पौराणिक कथाएं-अश्वपति की कथा 

पौराणिक कथाएं

पौराणिक कथाएं-अश्वपति की कथा 

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

पापों से मुक्ति कैसे हो 

राजर्षि अश्वपति कैकय देश के अधिपति थे। वे बड़े ज्ञानी और वैश्य विद्या के उपासक थे। उनके राज्य में बड़ी शान्ति थी। प्रजा अपने सम्राट का सम्मान करती थी। 

उन्हीं दिनों पांच विद्वान ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। प्राचीनशाल,सत्ययज, इन्द्रद्युम्न, जन और बुडिल नाम के उन पांच गृहस्थ वेदों ने यह कि किया कि आरुणि उद्दालक के पास चलें और उनसे वैश्वानर-विद्या सीखें। 

वे उद्दालक के पास पहुंचे, किन्तु उद्दालक स्वयं भी ब्रह्म विद्या नहीं जानते  थे। 

तब उन्होंने सोचा कि मैं इस विद्या का पूर्णत: ज्ञान नहीं रखता और न कर ही सकता है, इसलिए इस विद्या में प्रवीण विद्वान अश्वपति के पास चलना चाहिए। 

अत: आरुणि आदि सब मिलकर अश्वपति के पास गए। राजा ने पृथक पृथक सबकी पूजा की और बड़ी श्रद्धा-भक्ति से उनका स्वागत-सत्कार किया। वे लोग बड़े आनन्द से वहां ठहर गए। दूसरे दिन प्रात:काल आकर अश्वपति ने उन ऋषियों से प्रार्थना की कि मैं एक यज्ञ करना चाहता हूं, आप लोग मेरे ऋत्विक बनकर यहां रहें और उतनी ही दक्षिणा आप लोग पृथक-पृथक होकर ग्रहण करें। 

वे लोग यज्ञ कराने या दक्षिणा लेने के लिए नहीं आए थे। उनके आने का उद्देश्य तो वैश्वानरोपासना का ज्ञान प्राप्त करना था। यदि वे इस पौरोहित्य और दक्षिणा के प्रलोभन में पड़कर अपना उद्देश्य भूल जाते तो उन्हें वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि कैसे होती? उन्होंने इस बात को विघ्न समझकर अस्वीकार कर दिया। 

अश्वपति ने सोचा कि राजा का स्थान बड़ा ही विषम है, सम्भव है, मेरे राज्य में बड़े बड़े पाप होते हों। प्रजा के पापों का भागी राजा ही तो होता है-ऐसा सोचकर ही इन लोगों ने मेरे यज्ञ में दक्षिणा ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया है। अत: उनके मन से यह शंका दूर कर देने के लिए उन्होंने अपनी सफाई पेश की। वे बोले 

“मेरे राज्य में न चोर है, न लोभी है, न शराबी है, न यशहीन है, न मूर्ख है और न व्यभिचारी या व्यभिचारिणी ही है। इसलिए आप लोग यजमान बनना स्वीकार करें।” 

उन लोगों ने कहा-“राजन ! मनुष्य जिन उद्देश्यों को लेकर कहीं जाता है उन्हीं की पूर्णता चाहता है। हम लोग इस समय धन या सम्मान के लिए नहीं आए हैं. हम तो वैश्वानर उपासना ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। इसलिए आप कृपा करके उसी का वर्णन करें।” 

यह सुनकर राजा ने कहा-“कल प्रात:काल मैं इस विद्या का वर्णन करूंगा।” दूसरे दिन प्रातःकाल ही वे सब हाथ में समिधा (हवन सामग्री) लेकर बड़ी नम्रता के साथ राजा के पास उपस्थित हुए और राजा ने एक-एक करके सबकी उपासना पूछो। सबने अपनी-अपनी की हुई उपासना का वर्णन किया। सबकी एकाकी उपासना सुनकर अश्वपति ने बतलाया कि ‘ब्रह्म विद्या के एक-एक अंग की उपासना करने के कारण ही आप लोग प्रजा, पशु, धन आदि सांसारिक सम्पत्तियों से युक्त हैं।

परन्तु इस अधूरी उपासना के कारण आप लोगों का बड़ा अनिष्ट हो सकता था। बड़ा अच्छा हुआ, आप लोग मेरे पास आ गए।’ आप लोगों को वैश्वानर-आत्मा की पृथक-पृथक उपासना नहीं करनी चाहिए, वह तो सारे लोकों में, सारे प्राणियों में और सारी आत्माओं में भोक्ता के रूप में विद्यमान है। वही सब कुछ है। उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है। इसके पश्चात राजा ने नित्य अग्निहोत्र अथवा प्रतिदिन की वैश्वानर-पूजा पद्धति उन्हें बतलाई। 

उन्होंने कहा-“वैश्वानर आत्मा को जानने वाला जो पुरुष प्रतिदिन भोजन के समय जो अन्न प्राप्त हो उसके पांच ग्रास लेकर ‘ॐ प्राणाय स्वाहा’, ‘ॐ व्यानाय स्वाहा’, ‘ॐ अपानाय स्वाहा’, ‘ॐ समानाय स्वाहा’, ‘ॐ उदानाय स्वाहा’, इन मन्त्रों से पांच आहुतियां देकर अपने उदरस्थ वैश्वानर का अग्निहोत्र करता है, वह सारे लोकों, सम्पूर्ण प्राणियों और समस्त आत्माओं को तृप्त करता है।

जैसे मूंज की रुई आग लगते ही भस्म हो जाती है, वैसे ही इस उपासना को करने वालों के समस्त पाप जल जाते हैं। जैसे भूखे बच्चे अपनी माता की प्रतीक्षा किया करते हैं, वैसे ही संसार के समस्त प्राणी इस नित्य अग्निहोत्र की प्रतीक्षा किया करते हैं और इन आहुतियों को पाकर सन्तुष्ट होते हैं।” 

इस प्रकार अश्वपति से ज्ञानदक्षिणा प्राप्त करके वे लोग लौट गए और महाराज अश्वपति पूर्ववत ज्ञान में स्थित होकर प्रजापालन करने लगे। 


Mythology – Tale of Ashwapati

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

How to get rid of sins

Rajarshi Ashwapati was the ruler of Kaikeya country. He was very knowledgeable and worshiper of Vaishya Vidya. There was great peace in his kingdom. The subjects respected their emperor.

At the same time, five scholars were trying to attain Brahm Gyan. Those five householder Vedas named Puranashal, Satyayaj, Indradyumna, Jana and Budil did that Aruni should go to Uddalak and learn cosmology from him.

He approached Uddālaka, but Uddālaka himself did not even know theology of Brahman.

Then he thought that I do not have or can not fully understand this knowledge, so one should go to the learned scholar Ashwapati in this discipline.

Therefore, Aruni etc. all went to Ashwapati. The king worshiped all of them separately and welcomed them with great devotion. They stayed there with great joy. On the second morning in the morning, Ashwapati prayed to those sages that I want to perform a yajna, you will stay here as my Ritvik and receive the same Dakshina separately.

They did not come to perform Yajna or to take Dakshina. The purpose of his arrival was to gain knowledge of globalism. If they had fallen into this temptation and the temptation of Dakshina and forgotten their purpose, how could they have achieved real knowledge? They rejected it as an obstacle.

Ashwapati thought that the position of the king is very odd, it is possible that in my kingdom there are great sins. It is only the king who participates in the sins of the people – only after thinking that these people have refused to take Dakshina in my yagya. Therefore, to remove this doubt from his mind, he offered his clarification. They said

“In my state there is neither a thief, nor a greedy, nor an alcoholic, neither a fool, nor a fool, nor an adulterer or an adulteress. Therefore, you people accept to be a judge.”

They said- “Rajan! Man wants the fulfillment of the objectives he goes with. We have not come for wealth or honor at this time. We want to get knowledge of global worship. So please you please Describe it. “

Hearing this, the king said- “Tomorrow morning I will describe this learning.” On the second day in the morning, all of them took samidha (havan material) in their hands and attended the king with great humility and the king asked to worship everyone one by one. Everyone described their respective worship. On hearing everyone’s lone worship, Ashwapati told that because of worshiping each and every part of Brahm Vidya, you people are full of worldly possessions such as people, animals, money etc.

But due to this incomplete worship, your people could be very evil. It is very good, you guys come to me. You people should not worship the global-soul separately, it exists in all the realms, in all beings, and in all souls as bhakti. That is everything. There is nothing else apart from that. After this, the king told him the daily Agnihotra or the daily cosmopolitan worship method.

He said- “The man who knows the global soul, taking five grains of food which he gets at the time of meal every day, ‘ॐ Pranaye Swaha’, ‘ॐ Vyanayya Swaha’, ‘ॐ Apanaye Swaha’, ‘ॐ Samayaya Swaha’, ‘ॐ Udayanay ‘Swaha’, by giving five sacrifices from these mantras, performs the fire of his eminent Vishwanar, he satisfies all the worlds, all beings and all souls.

Just as the cotton wool is consumed as soon as the fire starts, so all the sins of those who worship this are burnt. Just as hungry children wait for their mother, so all the creatures of the world wait for this continual Agnihotra and are happy to find these sacrifices. “

In this way, after receiving knowledge from Ashwapati, they returned and Maharaj Ashwapathi began to perform Prajapalana, situated in the previous knowledge.

 

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