पौराणिक कथा-ध्रुव की कथा 

पौराणिक कथा-ध्रुव की कथा 

पौराणिक कथा-ध्रुव की कथा  

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथाएँ हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

कैसे पाया परमपद 

स्वायंभुव मनु के पुत्र उत्तानपाद की दो पत्नियां थीं सुनीति और सुरुचि। बड़ी रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था और छोटी रानी सुरुचि के पुत्र का नाम था उत्तम। 

महाराज उत्तानपाद छोटी रानी सुरुचि से ही अधिक प्रेम करते थे। एक दिन की बात है, महाराज उत्तानपाद उत्तम को गोद में लेकर खिला रहे थे और सुरुचि वहीं बैठी अपने पुत्र के प्रति पिता के स्नेह को देखकर अपने तथा अपने पुत्र के सौभाग्य पर फूली नहीं समा रही थी। उसी समय खेलते-खेलते पांच वर्ष का बालक ध्रुव भी वहीं आ पहुंचा। अपने छोटे भाई को पिता की गोद में देखकर उसके मन में भी इच्छा हुई कि मैं भी पिता की गोद में बैठकर अपने भाई की भांति खेलूं। 

यद्यपि पिता के हृदय में वात्सल्य स्नेह की कमी नहीं थी तथापि सुरुचि के भय से उसके सामने उन्होंने ध्रुव की ओर स्नेहपूर्ण नजरों से देखना भी गवारा न किया। बालक ध्रुव ने पिता को आकर्षित करने की चेष्टा भी कि किन्तु पिता का रुख ऐसा रहा, मानो वे उस अबोध को जानते तक न हों। इससे नन्हे ध्रुव को बड़ा दुख हुआ और वह रुआंसा-सा हो गया। 

उसी समय सुरुचि बोल उठी-“बेटा! तुम बड़े अभागे हो, क्योंकि तुम्हारा जन्म मेरे गर्भ से न होकर सुनीति के गर्भ से हुआ है। अब तुम जाकर भगवान की आराधना करो जिससे तुम्हारा दूसरा जन्म मेरे गर्भ से हो और तुम पिता की गोद में चढ़कर अपनी अभिलाषा पूर्ण कर सको।” यह सुनकर ध्रुव को बड़ा दुख हुआ, वह रोने लगा। परन्तु इस पर भी राजा ने उसे सान्त्वना नहीं दी। इसके बाद वह अपनी मां के पास गया और जोर-जोर से रोने लगा। । 

जब दूसरों के द्वारा माता को अपने बच्चे के रोने का कारण मालूम हुआ तो वह भी विलाप करने लगी और ध्रुव से बोली- “बेटा ! तुम्हारी विमाता ने सत्य ही कहा है, यदि तुम अभागे न होते तो मुझ अभागिनी के गर्भ से तुम्हारा जन्म कैसे होता। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात और क्या होगी कि तुम्हारे पिता तुम्हें गोद में लेने से लज्जित होते हैं।

परन्तु यह बात भी बिल्कुल ठीक है कि भगवान का आराधना करने से तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है। तुम भगवान की आराधना करो। जिनकी आराधना से ब्रह्म को परमेष्टी-पद प्राप्त हुआ है, तुम्हारे पितामह चक्रवर्ती हुए हैं और बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी जिनके चरणों की धूलि ढूंढ़ा करते हैं, उन्हीं के चरणों की पूजा करो, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।” 

अपनी मां की बात सुनकर ध्रुव के हृदय में उत्साह का संचार हो गया, वह अपने अन्त:करण को नियंत्रित करके घर से निकल पड़ा। उस पांच वर्ष के बच्चे को यह पता नहीं था कि भगवान कहां मिलेंगे और वे कैसे हैं। परन्तु क्षत्रियों का स्वाभाविक तेज उसके अन्दर प्रस्फुटित हो उठा और अपने धर्म की पूर्ण अभिव्यक्ति होते ही भगवान ने उसे अपनी ओर खींच लिया। 

भगवान के भक्त ऐसे अवसरों की प्रतीक्षा में घूमा ही करते हैं। जहां सच्चा त्याग, सच्ची उत्सुकता देखी वहीं आकर प्रकट हो गए और भगवान तक पहुंचने का मार्ग बतला दिया। 

ध्रुव के घर से निकलते ही देवर्षि नारद आ पहुंचे। अपने पापहारी कर कमलों से ध्रुव के सिर का स्पर्श करके उन्हें अपने निश्चय पर दृढ़ करने के लिए भगवन्मार्ग की कठिनता बतलाई और कहा-“अभी तुम्हारी उम्र भवगत्प्राप्ति के लिए साधना करने की नहीं है, चलो, मैं राजा से तुम्हें सर्वदा के लिए सम्मान देने की बात कहे देता हूं। तुम अभी बाघ, सिंह आदि से भरे हुए जंगल में मत जाओ।” 

परन्तु अब ध्रुव इन बातों में कब आने वाला था? घर से निकलते ही देवर्षि नारद के दर्शन से उसका उत्साह और भी बढ़ गया तथा वह अपने निश्चय पर अटल रहा। 

तब देवर्षि नारद ने ध्रुव की अटल निष्ठा और जिज्ञासा देखकर उसे द्वादशाक्षर मन्त्र का उपदेश दिया, पूजाविधि बताई और यमुना के पवित्र तट पर मथुरा के पास जाकर चतुर्भुज भगवान विष्णु के ध्यान की पद्धति बतलाई। इतना ही नहीं, उसके मन में यह विश्वास भी जमा दिया कि जो निष्कपट भाव से भगवान की आराधना करते हैं उन पर भगवान अवश्य ही कृपा करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। 

ध्रुव ने प्रणाम करके मथुरा के लिए प्रस्थान किया। ध्रुव ने मथुरा पहुंचकर देवर्षि नारद के आदेशानुसार भगवान की आराधना प्रारम्भ कर दी। 

पौराणिक कथा-ध्रुव की कथा 

एक महीने तक वह तीन-तीन दिन के बाद जीवनरक्षा के लिए कैथ, बेर आदि जंगली फलों को खाता रहा और बाकी समय भगवत्पूजा में ही व्यतीत किया। 

दूसरे महीने में हर छठे दिन सूखे तिनके और पत्तों को खाकर, तीसरे में हर नवें दिन पानी पीकर, चौथे महीने में हर बारहवें दिन हवा पीकर और पांचवें महीने में वह श्वास रोककर एक पैर से ढूंठ की भांति खड़ा होकर निरन्तर भगवत चिन्तन में ही लीन हो गया। 

उसके पैर के अंगूठे से दबकर पृथ्वी कांपने लगी, श्वास बंद करने से त्रैलोक्य का श्वास बंद हो गया, क्योंकि अब उसका श्वास समष्टि के श्वास से भिन्न नहीं था। 

सारे देवता घबराकर भगवान के पास गए। भगवान उन सबको आश्वासन देकर ध्रुव के सामने प्रकट हुए। उस समय ध्रुव ध्यान में लीन था, इसलिए जब सम्मुख आए हुए भगवान का उसे पता न चला तो भगवान ने ध्यान में से अपने को खींच लिया। ध्रुव ने घबराकर अपनी आंखें खोली तो देखा कि भगवान सामने खड़े हैं। देखते ही वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा। भक्ति की प्यासी अपनी आंखों से वह इस तरह देख रहा था मानो भगवान को पी जाएगा।

बांहें इस तरह उठी थीं मानो उन्हें आलिंगन करना चाहता हो। उसकी इच्छा हुई कि भगवान की स्तुति करूं, परन्तु कहता क्या? केवल चुपचाप पड़ा रहा। भक्तवत्सल भगवान ने उसे उठाया और अपना शंख उसके कपोल से छुआकर सम्पूर्ण ज्ञान और समस्त शास्त्र उसके अंदर प्रस्फुटित कर दिए। तत्पश्चात वह गद्गद कण्ठ से भगवान का स्तुति करने लगा। 

ध्रुव की स्तुति से सन्तुष्ट होकर भगवान ने उसे वह स्थान, वह ध्रुवलोक प्रदान किया जिसे अब तक किसी ने नहीं पाया था, फिर उन्होंने ध्रुव से कहा कि अपने पिता के पास जाकर इस जीवन में ही चक्रवर्ती पद का उपभाग करत हए मेरा भजन करो। आदेश पाकर भक्तराज ध्रव अपने पिता के पास लौट आया। ध्रुव के वहां पहुंचने पर बड़ा उत्सव मनाया गया। कुछ दिनों बाद उसे राज-पाट देकर महाराज उत्तानपाद ने वन के लिए प्रस्थान किया। 

कुछ दिनों के उपरान्त ध्रव के छोटे भाई उत्तम जंगल में शिकार खेलने गए तो वहा एक यक्ष से उनका सामना हआ। युद्ध में वे यक्ष के हाथों मारे गए। बाद में उनकी माता उन्हें खोजने वन में गईं तो जंगल में दावाग्नि से घिर गईं, जहां जलने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। 

अपने भाई और माता की मृत्यु का समाचार पाकर ध्रुव बहुत दुखी हए। उन्होंने यक्षों की राजधानी अलकापुरी पर चढ़ाई कर दी। वर्षों तक युद्ध चलता रहा। जब युद्ध थमने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं दी तो स्वायंभुव मनु ने बीच में पड़कर उस युद्ध को रुकवाया और दोनों के बीच सुलह करा दी। 

बाद में यक्षपति कुबेर ने उन्हें वर दिया कि भगवान में तुम्हारी अचल भक्ति युगों-युगों तक बनी रहेगी। 

ध्रुव की पत्नी शिशुमार की पुत्री थीं। ध्रुव से वे दो पुत्रों उत्कल और वत्सर की मां बनी थीं। उत्कल पैदाइशी विरक्त थे अतः ध्रुव के आग्रह पर भी उन्होंने राज-पाट स्वीकार नहीं किया। तब उन्होंने अपने छोटे पुत्र वत्सल को राज-पाट सौंप दिया और वन में चले गए। 

विशाला नगरी में जाकर एक स्थान पर उन्होंने अपना आसन जमाया और भगवान के ध्यान में लीन हो गए। 

कुछ ही समय बाद भगवान के पार्षद नन्द व सुनन्द आदि एक दिव्य विमान लेकर उपस्थित हुए और उनसे अपने पद पर आरोहण करने की प्रार्थना की। 

ध्रुव चलने को उद्यत हुए तो उन्हें अपनी मां की याद आई। जब उन्होंने पार्षदों से उनके विषय में पूछा तो पार्षदों ने बताया कि वे भी अपने धाम को जा 

चुकी हैं तब ध्रुव ने बड़ी शान्ति से अपने ध्रुव पद पर आरोहण किया। 

आज भी समस्त ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, ऋषि-देवता प्रदक्षिणा करते हुए ध्रुव के चारों ओर घूमा करते हैं । यह ध्रुव पद अचल और अविनाशी है। भगवान की भक्ति के प्रभाव से वहीं स्थित होकर सारे जगत को धारण कर रहे हैं और जब तक सृष्टि रहेगी, धारण करते रहेंगे। 


Mythology-Legend of the Dhruv

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. These ancient stories are inspiring for our lives.

How did you find the Most High

The son of Swayambhuva Manu, Uttanapada, had two wives, Suniti and Suruchi. The son of the elder queen Suniti was named Dhruva and the son of the younger queen Suruchi was named Uttam.

Maharaj Uttanapada loved the younger queen Suruchi more. Once upon a time, Maharaj was feeding Uttanapada Uttam with his lap and Suruchi was not able to bear the happiness of her and her son, seeing the father’s affection for his son sitting there. At the same time, Dhruv, a five-year-old boy, came there. Seeing my younger brother in the father’s lap, he also wished that I should also sit in my father’s lap and play like my brother.

Though there was no lack of affection in the heart of the father, he did not refuse to look at Dhruv with affectionate eyes in front of him due to fear of taste. The child Dhruva also tried to attract the father, but the father’s attitude remained as if he did not even know that ignorance. This made the little Dhruva very sad and became a little bit angry.

At the same time Suruchi spoke – “Son! You are unfortunate, because you are born not from my womb but from Suniti’s womb. Now you go and worship God so that your second birth is from my womb and you can climb into the lap of the father and fulfill your desire. “Dhruva was very sad to hear this, he started crying. But even then the king did not console him After this he went to his mother and started crying loudly.

When the mother found out the reason for her child’s crying by others, she too started mourning and said to Dhruva, “Son! Your friend has told the truth, if you were not unfortunate, how could I have been born from your unfortunate womb?” What would be more unfortunate than this, that your father is ashamed to adopt you.

But it is also right that worshiping God can fulfill your desire. You worship God. By whose worship Brahma has attained the rank of God, your grandfather has become a chakravarti and worship the feet of those who seek the dust of the greatest knowledgeable meditators, your desire will be fulfilled. “

After listening to his mother, Dhruva got excited in his heart, he controlled his conscience and left the house. That five-year-old did not know where to find God and how they are. But the natural brilliance of the Kshatriyas erupted in him and God pulled him towards him as soon as he was a complete expression of his religion.

Devotees of God roam around waiting for such occasions. Where he saw true sacrifice, true curiosity, he came and appeared and showed the way to reach God.

Devarshi Narada arrived as soon as Dhruva left the house. Touching the head of Dhruva with his sinful lotus, he explained the difficulty of the Lord’s way to make him firm on his determination and said- “Now your age is not to do spiritual practice for your attainment, come, I ask the king to honor you forever I’ll tell you. Don’t go into a forest full of tigers, lions etc. “

But now when Dhruv was going to come in these things? As soon as he came out of the house, his enthusiasm increased by the sight of Devarshi Narada and he remained firm on his determination.

Then Devarshi Narada, on seeing Dhruva’s unwavering devotion and curiosity, preached to him the Dvakshakshara Mantra, told the Puja Vidhi and went to Mathura on the holy bank of Yamuna and showed the method of meditation of the quadrilateral Lord Vishnu. Not only this, he also instilled the belief in his mind that God definitely blesses those who worship God with a sincere spirit, no doubt.

Dhruva bowed and left for Mathura. Dhruva reached Mathura and started worshiping God according to the order of Devarshi Narada.

For a month, after three to three days he continued to eat wild fruits like cath, plum, etc. for life saving and spent the rest of the time in Bhagavatpuja.

In the second month, after eating dried straws and leaves every sixth day, in the third month by drinking water on the ninth day, in the fourth month by drinking air every twelfth day and in the fifth month, by stopping breathing, standing like a search with one foot, continuously engrossed in the Bhagavata thinking done.

The earth began to tremble with his toe, closing the breath stopped the breath of Trilokya, because now his breathing was no different from the breath of the world.

All the gods panicked and went to God. God appeared in front of Dhruva after assuring them all. At that time Dhruva was absorbed in meditation, so when he did not know about the God coming in front of him, then God pulled himself out of meditation. Dhruv panicked and opened his eyes and saw that God was standing in front. On seeing it, he fell at the feet of God. Thirsty of devotion with his own eyes he was looking as if God would be drunk.

The arms were raised as if you wanted to hug them. He wished to praise God, but what would he say? Only lying quietly. Bhaktavatsal Bhagavan picked him up and touched his conch with his cheek and sprung all knowledge and all scriptures in him. After that, he started praising God from Gaddad Kantha.

Satisfied with the praise of Dhruva, the Lord gave him the place, the Dhruvaloka which had not been found till now, then he asked Dhruva to go to his father and perform the Chakravarti post in this life itself to worship me. On receiving the order, Bhaktaraja Dravah returned to his father. A big celebration was observed when Dhruva reached there. A few days later, by giving him the throne, Maharaj Uttanapada departed for the forest.

After a few days, Dhruv’s younger brother Uttam went to play hunting in the jungle, and he encountered a demigod there. He died at the hands of the Yaksha in battle. Later, his mother went to the forest to find him, then was surrounded by Davagni in the forest, where he died due to burns.

Dhruv was saddened to learn of the death of his brother and mother. He invaded Alakapuri, the capital of the Yakshas. The war went on for years. When there was no possibility of ending the war, the autonomous Manu intervened to stop the war and make a reconciliation between the two.

Later, Yakshapati Kubera gave him the blessing that your unwavering devotion in God will continue for ages.

Dhruv’s wife was the daughter of Shishumar. From Dhruva she became the mother of two sons Utkal and Vatsar. Utkal was born uncontested, so even on Dhruv’s request, he did not accept the coronation. He then handed over the coronation to his younger son Vatsal and went into the forest.

After going to the city of Vishala, he placed his posture in one place and got absorbed in the meditation of God.

Shortly after, the councilors of God, Nand and Sunanda etc. appeared with a divine plane and requested them to ascend their posts.

When he was ready to walk the pole, he remembered his mother. When they asked the councilors about them, the councilors told that they too go to their dham

Then Dhruva climbed his pole post with great peace.

Even today, all the planets, satellites, constellations, sage-gods revolve around the pole while performing pradakshina. This pole post is immovable and indestructible. Due to the effect of devotion to God, they are located there and are wearing the whole world and will keep wearing it as long as the world exists.

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