पौराणिक कथा-शबरी की कथा 

पौराणिक कथा-शबरी की कथा 

पौराणिक कथा-शबरी की कथा 

त्याग तप और सदाचार के बल पर एक साधारण मनुष्य कैसे देवताओं के समान श्रेष्ठ हो सकता है। धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

आराधना का माहात्म्य

प्राचीन समय की बात है। पांचाल देश का राजकुमार सिंहकेतु एक दिन अपने सेवकों को साथ लेकर वन में शिकार खेलने गया। उसके सेवको में से शबर नामक एक सेवक को शिकार की खोज में इधर-उधर घूमते हुए एक टूटा-फूटा शिवालय दिखाई पडा। उसके चबूतरे पर एक शिवलिङ्ग पड़ा था, जो टूटकर जलहरी से सर्वथा अलग हो गया था।

शबर ने उसे मूर्तिमान सौभाग्य की तरह उठा लिया। वह राजकुमार के पास पहुंचा और उसे शिवलिङ्ग दिखलाकर विनयपूर्वक बोला-‘प्रभो ! देखिए, यह कैसा सुन्दर शिवलिङ्ग है। आप यदि कृपा पूर्वक मुझे पूजा की विधि बता दें तो मैं नित्य इसकी पूजा किया करूं।” 

निषाद के इस प्रकार पूछने पर राजकुमार ने प्रेम-पूर्वक पूजा की विधि बतला दी। षोडशोपचार पूजन के अतिरिक्त उसने चिता भस्म चढ़ाने की बात भी बतलाई। अब शबर प्रतिदिन स्नान करके चन्दन, अक्षत, वन के नए-नए पत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नृत्य, गीत, वाद्य के द्वारा भगवान महेश्वर का पूजन करने लगा। वह प्रतिदिन चिताभस्म भी अवश्य भेंट करता। तत्पश्चात वह स्वयं प्रसाद ग्रहण करता। इस प्रकार श्रद्धालु शबर पत्नी के साथ भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की आराधना में तल्लीन हो गया। 

एक दिन जब शबर पूजा के लिए बैठा तो देखा कि पात्र मे चिताभस्म तनिक भी शेष नहीं है। उसने बड़े प्रयत्न से इधर-उधर ढूढा, पर उसे कहीं भी चिताभस्म नहीं मिली। तब उसने अपनी पत्नी से चिताभस्म के बारे में पूछा। साथ ही उसने यह भी कहा कि ‘यदि चिताभस्म नहीं मिली तो पजा के बिना में अब क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता।’ 

उसकी पत्नी ने उसे चिन्तित देखकर कहा-“नाथ! घबराइए मत। एक उपाय है। यह घर तो पूराना हो ही गया है। मैं इसमें आग लगाकर उसी में प्रवेश कर जाती हूं। इससे आपकी पूजा के निमित्त पर्याप्त चिताभस्म तैयार हो जाएगी।” बहुत वाद-विवाद के बाद शबर भी उसके प्रस्ताव से सहमत हो गया।

शबरी ने स्वामी की आज्ञा पाकर स्नान किया और उस घर में आग लगाकर अग्नि की तीन बार पारिक्रमा की, पति को नमस्कार किया और सदाशिव भगवान का हृदय में ध्यान करती हुई अग्नि में घुस गई। वह क्षण भर में जलकर भस्म हो गई। फिर शबर ने उस भस्म से भगवान भूतनाथ की पूजा की। 

शबर को कोई विषाद तो था नहीं। स्वभाववशात पूजा के बाद वह प्रसाद देने के लिए अपनी स्त्री को पुकारने लगा। स्मरण करते ही वह स्त्री तुरंत आकर खड़ी हो गई। अब शबर को उसके जलने की बात याद आई। आश्चर्यचकित होकर उसने पूछा, “तुम और यह मकान तो सब जल गए थे, फिर यह सब कैसे हुआ?” 

शबरी ने कहा-“आग में मैं घुसी तो मुझे लगा कि जैसे मैं जल में घुसी हूं। आधे क्षण तक तो मुझे प्रगाढ़ निद्रा-सी विदित हुई और अब जागी हूं। जगने पर देखती हूं तो यह घर भी पूर्ववत खड़ा है। अब प्रसाद के लिए यहां आई हूं।” 

निषाद-दम्पति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उनके सामने एक दिव्य विमान आ गया। उस पर भगवान के चार गुण थे। उन्होंने ज्यों ही उन्हें स्पर्श किया और विमान पर बैठाया, उनके शरीर दिव्य हो गए। वास्तव में श्रद्धायुक्त भगवान की आराधना का ऐसा ही माहात्म्य है। 

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mythology story- Legend of Shabari

On the strength of renunciation, tenacity and virtue how an ordinary human being can be superior like gods. Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Significance of worship

It is a matter of ancient times. Prince Singhketu of Panchal country went with his servants one day to go hunting in the forest. From among his servants, a servant named Shabar saw a broken pagoda wandering around in search of prey. There was a Shivling on his platform, which was broken and completely separated from the aquarium.

Shabar picked him up like a good fortune. He reached the prince and showed him Shivlinga, and said politely – ‘Prabho! See how beautiful Shivalinga is. If you kindly tell me the method of worship, then I worship it regularly. “

When Nishad asked like this, the prince kindly showed the method of worship. In addition to worshiping Shodashopchar, he also talked about offering pyre ashes. Now Shabar started bathing daily to worship Lord Maheshwar through sandal, akshat, new letters of forest, flowers, fruits, incense, lamps, dances, songs, instruments. He would also present Chitabhasam daily. He would then receive the prasad himself. Thus the devotee was devoutly engrossed in worshiping Lord Shankar with Shabar’s wife.

One day when Shabar sat for the puja, he saw that there is no remaining Chitabhasam in the vessel. He searched around here and there with great effort, but he could not find Chitabhasma anywhere. He then asked his wife about Chitabhasma. He also said that “If Chitabhasma is not found, I cannot survive for a moment without Paja”.

Seeing her anxious, his wife said- “Nath! Do not panic. There is a solution. This house is already gone. I set fire to it and enter it. This will create enough chitabhasam for your worship.” After much debate, Shabar also agreed to his proposal.

Shabri took a bath after receiving Swami’s command and set the house on fire and circled the fire thrice, saluted her husband and entered the fire meditating in the heart of Sadashiva God. She was incinerated in a moment. Then Shabar worshiped Lord Bhootnath with that ash.

Shabar did not have any sadness. By nature, after worship, he started calling his lady for making offerings. Upon remembering that woman immediately came and stood up. Now Shabar remembered his burning. Surprised, he asked, “You and this house were all burnt, then how did this all happen?”

Shabari said- “I entered into the fire, I felt as if I had entered into the water. For half a moment I became aware of deep sleep and now I have awakened. When I wake up, this house is also standing undone. Now Prasad I have come here for

The Nishad-couple were talking in such a way that a divine plane appeared in front of them. God had four qualities on him. As soon as he touched them and made them sit on the plane, their bodies became divine. In fact, worshiping the revered God has such great significance.

 

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