ओटोवान ग्वेरिक की जीवनी |Otto von Guericke biography in hindi

ओटोवान ग्वेरिक की जीवनी

ओटोवान ग्वेरिक की जीवनी |Otto von Guericke biography in hindi

विश्व के महान् भौतिक शास्त्री एवं इंजीनियर ओटो वान ग्वेरिके का जन्म 20 नवम्बर, सन् 1602 ई० में मगडेबर्ग, सैम्सोनी, जर्मनी के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी आरम्भिक शिक्षा लिपजिम विश्वविद्यालय में पूरी की। उन्नीस वर्ष की आयु होने पर वह जेना विश्वविद्यालय में विधि शास्त्र का अध्ययन करने लगे। तत्पश्चात सन् 1623 ई० में उन्होंने लीडन विश्वविद्यालय में गणित एवं यांत्रिकी का अध्ययन किया। 

ओटो वान ग्वेरिके सन् 1631 ई० में स्वीडन के गुमुस्तावस द्वितीय की सेना में अभियन्ता के पद पर नियुक्त हुए। इन दिनों जर्मनी एक भीषण युद्ध की चपेट में सुलग रहा था। ओटो वन ग्वेरिके ने इस युद्ध में विशेष भूमिका निभायी। यह युद्ध करीब तीस वर्षों तक जारी रहा, जिसमें लगभग तीस हजार व्यक्ति हताहत हुए परन्तु विजय श्री भी हाथ नहीं लगी।। शत्रु का मगडेबर्ग पर अधिकार हो गया था। उन लोगों ने नगर का सम्पूर्ण सौन्दर्य नष्ट कर डाला था। दैवयोग से ओटो वान ग्वरिके जीवित बच गए।

जीवित बचकर उन्होंने अपने नगर के पुनर्निमाण में पूर्ण सहयोग दिया, परिणामस्वरूप मागडेबर्ग के नागरिकों ने उन्हें मेयर के उच्चासन पर बैठा दिया। अपनी योग्यता के बल पर ओटो वान ग्वेरिके ने इस पद को निरन्तर पैंतीस वर्षों तक संभाले रखा। यद्यपि इस पद पर कार्यरत रहने से उनकी व्यस्तता बढ़ गई थी, फिर भी वे अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए समय निकाल लिया करते थे। 

उन्होंने प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक अरस्तु का यह सिद्धान्त पढ़ा था कि ‘सिद्धान्त पूर्ण निर्वात असंभव है’ ओटो वान ने इस सिद्धान्त को चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्हें मालूम था कि महान् वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली यह सिद्ध कर चुके थे कि वायु में भार होता है, साथ ही ओटो वान टौरिसैली के द्वारा वायुदाबमापी पर किए गए प्रयोगों से भी परिचित थे। इन सबको आधार अनाकर ओटो वान ग्वेरिके ने सन् 1650 ई० में निवर्ति की उत्पक्ति के लिए ‘वायु पम्प’ आविष्कृत किया। 

इस पम्प के माध्यम से पर्याप्त ऊंची सीमा तक निर्वात उत्पन्न किया जा सकता था। उन्होंने आविष्कृत पम्प का प्रयोग अन्य प्रयोगों के लिए भी किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि किसी निर्वात कक्ष में बजने वाली घण्टी की ध्वनि बाहर सुनाई नहीं देती है। इस तथ्य से ओटो वान इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि प्रकाश तो विनिर्वति से होकर गुजर सकता है, किन्तु ध्वनि नहीं गुजर सकती। उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिखाया कि निर्वात में मोमबत्ती नहीं जल सकती और जीवित जन्तु भी कुछ ही समय में मौत के घेरे में पहुँच जाते हैं। प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री एवं अभियन्ता ओटो वान ग्वेरिके ने नई तरह के निर्वति यंत्र अविष्कृत किए। उन्होंने तांबे के ऐसे दो अर्द्धगोलों का निर्माण किया, जो एक-दूसरे के साथ फिट होकर एक सम्पूर्ण गोला बना देते थे। 

ओटो वान की ख्याति मगडेगबर्ग के अर्द्धगोलों के रूप में खूब फैली। इन्हीं गोलों के माध्यम से उन्होंने रेजन्सबर्ग में शासक फर्डीनिद्र तृतीय के सामने निर्वात की महान् शक्ति का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने तांबे से बने दोनों अर्द्धगोलों को एक-दूसरे के साथ मिला दिया, इस तरह वह चौदह इंच व्यास का एक बड़ा गोला बन गया। इसे वायुरुद्ध करने के लिए उन्होंने एक चमड़े का छल्ला, तारपीन व मोम के घोल में डुबोकर उन गोलों के जोड़ वाले स्थान पर चिपका दिया। कुछ देर बाद ही तारपीन का असर खत्म हो गया और चमड़े का छल्ला उन अर्द्धगोलों के साथ चिपक गया। 

इसके बाद एक अर्द्धगोले में लगी धौकनी को निर्वात पम्प से जोड़ दिया तथा गोले के भीतर की हवा बाहर निकाल दी। इस तरह उस गोले मे निर्वात उत्पन्न करके आठ-आठ घोड़े दोनों अर्द्धगोलों को विपरीत दिशा में खींचने के लिए जोत दिए गए। दोनों ओर से घोड़ों ने खूब खींचातानी की किन्तु असफल रहे। अर्द्धगोले अलग नहीं हुए। उसी समय इतनी भयंकर आवाज हुई कि रेजन्सवर्ग के सभी दरबारी डर गए। वास्तव में वह भयानक ध्वनि रिक्त स्थान में अचानक वायु प्रवेश के कारण हुई थी।

 शासक फर्डीनद्र तृतीय इस प्रदर्शन से बहुत प्रभावित हुआ। तब ओटो वान ग्वेरिके ने उन अर्द्धगोलों को अलग करने की सरल विधि बतायी। उन्होंने दोनों ओर के घोड़ों को खोल दिया था तथा दोनों अर्द्धगोलों को अलग करने के लिए एक अर्द्धगोले पर लगी टोंटी घुमा दी, जिससे गोलों में वायु तेजी से प्रवेश कर गई और दोनों अर्द्धगोले सुगमता से एक-दूसरे से अलग हो गए। इस प्रकार उन्होंने वायु दाब का सफल प्रदर्शन करके दिखाया। 

सन् 1633 ई० में ओटो वान ग्वेरिके ने एक ऐसा जनरेटर तैयार किया, जो स्थिर बिजली पैदा करता था। कई वर्षों के प्रयोग के बाद सन् 1672 ई० में ओटो वान ग्वेरिके इस नतीजे पर पहुँचे कि गंधक की गेंद पर पैदा होने वाली बिजली उसकी सतह पर चमक पैदा करती है, जो विद्युत प्रतिदीप्ति कहलाती है। ओटो वान ग्वेरिके ने खगोलशास्त्र का भी अध्ययन किया था और इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि धूमकेतु नियमित रूप से अंतरिक्ष में अपने स्थानों की ओर वापस आने हैं। 

सन् 1681 ई० में ओटो वान ब्रेन्डनबर्ग के न्यायाधीश पद से मुक्त होकर हेमबर्ग चले गए और वहीं मई सन् 1686 में उनका देहान्त हो गया।

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