परोपकार पर निबंध|Essay on Philanthropy

परोपकार पर निबंध,

परोपकार पर निबंध Essay on Philanthropy In hindi

अठारहो पुराणों में महाभारतकार महाकवि व्यास के दो ही सारवचन हैं-परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप । गोस्वामी तुलसीदास ने इसे ही इस प्रकार कहा-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

परपीड़ा सम नहिं अधमाई ।। 

सचमुच भगवान व्यास के वचन बड़े ही मल्यवान और विलक्षण हैं। परोपकार, अर्थात दूसरों की निःस्वार्थ भलाई से बढ़कर मनुष्य-जीवन की और कोई सार्थकता क्या हो सकती है? केवल अपने लिए तो नालियों के कीड़े-मकोड़े भी जी लेते हैं, किंतु मनुष्य वही है, जो मनुष्य के लिए जीता और मरता है। खाने-पीने और श्वास लेने का काम तो कुत्ते, मेढ़क और हाथी के द्वारा भी संपन्न होता है, किंतु वही नररत्न है, जो गोवर्द्धन-धारण द्वारा विपत्ति के प्रलयमेघ से दूसरों को बचा लेता है। 

यदि हम आँखें खोलकर देखें, तो प्रकृति के स्वर्णपत्रों पर परोपकार की अनगिनत आकर्षक कहानियाँ अंकित पाएँगे। सर्वंसहा वसुंधरा स्वयं कष्ट सहती है और हमारे लिए चंदन का पालना ही नहीं बनती, वरन् माता की भाँति पालन-पोषण भी करती है। सूरज स्वयं दिनभर तपता रहता है और सारे संसार में ऊष्मा, प्रकाश एवं नवजीवन का संचार करता है। चाँद रातभर जागता है और हमें चाँदनी-की सौगात देता है।

बादल अपने प्राणों में न मालूम कितनी बिजलियों की तड़प छिपाए रहता है, फिर भी संसार को जलदान के द्वारा संतृप्त एवं संजीवित करता है। हाँफती-दौड़ती सरिताएँ प्रियतम सागर से मिलने जाती हैं, लेकिन फिर भी वे मुक्तहस्त आमंत्रण लुटाती चलती हैं- ‘आओ, हमलोगों का जीवन तुम्हारे लिए, केवल तुम्हारे लिए है।’ रसाल-पादप रसीले फलों से जब लद जाता है, तब वह झुककर उन्हें लुटाने के लिए लालायित रहता है। हरसिंगार जब फूलों से सज जाता है, तब हर दिशा को गंधपूरित कर देता है। इसलिए संत कबीर ने कहा है-

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर ।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर ।।

मानव का गौरव मानव के भारवहन के सिवा और कुछ नहीं। दूसरों के दुःख सहने से बढ़कर मानवजीवन का और कोई सुख नहीं है। मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा-

गौरव क्या है, जनभार वहन करना ही।

सुख क्या है, बढ़कर दुःख सहन करना ही। 

इसलिए प्रसादजी ने ‘कामायनी’ में श्रद्धा के मुख से मनु को उपदेश दिलवाया है औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ। 

परोपकारी मनुष्य कभी भी स्वास्थ्य के संकुचित घेरे से नहीं गिरता है। वह कभी भी दूसरे व्यक्ति को दुख नहीं देना चाहता है। उसके शरीर का तन-मन हर क्षण दूसरों की चिंता में रमा रहेगा। ऐसे मनुष्यों के हृदय से विकारों की काई मिट जाती है, उसकी दुर्गंध समाप्त हो जाती है और उसका हृदय स्वच्छ मंदिर बन जाता है, उसमें प्रभु का निवास हो जाता है। 

अतः, यदि हम अपने हृदय को क्षद्रताओं के नरक से महत्ताओं के स्वर्ग में परिणत कर देना चाहते हैं, तो हम अपने तन-मन-धन को दूसरों की भलाई के लिए होम कर देने को सदा तत्पर रहें। संपत्ति की महत्ता इसी में है कि वह सुरसरि की तरह सबका हित करे। सागर की तरह विशाल वह संपत्ति किस काम की, जहाँ से सभी प्यासे लौट जाएँ ? उस बड़प्पन से क्या लाभ, जिससे दूसरों की भलाई न हो सके? रहीम ने ठीक ही कहा है

बड़े हए तो क्या हुए, जैसे पेड़ खजूर ।

पंछी को छाया नहीं, फल लागत अति दूर ॥ 

भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र, बीमारों को सेवा-शुश्रूषा और अज्ञों को ज्ञान देकर हम विभिन्न प्रकार से उपकार कर सकते हैं। 

अतः, मानवता का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब मनुष्य व्यष्टिकेंद्रित न रहे, वरन् समष्टिकेंद्रित रहे। अपने संकुचित स्वार्थ के सीमित वृत्त में घिरे रहनेवाले व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र एवं विश्व में उत्पात का तांडव मचाते हैं, विग्रह और युद्ध की विभीषिका उपस्थित करते हैं। वसुंधरा तभी अपना नाम सार्थक करेगी, जब उसपर केवल परोपकारी ही रह जाएँ।

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