पौधे के दुनिया की रोचक जानकारी

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पौधे के दुनिया की रोचक जानकारी

जी हां, यह अब सिद्ध हो चुका है कि पेड़-पौधे भी हमारी तरह रोते-हंसते हैं और ठीक हमारी ही तरह उनके दःख-सुख भी होते हैं। इतना ही नहीं वे मनुष्य की तरह सांस भी लेते हैं, बीमार भी होते हैं और मरते भी हैं। इस बात को सर्वप्रथम श्री जगदीश चंद्र बसु ने सिद्ध करके दिखाया। उसके बाद तो जैसे पौधों के रहस्यमय संसार में दखलंदाजी का सिलसिला शुरू हो गया। इस दखलंदाजी के जो परिणाम सामने आये, उसने सभी को दांतों तले उंगली दबाने के लिए विवश कर दिया। 

बात इंग्लैंड की है। जगदीश चंद्र बस को इस प्रयोग का प्रदर्शन करना था कि पौधे भी हमारी तरह पीड़ा का अनुभव करते हैं। उनका प्रयोग देखने बहुत से वैज्ञानिक एवं जिज्ञास नर-नारी जमा थे। आचार्य बस ने इंजेक्शन के द्वारा एक पौधे को जहर दिया। पौधे को क्षण भर में मझा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा हआ नहीं। उपस्थित जनसमूह में फुसफुसाहट शुरू हो गयी। क्षण भर में जिज्ञासा का वातावरण परिहास के वातावरण में बदल गया। 

वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बस असमंजस में पड़ गये। सोचने लगे, “विष का इंजेक्शन देने का पौधे पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ा? क्या विष असली नहीं? अगर यह शुद्ध विष नहीं है तो यह मुझ पर भी प्रभाव नहीं डालेगा। क्यों न इसकी शुद्धता का परीक्षण किया जाये?” 

श्री जगदीश चंद्र बस ने विष की शीशी उठायी और पी ली। विस्मय से लोग चिल्ला पड़े, “यह आपने क्या कर डाला?” चारों ओर हाय-तौबा मच गयी। पल भर में परिहास का वातावरण आशंका और आतंक के वातावरण में परिवर्तित हो गया। 

कुछ देर बाद भी जब श्री जगदीश चंद्र बस पर विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तब दर्शक स्तब्ध रह गये। इसी बीच श्री जगदीश चंद्र बस ने कहा, “विष का मुझ पर असर न होना यह सिद्ध करता है कि विष असली नहीं था।” उन्होंने अपनी दृष्टि उस व्यक्ति की ओर मोड़ दी, जो विष की शीशी लाया था। उन्होंने पूछा “क्यों भाई, क्या जहर असली था?” 

उस व्यक्ति ने मंच पर खड़े होकर स्वीकार किया, “शीशी में जहर नहीं था। मैंने जहर के रंग का पानी इसमें भर दिया था।” यवक की बात सनकर उन व्यक्तियों को गहरा पश्चाताप हआ, जो पौधे पर विष का प्रभाव न पड़ने पर वैज्ञानिक बस् का उपहास कर रहे थे। 

वैज्ञानिक बस ने वास्तविक विष मंगाकर उसका इंजेक्शन फिर पौधे को दिया। क्षण भर में पौधा मझा गया। वातावरण हर्ष-ध्वनि से गंज उठा। पौधों के जादूगर आचार्य बस ने हर्षित जनसमुदाय पर दृष्टि डाली। उनकी आनंद-विभोर मद्रा यह बता रही थी कि उन्हें जनता की हर्ष-ध्वनि में अपने प्रयोग की सफलता का पुरस्कार मिल गया है। 

पौधे के दुनिया की रोचक जानकारी

पौधों में जीवन का विश्लेषक होने का श्रेय सर्वप्रथम आचार्य बस को ही प्राप्त हुआ था। उन्होंने अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध किया कि पौधे भी हमारी तरह द:ख-दर्द का अनभव करते हैं, सांस लेते हैं, भोजन करते हैं और ठीक हमारी तरह ही संवेदनशील भी होते हैं। बाहरी उत्तेजना की प्रतिक्रिया भी वे व्यक्त करते हैं। और तो और जिस तरह पशु और मानव थकान का अनुभव करते हैं, उसी तरह पौधे भी थकान महसूस करते हैं। 

आचार्य बस की इस चमत्कारिक खोज से उन लोगों में तहलका मच गया, जो अब तक यह मानते थे कि पौधों में जीवन है ही नहीं। इस महान वैज्ञानिक ने पौधों पर क्लोरोफार्म का प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया कि पौधे भी क्लोरोफार्म देने से मनष्य की भांति मर्छित हो जाते हैं और उसका प्रभाव मिटते ही सचेत हो जाते हैं। इस अद्भुत प्रयोग ने वैज्ञानिकों की धारणा ही बदल दी। विज्ञान के क्षेत्र में नया क्रांतिकारी मोड़ आ गया। 

महान् वैज्ञानिक बसु ने पौधों पर मदिरा का भी प्रयोग किया। यह देखकर उन्हें सखद आश्चर्य हआ कि मदिरा के प्रभाव से अन्य जीवों की भांति पौधे भी मदहोश होते हैं। वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से उन्होंने यह स्तब्धकारी प्रयोग भी किया कि गाजर और पत्तागोभी चाकू से कटते समय पीड़ा से कांप जाते 

पौधों के मन की भाषा समझने के लिए आचार्य बस ने एक अतिसंवेदनशील यंत्र बनाया, जिसका नाम है, ‘क्रेस्कोग्राफ’। इसकी मदद से यह जाना जा सकता है कि पौधा एक सेकंड में कितना बढ़ता है? 

पौधों के किसी अंग पर यदि आघात किया जाये तो वे अपनी अनक्रिया से यह बता देते हैं कि उन्हें कष्ट हो रहा है। एक बार प्रयोग करते समय उन्होंने देखा कि पौधे की हलचल शांत हो गयी और वह कांपने लगा। यह कंपन भी क्षणिक होने के साथ-साथ ठीक वैसा ही था जैसा मृत्यु के समय पशुओं में होता है। 

संज्ञाहीन और निष्प्राण समझे जाने वाले पौधों को अन्य जीवों की भांति प्राणधारी और संवेदनशील सिद्ध करके आचार्य बस ने विज्ञान के इतिहास में जो यगांतरकारी अध्याय जोड़ा, उसका संपूर्ण विश्व में स्वागत हुआ। महाविज्ञानी अलबर्ट आइंस्टाइन ने आचार्य बस के आश्चर्यजनक अनुसंधानों पर मुग्ध होकर कहा, “जगदीश बसु ने जो अमूल्य और गौरवशाली उपहार संसार को भेंट किया है, उसके लिए विजय-स्तंभ स्थापित करना ही उचित होगा।” 

प्रसिद्ध नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने जब उन्हें अपनी पस्तक भेंट की तो उस पर लिखा-“एक नगण्य व्यक्ति द्वारा एक महानतम वैज्ञानिक को भेंट।” 

रोम्यां रोलां ने अपनी पस्तक ‘जाँ || क्रिस्टोफ’ को जब आचार्य बस् को भेंट किया था, तब उन्होंने भावातिरेक में लिखा था-“एक नयी दनिया के पट खोलने वाले को।’ 

फिर तो इस नयी दनिया के पट खलते ही गये और रहस्य का पर्दा हटता ही गया। न्ययार्क के बैक्सटर नामक व्यक्ति ने इस दिशा में कछ बातें और बतायी, फिलहाल लोग अचरज की निगाह से देखते हैं। पौधों के मन की बात जानन के लिए उन्होंने पॉलीग्राफ’ नामक एक यंत्र बनाया है। उससे पौधों को जोड़कर उन्होंने कुछ ऐसे प्रयोग किये, जिनसे संसार चकित रह गया। 

एक दिन बैक्सटर अपने कमरे में बैठकर दाढ़ी बना रहे थे। कमरे में ही पॉलीग्राफ यंत्र रखा था। अचानक दाढ़ी बनाते समय उनकी अंगली कट गयी। उनके मंह से टीस निकल गयी। कमरे में रखे पौधे ने यंत्र के ग्राफ पर अपनी गहरी संवेदना व्यक्त कर दी। बैक्सटर के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होंने यह सिद्ध करके विज्ञान-जगत में हलचल पैदा कर दी कि पौधे भी मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के दुःख में अपनी संवेदना प्रकट करते हैं। 

इस प्रयोग की सफलता ने बैक्सटर का उत्साह भी बढ़ाया और जिज्ञासा भी। उसने और प्रयोग किये और यह सिद्ध कर दिया कि पौधे अपने वातावरण में किसी भी कोशिका के अवसान पर अपना शोक व्यक्त करते हैं। 

पौधे के दुनिया की रोचक जानकारी

बैक्सटर के साथ एक दिन मजेदार बात हुई। उसके प्रयोगों की चर्चा सुनकर कनाडा से एक महिला वैज्ञानिक उसकी प्रयोगशाला देखने आयी। बैक्सटर ने अपने प्रयोग-प्रदर्शन के लिए पहले जिस पौधे को चूना, उसने पॉलीग्राफ पर कोई संकेत नहीं दिया। दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें पौधे भी निष्क्रिय रहे। बैक्सटर को आश्चर्य हो रहा था कि आखिर, पौधे कोई संकेत क्यों नहीं दे रहे हैं। पौधे ने जब भय का संकेत पॉलीग्राफ पर दिया तो बैक्सटर परेशान हो गया। उसने महिला से पूछा, “क्या आप अपने प्रयोग के लिए पौधों को हानि पहुंचाया करती हैं?” महिला ने उत्तर दिया, “आपका अनमान सही है। मैं पौधों को जला देती हैं और उनकी राख से प्रयोग करती हूं।” 

यही तो कारण था कि कुछ पौधे भय के मारे आपके आगे निष्क्रिय रहे और एक पौधे ने बता दिया कि वह आपसे भयभीत है।” बैक्सटर ने इतना कहा तो महिला वैज्ञानिक ने स्तब्ध होकर पूछा, “भला, पौधे मेरी प्रवृत्तियों को कैसे जान गये?’ 

“पौधे अपने आसपास के परिवेश को अच्छी तरह समझते हैं। मानव की अनुभूतियों और प्रवृत्तियों को समझने की उनमें विलक्षण क्षमता होती है।”-बैक्सटर ने इतना कहा तो महिला वैज्ञानिक चकित होकर उसकी ओर देने लगी। 

इस बात की सत्यता उभरकर उस समय सामने आ गयी जबकि महिला वैज्ञानिक के चले जाते ही पौधे फिर सामान्य व्यवहार करने लगे। इस घटना ने बैक्सटर के ज्ञान-कोष में नये रत्न भर दिये। 

एक बार बैक्सटर किसी काम से न्यूजर्सी गया। जब वह वहां से न्यूयार्क लौटने लगा, तब उसी समय उसकी प्रयोगशाला के पौधों ने पॉलीग्राफ पर प्रसन्नता व्यक्त की। इस रहस्य को स्पष्ट करते हए बैक्सटर ने बाद में बताया, 

“पौधे अपने पालनकर्ता के साथ घनिष्ठ और आत्मीय संबंध स्थापित कर लेते हैं। वे समय और दूरी की मर्यादा लांघकर अपने पालनकर्ता के साथ भावनात्मक तादातम्य भी बनाये रखते हैं।” 

यह सब कुछ बैक्सटर के साथ अकस्मात् ही शुरू हुआ। वह न्ययार्क में पप्लिस और स्रक्षा अधिकारियों को झूठ का पता लगाने की वैज्ञानिक विधियों का प्रशिक्षण देते थे। एक दिन जाने क्यों उसके भीतर यह जिज्ञासा हुई कि क्या पौधों की जड़ों में पानी देने पर उसकी पत्तियों पर कोई प्रतिक्रिया होती है तो उसमें कितना समय लगता है? 

अपनी जिज्ञासावश उसने अपने घर के बरामदे में रखे गमले के पौधे की पत्तियों को पॉलीग्राफ लाई-डिटेक्टर (झूठ संसूचक) के तार से बांध दिया और पौधे की जड़ में पानी डालकर पॉलीग्राफ को चालू कर दिया। ज्यों ही तार में हल्का विद्युत-संचार हुआ, त्यों ही यंत्र की सुई हरकत करने लगी और ग्राफ पर नीचे की ओर जाती हई टेढ़ी-मेढ़ी रेखा खिचने लगी। इसका अर्थ था सख, संतोष और राहत की अनुभूति। 

यह सब देखकर बैक्सटर दंग रह गया। उसे लगा कि कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है। यह सपना नहीं था, सच था, शत-प्रतिशत सच। उसकी आंखों के सामने पॉलीग्राफ पर पादप जगत का वह अद्भुत रहस्य खुल रहा था, जिसे वैज्ञानिकों से परिचित कराने का कार्य बैक्सटर जैसे मामली तकनीशियन ने किया 

इस चमत्कारिक सफलता ने बैक्सटर का उत्साह बढ़ाने के साथ उसके धैर्य की सीमा भी तोड़ दी। उसने ताबड़तोड़ पौधों के साथ कई खिलवाड़ किये। कष्ट काफी के गर्म प्याले में डुबोया, पर यंत्र की सई में कोई हरकत नहीं हुई। जब वह यह सोच रहा था कि पौधे में आवेग उत्पन्न करने के लिए क्या किया जाये, तभी उसके दिमाग में यह विचार कौंध गया कि क्यों न वह उस तार को जला डाले, जिसके द्वारा पौधे की पत्ती यंत्र से जुड़ी है। जैसे ही यह विचार उसके मन में आया, वैसे ही यंत्र के गैल्वेनोमीटर की सई में हरकत शुरू हुई। वह तेजी से ऊपर की ओर उठने लगी। ग्राफ पर एक ऊर्ध्व वक्ररेखा खिचती चली गयी, जिसका साफ-साफ मतलब होता है-भय की आशंका। 

यह देखकर बैक्सटर की आंखें फटी की फटी रह गयीं। वह सोचता रह गया कि उसने तो सिर्फ ऐसा करने की बात सोची भर ही थी, कुछ किया तो नहीं था। फिर पौधे पर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों हुई? क्या पौधे ने उसके मन के भावों को पढ़ लिया था? 

थोड़ी देर में वह अपनी कुर्सी से उठा। वह कमरे में कुछ देर तक चहलकदमी करता रहा। फिर जब वह अपनी कुर्सी के पास आया तो उसके हाथ में माचिस की एक डिबिया थी। उसने तीली जलायी भी न थी कि पॉलीग्राफ पर भीषण उद्वेग की वक्ररेखा बनने लगी। अब बैक्सटर को एक मजाक सूझा। उसने माचिस की एक तीली जलायी और पौधे की ओर इस तरह बढ़ाया, मानो वह उसे जलाकर ही छोड़ेगा। मगर आश्चर्य पौधे ने यंत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। क्या पौधे ने समझ लिया था कि बैक्सटर अब ऐसी कोई भी हरकत नहीं करने वाला है, जिससे पौधे को कोई क्षति पहंचे? क्या पौधे को बैक्सटर के इस मजाकिया खेल का 

आभास मिल चका था या पौधे ने विवशता की स्थिति में सब कुछ स्वीकारने के लिए अपने को मानसिक रूप से तैयार कर लिया था? 

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इस बारे में बैक्सटर का कहना है कि वनस्पतियों में मनुष्य की पांचों ज्ञानेन्द्रियों से कहीं अधिक सूक्ष्म और पैनी ज्ञानेन्द्रियां होती हैं, जिससे वे हमारे मानसिक जगत की गतिविधियों की संवेदना ग्रहण कर लेती हैं। एक दिन बैक्सटर अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठा गपशप कर रहा था। इतने में उसे एक बात सूझी। उसने फटाफट कुछ पर्चियां तैयार की। पर्चियों को आपस में मिलाकर हैट में रख दिया। उसके दोस्तों में सभी ने पर्चियां निकालीं। किसकी पर्ची में क्या लिखा था, यह एक दूसरे को नहीं मालूम था। बैक्सटर ने यह बता दिया था कि इनमें से एक पर्ची में एक खास आदेश होगा, जिसे यह पर्ची मिले, वह उस पर्ची में अंकित आदेश का पालन करे। 

जिस मित्र को यह पर्ची मिली, वह उठा। दूसरे कमरे में जाकर उसनें वहां रखे दो पौधों में से एक को उखाड़ा और पांव से कचलकर परी तरह नष्ट कर दिया। यह बात बैक्सटर और पर्ची पाने वाले उसके दोस्त के अलावा कोई नहीं जानता था। तीन-चार दिन बाद उसने उन सभी दोस्तों को बलाया। उसने दसरे कमरे में जो एक पौधा बचा था, उसे यंत्र से जोड़ दिया। इसक बाद अपने मित्रों को एक-एक करके उस कमरे में भेजना आरंभ किया।

उसके उन मित्रों के कमरे में जाने पर पौधे ने यंत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की, जिन्होंने उसके साथी पौधे को उखाडकर पैर से नहीं कचला था। जैसे ही वह मित्र कमरे में पहंचा, जिसने पौधे को उखाडा था, वैसे ही पॉलीग्राफ की सई पागलों की तरह दौड़ने लगी। इसका अर्थ यह था कि उस व्यक्ति को देखते ही पौधा एकदम से घबरा गया था, क्योंकि उसने अपने साथी पौधे के हत्यारे को पहचान लिया था। 

इस तरह आचार्य जगदीश चंद्र बस् ने पादप जगत के रहस्य का जो पट खोला था. उसके आगे के पटों को खोलकर बैक्सटर ने जो अदभत रहस्य सामने रखे. उससे उसका नाम विज्ञान के महान् अन्वेषक वैज्ञानिक की पंक्ति में आ गया। 

बैक्सटर के प्रयोगों से प्रभावित होकर कछ ऐसे ही दिलचस्प प्रयोग रूस के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक बी.एन पुश्किन ने भी किये। उन्होंने ताथा नामक एक लड़की को बुलाकर कहा, “तुम 1 से लेकर 10 तक के बीच की कोई एक संख्या चून लो। जब तमसे पूछा जाये तो सही संख्या पूछने पर भी तम यही कहना कि नहीं, यह संख्या मैंने नहीं चनी है।” इतना कहकर उन्होंने वहां गमले में रखे पौधे को पॉलीग्राफ से जोड़ दिया। 

एक व्यक्ति एक संख्या बताकर यह पछने लगा कि क्या तमने यह संख्या चनी है। लड़की हर बार सिर हिलाकर यही कहती रही कि नहीं, यह संख्या मैंने नहीं चनी है। हर बार तो ग्राफ पर कुछ भी अंकित नहीं हुआ किन्तु जब पांच की संख्या के बारे में पछे जाने पर उस लड़की ने फिर नकारात्मक उत्तर दिया तब जो ग्राफ अंकित हुआ उसका सीधा तात्पर्य था कि लड़की ने पांच की संख्या चुनी है और वह इनकार करके झूठ बोल रही है। जब लड़की से पूछा गया कि क्या सचम्च पांच अंक ही तुमने चुना था, तब उसने स्वीकार किया कि उसने पांच अंक ही चुना था। 

इस घटना से यह सिद्ध हो गया कि पौधों में हमारा झठ पकड़ने की भी क्षमता है। पुश्किन का यह विश्वास है कि पौधों और मनुष्य के नाड़ी-संस्थानों में कहीं कोई न कोई संबंध अवश्य है, जिसके कारण पौधों के अंदर मनष्यों के अदृश्य संवेगों का सही-सही संवेदन होता है। 

इतना ही नहीं, पौधे भी हमारी तरह संगीत का आनंद लेते हैं। मधुर संगीत पर वे भी झम उठते हैं और अपनी खशी जाहिर करते हैं। उनकी यह खुशी जाहिर होती है, उनकी बद्धि से। अपने यहां के ही अन्नामलाई विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री डॉ. टी.सी.एन. सिंह ने अभी हाल में ही एक प्रयोग के द्वारा यह सिद्ध किया कि पौधों पर संगीत की स्वर-लहरी का अनकल प्रभाव पड़ता है। उन्होंने एक महीने तक कछ पौधों के सामने प्रतिदिन पच्चीस मिनट तक वीणा-वादन की व्यवस्था की। बाद में देखा कि जिन पौधों के सामने वीणा बजायी गयी थी, वे अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़े हैं। 

इसके बाद अपने अगले प्रयोग के दौरान प्रो. सिंह ने मद्रास और पांडिचेरी में लाउडस्पीकर लगाकर धान के खेतों में कछ दिनों तक राग चारूकेशी प्रसारित किया। बाद में यह देखा गया कि उन खेतों की फसल में 25 से लेकर 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हई। संगीत के जाद का असर तंबाक और मंगफली पर भी पड़ा। उनकी उपज 50 फीसदी बढ़ गयी थी। 

उन खेतों से सटी हई भमि में पांवों में बिना घंघरू बांधे भरत-नाट्यम नत्य करने से उत्पन्न तरंगों ने पौधों को तेजी से बढ़ने में मदद की और वे पौधे दसरे पौधों की अपेक्षा दो सप्ताह पहले ही फल गये।

डॉ. सिंह के प्रयोग से प्रभावित होकर अमरीका के इलिनाय विश्वविद्यालय के जॉर्ज ई स्मिथ ने भी पौधों पर संगीत का प्रभाव आजमाया। अपने प्रयोगों से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत से प्रभावित पौधों के तने अपेक्षाकृत अधिक मोटे, अधिक मजबूत और अधिक हरे हो जाते हैं। 

अब तो अमरीका ही क्या, सारी दुनिया में पौधों पर होने वाले संगीत के प्रभाव संबंधी प्रयोग यही बता रहे हैं कि संगीत का पौधों पर चमत्कारिक प्रभाव पड़ता है। अब तो फोटो सॉनिक्स’ नाम से विज्ञान की एक नयी शाखा का ही उदय हो गया है, जिसमें पौधों पर ध्वनि प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

पौधे मीठी धनों पर खश होते हैं। तेज-तर्रार, कर्ण-कट धनें उन्हें नापसंद हैं। अमरीकी महिला श्रीमती डीरोथी रैटेल लेक के प्रयोगों से इसका पता चला। उन्होंने एक प्रयोग के दौरान कुछ पौधों को बॉख का पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत सुनाया और कुछ पौधों को रविशंकर’का भारतीय शास्त्रीय संगीत। देखने वाले हैरत में पड़ गये। बाँखको सनने वाले पौधे संगीत-स्रोत की ओर 35डिग्री तक झक जबकि रविशंकर को सुनने वाले पौधे 60 डिग्री तक झुके। और तो और, एक निकटतम पौधे ने तो लाउडस्पीकर का आलिगन तक कर लिया। 

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सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रैटेल लेक ने प्रयोग के बाद यह देखा कि रॉक संगीत सुनने वाले पौधे या तो असाधारण रूप से लंबे हो गये और उनकी पत्तियां छोटी रह गयीं या वे बौने ही रह गये और आठ-दस दिनों बाद मरझा गये। इन पौधों से केवल 6 फीट की दूरी पर उन्हीं की जाति के और भी पौधे थे, जिन्हें शास्त्रीय संगीत सुनाया गया था। इन पौधों पर शास्त्रीय संगीत का विलक्षण प्रभाव पड़ा और वे अस्वाभाविक रूप से पष्पों से लद गये। 

जब कुछ पौधों को एसिड रॉक अर्थात् तेज धन वाला संगीत सनाया गया तो वे संगीत-स्रोत की विपरीत दिशा में मड़ गये। रैटेल लेक ने इन पौधों का रुख फिर मोड़कर यथावत् कर दिया। स्तब्धकारी बात तो यह थी कि पौधे यथावत् नहीं रहे और क्षण भर में ही आश्चर्यजनक रूप से वे संगीत की विपरीत दिशा में फिर मुड़ गये। 

रूसी विज्ञानवेत्ताओं ने भी पौधों की दनिया के अदभत रहस्यों को खोजने के लिए कछ प्रयोग किये हैं, जिनके परिणाम अभी भी वैज्ञानिकों की समझ से परे है। एक प्रयोग के दौरान अनाज के पौधों की क्यारी के एक पौधे को कांच के बर्तन से ढक कर रख दिया गया। अन्य पौधों को तो बराबर पानी दिया जाता था, किन्तु कांच के बर्तन से ढके पौधे को जान-बूझकर पानी नहीं दिया जाता था। इतने पर भी वह पौधा अन्य पौधों की ही भांति जीवित और स्वस्थ था। 

वैज्ञानिकों ने जब परीक्षण किया तब उन्हें पता लगा कि ढंके गये पौधे को पानी न दिये जाने के बावजद उसे किसी तरह से पानी मिल जाता था। पानी मिलने का कोई बाह्य स्रोत तो था नहीं, फिर पानी कैसे मिल जाता था? आश्चर्यचकित वैज्ञानिकों ने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए विचार-मंथन किया और अंततः इस निष्कर्ष पर पहंचे कि कांच के वर्तन से ढंके पौधे को उसके साथ वाले पौधे पानी पहंचाते थे। पौधों की पारस्परिक संवेदनशीलता और साझेदारी का इससे बढ़कर उत्कृष्ट दृष्टांत और क्या हो सकता है! 

अभी पौधों के रहस्यमय संसार में घुसने की दखलंदाजी हमने शुरू की है, देखिये कितनी अनजानी बातों का लेखा-जोखा सामने आता है।

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