Positive thinking meaning in Hindi-अपने काम से नफरत करना, अपने आप से नफरत करना है

Positive thinking meaning in Hindi

Positive thinking meaning in Hindi-अपने काम से नफरत करना, अपने आप से नफरत करना है (To Disregard Your Work is To Disregard Yourself) 

1.प्रत्येक व्यक्ति पर परिवार, समाज एवम् राष्ट्र का अकूत कर्जा होता है. हर व्यक्ति इस कर्ज भार से पूर्णतः मुक्त तो नहीं हो सकता, किन्तु हल्का अवश्य हो सकता है और हल्का होने के लिए उसे कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा. यदि कोई अपने काम से नफरत करेगा तो जिन्दगी का रथ आगे कैसे बढ़ेगा? इसलिए हमें अपने काम से उतना ही प्रेम करना चाहिए, जितना हम अपने आप से करते हैं.

2. हमारे पैर और जूते हर अच्छी बुरी जगह एवम् गंदगी पर चलते हैं, तो क्या हम अपने पैरों या जूतों से नफरत करते हैं ? कार के पहिए उबड़-खाबड़ रास्तों के तमाम कीचड़ से गुजरते हैं, तो क्या हम कार या पहियों से नफरत करते हैं ? नहीं, तो फिर अपने काम से नफरत करने का कोई औचित्य ही कहाँ है.

3. हमें सदैव यह याद रखना चाहिए कि हमारे होने का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य है. और उस प्रयोजनार्थ किसी न किसी काम का आयोजन भी आवश्यक है. इसलिए प्रयोजन की प्राप्ति हेतु आवण्टित कार्य को अपना समझ कर ही करना चाहिए. जब हम अपने परिवार, अपने समाज, अपने धर्म और अपने राष्ट्र से नफरत नहीं करते, तब अपने कर्म से नफरत कैसे कर सकते हैं.

4. कोई भी काम न बढ़िया होता है, न घटिया होता है. काम तो बस काम होता है, अच्छा या बुरा तो बस हमारा नजरिया होता है. काम कोई मजबूरी नहीं, जीने के लिए जरूरी है. काम तो जिन्दगी का पर्याय है, जिन्दगी की परिभाषा है, हमारे होने का तात्पर्य है. काम ही हमारी पहचान है, काम ही हमारी आन, बान और शान है. काम ही हमारी मुस्कान है और काम ही हमारा परिधान है.

5. एक से ही कपड़े, एक ही ढंग से हम रोज-रोज पहनते हैं, पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम कपड़े पहनना ही छोड़ दें. हम दिन भर कहीं भी रहें, शाम को तो घर लौटते ही हैं, पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि उकता कर कदम कहीं और मौड़ दें. तब अपने काम से उकता जाने का कोई अर्थ नहीं है. यदि हम अपने वर्तमान कार्य को छोड़कर कोई दूसरा कार्य अपना लेते हैं, तब इस बात की क्या गारण्टी है कि हम दूसरे कार्य से कभी उकता नहीं जायेंगे. इसलिए जो कार्य हमारे हाथ में है, उसे अपनत्व एवम् गंभीरता पूर्वक करते रहें. यदि बदलना पड़े तो सोच समझकर बदलें.

6. यह भी संभव नहीं है कि आप रोज-रोज अपना काम बदल सकें. काम जो भी मिला या आपने चुना, उसे बीच में छोड़ने का कोई औचित्य नहीं है. हाँ, कोई बेहतर कार्य या विकल्प उपलब्ध हो तो अवश्य बदल सकते हैं. अपने कार्य से ऊब जाने का कोई अर्थ नहीं है. काम कैसा भी हो, आप अपने कार्य के माध्यम से ही अपने जीवन में अर्थ भर सकते हैं.

7. क्या आप अपनी सूरत से नफरत करते हैं? क्या आप जीव-जगत और प्रकृति से नफरत करते हैं ? क्या आप परमात्मा या परमात्मा की किसी मूरत से नफरत करते हैं ? तब आप अपने काम से ही कैसे नफरत कर सकते हैं. याद रखें, काम ही पूजा है, काम ही अर्चना है. काम ही आपकी शहादत है, काम ही इबादत है. काम तो खुदा की कायनात है.

8. यदि आप कोई काम छोड़ देते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे कोई दूसरा भी नहीं करेगा. जब दूसरे लोग इसी कार्य को बड़े आनन्द के साथ करते रहते हैं, तब आप क्यों नहीं कर सकते ? जब लोग बिना उकताये, बिना किसी शिकायत के एक ही कार्य को जिन्दगी भर सकते हैं, तब आप क्यों नहीं कर सकते ? याद रखें, जिन्दगी तो वैसे ही बहुत छोटी है, फिर बार-बार काम बदल कर इसे और छोटी मत बनाइए.

9. जहाँ काम है, वहाँ सृष्टि है. जहाँ सृष्टि है, वहाँ काम है. मानवीय सृष्टि में जो कुछ दृष्टि गोचर होता है, वही काम है. काम के आगे काम है, और काम के पीछे काम है. ‘काम’ बिना न कोई सृजन है, न आराम है. ‘काम’ तो जीवन का पुरूषार्थ है. पुरुषार्थ से घृणा करना, जीवन से घृणा करना है. याद रखें, घृणा करने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और नकारात्मक ऊर्जा के रहते हर सफलता संदिग्ध ही होती है. इसलिए अपने काम से कभी घृणा न करें, लोगों से घृणा न करें, घृणा करनी ही हो तो अपनी कार्य प्रणाली से करें.

दृष्टान्त- एक भिखारी था, उसे अपने धन्धे से इतना लगाव था कि वह धीरे-धीरे पैसे वाला हो गया. घर, गाड़ी आदि सभी सुविधायें उपलब्ध हो जाने के बाद भी उसने अपना धन्धा नहीं छोड़ा. सुबह जल्दी आकर अपने नियत स्थान पर बैठ जाता. शाम को उसका ड्राइवर उसे लेने आता. जैसे ही कार उसके पास आकर रूकती, अपनी आदत के मुताबिक वह अपना कटौरा ड्राइवर की तरफ बढ़ा देता. ड्राइवर भी मालिक की आदत से वाकिफ था. तुरन्त अपनी जेब से एक सिक्का निकाल कर कटोरे में डाल देता. भीख मिलने पर ही भिखारी अपनी चटाई उठाकर अपनी कार में सवार हो पाता और घर चला जाता. सचमुच भिखारी को अपने धन्धे से कितना प्यार था. यह प्यार ही उसकी सफलता का राज था. 

Thoughts in hindi for students motivationalबिना लक्ष्य कदम बढ़ाना, धूल में लट्ठ चलाना है (To Proceed Without a Target is To Group in the Dark) 

Positive thinking meaning in Hindi

1.विश्व की प्रत्येक वस्तु के साथ उसका कोई न कोई प्रयोजन भी अवश्य जुड़ा हुआ होता है. इसी तरह हमारा जन्म भी किसी पूर्व निर्धारित प्रयोजनार्थ ही हुआ है. और जहाँ प्रयोजन, वहाँ लक्ष्य. जहाँ लक्ष्य, वहाँ प्रयोजन. प्रयोजन की प्राप्ति हेतु लक्ष्य तो साधना ही पड़ेगा. लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रयोजन को पैरों में बांधना ही पड़ेगा, चलने से पहले लक्ष्य तो निर्धारित करना ही  पड़ेगा, वरना हमारा चलना ही व्यर्थ हो जायेगा.

2. यदि हम हर कार्य लक्ष्यानुसार ही करते हैं तो हमें एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना पड़ेगा. यदि हम हर क्षण का सदुपयोग करते हैं तो हमें लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अधिक चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं होगी. यदि हम किसी लक्ष्य को सामने रख कर ही चलेंगे, तो हमारी यात्रा निरर्थक नहीं होगी. चलने का कोई मकसद तो हो. किसी मकसद के साथ चलेंगे तो हमें हर कदम पर आनन्द की अनुभूति होगी. आनन्द के साथ चलते रहेंगे तो मंजिल मिलना निश्चित ही है.

3. यह कतई अपेक्षित नहीं है कि हर व्यक्ति अपने लक्ष्य में कामयाब हो ही, किन्तु कामयाब होने के लिए किसी न किसी लक्ष्य का होना तो अपेक्षित ही है. यह अपेक्षित नहीं है कि हर व्यक्ति कोई बड़ा लक्ष्य लेकर ही चले, किन्तु बड़े से बड़े लक्ष्य तक पहुँचने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य प्राप्त करते चलना अपेक्षित है. इसलिए अपनी क्षमतानुसार छोटे-छोटे लक्ष्य प्राप्त करते चलें, तब आपको बड़े लक्ष्यों के लिए सोचने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी..

4. भले ही छोटा ही हो, लक्ष्य तो भिखारी का भी होता है. भिखारी को भी अपना लक्ष्य बार-बार दाता के सामने दोहराना पड़ता है, अर्थात् लक्ष्य को दोहराते चलना आवश्यक है. दोहराना ही नहीं, लक्ष्यानुसार निरन्तर आगे बढ़ते रहना आवश्यक है. और जब आप किसी लक्ष्य तक पहुँचने वाले होते हैं, तब कुछ और बड़े लक्ष्य स्वतः ही सामने आ जाते हैं. यही क्रम जिन्दगी भर चलता है, जो इस क्रम को भंग कर देता है, वह हर दौड़ में पिछड़ जाता है…

5. आप सबसे आगे निकलने का सपना तो पाल सकते हो, किन्तु इसे अपना लक्ष्य नहीं बना सकते. सबसे आगे कोई निकल भी नहीं सकता. सबको अपनी ही ट्रेक में दौड़ना पड़ता हैं. अपनी ट्रेक में आप जहाँ हैं, वही स्थान आपके लिए महत्वपूर्ण है. यहाँ मृत्यु के अतिरिक्त कुछ भी निश्चित नहीं, किन्तु मृत्यु को तो लक्ष्य बनाया नहीं जा सकता. जन्म और मृत्यु तो जिन्दगी के दो छोर हैं. दोनों के बीच ही हमें बहुत कुछ करना होता है. यदि हम सही समय पर सही लक्ष्य निर्धारित करते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते चलेंगे तो जन्म और मृत्यु को सार्थक कर लेंगे. 

6.आप शिक्षार्थी, शिक्षक, प्रशिक्षक, जनसेवक, जन प्रतिनिधि, व्यवसायी, उद्यमी, निर्माता, विक्रेता, सेवा प्रदाता, कृषक, श्रमिक कुछ भी हों, आपको कोई न कोई लक्ष्य तो लेकर ही चलना पड़ेगा. और हर क्षण लक्ष्य की दिशा में सतर्क रहना पड़ेगा. बिना लक्ष्य तो आप कहीं पहुँच भी नहीं पायेंगे. गलती से पहुँच भी गये तो मुम्बई की जगह कोलकाता पहुँच जायेंगे.

7. यदि आप लेखक हैं तो दैनिक अध्ययन एवम् लेखन का कोई न कोई लक्ष्य सामने रख कर चलें. किसी कारणवश यदि किसी दिन कम लिख सकें या बिल्कुल ही न लिख सकें तो अगले दिन उसकी कमी पूर्ति कर लें. किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व लक्ष्य निर्धारित करें. फिर कार्य-योजना तैयार करें और फिर योजनानुसार कार्य करते चलें। लक्ष्य की ओर उठने वाला हर कदम आनन्द से भरा होना चाहिए, तब आप जब भी लक्ष्य तक पहुँचेंगे, थकान रहित होंगे.

8. अलग-अलग व्यक्तियों के लक्ष्य भी अलग-अलग ही होंगे. हर व्यक्ति अपनी दक्षता और क्षमता के अनुसार ही अपने लक्ष्यों का निर्धारण करता है. इसलिए हर व्यक्ति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकता है. आरम्भ में आप अपना लक्ष्य छोटा रख सकते हैं. जैसे-जैसे लक्ष्य के नजदीक पहुँचते जायें, लक्ष्य को बढ़ाते चलें, आप अपने लिए दैनिक लक्ष्य भी निर्धारित कर सकते हैं. जब दैनिक लक्ष्यों की पूर्ति दैनिक रूप से होने लगेगी, तब आपके उत्साह और आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होती चली जायेगी. तब आपकी क्षमता और कार्य कुशलता बढ़ने लगेगी. तब आप निरन्तर सफलता ही ओर बढ़ते चले जायेंगे.

9. परमात्मा कभी बैचेन नहीं रहता. पशु-पक्षी, पेड़-पौधे कभी बैचेन नहीं रहते. पर अफसोस कि आदमी सदैव बैचेन रहता है. कारण कि वह कभी एक लक्ष्य लेकर नहीं चल सकता. लक्ष्य बदलता रहता है. एक लक्ष्य की पूर्ति से पहले ही दूसरा, तीसरा लक्ष्य खड़ा कर देता है. आदमी के तमाम कष्टों का कारण भी यही है. इसलिए बैचेनी से उबरने के लिए, सुखी रहने के लिए जरूरी है कि निश्चित लक्ष्यों के साथ ही आगे बढ़ा जाय.

दृष्टान्त- गरीब किसान का एक बच्चा किसी तरह स्कूल जाने लगा. स्कूल के अध्यापक के अलावा आस-पास कोई भी दसवीं पास नहीं था, सो उसने दसवीं पास करने को अपना लक्ष्य बना लिया. अपनी कक्षा में प्रथम आता था, किन्तु आर्थिक समस्यायें बढ़ रही थीं. उसने बीच-बीच में मजदूरी भी की. कुछ सरकारी छात्रवृत्ति भी मिलने लगी. कुछ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगा. नवीं कक्षा में पढ़ते हुए दसवीं कक्षा के छात्रों को घर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था. और अन्ततः अपने लक्ष्य में कामयाब हुआ, प्रथम श्रेणी में दसवीं उत्तीर्ण की. किन्तु दसवीं करते ही बी.ए. करने का लक्ष्य बना लिया. कुछ सरकारी सहयोग और कुछ ट्यूशन पढ़ाते हुए एक दिन बी.ए. भी कर लिया. बी.ए. करते ही उसने अफसर बनने का लक्ष्य बना लिया. छोटी-सी नौकरी करते हुए उसने अच्छी तैयारी की और प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गया, यदि वह कोई लक्ष्य लेकर नहीं चलता तो कहीं भी नहीं पहुँच पाता. 

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