गर्भावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन | गर्भावस्था में होने वाले परिवर्तन 

गर्भावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन

गर्भावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन | गर्भावस्था में होने वाले परिवर्तन 

गर्भावस्था में स्त्री के शरीर में अकस्मात कई परिवर्तन होने लगते हैं। इन परिणाम स्वरूप उसे अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | गर्भावस्था में शारीरिक परिवर्तनों से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं है। यद्यपि कुछ स्त्रियों को गर्भावस्था में किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता, किंतु गर्भावस्था के परिवर्तन तो उनमें भी स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।

शरीर की त्वचा

शरीर के कुछ भागों की त्वचा में सांवलापन विकसित होना गर्भावस्था के सामान्य लक्षण हैं। जैसे एक रेखा नाभि के नीचे और पेड़ के ऊपर दिखने लगती ९। स्तनों के निप्पलों के किनारों का वर्ण भी हल्के पीले रंग से बदलकर कुछ भूरे वण का हो जाता है। यह परिवर्तन शरीर में उत्तेजित हारमोंस के परिवर्तन के कारण है। शरीर के अन्य चिह्न भी श्याम वर्ण के हो जाते हैं। दरअसल त्वचीय कोशिकाएं, जिनमें श्यामल वर्णक होते हैं, वे इन हारमोंस से फैल जाती हैं। इसी कारण गर्भावस्था के तीसरे मास के बाद चिह्न, तिल या धब्बे अधिक गहरे हो जाते हैं। शिशु का आगमन होते ही ये परिवर्तन लोप हो जाते हैं। लेकिन किसी-किसी स्त्री में स्थायी रूप से रह भी सकते हैं। ये सभी गर्भावस्था के समय के सामान्य परिवर्तन हैं और इनसे कभी कोई भी समस्या नहीं उत्पन्न होती।

गर्भावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन

स्तनों में परिवर्तन 

जैसे ही स्त्री गर्भवती होती है, उसके स्तन बढ़ने लगते हैं। उनकी कोमलता और संवेदनशीलता लोप हो जाती है तथा हल्के से दबाव से ही उनमें पीड़ा होने लगती है। चार-पांच मास तक स्तनों की यही दशा रहती है। निप्पल के किनारों के रंग में भी परिवर्तन हो जाता है। वे कुछ अधिक स्याह हो जाते हैं। कुछ स्त्रियों में यह परिवर्तन स्थायी हो जाता है। स्तन वृद्धि के साथ वे भारी भी हो जाते हैं। 

जिन स्त्रियों के स्तन बड़े-बड़े, भारी और लटकते हुए होते हैं, उन पर भार के कारण लकीरें सी पड़ जाती हैं। यदि गर्भावस्था में उनमें अधिक वृद्धि हो जाए तो स्त्री को सही नाप की सूती ब्रा पहननी चाहिए, जो स्तनों के भार को सहारा दे और भार से लटकने के कारण उन पर चिह्न अधिक गहरे न पड़ें।

त्वचा पर चिह्न 

गर्भावस्था में शरीर की त्वचा पर खिंचाव अधिक होता है जिस कारण पेट, कल्हे, जांघों और छाती की त्वचा पर अनेक चिह्न दिखने लगते हैं। जहां की त्वचा अधिक खिंचाव होगा, वहां सफेद या भूरे रंग के चिह्न दिखने लगते हैं। यह स्त्रियों में कम तो कुछ में अधिक गहरे दिखाई पड़ते हैं, जबकि बहुत सी त्रयों में यह देखने को नहीं मिलते। शरीर का भार नियंत्रित करने से इन्हें किसी हद तक रोका जा सकता है, किंतु पेट के खिंचाव को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता। यह बढ़ते हुए गर्भाशय के कारण खिंचता ही है। 

त्वचा पर चिह्न होना स्त्रियों के शरीर, कार्य और भोजन आदि पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त हारमोंस के परिवर्तन होने से जल का अवरोधन बढ़ता है। इससे नितंब और जांघों में तरल अवरोध होने के कारण भार को नियंत्रित करने वाली स्त्री में भी खिंचाव के चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे में शरीर पर विटामिन ई यक्त तेल तथा जैतून के तेल का प्रयोग करने से लाभ होता है। अतः गर्भधारण करते ही स्त्री को अपनी त्वचा की देखभाल शुरू कर देनी चाहिए। 

स्फीत शिरा 

कभी-कभी गर्भावस्था के बाद कई स्त्रियों के एक पैर या दोनों पैरों में नीली शिराएं (नसें) दिखाई देने लगती हैं, जिन्हें स्फीत शिरा (वेरीकोस वेन) कहते हैं। जैसे-जैसे गर्भावस्था का काल बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे शरीर के कई हिस्सों स्तनों के निप्पल, भग का बाहरी हिस्सा तथा मलद्वार की त्वचा काली होती जाती है। इसके अलावा गालों तथा मस्तक के बीच के हिस्से की त्वचा पर काले धब्बे तथा झाइयां दिखने लगती हैं, जिनको कोलास्मा’ कहते हैं। त्वचा के काली होने का कारण यह है कि त्वचा के नीचे मेलानिन नामक पिगमेंट एकत्रित होने लगता है। यह परिवर्तन शरीर में उत्तेजित द्रव की वजह से होता है। 

गर्भावस्था में नाभि के नीचे काले रंग की एक लकीर सी दिखने लगती है। इस लकीर के दोनों ओर त्वचा के नीचे चर्बी की वजह से छोटी-छोटी चांदी के समान श्वेत लाइनें बन जाती हैं। यह पेट, स्तन तथा जांघों पर भी हो जाती हैं। प्रसव के बाद मांसपेशी के खिंचाव के कारण यह चिह्न स्थायी हो जाते हैं। 

शरीर में ए.सी.टी.एच. उत्तेजित द्रव की वृद्धि होते ही यह परिवर्तन होता है। गभ के कारण रक्त को पैरों की मांसपेशियों में लौटते समय अधिक बाधा होती है। इस बाधा के कारण पैरों की शिराएं जो पतली दीवारों एवं त्वचा के पास होने के कारण शीघ्र दिखने लगती हैं, वे ‘स्फीत शिरा’ या वेरीकोस वेन कहलाती हैं। 

इस अवस्था में स्त्री को बहत देर तक खड़े नहीं रहना चाहिए तथा सोफे या उस पर बठते समय एक पैर को दसरे पैर पर नहीं रखना चाहिए। अधिक आराम चाहिए तथा लेटते समय पैर थोडा ऊपर करके सोना चाहिए। इसके लिए कनाचे कोई मोटा तकिया लगाया जा सकता है। जब कुर्सी पर बैठे तो पैर के अंगूठों को चलाएं, ताकि मांसपेशियों का व्यायाम हो। चूंकि स्फीत शिराओं पर रक्त का दबाव अधिक होता है, अतः वे कभी-कभी फूलकर त्वचा के बाहर उभर आती हैं। ये शिराएं उभरने के साथ ही फैलती भी जाती हैं तथा कम स्थान होने के कारण टेढ़ी-मेढ़ी दिखने लगती हैं। इनमें दर्द भी होता है। इस दर्द से मुक्ति पाने के लिए गरम पट्टी अथवा स्टॉकिंग का प्रयोग करना चाहिए।

बालों की समस्या 

चमकते-लहराते बाल सभी स्त्रियों का सौंदर्य बढ़ाते हैं, किंतु गर्भावस्था में हारमोंस परिवर्तन के कारण उनके बाल रूखे और सफेद हो जाते हैं (यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक गर्भवती स्त्री के बाल ऐसे हो जाएं) तथा चेहरे के सौंदर्य में कमी आ जाती है। इसके अतिरिक्त बालों का न बढ़ना, बालों की नोक पर बाल का दो मुंह में बंट जाना और झड़ना, बाल रूखे हो जाना तथा उनकी वृद्धि रुक जाना आदि समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। इस कारण गर्भावस्था में अच्छे शैंपू और तेल आदि का प्रयोग करना चाहिए। बालों में आवश्यकता से अधिक कंघी न करें, क्योंकि बार-बार कंघी करने से भी बाल टूट जाते हैं। 

इन समस्याओं के निवारण के लिए बालों को उलझने न दें और कंघी के बजाय हल्के ब्रश से धीरे-धीरे बाल संवारें। गर्भावस्था में बालों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। बालों की सफाई के लिए सप्ताह में दो-तीन बार सिर धोने की आदत डालें और कंघी की जगह ब्रश करें। सिर धोने के लिए साबुन के बजाय रीठा. बेसन, आंवला और शिकाकाई आदि चीजों या किसी अच्छे शैंपू का प्रयोग करें। शष्क, तैलीय और सामान्य बालों के लिए अलग-अलग शैंपू मिलते हैं। 

गर्भावस्था में बालों की जड़ें मजबूत रहें, बाल सफेद न हों, सिर की त्वचा के रोम छिद्र खुले रहें और रक्त संचार सुचारु रूप से हो इसके लिए सिर धोने से पहले बालों में जैतून या नारियल के तेल की हल्की मालिश करें। इससे बाल नहीं झडेंगे तथा वे घने, काले और लंबे रहेंगे।

नाखूनों की सुरक्षा 

गर्भावस्था में प्राय: कैल्शियम की कमी हो जाती है, जिससे हाथों के नाखूनों की चमक कम हो जाती है (पैरों के नाखूनों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता)। उनमें दरारें पड़ जाती हैं या वे फटने लगते हैं। उंगलियों की शोभा नाखूनों से है और उनकी विकृति को मिटाने के लिए स्त्रियां नेल पॉलिश का प्रयोग करती हैं, किंतु इस क्रिया से नाखूनों को वायु नहीं मिल पाती। अत: उनका रक्तिम दूधिया रंग धीरे-धीरे लोप होने लगता है। वे मटमैले और भद्दे हो जाते हैं। 

गर्भावस्था में (यदि किसी समारोह आदि में न जाना हो तो) नेल पॉलिश का प्रयोग न के बराबर करना चाहिए तथा डॉक्टर के परामर्श से कैल्शियम का सेवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हाथ-पैरों के नाखूनों पर जैतून का तेल मलना चाहिए। इससे नाखून मजबूत और चमकदार बनते हैं तथा वे अपने स्वाभाविक रंग को कायम रखते हैं। गर्भधारण करते ही स्त्री को यह प्रयोग आरंभ कर देना चाहिए, ताकि नाखूनों का सौंदर्य और आकर्षण बना रहे।

दांत और मसूड़े 

गर्भावस्था में मसूड़े मुलायम होकर फूल जाते हैं, जिससे उनमें संक्रमण हो जाता है और रक्त आने लगता है। इसके अलावा दांतों में कीड़ा लग जाता है और वे हिलने या दर्द करने लगते हैं। प्लाक नामक बैक्टीरिया की एक परत मसूड़ों और दांतों पर जम जाती है। ये जीवाणु दांतों के बीच फंसे भोजन के टुकड़ों से पनपते हैं। अधिक मीठा खाने वाली स्त्रियां इनसे अधिक ग्रस्त होती हैं। 

दांतों में जीवाणु पनपने की स्थिति न आए, इसके लिए दांतों की सफाई और मसूड़ों की मालिश करना आवश्यक है। फिटकरी के पानी से कुल्ला करना भी अच्छा रहता है। इसके अलावा उंगली के हल्के दबाव से धीरे-धीरे मसूड़ों को मलें और दांतों पर नियमित ब्रश करें। दांतों को साफ रखें और भोजन करने के बाद गुनगुने जल से कुल्ले करें। सोने से पहले भी ब्रश करना आवश्यक है। यों हर बार के भोजन के बाद ब्रश करना अच्छा माना गया है। 

गर्भावस्था में कैल्शियम की कमी तथा हारमोंस के परिवर्तन के कारण दांत और मसूड़े विकारयुक्त होते हैं। गर्भावस्था के दौरान मसुडे  कोमल हो जाते हैं, अत: मुलायम ब्रश का प्रयोग करना चाहिए। नीम या दातुन करने से दांत निरोग, साफ और चमकीले हो जाते हैं। 

जब शिशु गर्भ में आता है, तो उसकी अस्थियों के निर्माण के लिए शरीर में पर्याप्त कैल्शियम नहीं होता, इसलिए वह उसे मां के शरीर से प्राप्त करना है। ऐसे में मां यानी स्त्री के शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है, जिसका प्रभाव उसके दांतों और मसूड़ों पर पड़ता है। इसलिए मां बनने वाली प्रत्येक स्त्री को कैल्शियम की आवश्यकता होती है। इसके लिए डॉक्टर से संपर्क करना अनिवार्य है। यदि आवश्यक हो तो किसी डेंटिस्ट के पास जाना चाहिए। अपने दांतों और मसूड़ों की सुरक्षा करना आपका परम कर्तव्य है।

पेट का बढ़ना 

कुछ स्त्रियों का पेट गर्भावस्था के तीसरे-चौथे मास में ही इतना अधिक बढ़ जाता है कि अन्य स्त्रियों का सातवें-आठवें मास में भी उतना बढ़ा हुआ पेट नहीं दिखाई पड़ता। उनके पेट को देखकर पता ही नहीं चलता कि उनका गर्भस्थ शिशु सात आठ मास का हो गया है। यह सब स्त्रियों के कार्य, शरीर की बनावट एवं मांसपेशियों पर निर्भर करता है। जो गर्भवती स्त्रियां नित्य व्यायाम करती हैं, डांसर होती हैं और जिनका कद लंबाई में अधिक होता है, उनका पेट कम बढ़ा हुआ दिखाई देता है। गर्भावस्था के दो-तीन मास में ही दूसरी स्त्रियों की तुलना में इनका पेट कम बढ़ा दिखता है। यह उनकी शक्तिशाली पेट का बढ़ना कई बातों एवं स्वस्थ मांसपेशियों के कारण होता है। इसका पर निर्भर करता है। अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि उनके पेट के बच्चे में कोई गड़बड़ी है और न ही इस विषय में उन्हें किसी प्रकार की कोई चिंता करनी चाहिए। 

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