परिवार नियोजन पर निबंध-Essay on Family Planning in Hindi

परिवार नियोजन पर निबंध

परिवार नियोजन पर निबंध-Essay on Family Planning in Hindi

अत्यंत प्राचीन काल में जब देश की जनसंख्या बहुत कम थी, तब एक व्यक्ति को दो बच्चे हों या पाँच-इसपर बहुत सोच-विचार नहीं किया जाता था, किंतु जब आज देश की जनसंख्या विस्तृत होकर पर्याप्त संकटकारिणी स्थिति में आ गई है, तब इस ओर सोचना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। द्वितीय महायुद्ध के बाद जापान में इतने लोग मारे गए कि वहाँ अधिक बच्चे पैदा करने के लिए सरकार की ओर से पुरस्कार की घोषणा की गई। 1972 ई० के दिसंबर में उगांडा के राष्ट्रपति अमीन ने अपनी चारों पत्नियों से कहा कि जो वर्ष में एक बच्चे को जन्म नहीं देगी, उसका तलाक कर दिया जाएगा।

किंतु, आज की स्थिति में दो या तीन बच्चे के बाद जन्मति कराने के लिए पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है और आप जिधर गुजरिए, उधर ही लाल तिकोन का निशान देखिए और पढ़िए ‘छोटा परिवार : सुख का आधार’, ‘सखी जीवन के लिए डॉक्टर की सलाह मानिए’, ‘दो या तीन बच्चे, बस’, ‘हम दो, हमारे दो’, ‘मुन्ना-मुन्नी मम्मी-पापा के हम दो।’

आज दुनिया की आबादी बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। भारत का तो और भी बुरा हाल है। देश-विभाजन के पश्चात् 1947 ई० में हमारे देश की आबादी लगभग 36 करोड़ थी, जो 1981 ई० तक बढ़कर 70 करोड़ से भी अधिक हो गई। यदि हिसाब लगाया जाए, तो हमारे यहाँ एक मिनट में लगभग 23 बच्चे पैदा होते हैं। एक वर्ष में लगभग एक करोड़ बीस लाख व्यक्ति पैदा हो रहे हैं।

इस तरह, भारत के अंदर जनसंख्या की दृष्टि से एक महादेश पैदा होता जा रहा है (आस्ट्रेलिया महादेश की आबादी केवल एक करोड़ है।)। हर वर्ष इतने मेहमानों के आ जाने के कारण उनके लिए हर वर्ष सवा करोड़ क्विंटल अन्न, उन्नीस करोड़ मीटर वस्त्र तथा पचीस लाख नए गृहों का प्रबंध अनिवार्य हो जाता है। इनके अतिरिक्त, उनके लिए दवाइयाँ, शिक्षा तथा नौकरियों की भी व्यवस्था करनी पड़ती है।

यदि यही रफ्तार रही, तो अगले पंद्रह वर्षों में हमारे देश की आबादी 100 करोड़ हो जाएगी। जनगणना-विशारदों का कथन है कि पाँच सौ वर्षों में पृथ्वी पर मनुष्य कीड़े की तरह रेंगते नजर आएँगे। जिस गति से जनसंख्या बढ़ती है, उस गति से पैदावार नहीं बढ़ सकती। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस का कहना है कि यदि जनसंख्या में ज्यामितिक दर से वृद्धि होती है, तो उत्पादन में अंकगणितिक दर से। अर्थात्, जिस रफ्तार से उत्पादन बढ़ता है। मनुष्य के जन्म लेते ही उसके भोजन, वस्त्र, आवास आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जमीन तो रबर है नहीं कि उसे हम जितना चाहें, खींचकर बढ़ा लें ! 

अतः, सुखमय परिवार, समाज एवं राष्ट्र के लिए परिवार-परिसीमन परमावश्यक है। जिस व्यक्ति के पास बच्चों की पलटन खड़ी है, उसके सामने समस्याओं की भी पलटन खड़ी है। बच्चों के भोजन, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए पिता प्रबंध नहीं कर पाता। अतः, उसका सारा जीवन चिंताओं का कारागार बन जाता है, नरक का द्वार बन जाता है। एक हास्य रस के कवि ने कहा है 

उनके दर्जनभर बच्चे 

जब मिलकर चिल्लाते हैं। 

मेरे माइंड की बिजली के 

सब बल्ब फ्यूज हो जाते हैं।

 परिवारों से ही समाज बनता है और समाज से ही राष्ट्र । यदि परिवार ही दुःखी है, तो समाज सखी कैसे हो सकता है? फिर दुःखी समाज से सुखी राष्ट्र की कल्पना असंभव है। जिस देश में आबादी बहुत बढ़ जाती है, वहाँ की सरकार के सामने तरह-तरह की समस्याएँ आ खड़ी होती हैं। उसे अन्न के लिए अन्य देशों के समक्ष भिक्षापात्र फैलाना पड़ता है और हम समझ सकते हैं कि भिखारी का क्या स्वतंत्र व्यक्तित्व और गौरव हो सकता है। 

नियुक्ति के क्षेत्र सीमित हैं, इसीलिए अधिक आबादी के कारण देश में बेकारों की वाहिनी तैयार हो जाती है, जो देशहित की जड़ पर कुठाराघात आरंभ कर देती है। अधिक बच्चों के कारण पिता का सारा जीवन जिस प्रकार चुसी हुई नारंगी की तरह होता है, उसी प्रकार अत्यधिक जनसंख्यावाले देश का जीवन उलझनों की कहानी भर होता है, समस्याओं की सुरसाएँ उसे कभी आगे बढ़ने नहीं देतीं। 

अतः, जनसंख्या की इस बाढ को रोकने में ही व्यक्ति, समाज और देश, सभी को भलाई है-इसमें कोई संदेह नहीं। कुछ अंधविश्वासी लोगों का कहना है कि मनुष्य तो परमात्मा की सृष्टि है, उसकी इच्छा का विकास है। ऐसे भी लोग हैं, जो संतान चाहते हैं, किंतु जीवनभर एक चूहा भी पैदा नहीं करते; क्योंकि विधाता नहीं चाहता कि उन्हें संतान हो। अतः, कृत्रिम पद्धतियों से प्रजनन पर नियंत्रण परमात्मा के प्रति विद्रोह है, उनकी इच्छा की अपूर्ति है।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यदि परिवार-नियोजन हुआ होता, यदि दो या तीन बच्चों के बाद जन्मनिरोध किया जाता, तो मानवसमुदाय रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे महापुरुष से वंचित होता। कुछ यह भी कहते हैं कि घबराने की जरूरत नहीं, दुनिया में सबसे बड़ी जनसंख्यावाला देश चीन है, उससे मुकाबले के लिए आबादी बढ़ाना जरूरी है। कुछ लोग कहते हैं कि अभी तो नए-नए ग्रह-उपग्रह खोजे जा रहे हैं, जो पृथ्वी से हजारों गुना बड़े हैं, समुद्र के भीतर भी बस्ती बनाने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं-अतः जन्मनिरोध करना व्यर्थ है; क्योंकि हमारे देश में इतने मनुष्य चाहिए, जो विभिन्न ग्रहों, उपग्रहों तथा सागरतलों में अपना बहुमत बना सकें। 

किंतु, इन सब दलीलों से कीड़े-मकोड़े की तरह बच्चे पैदा करते चलना, उचित पोषण के अभाव में धंसी आँखोंवाले बच्चों की जमात से घर भर देना, देश को समस्याओं के चौमुहाने पर खड़ा कर देना मूर्खता ही नहीं, वरन् समाजद्रोह है। हर संभव उपाय से इसे रोकना ही कल्याणकर है। 

भारत-सरकार ने अपनी प्रथम तीनों पंचवर्षीय योजनाओं में इसपर बहुत व्यय किया है। प्रथम योजना में पैंसठ लाख रुपये, द्वितीय योजना में पाँच करोड़ रुपये तथा तार योजना में पचास करोड़ रुपये खर्च किए गए। उसने अपनी चौथी पंचवर्षीय योजना में भी परिवार-नियोजन पर काफी धन खर्च किया। इसके लिए जन्मनिरोध का आषायचा, शल्य-चिकित्सा, नसबंदी, लूप-पद्धति आदि अपनाई गई हैं।

नसबंदी को जनप्रिय बनाने के लिए सरकार रुपये भी देती है। नसबंदी के लिए पुरुषों तथा स्त्रियों को रुपये देने की भी व्यवस्था की गई है। स्त्रियों को लूप लगवाने के लिए भी रुपये दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, पुरुषों की नसबंदी के लिए पंद्रह तथा स्त्रियों को लूप लगवाने के लिए अठारह रुपये दिए जाते हैं और नसबंदी के लिए पुरुषों या स्त्रियों को ले जानेवालों को भी कुछ रुपये दिए जाने का प्रबंध किया जाता है।

जन्मनिरोध के लिए मुफ्त टिकिया बाँटी जाती है। इसके अतिरिक्त, परिवार-नियोजन के लिए प्रखंडस्तर पर अनेक परिवार-नियोजन-केंद्र खोले गए हैं और इससे थोड़ा लाभ भी हुआ है। कुछ लोग गाँधीजी की भाँति अत्मनियंत्रण इसका इलाज बताते हैं, किंतु यह पद्धति बहुत थोड़े लोगों के लिए है। अधिकांश लोगों को कृत्रिम पद्धतियों का सहारा लेना ही पड़ता है। परिवार-नियोजन को सफल बनाने के लिए मानसिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना आवश्यक है। अब शिक्षित व्यक्ति इसके महत्त्व को समझने लगे हैं। दो बच्चों के बीच समय का अंतराल बढ़ाना जितना आवश्यक है, उतना ही कम उम्र में लड़के-लड़कियों के विवाह पर रोक भी। मेरा तो विचार है कि दो बच्चे से अधिक पैदा करनेवाले माँ-बाप को कानूनन दंडनीय माना जाना चाहिए। इस दिशा में हमारी राज्य सरकारें भी सोच रही हैं।

बिहार सरकार यह घोषणा करने पर विचार कर रही है कि तीन से अधिक संतानों के लिए राशन-कार्ड नहीं बनेगा। दो बच्चेवालों को पुरस्कार देने की बात चल रही है। जापान ने इस समस्या का समाधान गर्भपात को वैध बनाकर किया है। भारत सरकार ने भी गर्भपात को वैध बना दिया है। सिंगापुर सरकार ने दो बच्चों से अधिक संतान पैदा करनेवाले को दंड का भागी करार दिया है। ऐसी ही कार्रवाइयों से जनसंख्या की बाढ़ रुक सकती है। इस विषय में धर्म भी बहुत बड़ा अडंगा है। 

पोप, खलीफा और शंकराचार्य सभी वैज्ञानिक प्रणाली से संततिनिरोध के विरोधी है। ग्रामीण जनता के मन से इस धारणा को हटाना पड़ेगा कि पुत्र से ‘पुम्’ नामक नरक से त्राण होता है। पुत्र अवश्य हो, इसी कोशिश में लाखों व्यक्तियों को पाँच-छह लड़कियाँ पैदा करनी पड़ती है। खैरियत यही है कि लोग समय की माँग समझकर इनके कट्टरपंथ में नहीं पड़ रहे हैं। अतः, सरकार तथा अन्य सामाजिक संगठनों को इसके सस्ते-सुलभ साधन धर-घर पहँचाने के साथ सतर्क प्रचार में तीव्र होना चाहिए, ताकि धार्मिक या अन्य प्रकार के अड़गे भी समाप्त हों। 

आज के संदर्भ में बड़ा ही आवश्यक हो गया है कि परिवार नियोजन के लिए व्यापक अहानिकर और सुलभ प्रबंध किया जाए। हमारे वैदिक ऋषियों ने जहाँ कम आबादी में संतान को मोक्ष का कारण कहा, वहाँ घनी आबादी की हालत में कहा था-जिसे बहुत संतानें होती हैं, वह नरक जाता है। बाद के नरक का क्या ठिकाना, अधिक संतानवालों का जीवन यहीं नरक बन जाता है, इसमें संदेह नहीं। अतः, हमें कौरवों की भाँति शताधिक संतानों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मर्यादापुरुषोत्तम राम, वीरव्रती लक्ष्मण, आदर्श बंधु भरत एवं महान साधक शत्रुघ्न की तरह केवल दो संतानों से अधिक की आवश्यकता नहीं, यदि एक रहे तो और अच्छा। एक सिंह के समक्ष सौ-सौ चूहों की क्या बिसात।

अशिक्षित, निर्धन, रुग्ण, अपंग।

बढ़ाते व्यर्थ करुण भू-भार ।

नरक क्यों बने न जन-भू-स्वर्ग।

नहीं जब प्रजनन पर अधिकार ।। 

-सुमित्रानंदन पंत, लोकायतन 

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Essay on Family Planning

In the very ancient times, when the population of the country was very small, then a person had two children or five – it was not considered very much, but today when the population of the country has expanded to a sufficient crisis position, then this It becomes very important to think more. After the Second World War, so many people died in Japan that the award was announced by the government to produce more children there. In December 1972, Uganda’s President Amin told his four wives that the year in which he would not give birth to a child would be divorced.

But, in today’s situation the award is being given for giving birth after two or three children and wherever you go, look at the mark of red Tikon and read ‘Chhota Family: Basis of Happiness’, ‘For a Happy Life’ Follow the doctor’s advice, ‘Two or three children, enough’, ‘Hum do, hamare do’, ‘Munna-munni mummy-papa ke hum do’.

Today, the world’s population is increasing very fast. India is in worse condition. After the partition of the country, in 1947, our country had a population of about 36 crores, which increased to more than 70 crores by 1981 AD. If we calculate, we have about 23 children born in a minute. About one crore twenty lakh persons are being born in a year.

In this way, a continent is being created within India in terms of population (the population of Australia continent is only one crore.). Due to the arrival of so many guests every year, it becomes mandatory for them to manage 125 million quintal grains, nineteen million meters of clothes and twenty five million new houses. Apart from these, medicines, education and jobs also have to be arranged for them.

If the same pace persists, then in the next fifteen years the population of our country will be 100 crores. Census-scholars say that in five hundred years, humans will be seen crawling on the earth like insects. Yield cannot increase at the speed with which population increases. The well-known economist Malthus states that if the population grows at a geometric rate, then at an arithmetic rate of production. Namely, the speed at which production increases. The problem of food, clothing, housing etc. arises as soon as a human is born. The ground is not rubber so that we can stretch it as much as we want!

Hence, family delimitation is essential for a happy family, society and nation. The person who has the platoon of children, there is also a platoon of problems in front of him. The father is unable to make arrangements for children’s food, clothing, education, health etc. Therefore, his whole life becomes a prison of worries, a gate to hell. A poet of comic humor has said

Their dozen children

When shouting together.

Of my mind’s electricity

All bulbs fuse.

Society is formed by families and nation is formed by society. If the family is unhappy, then how can the society be a friend? Then it is impossible to imagine a happy nation from a grieving society. In a country where the population increases greatly, the government of the country faces various problems. He has to spread beggars to other countries for food and we can understand what a beggar can have an independent personality and pride.

The areas of appointment are limited, so due to the large population, the duct of waste is prepared in the country, which starts the fidgeting at the root of the national interest. The way a father’s entire life is like a squeezed orange due to having more children, similarly the life of a heavily populated country is filled with a story of complications, the problems of problems never allow him to move forward.

Therefore, it is for the benefit of the individual, society and country to prevent this flood of population. Some superstitious people say that man is a creation of God, his desire is development. There are also people who want children, but do not produce a mouse throughout life; Because the creator does not want them to have children. Therefore, the control of reproduction by artificial methods is a rebellion to the divine, a deprivation of their will.

Some also say that if family planning had taken place, if birth control had been done after two or three children, the human community would have been deprived of great men like Rabindranath Tagore. Some also say that there is no need to panic, China is the country with the largest population in the world, it is necessary to increase the population. Some people say that new planet-satellites are still being discovered, which are thousands of times larger than the Earth, plans are being made to make habitation within the sea also – so it is pointless to birth; Because our country needs so many humans, who can make their majority in different planets, satellites and seas.

But, all these arguments are being made to produce children like insects, to fill the house with a bunch of children with sunken eyes due to lack of proper nutrition, to make the country stand on the crossroads of problems is not only foolishness, but also sedition. It is welfare to stop it by all possible means.

The Government of India has spent a lot on it in its first three five-year plans. Sixty-five lakh rupees were spent in the first plan, five crore rupees in the second plan and fifty crore rupees in the wire scheme. He also spent a lot of money on family planning in his fourth five-year plan. For this, birth control, surgery, sterilization, loop method etc. have been adopted.

To make vasectomy popular, the government also gives Rs.

Arrangements have also been made to give money to men and women for sterilization. Rupees are also given to women for looping. Not only this, fifteen rupees are given for the vasectomy of men and eighteen rupees for women to make loops, and some rupees are also arranged for men or women carrying them for sterilization.

Free muffins are distributed for birth control. In addition, many family-planning centers have been opened at the block level for family planning and have also benefited little. Some people treat it as Gandhiji’s self-control, but this method is for very few people. Most people have to resort to artificial methods. Changes in mental attitude are necessary to make family planning a success. Now educated people are beginning to understand its importance. As much as it is necessary to increase the time interval between two children, at the same time also ban the marriage of boys and girls. I think that parents who produce more than two children should be punishable by law. Our state governments are also thinking in this direction.

The Bihar government is considering announcing that ration cards will not be made for more than three children. There is talk of giving prizes to two children. Japan has solved this problem by legalizing abortion. The Indian government has also legalized abortion. The Singapore government has declared punishment for children born to more than two children. Similar actions can stop the flood of population. Religion is also a big problem in this subject.

The Pope, the Khalifa and the Shankaracharya are all opposed to the anti-sage from the scientific system. This notion has to be removed from the minds of the rural people that the son has a temper from hell called ‘Pum’. Must have a son, in this effort, millions of people have to produce five to six girls. Well, the reason is that people are not falling into their radicalism as they demand time. Therefore, the government and other social organizations should be vigilant in vigilant propaganda with its cheap-accessible means of access to dhar-ghar, so that religious or other forms of obstruction are also eliminated.

In today’s context, it has become very necessary to make extensive and easy arrangements for family planning. Our Vedic sages said that in a low population the reason for salvation, there was a situation of dense population – one who has many children goes to hell. There is no doubt about the whereabouts of later hell, the life of more children becomes hell here. Hence, we do not need more children like the Kauravas, but like Maryadapurushottam Ram, Veeravarvati Lakshmana, Adarsh ​​Bandhu Bharata and the great seeker Shatrughna need more than just two children, if one remains good. What is the situation of a hundred rats in front of a lion.

Uneducated, poor, sick, crippled.

Increasing wasteful land load.

Why should not hell become a land of heaven.

No when rights over reproduction.

-Sumitranandan Pant, Lokayatan

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