पॉजिटिव थॉट्स इन हिंदी अबाउट लाइफ-चिन्ता करने से ‘हुआ’ ‘अनहुआ’ नहीं हो सकता (Some Thing Done, Can Not be Undone’ By Worring) 

positive thoughts in hindi about life

पॉजिटिव थॉट्स इन हिंदी अबाउट लाइफ-चिन्ता करने से ‘हुआ’ ‘अनहुआ’ नहीं हो सकता (Some Thing Done, Can Not be Undone’ By Worring) 

1.जो बीत गई, वह बात गई. जो कट गई, वह रात गई. यानी जो हो गया, वह हो गया, उसे अब ‘अनहुआ’ नहीं किया जा सकता, केवल आगे के लिए सबक लिया जा सकता है. याद रखें, जो हो गया, उसी की चिन्ता करते रहने से तो जो हो सकता है, वह भी नहीं हो पायेगा. इसलिए जो हो गया, उसे स्वीकार करें. चिन्ता करनी ही हो तो जो हो रहा है, उसकी करें, भूत और भविष्य की बजाय केवल वर्तमान की चिन्ता करें, तब सब कुछ अपने आप होता चला जायेगा.

2. मुँह से निकली बोली और बन्दूक से निकली गोली कभी लौट कर नहीं आ सकती. हाथ से निकली श्वासों की टोली और वक्त की डोली, कभी लौट कर नहीं आ सकती. इसलिए जो हाथ से निकल गया, उसे भूल जाइए. परन्तु हाथ पर हाथ धर कर मत बैठ जाइए, यह मत सोचिए कि अब कुछ नहीं हो सकता. याद रखें, जो होगा, वो अब ही तो होगा. जो अब तक नहीं हुआ, वह सब होगा, किन्तु आरम्भ तो करिए.

3. हम अक्सर यह सोच-सोच कर ही दुखी रहते हैं कि हमने वक्त पर वक्त को नहीं पकड़ा. मन लगाकर अध्ययन नहीं किया. तन, मन और धन लगाकर व्यवसाय नहीं किया. सही व्यवसाय का चयन नहीं किया. काश ऐसा किया होता तो ऐसा हो जाता. बीस साल पहले अमुक स्थान पर प्लाट खरीद लेते तो आज बैठे-बैठे ही करोड़पति हो जाते. हाँ, गुजरा वक्त तो लौट कर नहीं आ सकता, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि अब सारे रास्ते ही बन्द हो चुके हैं. रास्ते तो सभी खुले हुये ही हैं, बल्कि पहले से अधिक खुले हुए हैं. जिन कारणों से हम पहले प्लाट नहीं खरीद पाये थे, वे कारण आज भी मौजूद हैं. कारणों को हटाते ही हम अब भी प्लाट खरीद सकते हैं. जरा दूर मिलेगा, महँगा मिलेगा. पर करोड़पति होने की संभावनायें तो अब पहले से कहीं अधिक है.

4. अतीत का अफसोस मत करो, मगर अतीत से कुछ सीखते हुए आगे बढ़ो. जो हो गया, उसे नियति को सौंप दो. जब नये सोच के साथ आगे बढ़ोगे, तब हीन भावना अपने आप ही तिरोहित हो जायेगी. चिन्ता आशा में रूपान्तरित हो जायेगी. गये-गुजरे अतीत की चिन्ता करके अपने वर्तमान को गया-गुजरा बनाते रहने का कोई औचित्य नहीं है.

5. यदि आपने सौ रुपये में खरीदे शेयर को एक सौ दस रुपये में बेच दिया और अब भाव दो सौ रुपये हो गया तो यह चिन्ता का कारण नहीं होना चाहिए. जो भाग्य में था, वो मिल गया. यदि भाव एक सौ दस से आगे नहीं बढ़ते, तब आप कितने खुश रहते. अर्थात् बेच कर पछताना रोक कर पछताने से बेहतर है. 

6.यदि आपको सौ रुपये के शेयर को अस्सी रुपये में बेचना पड़े और बाद में भाव दो सौ रुपये हो जाय, तब आप क्या करेंगे ? तब एक उपाय यह भी बचता है कि आप अपने घाटे को फिलहाल भूल जायें और उस कम्पनी के शेयर्स के भाव घटने का इन्तजार करें. जब भी भाव अस्सी रुपये से नीचे आयें, तुरन्त फिर से खरीद लें. यदि भाव नीचें नहीं आते हैं, तब भी चिन्ता न करें. दूसरे लाभप्रद शेयर्स खरीद लें. इस तरह एक के घाटे को दूसरे से पाटा जा सकता है. किसी एक शेयर में घाटा हो जाने से निवेश करना तो नहीं छोड़ा जा सकता.

7. अतीत के घाटे को पूरा करने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि घाटा देने वाली कम्पनी के कुछ शेयर वर्तमान दरों पर खरीद लिए जायें. भावों में कमी आने पर कुछ शेयर और खरीद लें और कमी आने पर कुछ शेयर और खरीद लें. भावों के लगातार गिरने पर कुछ न कुछ शेयर खरीदते रहें और औसत क्रय मूल्य निकालते रहें. जब भाव औसत से ऊपर निकल जायें तो धीरे-धीरे बेचना शुरू कर दें. इस तरह पुराना घाटा भी पूरा हो जायेगा और अच्छा खाशा लाभ भी हो जायेगा. याद रखें, शेयर मार्केट में भाव ऊपर नीचे होते रहते हैं.

8. जो कुछ भी अब तक हुआ, उसे भूल जाइए. जो अभी भविष्य के गर्भ में है, उसकी चिन्ता मत करिए. केवल यह देखिए कि आप इस वक्त क्या कर रहे हैं. वर्तमान के एक-एक क्षण का आनन्द के साथ सदुपयोग करते चलें, ताकि भविष्य में पछताना न पड़े. अपनी ही गलतियों से सीख कर सुधार करते चलेंगे तो कभी पछताना ही नहीं पड़ेगा.

9. यदि आपके किसी व्यक्ति द्वारा अथवा परिवार के किसी सदस्य द्वारा कोई काम गलत हो गया या कोई काम बिगड़ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप उसे रोजाना ही उसकी गलती का अहसास दिलातें रहें, हर बार उसे कौसते रहें. कोसने और क्रोध करने की बजाय उसे सुधार करने का पूरा-पूरा मौका दें. फिर देखें कि सहानुभूति क्या रंग लाती है. निष्कर्ष 

(क) जो मर गया, उसकी लाश को कब तक उठाये फिरेंगे, क्या उठाये फिरने से वह फिर से जीवित हो सकता है ? जो हो गया, उसकी चिन्ता कब तक करते रहेंगे ? क्या चिन्ता करने से ‘हुआ’ ‘अनहुआ’ हो सकता है ? इसलिए जो हो गया, उसे भूल जाइए. उसकी न चिन्ता करें न आत्मग्लानि. जो है, उसे संभालें, सारा तनाव दूर हो जायेगा. अतीत से चिपके रहने पर तो वर्तमान भी आपके हाथ से फिसलता चला जायेगा. (ख) वर्तमान को अधिक सार्थक बनाने हेतु आप एक छोटा-सा प्रयोग कर सकते हैं. अपनी उम्र को सदा दस वर्ष घटा कर अनुभव करें. आपने अपनी जिन्दगी के दस साल तो फालतू में ही गुमाये होंगे, इसलिए इतनी अवधि तो आप घटा ही सकते हैं. उम्र को कम अनुभव करने पर एक चमत्कार घटित होगा. इस तरह आप अपनी आयु के सम्बन्ध में वैचारिक रूप से जो ‘हो गया’ उसे ‘अनहुआ’ मान सकते हैं. 

आप अपने अनुभवों के आधार पर ही आगे बढ़ सकते हैं (You Can Proceed Only By Your Own Experiences) 

positive thoughts in hindi about life

1.आश्चर्य तो इसी बात का है कि आदमी अपने अनुभवों से कुछ भी सीखना नहीं चाहता है. सुखद अनुभवों को तो वह पकड़ लेता है, किन्तु दुखद अनुभवों को भूल जाना चाहता है. अनुभव चाहे अच्छे हों या बुरे, आप दोनों से ही कुछ न कुछ सीख सकते हैं. यह सही है कि आप अपने अनुभवों से ही सीख सकते है, दूसरों के अनुभवों से सीखना तो जरा जौखिम भरा होगा.

2. आप द्वारा लगाये गये पौधे पर जब फल आता है, तब ‘स-फल’ कहलाता है और तब आप ‘सफल’ हो जाते हैं. जब पौधे पर कोई फल नहीं लगता, तब वह ‘वि-फल’ कहलाता है और आप ‘विफल’ हो जाते हैं. यही है, आपकी सफलता और विफलता, जिसका पता महज आपके अनुभव से ही चल सकता है. जब आप कोई पौधा ही नहीं लगायेंगे, तब आपका अनुभव कैसे पकेगा? जब अनुभव नहीं पकेगा, तब नये पौधे में फल भी कहाँ पकेगा?

3. जब एक से अधिक व्यक्ति एक से पौधे लगाते हैं, एक सी देखभाल करते हैं, एक सा परिश्रम करते हैं, तब भी सभी के वृक्षों पर एक से फल नहीं लग पाते हैं. उन सभी वृक्षों के फलों की गुणवत्ता एवम् उत्पादकता भी एक सी नहीं रह पाती है. इसी तरह एक जैसे कार्य करने वाले विभिन्न व्यक्तियों की सफलतायें भी एक सी नहीं हो सकती. इसका मुख्य कारण सबके अनुभवों की भिन्नता है.

4. जब एक ही व्यक्ति द्वारा एक ही खेत में एक ही फसल बोयी जाती है, तब भी फसल के सभी पौधों से एक समान उत्पादकता कहाँ प्राप्त होती है, खाद, बीज, पानी, निराई-गुड़ाई सब कुछ समान होने पर भी पौधों से अलग-अलग मात्रा में उपज प्राप्त होती है. गुणात्मकता में भी अन्तर आ जाता है. कोई दाना छोटा और कोई दाना बड़ा हो जाता है, तब एक ही परिसर में एक से कार्य करने वाले विभिन्न व्यक्तियों से एक से कार्य परिणामों की उम्मीद कैसे की जा सकती है. सबकी कार्य क्षमतायें भिन्न-भिन्न होती हैं और कार्यक्षमता व्यक्तिगत अनुभव पर बहुत कुछ निर्भर करती है.

5. वैसे हमारे जीवन में नब्बे प्रतिशत कार्य तो स्वतः ही ठीक-ठाक हो जाते हैं, केवल दस प्रतिशत कार्य ही ठीक से नहीं हो पाते हैं. इसका अर्थ हुआ कि नब्बे प्रतिशत कार्यों में हमारे अनुभव बिना किसी विशेष प्रयास के स्वतः ही लागू होते रहते हैं. शेष दस प्रतिशत कार्यों में ही हमें अपने अनुभवों की विशेष आवश्यकता पड़ती है, अर्थात् हम इन कार्यों को भी अपने अनुभवों के आधार पर सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं.

6. जब आपके पास कुछ क्षमतायें और कुछ अक्षमतायें होती हैं, तब आपके प्रतिद्वन्द्वी भी आप से अलग कैसे हो सकते हैं. परिपूर्ण तो कोई हो भी नहीं सकता. परमात्मा के अतिरिक्त कोई परिपूर्ण है भी नहीं. जब सामने वाला आपकी कमजोरी का फायदा उठाकर आगे बढ़ सकता है, तब आप भी उसकी कमजोरी का फायदा क्यों नहीं उठा सकते. अर्थात् आप अपने अनुभवों के आधार पर दूसरों की कमजोरियों/अक्षमताओं को अपनी योग्यताओं में बदल सकते हैं.

7. शास्त्रों द्वारा जो कुछ सिखाया जाता है, वह आपका अनुभव नहीं हो सकता. उधार के ज्ञान से किसी का भला हो भी नहीं सकता. अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन तो आपको ही करना पड़ेगा. और आप द्वारा पचाया गया भोजन ही आपका अपना होगा. दूसरों के अनुभवों से आपका पेट नहीं भर सकता. पर हाँ, दूसरों के अनुभवों को उपलब्ध हुआ जा सकता है. अन्ततः आपका अपना अनुभव ही आपके लिए निर्णायक सिद्ध होगा.

8. यह सही है कि अनुभव में उतरने के लिए आपको कुछ तो करना ही पड़ेगा पर इसका अर्थ यह नहीं, कि आप हर बार असफल होते रहें और एक से अनुभवों को बार-बार ढ़ोते रहें. कहीं ऐसा न हो कि आप अपना समूचा जीवन अनुभव प्राप्त करने में ही लगा दें और कुछ भी प्राप्त न कर सकें. जैसे ‘कटते – कटते कतरन हो गई चदरिया, जिन्दगी ने समझा मुझे सीना आ गया ।’ अर्थात् प्रकृति ने तो आपको एक ही चदरिया दी थी. यदि आप इसे नये-नये अनुभवों के चक्कर में ‘कतरन’ में बदल देते हैं, तब आपके पास कुछ भी नहीं बचेगा. मजा तो तब है, जब आप इसे अपने अनुभवों के आधार पर सुरक्षित करते चलें और अन्त में ज्यों की त्यों प्रकृति को वापस सौंप दें. प्रबुद्ध कबीर ने कुछ ऐसा ही किया था-‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया.’

9. आदमी केवल सपनों में जीता है, हकीकत से रूबरू होने की शक्ति नहीं है, उसमें. यह शक्ति तो स्वानुभव से ही आ सकती है. अस्तित्व में होने का अर्थ है, ‘परिवर्तन’. परिवर्तन का अर्थ है ‘परिपक्वता’ और परिपक्वता का अर्थ है ‘लगातार’ स्व-संवर्धन में रत रहना’. याद रखें, स्व-संवर्धन स्वानुभव का 

ही अन्तिम चरण है. स्वानुभव से ही आप अपने सपनों को साकार कर सकते हैं. दृष्टान्त 

एक मूर्तिकार एक से बढ़ कर एक मूर्तियाँ बनाता था. एक बार उसने बहुत ही सुन्दर मूर्ति बनाई. तैयार होने पर उसने मूर्ति को उलट-पुलट कर देखा और अचानक रोने लगा. लोगों ने रोने का कारण पूछा तो मूर्तिकार ने बताया कि ‘काफी तलाश करने के बाद भी मुझे इस मूर्ति में कोई कमी नजर नहीं आ रही है. मेरी दुविधा का यही कारण है. यदि मेरी सूक्ष्म दृष्टि इसी तरह कुण्ठित बनी रही तो भविष्य में इससे अच्छी मूर्तियाँ नहीं बना पाऊँगा.’ अर्थात् मूर्तिकार अपने ही अनुभवों के आधार पर एक से बढ़ कर एक मूर्तियों का निर्माण कर रहा था. 

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