सकारात्मक विचार इन हिंदी-दूसरों की सफलताओं से ईर्ष्या नहीं, बल्कि कुछ सीखने की कोशिश करें

सकारात्मक विचार इन हिंदी

सकारात्मक विचार इन हिंदी-दूसरों की सफलताओं से ईर्ष्या नहीं, बल्कि कुछ सीखने की कोशिश करें (It is Better to Learn From The Success of Others, Then Envying Them) 

1.अगर हम किसी का दुर्भाय सोचते हैं, तो यह सिर्फ और सिर्फ हमारा ही दुर्भाग्य होगा. अगर हम किसी का सौभाग्य सोचते हैं, तो यह हमारा भी सौभाग्य होगा. याद रखें, ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति में स्वयम् की कोई महत्वाकांक्षा नहीं होती, बल्कि वह तो यही चाहता है कि दूसरा जल्दी से गिर कर नीचे आ जाय. ईर्ष्या करने वाला किसी दूसरे का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, किन्तु अपना नुकसान अवश्य कर लेता है.

2. जहाँ चन्दन महकता है, वहाँ दूसरे वृक्षों में भी सुगन्ध आ ही जाती है. जहाँ गुलाब खिलता है, वहाँ दूसरे फूलों से भी महक आ ही जाती है. जब दूसरों की सफल कल्पनाओं को अपने-अपने मूल ज्ञान से जोड़ा जाता है, तब हमारी सफलता के भी पंख लग जाते हैं. इसलिए दूसरों की सुगन्ध को दुर्गन्ध कह कर अपनी दुर्गन्ध न फैलायें.

3. हकीकत तो यही है कि अधिकांश व्यक्ति एक-दूसरे को जलाने के लिए ही हर वक्त दौड़ धूप करते रहते हैं, क्योंकि वे भी किसी न किसी से जले भुने होते हैं. माना कि दूसरों का काम तो आपको जलाना ही है, किन्तु ‘जलने या न जलने’ का विकल्प तो आपके पास ही है. अपने विकल्पों का सदैव सदुपयोग करें, जलना व जलाना छोड़ें। अपनी गति से निर्विकार रूप से निरन्तर आगे बढ़ते रहें. तब आपको न जलने की जरूरत पड़ेगी और न जलाने की.

4. दूसरों से जलन रखने से ईर्ष्या, ईर्ष्या से हीनभावना और हीनभावना से खुद के प्रति दुर्भावना पैदा होती है. याद रखें, दुर्भावना रखने से किसी दूसरे का कुछ भी नहीं बिगड़ सकता, किन्तु आपकी कार्यक्षमता अवश्य प्रभावित हो जाती है. ईर्ष्या से प्रगति रूक जाती है. जलने वाला जलता ही रह जायेगा और जगत आगे बढ़ जायेगा. इसलिए जलो, मगर दीपक की तरह.

5. हम हर सफल और असफल व्यक्ति से कुछ न कुछ अवश्य सीख सकते हैं. हम हर व्यक्ति और हर परिस्थिति से हर क्षण कुछ न कुछ सीख सकते हैं. यह सही है कि यह संसार सफल व्यक्तियों के कारण ही निरन्तर आगे बढ़ रहा है, क्या हमारे ईर्ष्या करने से सफल व्यक्ति परिश्रम करना छोड़ देंगे? तो फिर हमें जलने की कहाँ आवश्यकता है. मजा तो तब है, जब हम ईर्ष्या के बजाय सीखना जारी रखें.

6. यदि आप किसी की प्रशंसा करके उससे कुछ सीखना चाहेंगे तो बहुत कुछ सीख जायेंगे. यदि आप जहर से भरे होकर कुछ सीखना चाहेंगे तो कुछ भी नहीं सीख पायेंगे. यह मत भूलिए कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे किसी न किसी की प्रेरणा अवश्य होती है. और प्रेरणा प्रशंसा से मिलती है, ईर्ष्या से नहीं.

7. जो खुद कुछ नहीं कर सकता, वह सदा दूसरों की बुराई करने में ही लगा रहता है. और धीरे-धीरे यही उसका काम हो जाता है, क्योंकि उसे यही सबसे आसान लगता है. बुराई अक्सर पीठ पीछे की जाती है. बुराई न अस्त्र है, न शस्त्र ही. लेकिन जो बुराई को ही अपना अस्त्र समझ लेता है, उसका अमूल्य जीवन मूल्यहीन हो जाता है. इसलिए अपने इकलौते और अमूल्य जीवन को यूं व्यर्थ मत करिए.

8. यदि आप अपनी वस्तुओं को एक दूसरे से बदलेंगे तो वस्तुओं में कोई अभिवृद्धि नहीं होगी. किन्तु यदि आप अपने अच्छे विचारों को परस्पर बदलेंगे तो दोनों पक्षों के पास दो गुने विचार हो जायेंगे. इसलिए अपने अच्छे विचारों का आदान-प्रदान करें, अपने विचारों में अभिवृद्धि करते रहें. हर व्यक्ति के व्यक्तित्व एवम् कृतत्व का सम्मान करें और अपने व्यवसाय को नये आयाम प्रदान करें.

9. सफल व्यक्ति को उसकी सफलता पर बधाई दें, किन्तु आपके शब्दों में ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए. जब आप शुद्ध, निष्पक्ष और सहज भाव से किसी को बधाई देंगे, मन से उसकी प्रशंसा करेंगे तो दूसरे भी बदले में ऐसा ही करेंगे. आपकी मदद के लिए सदा तैयार रहेंगे. याद रखें, जो आप दूसरों को देंगे, वही लौट कर आयेगा. बुराई, घृणा, ईर्ष्या, बेईमानी तो ब्याज सहित लौट कर आती है. इनसे बचें, इनसे नकारात्मक ऊर्जा मिलती है.

दृष्टान्त- किसी शिष्य द्वारा अरस्तु से पूछा गया कि सफलता का रहस्य क्या है ? इस पर दार्शनिक अरस्तु ने पाँच सूत्र बताये 

1.अपना दायरा बढ़ाओं और संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊपर उठकर सामाजिक बनो.

2. आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और कल की योजनाओं के लिए आशान्वित रहो.

3. दूसरों के दोष दूँढ़ने में अपनी शक्ति खर्च मत करो, वरन् दूसरों से कुछ न कुछ सीखते हुए आगे बढ़ते रहो.

4. कठिनाइयों को देखकर चिन्तित होने की बजाय धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ते रहो. कठिनाइयों का निराकरण स्वतः ही होता चला जायेगा

5. हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई खोजो और उससे कुछ न कुछ सीखते हुए अपने ज्ञान एवम् अनुभव को बढ़ाओ. अर्थात् जब आप दूसरों से ईर्ष्या करना छोड़ देंगे, तब ही किसी से कुछ सीख पायेंगे. ईर्ष्या तो कभी न बुझने वाली आग है, जो ईर्ष्या करने वाले को ही जलाती है. प्रशंसा तो कभी न बुझने वाली प्यास है, जो दोनों ही पक्षों को लाभ पहुँचाती है. 

योजना किसी की भी हो, पर आपके अनुकूल हो (You Can Adopt Others Plan, Provided it Suits You) 

1.यदि आप दूसरों की योजनाओं से भी बेहतर योजना बनाने के लिए सक्षम हैं तो अपनी योजना अलग से ही तैयार करें और उस पर प्रभावी ढंग से अमल करें. किन्तु यदि आप योजना बनाने के लिए सक्षम नहीं है या आपके पास पर्याप्त समय नहीं है, तब दूसरों की योजना अपनाने में कोई हर्ज नहीं है, बशर्ते कि योजना आपके लिए अनुकूल हो.

2. आदमी अक्सर दूसरों को वही योजना सुझाता है, जिस पर वह खुद अमल नहीं कर पाता है. इसलिए दूसरों द्वारा सुझाई गई योजना को हाथ में लेने से पूर्व उस पर गहराई से विचार करें. क्या आप ऐसी ही किसी योजना की तलाश में थे? क्या यह योजना, समय और स्थान के सर्वथा अनुकूल है? क्या योजना के लिए आपके पास मूलभूत ढाँचा तैयार है ? क्या योजना की क्रियान्विति के लिए आर्थिक एवम् भौतिक संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे ? क्या योजना लम्बे समय तक लाभ देती रहेगी ? आदि सभी प्रश्नों पर गहन चिन्तन करने के बाद ही योजना पर अमल आरम्भ करें,

3. जिस योजना पर दूसरों द्वारा अमल किया जा चुका है, जिस योजना से आस-पास के लोग लाभान्वित हो रहे हैं, उसे अपनाने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए, कारण कि ऐसी योजना का ढाँचा तैयार मिलता है. कच्चा माल, कोस्टिंग, मार्केटिंग, मार्जिन आदि का खाका तैयार मिलता है. ऐसी रेडीमेड़ परियोजना को अपनाने में आपका प्रारम्भिक समय, श्रम एवम् धन बचेगा. ऐसी योजना कई दिमागों का निचोड़ होती है. जाँची परखी होती है. इसलिए ऐसी योजना बेझिझक अपनायी जा सकती है.

4. आपके पास भी बहुत अच्छी-अच्छी योजनायें हो सकती हैं, किन्तु दूसरों के पास इनसे भी बढ़िया योजनायें हो सकती हैं. इसलिए इसमें कोई समझदारी नहीं हो सकती कि आप अपनी योजना को ही सबसे बढ़िया समझते रहें. अर्थात् दूसरों की योजना को तब तक न नकारें, जब तक कि आपके पास उससे बढ़िया योजना न हो.

5. व्यक्ति दूसरों को देख-देख कर ही चलना सीखता है. व्यक्ति हर क्षण, हर परिस्थिति से कुछ न कुछ अवश्य सीखता है. व्यक्ति पीछे देख-देख कर आगे बढ़ सकता है. व्यक्ति किसी न किसी से प्रेरित होकर ही सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ सकता है. अर्थात् आप दूसरों की सफल योजनाओं के माध्यम से ही अपनी योजना को सफलता में बदल सकते हैं.

6. किसी असफल व्यक्ति के पास भी बढ़िया से बढ़िया योजनायें हो सकती हैं. बार-बार हारने वाले के पास भी जीत की संभावनायें हो सकती हैं. इसलिए योजना किसी की भी हो, आप उस पर चलकर सफल हो सकते हैं, किन्तु आपको योजना के हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करना होगा, विफलता के समस्त कारणों का विश्लेषण करना होगा. पूरे आत्मविश्वास के साथ योजना पर अमल करना होगा. तब यही योजना आपकी पहचान बन जायेगी.

7. जब आप किसी से सचमुच कुछ सीखना चाहेंगे तो सिखाने वाला भी अपनी समूची ताकत सिखाने में लगा देगा. याद रखें, अपने अहम् के साथ खड़े होकर आप कुछ भी नहीं सीख सकेंगे. सीखने के लिए सबसे पहले अहम् को छोड़ना होगा, फिर अपने तमाम पूर्वाग्रहों एवम् दुराग्रहों को छोड़ना होगा, तब ही आप कुछ सीख पायेंगे. इसलिए सदैव जिज्ञासु बने रहें. जिस योजना अथवा सलाह पर आप अमल कर सकते हैं, अवश्य करते रहें.

8. कोई भी ‘सफल व्यक्ति’ जन्मजात नहीं होता. दूसरों की सफलताओं को अपनी कल्पनाओं से जोड़कर ही कोई व्यक्ति सफल हो सकता है. आप दूसरों की नाकामयाबी को अपनी कामयाबी बना सकते हैं, बशर्ते कि आप में हौंसला हो. आप दूसरों की कामयाबी को अपनी कामयाबी बना सकते हैं, बशर्ते कि आप में सद्भावना हो. आप अपनी नाकामयाबी को कामयाबी में बदल सकते हैं, बशर्ते कि आप कामयाब लोगों से प्रेरित होने के लिए तैयार हों. 9. बिना सोचे समझे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा अपनाये गये ‘शॉर्टकट’ को अपनाने की भूल न करें. कहीं ऐसा न हो कि शॉर्टकट (Short Cut) को ढूँढ़ने में ही इतना समय लग जाए कि इतने समय में तो आप लम्बे रास्ते से ही पहुँच सकते थे. यह भी अपेक्षित नहीं है कि दूसरे का तथाकथित ‘शॉर्टकट’ आपके लिए भी शॉर्टकट ही साबित हो, जिसे आप दूसरे का शॉर्टकट समझते हैं, हो सकता है, यह उसके लिए शॉर्टकट ही नहीं रहा हो, इसलिए अपना ‘शॉर्टकट’ अपने अनुभवों के आधार पर बनायें.

दृष्टान्त- एक उत्साही युवक ने प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भरपूर तैयारी की, किन्तु दुर्भाग्यवश किसी भी सेवा के लिए चयन नहीं हो सका. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अपने जीवन के अनमोल पाँच साल लगा दिये. जबकि उसके एक साथी का केन्द्रीय सेवाओं में चयन हो चुका था. एक दिन साथी ने एक योजना सुझायी, साथी ने बताया कि यदि उसका चयन नहीं होता तो वह इसी योजना पर अमल करता. योजना थी, ‘प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले प्रतियोगियों को प्रशिक्षण देना.’ उत्साही युवक ने इस योजना पर तत्काल कार्य आरम्भ कर दिया. प्रारम्भ में कोचिंग क्लासेज अपने घर पर ही शुरू कर दी. उसने खूब मेहनत की. धीरे-धीरे प्रचार बढ़ा, अभ्यर्थियों की संख्या बढ़ने लगी. किराये का भवन ले लिया गया. कुछ अच्छे विशेषज्ञ/प्रशिक्षक भी रख लिये, देखते ही देखते अभ्यर्थियों की संख्या काफी बढ़ गई. आमदनी भी तदानुसार बढ़ती गई. तत्सम्बन्धी कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित करवादी गईं. चार-पाँच साल में ही उसकी आमदनी योजना बताने वाले साथी के वेतन से कई गुना हो गई. यह अच्छा ही हुआ कि उसका किसी सेवा के लिए चयन नहीं हुआ. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

one × 3 =