पौराणिक कथाएं-च्यवन ऋषि और सुकन्या कथा 

च्यवन और सुकन्या कथा 

पौराणिक कथाएं-च्यवन ऋषि और सुकन्या कथा 

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

तप का चमत्कार 

प्राचीन काल में भृगु नाम के एक महान ऋषि हुए हैं। उनकी पत्नी का नाम था-पुलोमा ! एक बार जब ऋषि पत्नी पुलोमा गर्भवती थीं, तभी प्रमोला नाम का एक राक्षस शूकर (सूअर) का रूप धारण कर उन्हें जबरन उनके आश्रम से उठा ले गया। पुलोमा ने छूटने का प्रयास किया। अथक प्रयास के बाद वे उस राक्षस की पकड़ से छूट गई और बचने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगीं।

इसी प्रयास में उनका गर्भ च्यवित हो गया। तब उस च्यवित गर्भ से एक तेजस्वी बालक पैदा हुआ। उस बालक में इतना तेज था कि उसे देखकर राक्षस भस्म हो गया। आश्रम में लौटकर माता-पिता ने उस बालक का नाम रखा–च्यवन! आगे चलकर वे ही महर्षि च्यवन के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

भृगु के पुत्र च्यवन बड़े ही तपस्वी, तेजस्वी और ब्रह्मतेज सम्पन्न हुए। वे सदा तपस्या में ही लगे रहते थे। तपस्या करते-करते उनके शरीर के ऊपर दीमक लग गई थी और दीमक के एक टीले के नीचे वे दब गए थे, केवल उनकी दो आंखें दिखाई देती थीं। एक दिन महाराज शर्याति अपनी सेना सहित वहां पहुंचे। सैनिकों ने जंगल में डेरे डाल लिए, हाथी-घोड़े यथास्थान बांधे गए और सैनिक इधर-उधर घूमने-फिरने लगे।

महाराज शर्याति की पुत्री सुकन्या अपनी सखियों सहित जंगल में घूमने लगी। घूमते-घूमते उसने एक टीला देखा। तभी टीले में से दो चमकती हुई आंखें दिखाई दीं। उत्सुकतावश वह अपनी सखियों के साथ टीले के पास आ गई और बाल्यकाल की चंचलता के कारण उसने उन दोनों आंखों में कांटा चुभो दिया। उनमें से रक्त की धारा बह निकली। सुकन्या डर गई और भागकर अपने डेरे में आ गई, उसने यह बात किसी से भी नहीं कही। 

इधर, राजा की सेना में एक अपूर्व ही दृश्य दिखाई देने लगा, राजा की समस्त सेना का मल-मूत्र बन्द हो गया। राजा, मन्त्री, सेवक, सैनिक, घोड़े, हाथी, रानी, राजपुत्री सभी दुखी हो गए। राजा को बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने सबसे पूछा “यहां पर भगवान भार्गव-मुनि च्यवन का आश्रम है, तुम लोगों ने उनका कोई अनिष्ट तो नहीं किया है, किसी ने उनके आश्रम पर जाकर अपवित्रता या अशिष्टता तो नहीं की है?” 

सभी ने कहा-“महाराज! हम तो उधर गए भी नहीं।” 

तब डरते-डरते सुकन्या ने कहा-“पिताश्री! अज्ञानवश एक अपराध मुझसे गया है-दीमक के ढेर में दो जुगनू-से चमक रहे थे, मैंने उनमें कांटा चभो दिया था जिससे उनमें से रक्त की धारा बह निकली।” 

महाराज सब समझ गए, वे पुरोहित और मन्त्री के साथ बड़ी दीनता से महर्षि च्यवन के आश्रम पर पहुंचे। उनकी विधिवत पूजा की और अज्ञान में अपनी कन्या के किए हुए अपराध की क्षमा मांगी। महाराज शर्याति ने हाथ जोड़कर कहा 

“भगवन ! मेरी यह कन्या सरल है, सीधी है। इससे अनजाने में यह अपराध हो गया, अब मेरे लिए जो भी आज्ञा हो, कहें, मैं उसका सहर्ष पालन करूंगा।” 

च्यवन मुनि बोले-“राजन ! यह अपराध अज्ञान में ही हुआ सही, किन्तु मै वृद्ध हूं, आंखें भी मेरी फूट गईं अत: तुम इस कन्या को ही मेरी सेवा करने के लिए छोड़ जाओ।” 

महाराज ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। सुकन्या ने भी बड़ी इसे स्वीकार किया। सुकन्या का विवाह विधिवत च्यवन मुनि के साथ गया और राजा उसे समझाकर अपनी राजधानी को चले गए। 

च्यवन मुनि का स्वभाव कुछ कड़ा था, किन्तु साध्वी सुकन्या दिन-रात सेवा करके उन्हें सदा सन्तुष्ट रखती थी। 

एक बार देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार च्यवन मुनि के आश्रम पर च्यवन मुनि ने उनका विधिवत सत्कार किया। ऋषि के आतिथ्य को स्वीकार कर अश्विनीकुमारों ने कहा- “ब्रह्मन! हम आपका क्या उपकार करें?”

 च्यवन मुनि ने कहा-“देवताओ! तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम मेरी इस वृद्धावस्था को समाप्त कर मुझे युवावस्था प्रदान कर दो, इसके बदले मैं तम्हें यज्ञ में भाग दिलाऊंगा। अभी तक तुम्हें यज्ञों में भाग नहीं मिलता है।” 

अश्विनीकुमारों ने ऋषि की आज्ञा मानकर एक सरोवर का निर्माण किया और बोले-“आप इसमें स्नान कीजिए।”

 ऋषि च्यवन ने वैसा ही किया। कुछ देर बाद सुकन्या ने तीन एक जैसे पुरुषों को तालाब से निकलते देखा। दरअसल पतिव्रता सुकन्या की परीक्षा लेने के लिए दोनों अश्वनीकुमारों ने भी अपने रूप वैसे ही बना लिए थे। तब सुकन्या ने अश्विनीकुमारों की बहुत प्रार्थना की कि मेरे पति को अलग कर दीजिए। सुकन्या की स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमार अंतर्धान हो गए और सुकन्या अपने परम सुन्दर रूपवान पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। 

च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था जाती रही, उन्हें आंखें फिर से प्राप्त हो गईं, उनका तपस्या से क्षीण जर्जर शरीर एकदम बदल गया। वे परम सुन्दर रूपवान युवा बन गए। एक दिन राजा अपनी कन्या को देखने आए। पहले तो वे ऋषि को न पहचानकर कन्या पर क्रुद्ध हुए।

किन्तु जब उन्होंने सब वृत्तान्त सुना तो कन्या पर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि की चरणवन्दना की कि आपके तप के प्रभाव से हमारा वंश पावन हुआ। उन च्यवन ऋषि के पुत्र प्रमति हुए और प्रमति के रुरु ।  रुरु के शौनक हुए। ये सब भृगु वंश में उत्पन्न होने से भार्गव कहलाए।

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Mythology story- Chyavan Rishi and Sukanya Katha

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Austerity miracle

There has been a great sage named Bhrigu in ancient times. His wife’s name was Puloma! Once when the sage wife Puloma was pregnant, a demon named Pramola took the form of a boar (boar) and forcibly picked them up from their ashram. Puloma attempted to leave. After relentless efforts, she got rid of the demon and started running around to escape.

In this endeavor, her womb was lost. Then a stunning child was born from that elated womb. The boy was so fast that the monster was consumed on seeing him. Returning to the ashram, the parents named the child – Chyawan! Later, he became famous by the name of Maharishi Chyavan.

Bhrigu’s son Chyavan was very rich, ascetic and brahmatej. He was always engaged in austerity. While doing penance, his body was termite and he was buried under a mound of termite, only his two eyes were visible. One day Maharaj Sharyati reached there with his army. The soldiers encamped in the forest, elephants and horses were tied in place and the soldiers started to roam around.

Sukanya, the daughter of Maharaj Sharyati, started wandering in the forest with her friends. While walking he saw a mound. Then two shining eyes appeared from the mound. Curiously, she came to the mound with her friends and due to the playfulness of childhood, she pierced the thorn in both of them. A stream of blood flowed from them. Sukanya got scared and ran to her tent, she did not say this to anyone.

Here, a rare sight appeared in the king’s army, the feces of all the king’s army stopped. The king, the minister, the servants, the soldiers, the horses, the elephants, the queen, the Rajputis all became unhappy. The king was very worried. He asked everyone “Here is the ashram of Lord Bhargava-Muni Chyavan, you have not done any harm to him, has anyone done profanity or rudeness by visiting his ashram?

Everyone said- “Maharaj! We have not even gone there.”

Then fearfully Sukanya said – “Father! I have ignorantly committed a crime – two fireflies were shining in the pile of termites, I had pierced them with thorns which caused a stream of blood to flow from them.”

Maharaj understood everything, he reached the ashram of Maharishi Chyavan with great humility along with the priest and minister. He was duly worshiped and apologized for the crime committed by his daughter in ignorance. Maharaj Sharyati said with folded hands

“God! This girl of mine is simple, straightforward. This has led to this crime unknowingly, now whatever command I have, say, I will gladly follow it.”

Chyavan Muni said – “Rajan! This crime happened right in ignorance, but I am old, my eyes also burst, so you leave this girl to serve me.”

The King accepted it with pleasure. Sukanya accepted it very well. Sukanya was duly married to Chyavan Muni and the king persuaded her and went to his capital.

Chyavan Muni had a tough nature, but Sadhvi Sukanya served her day and night and always kept her satisfied.

Once on the ashram of Ashvinikumar Chyavan Muni, the physician of the gods, he was duly received by Chyavan Muni. Accepting the hospitality of the sage, Ashwini Kumar said- “Brahman! What should we do for you?”

Chyavan Muni said- “Gods! You can do everything. You can end this old age and give me youth, instead I will make you participate in the yagya. So far you do not participate in yagyas.”

Ashwini Kumara obeyed the sage and built a lake and said – “You should bathe in it.”

Rishi Chyavan did the same. After some time Sukanya saw three identical men coming out of the pond. In fact, to take the examination of husband Sukanya, both Ashwanekumaras had created their forms in the same way. Sukanya then prayed a lot to the Ashwini Kumaris to separate my husband. Pleased with Sukanya’s praise, Ashwini Kumar fell into disarray and Sukanya lived happily with her supremely beautiful husband.

The Chyavan sage continued to grow old, he regained his eyes, his dilapidated dilapidated body completely changed from austerity. He became a very handsome young man. One day the king came to see his daughter. At first they were angry with the girl for not recognizing the sage.

But when he heard all the stories, he was very pleased with the girl and he pacified the sage that due to the effect of your tenacity, our lineage became pure. He was the son of Chyavan Rishi, Pramati and the son of Pramati. Ruru was shocked. All these originated in the Bhrigu dynasty called Bhargava.

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