Personal development skills-उत्साह से नाता जोड़ें 

Personal development skills-उत्साह से नाता जोड़ें 

उत्साह गुलाब की तरह कोमल है, लेकिन इसकी ऊर्जा-शक्ति विद्युत-तरंग की भांति तन-मन को स्फूर्तिमय बनाए रखती है। 

वाल्मीकि रामायण में लिखा है – ‘उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए जगत में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है।’ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आप स्वयं अपने जीवन में रोज देख सकते हैं अथवा इसका एहसास कर सकते हैं | जब आपके मन में कार्य करने की प्रबल इच्छा जागृत होती है, तब आप एकदम उठकर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, ‘मुझे यह कार्य करना है।’ उत्साह इतना बढ़ जाता है कि आप बड़े-से बड़े कार्य भी क्षणभर में कर देने को तत्पर दिखाई देते हैं। 

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अब्राहम लिंकन जब छात्र-जीवन में थे, वे एक शिक्षक के घर गए और पूछा – ‘मुझे अच्छा वक्ता बनने के लिए क्या करना चाहिए?’ शिक्षक ने उत्तर दिया- ‘तुम व्याकरण भलीभांति सीखो। लिंकन निर्धन थे, लेकिन उत्साह से भरे थे। वे उसी समय छ: मील तक कच्चे मार्ग की पगडंडियों पर चलकर किसी से एक व्याकरण की किताब उधार मांग लाए और फिर रातभर जागकर एक के बाद दूसरी, तीसरी मोमबत्ती जलाते हुए उस अमूल्य पुस्तक का अध्ययन करते रहे। अतः स्पष्ट है, संघर्ष के लिए केवल इच्छा शक्ति ही नहीं, उत्साही भी होना अत्यंत जरूरी है। 

जेम्स ए. गार्फील्ड ने कहा है – 

‘यदि झुर्रियां हमारे माथे पर पड़ती हैं, तो उन्हें हृदय पर मत पड़ने दो। उत्साह और उमंग को कभी वृद्ध नहीं होना चाहिए।’

उत्साही जीवन के कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत हैं 

बोस्टन यूनिवर्सिटी के संस्थापक रिच जब अपने गांव (केपकोड) से धन कमाने की इच्छा से बोस्टन आए तो पूंजी के नाम पर उनके पास केवल चार डॉलर थे। लेकिन वे उत्साह और आत्म-विश्वास से इतने भरे थे कि इन्हीं के बल पर उन्होंने संघर्ष किया और बोस्टन यूनिवर्सिटी की स्थापना जैसा बड़ा व लोकोपकारी कार्य कर दिखाया। इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि उत्साही जीवन के संघर्ष में धन की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि धन के बार-बार नष्ट हो जाने पर भी व्यक्ति उसे पैदा कर लेता है। 

वेस्टमिंस्टर (इंग्लैंड) की चर्च में एक कब्र के ऊपर लिखा है – ‘इसके नीचे इस गिरजे और नगर का निर्माता क्रिस्टोफर रेन सो रहा है। वह 90 वर्ष तक जनता के कल्याण के लिए जीवित रहा। अगर तुम उसका स्मारक देखना चाहते हो, तो चारों ओर देखो।’ 

लंदन में आप जहां-कहीं भी नजर डालेंगे, वहीं आपको रेन की कला का नमूना मिलेगा। उसने कोई शिक्षा नहीं पाई, लेकिन उसने 55 गिरजाघर और 36 बड़े-बड़े हॉल बनाए। सेंट चर्च उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना है, जिसको उसने 65 वर्ष तक कड़ी मेहनत से बनाया। यह था उसके उत्साह का कमाल | एक प्रसिद्ध लेखक के सम्मान में एक कॉलेज के छात्रों ने समारोह आयोजित किया। ऐसे भव्य आयोजन को देखकर लेखक अति प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वागत भाषण में कहा – ‘इस कॉलेज के छात्र उत्साही हैं और प्रत्येक कार्य की सफलता के लिए उत्साह पहली शर्त है। मैं कामना करता हूं कि ये छात्र जिस भी क्षेत्र में जायेंगे, उसमें सफल होंगे।’ 

जब लेखक भाषण पूरा कर चुके तो कुछ छात्रों ने कहा – ‘मान्यवर! अन्य किसी क्षेत्र में हम भले ही सफल हो जाएं, पर सफल लेखक नहीं बन सकते।’ ‘ऐसा क्यों सोचते हैं आप?-‘ लेखक ने प्रश्न किया। ऐसा सुना जाता है कि लेखन की प्रतिभा ईश्वर प्रदत्त होती है, परिश्रम से पैदा नहीं की जा सकती’ – उन छात्रों ने कहा। 

लेखक ने तपाक से उत्तर दिया – “एकदम गलत!”तो क्या हम भी लेखक बन सकते हैं? आप हमें लेखक बनने का कोई मंत्र बताइए’ – छात्रों ने कहा । लेखक मुस्कराए और बोले – ‘किसी भी कार्य की सफलता का मंत्र तो एक ही है – उत्साह और अनवरत परिश्रम यदि आप लोग सच में लेखक बनना चाहते हैं, तो मेरे सामने बैठने में समय बर्बाद मत करिए। अभी अपने कमरों में जाइए और लिखना प्रारंभ कर दीजिए और ऐसा तब तक करते रहें, जब तक कि आप अपने लेख पर मुग्ध न हो जाएं। इस उदाहरण में दिए अंतिम वाक्य का अभिप्राय यह है कि उत्साह से काम सरल हो जाता और आपके मन में आनंद की लहर उठती है |

उत्साह वह यौवन है जिसकी तरंग में युवक झूम उठता है। उसे अपने आगे अंधेरा नहीं दिखता, अपने सामने पराजय नहीं दिखती। उत्साह में यह विशेषता होती है। 

अमेरिका में जीवन बीमा के विक्रय-क्षेत्र में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त फ्रैंक बैजर अपने व्यवसाय के आरंभिक काल में असफल हो चुके थे और उन्होंने अपनी बीमा कंपनी को पद से इस्तीफा देने का निर्णय ले लिया था। एक दिन वे इस्तीफा लेकर कार्यालय पहुंच गए। उस समय प्रबंधक महोदय अपने विक्रेताओं की बैठक को संबोधित कर रहे थे। बैजर प्रबंधक-कक्ष के बाहर प्रतीक्षा करने लगे । अंदर से आवाज आई – ‘मैं जानता हूं कि आप सभी योग्य विक्रेता हैं, किंतु आप यह विशेष ध्यान रखें कि योग्यता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है उत्साह, आपका जोश, जीवन की ऊर्जा, जो मंजिल की दिशा में बढ़ने में आपकी सहायता करती है। आपका उत्साह, आपकी उमंग ही आपको सफलता के शिखर पर पहुंचा सकती है। 

इन शब्दों को सुनकर बैजर ने अपना निर्णय बदल दिया और जेब में रखे इस्तीफे को उसी समय फाड़ दिया । वे फौरन अपने घर चले गए | दूसरे दिन से फ्रैंक बैजर ने अपने काम को बड़े उत्साह के साथ करना शुरू किया | उनके उत्साह से ग्राहक इतने प्रभावित हुए कि कुछ वर्षों में वे अमेरिका के नंबर वन सेल्समैन बन गए।

इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि उत्साह वह अग्नि है जो हमारे शरीर रूपी इंजन के लिए भाप तैयार करती है । हेनरी फोर्ड ने एक बार कहा था 

‘जब मैं उत्साही मन से किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर वार्तालाप करता हूं, तो मुझे बाहरी संसार का बिल्कुल ध्यान नहीं रहता और मैं अपने सामने विषय में मग्न हो जाता हूं।’ 

एक बार डॉक्टर एनी बीसेंट को एक सभा में जाकर अध्यक्षता करनी थी और वहां उनका अध्यक्षीय भाषण भी था। सभा के आयोजक निश्चित समय से कुछ पूर्व ही उन्हें बुलाने के लिए उनके घर पहुंच गए, तो उन्होंने देखा कि वे जमीन पर बैठी लालटेन की चिमनी को अपने हाथों से रगड़कर साफ कर रही थीं। उनके हाथ चिमनी की सफाई के कारण लगभग काले हो गए थे। उन्हें इस प्रकार काम करते देख उन आयोजकों को बड़ा आश्चर्य हुआ। पूछने पर एनी बेसेंट बोलीं – ‘मेरे लिए किसी सभा की अध्यक्षता करना और घर में चीजों की सफाई करना दोनों महत्त्वपूर्ण काम हैं। अच्छी तरह से काम करने के लिए उत्साही बने रहना पड़ता है। चूंकि मेरे पास कुछ फुर्सत के क्षण थे, मैं इस काम में जुट गई, जिससे काम के प्रति मेरा उत्साह बराबर बना रहे । आप लोग चलिए, मैं समय पर आपकी सभा में पहुंच जाऊंगी।

इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि उत्साह काम की आत्मा है | संसार के लगभग हर बड़े और महान व्यक्ति की काम के प्रति ऐसी ही उत्साह की भावना उनमें देखी गई है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण तक ने महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सभी अतिथियों के चरण धोने का कार्य स्वयं उत्साहित होकर लिया था और लगनशील होकर उसे बड़ी कुशलता से संपन्न किया था। 

शेक्सपीयर ने कहा है – ‘जिस काम को करने में हमें आनंद आता है, वह हमारे रोगों का अमृत है।’

अनेक वर्षों से तैयार किए हुए अपने शोध-पत्रों को मेज पर रखकर एक दिन आइजक न्यूटन कमरे के बाहर खुली हवा में निकल आए थे। कार्य-सिद्धि की असीम प्रफुल्लता उनके चेहरे पर झलक रही थी। सहसा उनके कुत्ते जैकी की कोई परछाई सी दिखाई दी और वह मेज पर उछल पड़ा। मेज पर जलती हुई मोमबत्ती शोध-पत्रों के बंडल पर गिर गई। वर्षों की तपस्या से तैयार शोध-पत्र क्षणभर में जलकर राख हो गए। न्यूटन ने कमरे में आकर देखा तो स्तब्ध रह गए। एक क्षण के मौन के बाद उन्होंने प्यार से जैकी की पीठ सहलाते हुए कहा – ‘प्यारे जैकी, तुझे क्या पता कि तूने मेरी वर्षों की मेहनत को राख बना दिया है। खैर चलो, अब फिर नए उत्साह के साथ काम शुरु करते हैं।’

कैसा अद्वितीय संयम! जीवनभर की साधना नष्ट हो गई, लेकिन एक पशु पर जरा-सा क्रोध नहीं और फिर नए उत्साह के साथ काम की शुरुआत इसी का नाम है – उत्साही जीवन। 

इन उपरोक्त उदाहरणों से उत्साही जीवन की विशेषताएं उजागर होती हैं, जो निम्न तालिका में रेखांकित की गई हैं – 

उत्साह की विशेषताएं

  • उत्साह हमें जिंदादिल बनाए रखता है।
  • इसमें धैर्य, संयम और सहनशीलता जैसे गुण छिपे हैं।
  • यह क्रोध को नियंत्रण में रखने का एक मानवीय गुण है। 
  • यह संघर्ष की क्षमता में कभी गिरावट नहीं आने देता। 
  • यह व्यक्ति का साहस बढ़ाता है। 
  • उसे सतत् संघर्षवान बनाए रखता है, जिससे वह प्रगति के नए 
  • सोपानों पर पहुंचता रहे। 
  • उसे कर्त्तव्यपरायणता की ओर ले जाता है। 
  • उत्साह सार्थक जीवन की ऊर्जा है। 

निष्कर्ष –हर दिन उत्साह में नयापन होता है। इससे मन जब नया हो जाता है, तो यह किसी भी समस्या का सामना और समाधान कर सकता है। आप बीते दिन के बारे में जो कुछ 

भी जानते हैं, उस सबको भूल जाएं। हर नया दिन नए उत्साह से ऐसे आरंभ करें मानो हमने पिछला कुछ जाना ही नहीं, जैसे – कल रात जोरों की बारिश हुई और अब आकाश साफ हो रहा है। एक नए उत्साह से भरा ताजा दिन है। आप इस ताजे दिन से ऐसे मिलें मानों सारी शक्तियां आप में जागृत हैं और आप अपनी जीवन-यात्रा पर हैं। 

और हां, 

यात्रा के मध्य यदि विपरीत परिस्थितियां सामने आएं, तो आप हतोत्साहित न होकर अपनी शक्तियों पर विश्वास करें। उत्साह का दामन न छोड़ें और अपने संघर्ष को जीवित रखें, जिससे आपका जीवन महान बने। इसी में जीवन की सार्थकता है। 

याद रखें 

गुलाब कांटों में खिलकर दुनिया को महकाता है । वह मुरझाने पर भी अपनी सुगंधि नहीं त्यागता और गुलकंद के रूप में परिणित होकर हम सबको लाभान्वित करता रहता है। उसी की तरह आप भी जिंदगी की कठोर, कांटो-भरी राहों पर चलकर संघर्ष के बलबूते अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं। 

अब प्रश्न है, उत्साह कैसे बढ़ाया जाए? 

उत्साही जीवन के लिए रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें बड़े महत्त्व की होती हैं । अतः आप नियमित रूप से विशेषकर इन बातों पर अवश्य ध्यान दें –

प्रातःकाल उठे नए संकल्पों के साथ कि आज का दिन नई उमंग से भरा होगा।

उठने पर अपने घर में सभी प्रियजनों से मुस्कराते हुए ‘जय श्रीकृष्ण’, ‘नमस्कार,’ ‘गुड मार्निंग’ आदि कहें। 

‘मॉर्निंग वॉक’ पर जाएं अथवा व्यायाम करें। 

अपनी दैनिक चर्या सुव्यवस्थित ढंग से रखें | जरूरी कार्यों की प्राथमिकतानुसार सूची बनाएं और समयबद्ध होकर उसका पालन करें। 

चेहरे पर निरंतर मुस्कान रखें।

पहनावा ऐसा हो जो आपको प्रसन्नचित्त रखे।

रुचि के अनुसार काम लें और पूरी तन्मयता से उसे पूरा करें। 

आवश्यकता पड़ने पर अपने सहयोगी अथवा मित्र से परामर्श लेने में कभी न झिझकें ।

अपने कार्य-स्थल पर सबसे जोश से मिलें, बात करें और मीटिंग में भाग लें।

दूसरों के विचार सुनकर उनकी प्रशंसा दिल से करें, जिससे उल्लासपूर्ण वातावरण बने।

यदि काम बिगड़ भी जाए तो घबड़ाएं नहीं, बल्कि फिर से नए उत्साह के साथ उसे आरंभ करें, आइजक न्यूटन की तरह।

काम करते समय थक जाएं तो रैस्ट लें अथवा बाहर घूम लें, जिससे नई स्फूर्ति लेकर आप काम में लगें। 

खान-पान में संयम बरतें, जिससे शरीर निरोग रहे। कभी-कभी अपने ऊपर हंसना भी उत्साहवर्द्धन के लिए जरूरी है। ठहाके भी लगाएं, यह भी मनोरंजन का साधन है, जो काम में नवीन उत्साह लाता है।

आशा एवं उत्साह की बातें करें, जिससे आप मस्त रहना सीखें। बच्चों जैसे बनें – सहज, सरल, जोशीले बनें । तेजी से चलें, 

लेकिन सम्भल के।

रोज कुछ समय अच्छी पुस्तकें पढ़ने में लगाएं, जिससे आप कुछ नया ज्ञान प्राप्तकर उत्साहित हों। 

फुरसत के समय में आप घर का कुछ न कुछ छोटा-मोटा काम अवश्य करते रहें डॉक्टर एनी बीसेंट की तरह, जिससे उत्साह हरदम बना रहे।

संयम बरतें, जिससे क्रोध उत्पन्न न हो । क्रोध उत्साह को भस्म करता है। अतः सावधान रहें।

रोज आकाश की ओर देखें – पक्षी कितने उत्साह से उड़ रहे हैं। फिर नीचे धरती की ओर देखें – फूल किस स्नेह से खिल रहे हैं। 

ध्यान रहे, उत्साह जीवन को गति देता है । अतः प्रकृति के सौंदर्य को रोज निहारें और उसके नियमों का कभी उल्लंघन न करें, बल्कि उसके प्रति कृतज्ञता रोज प्रकट करें। आप भी फूल की तरह खिलेंगे और उत्साही बनकर पक्षी की तरह आकाश में उड़ेंगे। दांते ने कहा है – ‘Nature is the art of God.’ 

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चलते-चलते 

उत्साह के लिए प्रत्येक अवस्था एक समान है। जिस तरह उत्साह यौवन के दिनों में अपने रास्ते के कांटों को ठोकर मारकर धूल में मिला देता है, उसी तरह यदि हम उसे अपने बूढ़ापे तक कायम रखें तो वह चमत्कारपूर्ण काम कर सकता है। कहा जाता है कि अस्सी साल के ग्लेडस्टन में काम करने की जितनी शक्ति थी, उतनी आज के नौजवान में दिखाई देनी कठिन है। तो आइए, देखें यहां कुछ ऐसी अभूतपूर्व मिसालें – 

78 वर्ष की आयु में डॉक्टर जॉनसन ने अपनी सर्वोत्तम कृति ‘कवियों का जीवन-चरित्र’ लिखी थी।

न्यूटन ने अपनी पुस्तक ‘प्रिंसिपिया’ के नए संक्षिप्त विवरण 83 साल की उम्र में लिखे थे।

प्लेटो की 81 साल की आयु में लिखते हुए मृत्यु हुई थी।

टॉमस्कॉट ने ‘हिब्रु’ भाषा का अध्ययन 86 साल की आयु में किया था। 

‘गति के नियम की रचना करते समय गैलीलियो की अवस्था लगभग 70 साल की थी।

महाकवि लांगफेलो, टेनीसन, वाटियार आदि की कुछ सर्वोत्तम रचनाएं सत्तर साल की आयु में लिखी गई थीं।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने विश्व का महान हिन्दी काव्य ‘रामचरितमानस’ अपनी 72 वर्ष की आयु में लिखना प्रारंभ किया था।

इस्कॉन के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 69 वर्ष की वृद्धावस्था में विश्व कल्याण के लिए अमेरिका जाकर ‘हरे कृष्ण’ आंदोलन शुरू किया था। 

अतः अपने उत्साह को आप कभी मंद न होने दें। यदि उसी की रोशनी में आगे बढ़ते गए तो आप कभी थकान महसूस नहीं करेंगे, बल्कि सफलता के पायदान पर चिंता व तनाव से रहित होकर बराबर चलते रहेंगे। 

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