व्यक्तित्व विकास book In Hindi-व्यक्तित्व का स्वरूप (Form of Personality) 

व्यक्तित्व विकास book In Hindi

व्यक्तित्व विकास book In Hindi-व्यक्तित्व का स्वरूप (Form of Personality) 

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक स्थान पर लिखा है – ‘प्रात: उगते हुए सूर्य ने चारों ओर अपना प्रकाश-पुंज बिखेर दिया। ऐसा करते हुए उसने किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। उस दृश्य ने मेरे हृदय में एक विचित्र प्रकार की पीड़ा उत्पन्न कर दी और मैं समानता की भावना (Feeling of Equality) द्वारा अभिभूत हो उठा। समानता की भावना ने मुझे विश्व-मानव की कल्पना प्रदान कर दी और मैं विश्व-वेदना का गायक बन गया।’ 

गुरुदेव के कथन का अभिप्राय स्पष्ट है कि जब बाहर का प्रकाश भीतर का प्रकाश बन जाता है, तब रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विश्व कवि एवं अमर गायक का उदय होता है। आंतरिक प्रकाश के अभाव में बाह्य प्रकाश व्यर्थ रहता है। ब्रज-गोपियों ने ज्ञानी उद्वव से यही कहा था, ‘उधो! श्रीकृष्ण-दर्शन के लिए अंखियां चहैं, मोर पंखियां न चहैं।’ 

एक राजा के तीन लड़के थे। उसने प्रत्येक को एक निश्चित धनराशि देकर कहा – ‘इस धन से जो ऐसी वस्तु लाएगा, जो पूरे घर में समा जाए, उसको मैं अपना उत्तराधिकारी बना दूंगा।’ पहला लड़का गलीचा ले आया, परन्तु वह पूरे घर में छोटा पड़ गया। दूसरा लड़का एक बहुत बड़ा दर्पण लेकर लौटा, उसमें पूरे घर का प्रतिबिम्ब आ गया, लेकिन वह दस मिनट बाद ही टूट गया। तीसरा लड़का हाथ में एक मोमबत्ती लेकर लौटा और इस मोमबत्ती ने पूरे घर को प्रकाशित कर दिया और वह निरंतर प्रकाशमान रही। राजा ने इसी लड़के को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम प्रकाश फैलाएं, जिससे अंधकार का नाश हो और सही रास्ते दिखाई देने लगे | इसमें विस्तार’, अर्थात् सर्व-उन्नति की भावना निहित है, जिसके प्रति राजा का तीसरा बालक जागरूक है और वही राज्य का उत्तराधिकारी बनता है। 

स्वामी विवेकानंद ने इसी जीवन-सूत्र को लक्ष्य करते हुए कहा है – 

‘यदि तुम प्रतिष्ठित रूप में जीवित रहना चाहते हो, तो तुम्हें फैलना होगा, अपने व्यक्तित्व का विकास करना होगा। विकास जीवन का लक्षण है और इसका अभाव मृत्यु का परिचायक है।

जीवन और जगत का यह नियम है कि सर्वोच्च आसन पर प्रतिष्ठित व्यक्ति ही अभिनन्दित किया जाता है। संसार में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, इसलिए नहीं कि वे प्रतिभा के धनी थे अथवा साधन संपन्न थे, बल्कि इसलिए कि वे महान व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाकर जीवन को अनुशासित किया और अपनी सकारात्मक सोच (Positive Attitude) के साथ उसे निश्चित दिशा व गति प्रदान कर वे ऊंची उपलब्धियां हासिल करने में सफल हुए । वास्तव में असली विजयी वही है, जिसने ‘सार्थक जीवन’ बनाने की कला सीखकर स्थायी सफलता (Stable Success) हासिल की है। 

व्यक्तित्व विकास book In Hindi

क्या है व्यक्तित्व? 

एक बार सम्राट मिलिंद ने एक भिक्षु नागसेन को अपने दरबार में आने का निमंत्रण राजदूत द्वारा भिजवाया । भिक्षु नागसेन ने राजदूत से कहा – ‘मैं अवश्य आऊंगा, लेकिन एक बात पहले ही स्पष्ट कर दूं कि ऐसा कोई आदमी कहीं है नहीं – यह केवल एक नाम है, काम चलाऊ नाम ।’ राजदूत दरबार में पहुंचा और उसने सम्राट को सारा वृतांत सुना दिया । सम्राट ने कहा – ‘अजीब सी बात है! खैर, जब वह कहता है कि मैं आऊंगा तो अवश्य आएगा वह ।’ 

नागसेन रथ पर बैठकर आया । सम्राट ने द्वार पर उसका स्वागत किया। भिक्षु ने कहा – “स्वागत स्वीकार करता हूं, लेकिन ध्यान रहे कि भिक्षु नागसेन जैसा कोई है नहीं। “सम्राट ने कहा, तो आप कौन हैं, कौन आया है यहां, कौन स्वागत को स्वीकार कर रहा है? जरा उत्तर दीजिए।’ 

नागसेन ने मुड़कर कहा, “सम्राट यह रथ खड़ा है, जिस पर मैं आया। सम्राट ने कहा, ‘हां, रथ है?’ भिक्षु नागसेन ने कहा, ‘तो घोड़ों को निकाल कर अलग कर दिया जाए।’ घोड़े अलग कर दिए गए । नागसेन ने पूछा, ‘ये घोड़े रथ हैं?’ ‘नहीं, घोड़े कैसे रथ हो सकते हैं?’ सम्राट ने कहा। तब सामने के डंडे जिनसे घोड़े बंधे थे, खिंचवा लिए गए। नागसेन ने पूछा – ‘यह रथ है?’ सम्राट ने कहा – ‘सिर्फ दो डंडे कैसे रथ हो सकते हैं? डंडे अलग कर दिए गए, चाक निकलवा लिया। इस पर सम्राट ने कहा – ‘यह चाक है, रथ नहीं।’ इस प्रकार रथ का एक-एक अंग निकलता चला गया और एक-एक अंग पर सम्राट को कहना पड़ा कि यह रथ नहीं है। आखिर पीछे शून्य बच गया । भिक्षु नागसेन पूछने लगा – ‘रथ कहां है अब?’ और जितनी चीजें मैंने निकाली, तुमने कहा कि यह भी रथ नहीं! अब कहां है रथ? “सम्राट चौंक कर खड़ा रह गया । भिक्षु कहने लगा, ‘समझे आप? रथ एक जोड़ था । रथ कुछ चीजों का संग्रह मात्र था।’

इसी प्रकार व्यक्तित्व भी सद्गुणों का जोड़ है । मूलतः व्यक्तित्व’ का संबंध उन गहराइयों से है जो हमारी चेतना को विकसित करती हैं, अर्थात् जो हर क्षण हमारे व्यवहार, आचरण और हमारी क्रियाओं (चेष्टाओं) में अभिव्यक्त होती रहती हैं | स्पष्ट है, व्यक्तित्व का अर्थ केवल व्यक्ति के बाह्य गुणों (जैसे, रूप रंग, चाल-ढाल, पहनावा, बोलचाल आदि) से नहीं है, उसके आंतरिक गुणों से भी है, जैसे – चरित्र-बल, इच्छा-शक्ति, आत्मविश्वास, एकाग्रता आदि। मनोवैज्ञानिकों का यही मानना है । Salvador Maddi के शब्दों में, ‘Person ality is a stable set of internal characteristics and tendencies that determine the psychological behaviour of people.’ 

इस प्रकार व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाह्य गुणों (External quali ties) एवं आंतरिक गुणों (Internal qualities) के योग से है । यथार्थ में, आंतरिक गुणों के विकास से ही आपके व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान होती है, जिसे ‘कम्पलीट पर्सनेलिटी’ अथवा पॉजिटिव पर्सनेलिटी कहते हैं । यह पॉजिटिव पर्सनेलिटी ही किसी भी क्षेत्र में स्थायी सफलता का प्रमुख अंग मानी जाती है। 

Charles M. Schwab ने कहा है – 

‘Personality is to man what perfume is to a flower.’ 

मनुष्य के लिए व्यक्तित्व का वही अर्थ होता है, जो एक फूल में सुगंध का। 

महाभारत काल के एक अत्यंत गरीब व साधनहीन बालक एकलव्य के अंदर पॉजिटिव पर्सनेलिटी के सभी गुण मौजूद थे। उसमें एक सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनने की इतनी ऊंची ललक थी कि वह अपनी सकारात्मक सोच के साथ अंधकार में प्रकाश की किरण का आभास करता हुआ अपने बलबूते पर ही जीवन-उद्देश्य तक पहुंचने में सफल हुआ था। 

पॉजिटिव पर्सनेलिटी का महत्त्व हमारे देश में सनातन से ही रहा है (जैसा कि यहां अनेक महान व्यक्तित्व का जन्म हर युग में होता रहा है)। अतः व्यक्तित्व-विकास आज कोई नया विषय नहीं है। विशेष तौर पर यह कंसेप्ट भारतीय ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता से उभरकर सामने आया है। हृदय की दुर्बलता ही मनुष्य को कमजोर करती है, जिसके फलस्वरूप वह अपने उद्देश्य से गिरकर जीवन को निरर्थक बना देता है | कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब श्रीकृष्ण ने देखा कि स्वजनों के मोह से अर्जुन अपने कर्तव्य-पालन से विमुख होकर हृदय की दुर्बलता को प्राप्त हो रहा है (जो उसके सार्थक जीवन के निर्माण में बाधक सिद्ध होगी), तब उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा उसके कायरतापूर्ण – जैसे दोष को मिटाकर उसे निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में सफलता दिलाई, अर्थात् जीवन की सार्थकता के लिए उसके व्यक्तित्व का निर्माण किया था। 

व्यक्तित्व के अंग्रेजी शब्द ‘PERSONALITY’ में ग्यारह अक्षर हैं। इस एकादश अक्षर वाले शब्द पर्सनेलिटी का विश्लेषण करके आप इसको भली भांति समझिए, जो सफलता के गुणों को दर्शाते हैं, इस प्रकार से …. 

p-unctuality

e-arnest efforts to follow ethical values

R-ealistic approach to Life kills of communicating

O-ptimistic attitude toward goals

N-obility of character

A-wareness

L-oyalty towards commitment

I-ncrease strengths to overcome weaknesses

T-hink always positive

Y-ield your zeal to fight for success. 

PERSONALITY 

स्पष्ट है, व्यक्तित्व सदगुणों का जोड़ है। प्रत्येक व्यक्ति में नैसर्गिक रूप से सद्गुण रहते हैं, किसी में कोई कम और कोई ज्यादा | जरूरत है उन्हें संवारने की, व्यक्तित्व में निखार लाने की। 

लिली ऐलन ने कहा है – 

‘व्यक्तित्व-प्राप्ति का प्रश्न हर व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत है, इसका किसी दूसरे व्यक्ति से संबंध नहीं है। कोई भी व्यक्ति आपको दुर्बल से शक्ति-संपन्न, असफल से सफल और ‘कुछ नहीं’ से ‘सबकुछ नहीं बना सकता। आप स्वयं ही सब कुछ बन सकते हैं और आप में सब कुछ बनने की शक्ति मौजूद है। 

निष्कर्ष 

किसी भी युग में जीवन को महान बनाने (अर्थात् स्थायी सफलता जो आपकी ‘असली जीत’ मानी जाती है) के लिए एक प्रभावशाली व्यक्तित्व (Positive Personality) की विशेष आवश्यकता होती है, जिसका सीधा संबंध आत्म-विकास से जुड़ा है। आज हम इस वैश्वीकरण युग में बाह्य गुणों के विकास पर विशेष चर्चा करते हैं और यह कुछ हद तक ठीक भी है, लेकिन बिना आंतरिक गुणों (Internal qualities) का विकास किए स्थायी सफलता (Stable Success) की प्राप्ति करना असंभव ही है। यदि हम जीवन के प्रति जागरुक हैं और संसार में अपनी अमिट छाप छोड़ना चाहते हैं, तो हमें एक आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करना होगा। 

अत: जरूरी है कि हम अपने मन का शुद्धिकरण करें, क्रोध आदि जैसे विकारों को सही दिशा दें और आंतरिक गुणों के साथ-साथ कुछ विशेष गुणों को अपने व्यक्तित्व में सम्मलित करें, जैसे उत्तरदायित्व, परोपकार, उदारता, स्वदेश प्रेम टू लीडरशिप इत्यादि। 

पॉजिटिव पर्सनेलिटी की झलक : 

Thorton Wilder की एक कविता में पॉजिटिव पर्सनेलिटी’ की झलक मिलती है, जो इस प्रकार है – 

A man who is aware… He has a mind and he knows it, He has a will he shows it, He sees his way and goes it, He draws a line and toes it, He has a chance and takes it, A friendly hand and he shakes it, A rule and he never breaks it, If there is no time, he makes it, He sees the path the Lord trod And grips the hand of God. 

एक व्यक्ति जो जागरूक है… उसके पास मस्तिष्क है और वह इसे जानता है, उसके पास इच्छाशक्ति है, वह इसका प्रदर्शन करता है, वह अपना मार्ग जानता है और उस पर चला चलता है, वह एक लकीर खींच लेता है और पैर की अंगुलियों द्वारा इसका स्पर्श करता है, उसे एक अवसर मिलता है और वह उसको पकड़ लेता है, उसे एक मैत्री का हाथ मिलता है और वह उससे हाथ मिलाता है, यदि कोई नियम है, तो वह उसको कभी नहीं तोड़ता है, यदि समय नहीं है, तो वह उसकी व्यवस्था कर लेता है, वह उस मार्ग को देखता है जिस पर होकर परमपिता गए थे, और वह परमात्मा का हाथ कसकर पकड़ लेता है। 

याद रखें .

 श्रेष्ठता की दौड़ का अंत किसी बिंद पर नहीं डोला है 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

four + 9 =