शक संवत क्या है

शक संवत क्या है

शक संवत क्या है

भारत का राष्ट्रीय संवत् : शक संवत् –चीनी एवं भारतीय इतिहास में शक संवत् के प्रचलन का अत्यंत रोचक एवं ऐतिहासिक वर्णन है। यहां बीते 22 मार्च से शक संवत् 1927 आरंभ हो गया है। यह संवत् भारतीय गणतंत्र का अपना राष्ट्रीय संवत् है। 1957 में भारत सरकार ने इसे देश के राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता प्रदान की थी। इसीलिए राजपत्र (गजट), आकाशवाणी और सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगेरियन कैलेंडर के साथ इसका भी प्रयोग किया जाता है। 

शक संवत् को शालिवाहन संवत् भी कहा जाता है और इसका आधार सौर गणना है। इसमें महीनों का नामकरण विक्रमी संवत् के अनुरूप ही किया गया है, लेकिन उनके दिनों का पुनर्निर्धारण किया गया है। इसके प्रथम माह (चैत्र) में 30 दिन हैं, जो अंग्रेजी लीप ईयर 31 दिन हो जाते हैं । बैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण एवं भाद्रपद में 31-31 दिन एवं शेष 6 मास में यानी आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन में 30-30 दिन होते हैं। 

शक संवत् 

ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में उत्तर-पश्चिम भारत में यूनान राज्य का अंत हो गया तथा उसके स्थान पर शक नामक एक अन्य विदेशी जाति ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। शक, जिन्हें भारतीय स्रोतों में सीथियन भी कहा गया है, मध्य एशिया में रहने वाले कबाइली जनजाति के लोग थे, जो कि 165 वर्ष ईसा पूर्व यू-ची नामक कबीले द्वारा अपने मूल स्थान से खदेड़ दिए जाने पर बैक्ट्रिया एवं पार्थिया क्षेत्रों से होते हुए बोलन दर्रे से होकर भारत में आए थे। शक जातियों ने ईसा पूर्व पहली शताब्दी से ईसा बाद की चौथी शताब्दी तक भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर राज किया।

शक शासन मोटे तौर पर ईरान की एकेमेनिड एवं सल्यूसिड शासन प्रणालियों जैसा था। पूरा राज्य अनेक छोटे-छोटे प्रांतों में विभक्त होता था, प्रत्येक प्रांत का राज्यपाल एक सैनिक होता था, जिसे महात्रय कहते थे। शक शासक महाराजा एवं राजाधिराज जैसी गौरवपूर्ण उपाधियां धारण करते थे। बाद में शकों को कुषाण भी कहा जाने लगा। कुजूल कैडफाइसिस, जिसे  कैडफाइसिस प्रथम कहा जाता है, पहले बड़ा शक शासक था। उसके बाद उसका पुत्र विम कैडफाइसिस (कैडफाइसिस द्वितीय) राजगद्दी पर बैठा। उसन कुषाण राज्य को पंजाब और गंगा-यमना के दोआबे तक बढा लिया। इसने सोने तथा तांबे के सिक्के चलाए तथा इन सिक्कों में स्वयं का एक महान राजा एवं शिवभक्त के रूप में उल्लेख किया। उसके कुछ सिक्कों पर नंदी बैल के साथ त्रिशूलधारी शिव का चित्र अंकित है। इसी वंश का तीसरा महान शासक कनिष्क था। उसके शासन काल में कुषाण राजवंश समृद्ध हुआ। उत्तरी भारत के सांस्कृतिक विकास में कुषाण युग की गणना एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में की जाती है। कनिष्क का राज्यारोहण 78 ईस्वी में हुआ। अपने राज्यारोहण के अवसर पर कनिष्क ने ‘शक संवत्’ चलाया। कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिंध का भाग, बैक्ट्रिया एवं पार्थिया के प्रदेश शामिल थे।

अपने चरमोत्कर्ष के समय कनिष्क का साम्राज्य पश्चिमोत्तर में खोतान से पूर्व में बनारस तक एवं उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में सौराष्ट्र एवं मालवा तक फैला हुआ था। कनिष्क के इस विशाल साम्राज्य की राजधानी पुरुष पर यानी आधुनिक पेशावर थी। मथुरा की स्थिति लगभग दूसरी राजधानी जैसी थी। इस प्रकार मौर्य साम्राज्य के पश्चात पहली बार एक विशाल साम्राज्य की स्थापना हुई, जिसमें गंगा, सिंधु एवं ऑक्सस की घाटियां शामिल थीं। सिल्कमार्ग की तीनों महत्वपूर्ण शाखाओं पर इसका नियंत्रण था। उन पश्चिम भारत उस समय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बना आर्थिक दृष्टि से साम्राज्य अत्यंत समृद्ध था। सिक्कों के इतिहास की कार भी यह काल अभूतपूर्व था। 

कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसके शासनकाल में कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति (परिषद) का आयोजन किया गया, जिसमें धर्मशास्त्र एवं सिद्धांत से संबंधित मामलों पर विचार किया गया एवं विद्वानों द्वारा बौद्ध साहित्य पर टीकाएं लिखी गईं, प्रचार कार्य की गति तीव्र हो गई एवं मध्य एशिया तथा चीन में बौद्ध प्रचारक भेजे गए। 

चीनी इतिहास में एक कुषाण राजा का उल्लेख है, जिसने हान वंश की राजकुमारी से विवाह किया था, जो संभवतः कनिष्क ही था। कनिष्क की राजसभा पार्श्व, वसुमित्र, अश्वघोष जैसे बौद्ध दार्शनिकों, चिकित्सक एवं नागार्जुन जैसे प्रकाण्ड विद्वानों की उपस्थिति से सुशोभित थी। उसके शासनकाल में तक्षशिला एवं मथुरा कला तथा संस्कृति के महान केंद्र बन गए। रामायण एवं महाभारत दोनों में यवनों एवं शकों का उल्लेख मिलता है। 

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