सुन्दर लगेगा, कितना अपना लगेगा, आपकी कल्पनाओं से परे होगा. आप अपने चेहरे को पहचानते हो, क्योंकि आपने दर्पण में अपना चेहरा देखा है. अगर नहीं देखा होता तो आपको पता ही चलता कि आपका चेहरा कैसा है. इसी तरह आप अपनी पहचान लोगों की नजर में करते हैं. याद रखें, लोग आपको पहचान तब तक ही देते हैं, जब तक कि आप लोगों के दिलों में उतरते चले जाते 

6.सूरज ही बनना हो तो सुबह का सूरज बनो, जो कितना शान्त, शीतल और खुशगवार होता है. सुबह का सूरज ही सहनीय एवम् निर्विकार होता है. सूरज की तरह आप लोगों से दूर रह कर भी काफी नजदीक नजर आ सकते हो. यही अपनत्व है. यह दुनिया अपनत्व पर ही टिकी हुई है. दुनिया यदि अच्छी लगती है तो अपनेपन के कारण ही अच्छी लगती है.

7. याद रखें, आपकी शालीनता और नम्रता की ही सदा तारीफ होती है, गर्म मिजाजी और तुनक मिजाजी की नहीं. इसलिए हर शब्द चुन कर बोलिए, शब्दों में अपनेपन की चासनी घोलिए. बोलने का अंदाज ऐसा हो कि सुनने वाले के दिल को छू जाए. मजा तो तब है, जब दिल से ही बोला जाय और दिल से ही सुना जाय. जब आप दिल से बोलेंगे तो सुनने वाला भी कानों से नहीं, दिल से ही सुनेगा. दिल से कही गई बात में नम्रता और अपनत्व का समावेश अपने आप ही हो जाता है.

8. जो काम किसी प्रलोभन से नहीं करवाया जा सकता, वह प्रेम से करवाया जा सकता है. जो काम भुजबल या धनबल से नहीं करवाया जा सकता, वह नम्रता और अपनत्व से करवाया जा सकता है. कठिनाइयों और हानियों को सहन करते-करते व्यक्ति विनीत और बुद्धिमान हो जाता है, परन्तु मजा तो तब है, जब वह आरम्भ से ही विनीत और बुद्धिमान हो. जो पहले से ही सहनशील, विनम्र एवम् सहज होगा, उसके सामने कठिनाइयों एवम् हानियों का खतरा कम से कम होगा.

9. पानी को जितना ऊँचा उठाया जाता है, उतने ही दबाव के साथ पानी नलों में दौड़ लगाता है. इसी तरह व्यक्ति अपने सोच को जितना ऊँचा उठाता है, उतना ही नम्र बनता चला जाता है. नम्रता से भरा व्यक्ति ही लोगों के दिलों में जगह बना सकता है. अर्थात् नम्रता और अपनत्व को जितनी ऊँचाई दोगे, उतने ही आदरणीय बन जाओगे.

दृष्टान्त -एक वृद्ध व्यक्ति के कई शहरों में रेस्टोरेन्ट थे. एक दिन वह हुलिया बदलकर दूर के अपने एक रेस्टोरेन्ट में अचानक पहुँच गया. हाथ में छड़ी, आँखों पर चश्मा, झुकी कमर और फटे हाल देखकर किसी ने भी उसकी ओर ध्यान नहीं दिया. सेठ एक कोने में खड़ा हो गया. थोड़ी देर बाद ‘विनय’ नामक एक वेटर वहाँ से गुजरा. वह अपने सेठ को पहचान तो नहीं पाया, किन्तु एक ग्राहक समझकर वृद्ध के पास पहुँचा और नम्रतापूर्वक अभिवादन के साथ उसे सहारा देते हुए सुरक्षित सीट पर ले जाकर बिठा दिया. विनय ने पूछा-‘बाबूजी, आप क्या लेंगे?’ वृद्ध ने धीरे से आर्डर दिया-‘एक कप चाय’. विनय-‘अभी लाया, बाबूजी.’ वृद्ध ग्राहक को ठण्डा पानी पिलाया गया. बढ़िया गर्मागर्म चाय पिलाई गई. विनय वृद्ध के सामने झुक कर खड़ा हो गया-‘बाबू जी, और क्या लेंगे?’ वृद्ध ने कहा-‘बस.’ फौरन बिल प्रस्तुत किया गया वृद्ध ने पैसे ट्रे में रखे और उठ खड़ा हुआ. विनय ने सहारा देते हुए वृद्ध को बाहर तक पहुँचाया. कार में बैठते समय वृद्ध ने विनय से कहा-‘मैं तुम्हारे व्यवहार से प्रसन्न हूँ. कल तुम्हारे पदोन्नति के आदेश पहुँच जायेंगे. दुर्भाग्य से मैं ही इस रेस्टोरेन्ट का मालिक हूँ. तुम्हारे जैसे विनम्र और विनयशील कर्मियों के कारण ही मेरा व्यवसाय चल रहा है.’ विनय सेठजी को देखता ही रह गया. वह समझ ही नहीं पा रहा था कि यह सब कैसे हो गया. उसने तो सेठ जी को बस एक ग्राहक के रूप में ही अटैण्ड किया था. 

धन्यवाद देने में न देरी करें, न कंजूसी (To Thanks Giving, Neither Be Miserly, Nor Be Hesitant) 

Positive thinking in Hindi-

1.उस सर्वोच्च शक्ति के प्रति सदैव आभारी रहना चाहिए, जिसने कि हमें मनुष्य योनि में पैदा किया है. यदि हम नहीं होते तो क्या कर लेते ? अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति हमें सदैव आभारी रहना चाहिए, जिनके कारण आज हम यहाँ हैं. यदि हम यहाँ नहीं होते तो क्या कर लेते ? तो आइए, परमात्मा को धन्यवाद दें. परिवार, समाज, राष्ट्र को धन्यवाद दें. धन्यवाद ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी 

2.हमें अपने माता-पिता, शिक्षक-प्रशिक्षक, मार्गदर्शक, मित्र, शत्रु, प्रशंसक, आलोचक, समय, वातावरण सबके प्रति अहसानमन्द रहना चाहिए. प्रत्यक्षतः या परोक्षतः यदि हमें इन सबका सहयोग नहीं मिला होता तो हम यहाँ तक नहीं पहुँच पाते. आगे भी हम इनके सहयोग से ही कुछ कर पायेंगे. इसलिए इन सबके प्रति आभार प्रदर्शित करते रहें और आगे बढ़ते रहें। यही हमारी कृतज्ञता है, यही हमारी सफलता है.

3. किसी का कितना ही बड़ा कर्ज या अहसान क्यों न हो, उसे तत्काल चुकाने के लिए एक छोटा सा शब्द ही काफी है और वह ‘धन्यवाद’, और धन्यवाद एक ऐसा कर्ज है, जो आसानी से चुक नहीं सकता. याद रखें, आपको जितना वक्त ‘धन्यवाद’ कहने में लगेगा, सामने वाले को उतना वक्त ग्रहण करने में नहीं लगेगा, धन्यवाद देना आपका फर्ज है, अपने फर्ज के कर्ज को ब्याज सहित चुकाते चलें,

4. जब भी किसी को कोई काम बतायें, उसे अग्रिम धन्यवाद अवश्य दें. जब काम हो जाए तब दिल की गहराई से धन्यवाद दें, तत्काल दें. याद रखें, देरी से दिया गया धन्यवाद, प्यासे को प्यास से बेहोश होने पर पानी पिलाने जैसा है. धन्यवाद देना तो आपका दायित्व है. दायित्व को निभाते चलें, सबके प्रति अहसान से भरते चलें.

5. अपने परिजनों, बच्चों, मित्रों, शत्रुओं, सहकर्मियों, अधिकारियों, कर्मचारियों, व्यवहारियों, ग्राहकों, सलाह, कारों, शुभचिन्तकों, परिचितों, अपरिचितों सबको यथाशीघ्र धन्यवाद दें. कहीं ऐसा न हो कि आप वक्त पर धन्यवाद ही न दे सकें, यथा समय दिया गया धन्यवाद ही कारगर होता है. देर से दिया गया धन्यवाद अपनी प्रासंगिकता खो देता है.

6. जब भी धन्यवाद दें, जिसको भी दें, दिल खोल कर दें. केवल शब्दों से ही न दें, दिल से दें. मुस्कुराहट के साथ दें. कृतज्ञता के साथ दें. इस भावना के साथ दें कि आपको सोचना न पड़े, बोलना न पड़े, बोलने के लिए कोई प्रयास न करना पड़े, बल्कि आपके अधरों से ‘धन्यवाद’ अनायास निकले पड़े, औपचारिकता भर न निभायें. अहम् से रिक्त होकर धन्यवाद दें. साथ ही दूसरों का धन्यवाद भी मुस्कुराहट के साथ तत्काल स्वीकार करें. स्वीकार करते समय अहम् से न भरें, सामने वाले को इस बात का अहसास हो जाना चाहिए कि आपने ‘धन्यवाद’ स्वीकार कर लिया है.

7. जीवन की निर्भरता के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है, उनमें सबसे ऊपर है, ‘धन्यवाद. जीवन की सफलता के लिए जिन कारकों की आवश्यकता पड़ती हैं, उनमें सबसे कारगर है ‘धन्यवाद.’ धन्यवाद देने में यदि कोई सबसे बड़ी बाधा है तो वह है ‘अहम्. अहंकार सबसे बड़ी नासमझी है. अहम् से भरा व्यक्ति किसी के प्रति कृतज्ञ हो ही नहीं सकता. वह तो परमात्मा के प्रति भी कृतज्ञ नहीं हो सकता. कृतज्ञता के बिना नम्रता नहीं आ सकती, नम्रता के बिना सफलता नहीं आ सकती.

8. जीवन को निर्भार रखने के लिए सबसे प्रभावी उपाय है, ‘कृतज्ञता.’ अहम्वादी संस्कृति में, स्वार्थपूर्ण प्रकृति में केवल धन्यवाद ही अपवाद है. ‘धन्यवाद’ के बाद कोई विवाद बचता ही नहीं है. कृतज्ञ-नाद के बाद कोई निनाद बचता ही नहीं है. ‘धन्यवाद’ एक ऐसा हथियार है, जिसका यदि समय पर प्रयोग किया जाय तो बड़ा से बड़ा महाभारत भी टल सकता है. ‘धन्यवाद’ एक ऐसा सिक्का है, जो हर देश, हर काल में चल सकता है.

9. जब पक्षी तालाब में पानी पीते हैं, तब कुछ गाकर तालाब को धन्यवाद देते हैं. यह सही है कि पक्षियों के पानी पीने से तालाब खाली नहीं हो सकता, परन्तु उनके भाग्य से लबालब भरा तो रह ही सकता है. इन चहचहाते पक्षियों से, कृतज्ञता से खिलते फूलों से, धरती के अहसान से झुकते वृक्षों से, धरती के नजदीक आकर बरसते बादलों से कुछ तो सीखिए.

दृष्टान्त- गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने पर गुरुजी ने अपने एक शिष्य से पूछा-‘यदि कोई तुम्हें गाली दे तो क्या करोगे?’ शिष्य ने जवाब दिया-‘धन्यवाद दूँगा, इस बात के लिए कि केवल गाली ही दी, पिटाई तो नहीं की.’ इस पर गुरुजी ने जानना चाहा–’यदि कोई सचमुच तुम्हारी पिटाई कर दे, तब क्या करोगे ?’ शिष्य का जवाब था-‘तब भी धन्यवाद ही दूंगा. इसलिए कि केवल पिटाई ही की, जान से तो नहीं मारा.’ गुरुजी ने फिर पूछा-‘यदि कोई तुम्हें जान से ही मार डाले, तब क्या करोगे?’ शिष्य ने जवाब दिया-‘तब मेरे पास करने को कुछ बचेगा ही नहीं. फिर भी मेरी ‘आत्मा’ उसे धन्यवाद ही देगी, सांसारिक कष्टों से मुक्ति के लिए.’ अर्थात् हर स्थिति में ‘धन्यवाद’ अवश्य दें. 

अपने आपको सामने वाले के स्थान पर रख कर सोचिए (Think After Putting Yourself in The Place of Person, You Are Dealing With) 

1.यदि आप अपने आपको सामने वाले के स्थान पर रख कर सोचने की कला विकसित कर लेते हैं, तो आपको इस दुनिया में कोई भी गलत नहीं लगेगा. तब कोई भी व्यर्थ नहीं लगेगा, कुछ भी अनर्थ नहीं लगेगा, कोई भी असमर्थ नहीं लगेगा. तब आपकी सहानुभूति सबके प्रति होगी, सबकी सहानुभूति आपके प्रति होगी.

2. जो दूसरों को समझने की समझ रखते हैं, वे ही सचमुच सफलता का स्वाद चखते हैं. सामने वाले की परिस्थितियों को ठीक से समझ लेने पर न तो आप उस पर गुस्सा कर पायेंगे और न ही शत्रुता कर पायेंगे. जहाँ तक संभव हो, किसी से शत्रुता न पालें. शत्रुता पालने के बाद ही पता चल पाता है कि सामने वाला कितना शक्तिशाली है. इसलिए शत्रुता इतनी ही पालें कि सामने वाले को बस इतना ही लगे कि आप वैचारिक रूप से उससे सहमत नहीं हैं, किन्तु उसका किसी तरह का कोई नुकसान नहीं चाहते हैं. यदि आप एक-तरफा शत्रुता पालेंगे तो इससे आपको ही नुकसान होगा, अगले का कुछ भी नहीं बिगड़ पायेगा. याद रखें, जब आप किसी से शत्रुता पाल लेंगे, तब आपका अधिकांश समय अपने बचाव में ही लग जायेगा.

3. जब आप सामने वाले के सुख-दुःख में उतर जाते हैं, तब आपके चेहरे पर भी वही भाव उतर आते हैं. किसी के विश्वास को जीतने की यही शुरूआत है. दूसरों के विश्वास को जीतने की तत्परता ही सबसे बड़ी सफलता है. जब आप दूसरों पर विश्वास करना सीख जायेंगे, तब ही दूसरे भी आप पर विश्वास कर पायेंगे. जब आप किसी पर विश्वास ही नहीं कर सकते, तब यह आशा कैसे कर सकते हैं कि लोग आप पर विश्वास करें. याद रखें, विश्वास को केवल विश्वास से ही खरीदा जाता सकता है.

4. सामने वाले के दृष्टिकोण से सोचने की आप जितनी योग्यता रखते हैं, परिस्थितियों को दूसरों की नजर से परखने की जितनी क्षमता रखते हैं, परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेने में आप उतने ही सफल हो सकते हैं. आपकी सफलता इसी योग्यता और इसी क्षमता पर निर्भर करती है. सफलता का रहस्य भी यही है.

5. यदि आपके आंगन में गंदगी है तो आपको पड़ौसी की छत पर जमी धूल की शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है. जरा सोचिए, आप किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को कैसे अंगीकार कर सकते हैं, जो कि आपके पड़ौसी को स्वीकार नहीं है. पड़ौसी के स्थान पर अपने आपको रख कर सोचिए, पड़ौसी की नाराजगी तुरन्त समझ में आ जायेगी. यदि आप अपने को पड़ौसी से बड़ा समझेंगे, तो पड़ौसी कभी भी आपको बड़ा नहीं समझ पायेगा. तब वह केवल आपकी बुराई ही करेगा.

6. अपनी हीनता छिपाने के लिए कभी दूसरों की आलोचना मत कीजिए. जरा सोचिए, आप कहाँ होते, अगर दूसरे नहीं होते. आप यहाँ नहीं होते, अगर दूसरे यहाँ होते. इसलिए लोगों को दोष देने की बजाय उनकी परिस्थितियाँ समझिए. अगर आप उनके स्थान पर होते, तो क्या करते ?

7. जिसके साथ आपको व्यवहार करना है, उसके बारे में आप उससे पहले सोचें, उसके तथाकथित प्रश्नों और उसकी संभावित आंशकाओं के हर पहलू पर सोचें, याद रखें, दूसरों की मदद करने से आपके होने की सार्थकता सिद्ध होती है. देखा जाय तो दूसरों की मदद करना खुद की मदद करना ही है. दूसरे भी आपकी मदद के लिए ही हैं, बशर्ते कि आप मदद लेने के लिए तैयार हों, लोगों के प्रति सच्ची सहानुभूति प्रकट करके तो देखिए, उससे कहीं अधिक सहानुभूति आपको मिलने लगेगी.

8. जब हम दूसरों को धोखा देते हैं, तब हम परोक्षतः अपने आपको ही धोखा देते हैं. हमें याद रखना चाहिए धोखा देने से ही नहीं, धोखा देने की सोचने मात्र से ही हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा हो सकता है. धोखे का जवाब धोखे से देने पर लोगों का विश्वास उठ जाता है. यदि आप सामने वाले की परिस्थितियों एवम् विवशताओं को ठीक से समझ लेंगे, तब आप उसे धोखा नहीं दे पायेंगे.

9. पहले अपने मन के साथ सुर मिलाइए, सामने वाले के साथ तो अपने आप ही मिल जायेंगे. पहले अपने गुस्से का कारण खोजिए, तब आप किसी पर गुस्सा नहीं कर पायेंगे. कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता, अच्छा या बुरा तो उसे उसकी परिस्थितियाँ बनाती हैं. और परिस्थितियाँ समाज द्वारा सृजित की जाती हैं. आश्चर्य तो यही है कि उसी समाज द्वारा अच्छाई या बुराई का आंकलन किया जाता है. यदि आप लोगों की परिस्थितियों को समझने की कला विकसित कर लेते हैं, तब आपको न कोई अच्छा लगेगा, न कोई बुरा लगेगा. आप से अच्छा या बुरा कोई दूसरा हो भी नहीं सकता.

दृष्टान्त- फकीर जुनैद अपनी आँखों में आँसू भर कर परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे–’प्रभु मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया है, अब मेरी नजर तुम पर ही टिकी हुई है. पर प्रभु यह तो बताओ कि तुम्हारी नजर भी मेरी तरफ है या नहीं ?’ इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करने पर जुनैद को आत्मज्ञान उपलब्ध हुआ. यह रहस्य खुला कि जब तक व्यक्ति को दूसरे की नजर अपनी ओर होने या न होने में संदेह हो, तब तक दूरी बनी रहेगी. जब हम ईश्वर में विश्वास रखते हैं, तब ईश्वर द्वारा सृजित प्रकृति और व्यक्ति में विश्वास क्यों नहीं रख सकते ? 

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