विकास योजनाओं की पुनर्संरचना की जरूरत

विकास योजनाओं की पुनर्संरचना की जरूरत

विकास योजनाओं की पुनःसंरचना की जरूरत (Development Schemes: Need for a Remodelling) 

एक समाज कल्याणकारी राज्य महत्तम लोगों के महत्तम हित के लक्ष्य के जरिये समतावादी समाज की स्थापना का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। अपने इस प्रयास में यह आम जनता के लिए कई योजनाएं लागू करता है। भारत में भी समाज के विभिन्न वर्गों के लिए कई कल्याणकारी विकास योजनाएँ और कार्यक्रम चल रहे हैं। ये योजनाएँ एवं कार्यक्रम विशाल प्रशासकीय तंत्र द्वारा कार्यान्वित होती हैं। सरकार के सहयोग के लिए कई स्तरों पर स्थानीय सरकारें रहती हैं। ऐसी योजनाओं के वृहत्त निर्माण प्रक्रिया और कार्यान्वयन की व्यापक समीक्षा द्वारा एक लोकतांत्रिक लोक कल्याणकारी राज्य की रूपरेखा तय होती है।

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आज हमारे देश में ऐसे अनेक कल्याण योजनाएँ और विकास कार्यक्रम चल रहे हैं। योजनाओं की अधिकता के कारण बहुस्तरीय क्रियान्वयन तंत्र का गठन कार्यान्वयन प्रकिया को जटिल बना देता है। कार्यान्वयन में कई समस्याएँ आ खड़ी होती हैं। यही सब देखते हुए ऐसी सभी योजनाओं को समन्वित, एकीकृत करने का सुझाव दिया गया है। यहीं सभी प्रासंगिक पक्षों तथा व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में लेने की जरूरत है जो दीर्घावधि में नियोजन तथा कार्यान्वयन को न केवल सुधार देगा बल्कि इनके लाभों को लक्षित लाभार्थियों तक ज्यादा अच्छे और कुशल तरीके से पहुँचा दे। 

स्थायी परिसम्पत्ति या अधिरचना बनाने की योजनाओं को समन्वित और सुदृढ़ करने की जरूरत है जिससे एक व्यापक कार्यक्रम बन सके। लेकिन संपूर्ण योजना को सही तरीके से उप-विभाजित कर विभिन्न खंड का रूप दे देना चाहिए ताकि हरेक के लिए पूर्णतः आवंटित राशि का प्रतिशत मिल सके ताकि विशिष्ट क्षेत्र पर व्यय हो सके जैसे संपर्कता में सुधार, ग्रामीण आवासीकरण, जलछाजन विकास, अल्पसंख्यक विकास, कृषि के विकास आदि के लिए। यह सरकार द्वारा निर्धारित महत्व के आधार पर हो। 

ये क्षेत्रक अब की तरह ही विभिन्न नामों से पुकारे जा सकते हैं। लेकिन वे एकल कार्यक्रम के लिए अविभाज्य अंग होने चाहिए जो एकीकृत निर्देशावली से प्रेरित हो जो निधि प्रबंधन तथा लेखा प्रबंधन से जुड़े हों। यह एकरूपता बेहतर फंड प्रबंधन तथा कुशल लेखांकन को सुचारू बनाएगी। इससे अनेक योजनाओं के लिए कई लेजर्स और कैशबुक को संभालने से राहत मिल जाती है अगर अभिलेख या बहीखाते क्षेत्रकवार रखे जाते हैं, तो उनमें एकरूपता होनी चाहिए। कई-कई बैंक खातों को खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे लेखांकन अभी से ज्यादा आसान हो जाएगा। बेहतर लेखांकन और वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित हो जाएगा 

उदाहरण के रूप में नरेगा को लिया जा सकता है। नया प्रोग्राम विविध कल्याण एवं विकास योजनाओं के समायोजना तथा सुदृढीकरण के बाद नरेगा कार्यक्रम की तरह ही चलेगा। नरेगा में प्रखंड विकास पदाधिकारी (बी.डी.ओ.), अनुमंडल पदाधिकारी (एस.डी.ओ.) तथा जिलाधिकारी (डी.एम.) की महत्वपूर्ण भूमिका की बात की गई है फिर भी स्थानीय स्वशासन की भूमिका और जिम्मेवारी बहुत अहम और निर्णायक रहेगी क्योंकि यही सूक्ष्मस्तरीय योजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करेगी जैसा कि अभी भी होता है। चूँकि इस योजना में अतिरिक्त श्रमशक्ति का जुगाड़ रखा गया है और अन्य प्रशासनिक जरूरतों का भी, तो नरेगा के कार्यक्रम कार्यान्वयन के स्तर पर बाधित नहीं होते जैसा कि अन्य कार्यक्रमों में होता है जहाँ अनेक मामूली क्रार्यान्यवन बाधाएँ तथा विलम्ब की शिकायत होती है।

इसी तरह नई योजना को नरेगा के मॉडल पर निर्मित होना चाहिए ताकि वे नरेगा के अनुभव से सीख सकें। इसने सामुदायिक संसाधनों के बेहतर निर्माण तथा फंड के बेहतर उपयोग को सुनिश्चित किया है। कार्यान्वयन में पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए जो कई कदम कल्पित किए गए हैं उनसे भ्रष्टाचार तथा लीकेज की संभावना को कम-से-कम कर दिया गया है। अतः नरेगा मॉडल इस नये अवतार के मॉडल के लिए आदर्श ढाँचा सिद्ध होगा। 

लेकिन अभी भी लगता है कि नरेगा के मानदंडों में सुधार तथा परिवर्तन करते हुए नई योजनाओं को नरेगा पर ही ढला हुआ होना चाहिए। इनमें हर घर के लिए न्यूनतम कार्य दिवस निर्धारित हो जिसमें रोजगार मिले, वेतन-सामग्री का एक अनुपात हो, कार्यान्वयन के लिए कार्यक्रमों में विविधता हो, ठेकेदारों के जरिये योजना को पूरा करने की अनुमति हो। लगता है कि इन सारी योजनाओं को एक में मिला देने के बाद, सरकार के पास वित्तीय संसाधनों का प्रभावशाली पूल हो जिससे सालों मांगाधारित रोजगार मिल सके। अतः एक ग्रामीण परिवार के लिए न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की सीमाबद्धता पूर्णतः समाप्त होनी चाहिए।

इसके अलावा, वेतन-सामग्री अनुपात जो अभी 60:40 हे उसे 50:50 कर देना चाहिए। इससे सामग्री-सघन कार्य अभी जिस स्तर पर है, उसी स्तर पर बना रह जाएगा परंतु अन्य योजनाओं के वेतन संभागों के नये क्रार्यक्रम में पूलिंग से पर्याप्त लाभ और छूट मिलेगी ताकि ग्रामीण परिवार को साल-भर रोजगार मिल सके। इसके अलावा अभी नरेगा में यह प्रावधान है कि किसी भी योजना को ठेकेदारों से नहीं करवाया जाए पर इसे बदलकर सभी योजनाओं का लगभग 15% काम ठेकेदारों के जरिये करवाया जाए। जो योजनाएँ ठेकेदारों से करवाने के लिए कह दी जाएँ वे सामग्री-सघन हो (वे जिनमें 8% सामग्री लगे) और ये ऐसी भी होनी चाहिए कि इन्हें त्वरित गति से करना हो ऐसी योजनाओं का चयन का फैसला स्थानीय स्वशासन पर छोड़ दिया जाना चाहिए। 

नरेगा में जो पारदर्शिता के मानदंड हैं वे सुनिश्चित करते हैं कि सामान्य जनता को पूरी सूचना रहे और वह योजनाकरण और कार्यान्वयन के कई स्तरों पर भागीदारी करे और उनसे सूचित रहे और विभिन्न कार्यक्रमों में जो श्रमशक्ति लगी हुई है वे उपलब्ध रहे तथा बेहतर निगरानी तथा नियंत्रण के लिए साथ रखा जा सके। बहुत भारी वर्तमान योजनाएँ लाभार्थी की पहचान खोजती हैं। यह प्रायः पक्षपातकारी राजनीति तथा तनाव का शिकार हो जाती है। जब नई योजना आ जाती है तो लाभार्थी की पहचान आवश्यक नहीं रह जाएगी क्योंकि यह बी.पी.एल. परिवारों तक ही सीमित न होगी, बल्कि समाज के सभी वर्गों तक इसकी पहुँच सकेगी।

हालांकि ग्रामसभा जैसे स्थानीय स्वशासन निकायों द्वारा एक वरीयता क्रम सूची बनायी जा सकती है जिसके आधार पर स्वच्छ शौचालयों या अल्पलागत वाले आवास जैसी निजी यानी व्यक्ति लाभार्थ योजनाएँ बनाई जा सकें। इस आधार पर कार्यक्रमों की संख्या तथा प्रकृति को और भी विविधीकृत किया जा सके ताकि ग्रामीण आवास व्यवस्था, स्वच्छता व्यवस्था, किंचन गार्डन आदि का विकास हो सके जिससे देहात के लोगों की जरूरतें पूरी हो सकें। अत: हमें भविष्य की तैयारी में पहले से भी तैयार हो जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि हम समाज के निचले तबके को कई प्रकार के लाभ या सेवाएँ पहुँचा सकें। स्थानीय स्वशासी सरकार के पास केन्द्रीय योजनाएँ होनी चाहिए जो वरीयता के क्रम में कार्यान्वित हों। इससे समय तथा पैसे की बचत होगी। नतीजतन गाँवों में पूंजि संसाधनों का निर्माण सुधर सके और इस तरह शहर तथा देहात का विभाजन पाटा जा सके। 

ऐसी योजना शहरों तक भी फैलाई जाएगी, यह उस फैसले पर निर्भर करता है जिसमें नगरनिगम की निकायों की योजनाओं को प्रस्तावित योजना में सम्मिलित कर लिया जाए या नहीं। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो यह अच्छा ही होगा। क्योंकि इससे नियम वाले इलाकों के विकास कार्यों को प्रोत्साहन मिलेगा बशर्ते कि एक अनुकूलित कार्यान्वयन योजना को इसी रूप में देखा जा सके। सरकारी योजनाओं के सुदृढीकरण एवं समायोजन का प्रस्ताव विचारणीय होना चाहिए। उसे कार्यरूप देने के पूर्व उस पर पर्याप्त चर्चा तथा वाद-विवाद हो जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि इस तरह की योजना से इस देश में विभिन्न कल्याणकारी तथा विकास योजनाओं को बनाने और लागू करने में क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा।

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