पनडुब्बी का आविष्कार किसने किया-submarine ka aavishkar kisne kiya

पनडुब्बी का आविष्कार किसने किया

पनडुब्बी का आविष्कार किसने कियाsubmarine ka aavishkar kisne kiya

विज्ञान ने प्रकृति की अनन्त गहराइयों को छुआ है। प्रकृति के गर्भ में छिपे रहस्यों को उजागर करके विज्ञान ने मानवमात्र को ही नहीं अंतरिक्ष को भी समृद्ध किया है। इसी समृद्धि की श्रृंखला में पनडुब्बी नाम के एक वाहन उपकरण का ईजाद हुआ, जो सागर की गहराइयों में छिपे रहस्यों का पता लगाने से लेकर शत्रुओं से मोर्चा लेने तक में करामात दिखाता रहा है।

चाहे वह द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी की शक्तिशाली पनडुब्बी ‘यू नौकाएं’ द्वारा शत्रुओं के जहाजों को डुबाने की घटना हो अथवा इंग्लैंड के शक्तिशाली जहाज ‘रॉयल ओक’ को नष्ट करने की वारदात, पनडुब्बियों ने सफलतम प्रदर्शन किया। 

पनडुब्बियों की कल्पना सर्वप्रथम 1979 में विलियन वोर्नी ने की। इसने ही पानी पर चलने वाली नौकाओं से अलग पानी के भीतर गोता लगाकर चलने वाली नौका का नाम ‘पनडुब्बी’ रखा। बोर्नी ने जो पनडुब्बी बनाई, वह चमड़े के जोड़ों और पेंचों से इस प्रकार व्यवस्थित थी कि अंदर से ही छोटा या बड़ा किया जा सकता था।

इसके इक्कीस साल बाद हालैंड के कोरनेलिस वान ड्रवेल ने भी एक पनडुब्बी का निर्माण किया, लेकिन तकनीकी रूप से इसमें कुछ खामियां रह गई थीं। 1773 में अमेरिका के डेविड बुएँ शनेल ने सर्वप्रथम आवश्यक तकनीकों से पूर्ण एक सुरक्षित पनडुब्बी बनाने में सफलता अर्जित की। ‘टटल’ नाम की इस पनडुब्बी का आकार कछुए के आकार जैसा था। इसमें सिर्फ एक व्यक्ति सवार हो सकता था। 

बारूद की खोज के बाद पनडुब्बियों की क्षमता भी समृद्ध होती गई और पनडुब्बियों ने पानी के भीतर ही भीतर तारपीडो मारकर शत्रुओं के विशालकाय जहाजों को नष्ट करने में कामयाबी दर्ज की। डेविड बुशनेल ने भी अपनी पनडुब्बी से तारपीडो दागकर अंग्रेजों के लड़ाकू जहाज ‘ईगल’ को नष्ट कर दिया था, जो न्यूयार्क के बंदरगाह पर डेरा डाले पड़ा था।

पनडुब्बी का आविष्कार किसने किया

पनडुब्बी के उलटने से बचाव के लिए बुशनेल ने पनडुब्बी के पेदे में सीसा भरा। किसी संभावित दुर्घटना अथवा डूबने की स्थिति में सीसे को तुरंत निकाल देने से पनडुब्बी ऊपर आ जाती है और दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। आज भी पनडुब्बियों में ऐसी व्यवस्था है। 

अमेरिका के जाने-माने अभियंता राबर्ट फुल्टन ने भाप इंजन की मदद से एक नौका चलाई। इससे पहले फुल्टन ने ही ‘नाटिलस’ नामक पनडुब्बी को 25 फीट की गहराई तक सफलतापूर्वक पानी में उतारा था। चूंकि अब तक पनडुब्बी के क्षेत्र में कोई उत्साहजनक विकास नहीं हुआ था, सो भाप इंजन से इसके संचालन में कठिनाइयां उत्पन्न हो रही थीं।

इसी बीच अन्तर्दहन पेट्रोल इंजन का आविष्कार हो जाने से विकास की गति तेज हो गई। अतः पेट्रोल इंजन की मदद से इसका संचालन सुविधाजनक हो गया। 

1893 में अमेरिका ने पनडुब्बियों के सुधार के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतियोगिता में जार्ज सी. बार्कर, साइमन लेक और जान पी. हालैंड द्वारा निर्मित पनडुब्बी डिजाइनों में हालैंड की डिजाइन को सर्वश्रेष्ट चुना गया। इसके बाद (अमेरिकी आदेश के बाद) हालैंड को ‘पंलजर’ नामक पनडुब्बी का निर्माण बीच में ही रोक देना पड़ा। इसके बाद एक दूसरी पनडुब्बी बनाई गई, जिसका नाम ‘हालैंड’ रखा गया। 

हालैंड की पनडुब्बी ‘हालैंड’ बिना ऊपर आए पानी के भीतर ही भीतर 40-45 मील की यात्रा करने में सक्षम थी। यह 160 हार्स पावर (एच.पी.) के पेट्रोल इंजन से समुद्र पर चलती थी और 70 एच.पी. की बिजली की मोटर से पानी के भीतर लाई जाती थी। हालैंड के नमूने की पनडुब्बियों का प्रचार-प्रसार जापान, जर्मनी, हालैंड, इंग्लैंड में भी हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध की घोषणा से एक सप्ताह पूर्व ही हालैंड की मृत्यु हो गई और वह अपनी पनडुब्बियों को युद्ध में प्रदर्शन करते हुए नहीं देख सका। 

अमेरिका के देखा-देखी फ्रांस ने भी एक पनडुब्बी प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें फ्रांस के लौब्यूफ द्वारा निर्मित पनडुब्बी ‘नवल’ को सर्वश्रेष्ठ चुना गया। एक-दूसरे फ्रांसीसी पनडुब्बी आविष्कारक गोबट ने भी 1887 में अपनी पनडुब्बी का निर्माण किया। 

एक बार एक फ्रांसीसी पनडुब्बी में विस्फोट हो जाने से 23 लोग मारे गए। इस दुर्घटना से पनडुब्बी चालक ऐसी तकनीक की खोज में लग गए, ताकि दुर्घटनाओं से बचा जा सके। इसी दौरान डीजल इंजनों का ईजाद हुआ, जो पनडुब्बियों को ऐसी दुर्घटनाओं से बचाने में मददगार हुआ। चूंकि इसके पहले पेट्रोल-चालित पनडुब्बियों का प्रयोग होता था जो चलने में आसान तो थीं, लेकिन खतरे का डर बना रहता था।

हवा मिश्रित पेट्रोल की गैस जरा-सी चिनगारी के संपर्क में आने पर विस्फोट अवश्यंभावी हो जाता था। वैसे भी पेट्रोल इंजन को स्टार्ट करने के लिए सिलिंडर में चिनगारी उत्पन्न करनी ही पड़ती थी। अत: पानी के भीतर इंजन का संचालन हर समय खतरे से खाली नहीं रहता था। 

विज्ञान व प्रौद्योगिकी के निरंतर विकास के क्रम में अणुशक्ति से संचालित पनडुब्बियां भी निर्मित हो चुकी हैं। सर्वप्रथम अमेरिका ने अणुशक्ति से चलनेवाली पहली पनडुब्बी ‘नाटिलस’ को बनाया। अणुशक्ति चालित ‘मोबी-डिक’ नामक एक विशालकाय पनडुब्बी है, जिसका वजन लगभग 50,000 टन है तथा इसकी लंबाई 600 फीट है। इसमें लगी परमाण भट्टी लगभग 75,000 एच.पी. से शक्ति उत्पन्न करती है।

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