राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना: एक समीक्षा 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना: एक समीक्षा 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना: एक समीक्षा (National Rural Employment Guarantee Programme: A Review) 

नरेगा- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना दस से ज्यादा वर्षों से कार्यान्वित हो रही है। इसे देश के सभी जिलों में चलाया जा रहा है। नरेगा राज्य-संचालित कार्यक्रमों में सबसे रोचक कार्यक्रम रहा है। एक सफल योजना साबित होने के कारण यह बहुत उम्मीदें जगा रहा है।

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इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन संबंधी कई समस्याओं तथा इसके कुछ पक्षों की आलोचना के बावजूद यह एक ध्वजवाही योजना बन गया है जिससे देश के बेरोजगार जनों तक सरकारी लाभ पहुँचाने का मुख्य माध्यम प्राप्त हो गया है। देहात में लोगों के जीवन स्तर में आई वृद्धि सहज ही दृष्टिगोचर है। इसके अलावा इस योजना से विशालकाय ढांचा खड़ा हो पाया है। लोगों की क्रयशक्ति बढ़ने का परिणाम है कि अर्थव्यवस्था पर प्रकारांतर से सुखद प्रभाव पड़ा 

लेकिन इस योजना में कुछ ढांचागत तथा अवधारणागत सुधार की जरूरत है ताकि यह योजना अपने उद्देश्यों को बेहतर ढंग से प्राप्त कर सके। वर्षों से क्रियान्वयन के जरिये यह अनुभवगत ज्ञान प्राप्त हुआ है। यह अच्छी तरह ज्ञात है कि देश के सभी जिलों में इस योजना से समान लाभ नहीं मिल पाये हैं क्योंकि योजना की उपलब्धि प्रत्येक राज्य में एक जैसी नहीं रही है। इतना ही नहीं, कोई भी एक जिले में सभी कार्डधारियों को 100 दिन के रोजगार का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सका है, हालांकि इसके लिए आवंटित राशि की कभी कमी नहीं रही।

कहा जाता है कि एक आवश्यकता जनित योजना होने के कारण नरेगा में रोजगार के इच्छुकों को रोजगार देने पर जोर देना चाहिए, न कि आवंटित राशि के व्यय पर। तथ्य यही है कि अभी भी देश में सैकड़ों-हजारों ऐसे लोग है जो रोजगार की तलाश में हैं। लगता है कि कार्यान्वयन एजेंसियाँ यानी जिला प्रशासन तथा कई लाइन विभागों को सक्रिय होने की जरूरत है ताकि जरूरतमंद लोगों तक बेहतर सूचना-शिक्षा-जागरूकता कार्यक्रमों के जरिये पहुँचाया जा सके। आज भी बहुत लोग नहीं जानते कि नरेगा के अंतर्गत वे अधिकारपूर्वक रोजगार मांग सकते है और अगर रोजगार न हो तो बेरोजगारी भत्ता की मांग कर सकते है, अगर 15 दिनों के अंदर उन्हें काम न मिल सके तो।

आवंटित राशि के मामले में यह देखा गया है कि अन्य राज्यों की तुलना में कुछ राज्य राशि का बड़ा हिस्सा काम में ला पाये है। इस तरह राशि के व्यय के मामले में एक क्षेत्रीय भिन्नता भी दिखलाई पड़ती है। कई राज्य जैसे राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा केरल ने आवंटित राशि का सदुपयोग किया है और कई कार्यक्रमों को क्रियान्वित किया है। इसका एक और परिणाम हुआ है कि इन राज्यों में स्थानीय जनों की क्रयशक्ति काफी बढ़ गई है। कई अन्य राज्य भी बहुत पीछे नहीं हैं। इनमें एक पश्चिम बंगाल है।

अगर इन सबके बावजूद बहुत लोग नरेगा में काम करने के लिए आगे नहीं आ रहे तो इसका कारण है कि निजी क्षेत्रों में नरेगा की तुलना में ऊँची मजदूरी पर काम उपलब्ध है। इससे आवंटित राशि का पूरा-पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। यह व्याख्या पिछड़े राज्यों के शहरी इलाकों या अपेक्षाकृत विकसित राज्यों के लिए समर्थनीय हो सकती है पर निश्चित रूप से बिहार, झारखंड, उड़ीसा या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के ग्रामीण तथा अविकसित क्षेत्रों के लिए समर्थनीय नहीं है। इन राज्यों में निश्चित रूप से अब तक जो भी कर पाये हैं, उसकी तुलना में आवंटित राशि का अधिक उपयोग निश्चित रूप से करना चाहिए था। इससे ज्यादा रोजगार सृजित होते।

ऐसा लगता है कि अब जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था शत प्रतिशत से अधिक के द्रुत दर से वृद्धि कर रही है, तो लोग नरेगा के डेढ़-दो सौ के न्यूनतम मजदूरी दर पर काम की बजाय ज्यादा आकर्षक बाजार मजदूरी दर की ओर भागेंगे। चूँकि कोई भी राज्य अपने नागरिकों को 100 दिनों की रोजगार नहीं मुहैया करा पाया है, तो यह बेहद जरुरी है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक सुधार के कदम उठाये जाएँ।

यह जानकर कि गाँव में मांगने पर रोजगार मिल जाएगा, तो दैनिक मजदूरी वाले शहरी क्षेत्रों की ओर मुँह नहीं करेंगे जिससे शहर की ओर प्रवसन कम होगा। इससे शहरों की बनावट तथा सुविधाओं पर दबाव भी कम होता। परिणामतः शहरी मजदूरों के लिए पर्याप्त रोजगार होगा। चूँकि शहरों में रोजगार के लिए मारामारी कम होगी तो संभावना है कि शहरी मजदूरों को ऊँची मजदूरी तथा सुविधाएँ मिलेंगी। इससे यह भी परिणाम निकलता है कि सरकार को शहरों के लिए ऐसी रोजगार गारंटी योजना लाने की जरूरत कम हो जाती है। 

इस कार्यक्रम का लक्ष्य ग्रामीण इलाकों में रोजगार गारंटी के द्वारा शहर की ओर पलायन को रोकना ही नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में लाभकारी संपदा भी बनाना है। इसलिए सरकार को चाहिये कि वह न्यूनतम वेतन में समय-समय पर वृद्धि करती रहे, साथ ही शहरी क्षेत्रों के ऊँची मजदूरी वाली नौकरियों का आकर्षण कम करे। अगर ऐसा नहीं होता तो लोग नरेगा में काम करने के लिए गाँव में रुकने के लिए प्रोत्साहित नहीं हो पायेंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में मूल-भूत सुविधाओं तथा नागरिक संरचना का निर्माण करने का अवसर भी खो देगी। 

बहुत लोग मानते हैं कि नरेगा एक मांग-प्रेरित योजना है, इसलिए काम के इच्छुक लोगों को सरकार द्वारा तय की गई दर पर काम करने के लिए तैयार रहना चाहिये। ये दर प्रतिदिन एक परिवार का पोषण करने के लिए न्यूनतम मजदूरी के रूप में पर्याप्त है। अगर लोगों को बाहर ऊँची मजदूरी पर काम मिल रहा हो, तो वे उसे आगे बढ़कर करें। इससे सरकार का पैसा बचेगा। जो कि अन्य सरकारी कल्याण कार्यक्रमों में बेहतर तरीके से लगाया जा सकता है। इनमें नरेगा सहित कई कार्यक्रम हैं। इससे सरकार और अधिक संसाधन सघन कार्यक्रम चला सकेगी। 

बरसात के मौसम तथा अन्य व्यस्तता के मौसमों में जो राज्य-राज्य में भिन्न हो सकते हैं, लोगों को ग्रामीण रोजगार से ही ऊँची मजदूरी मिल जाती हैं। नतीजतन रोज-रोज की मजदूरी देहातों में कम हो रही है। नतीजतन नरेगा की राशि का पूरा उपयोग नहीं हो रहा। पर यह कहना होगा नरेगा आवंटन का कम या अधिक व्यय के पैमाने से कार्यक्रम की सफलता को नहीं मापना चाहिए। आवंटन का कम उपयोग का यह भी अर्थ हो सकता है कि उस विशेष इलाके में काम की मांग कम है। इसे तो विकास का एक सूचक माना जाना चाहिये, क्योंकि इसका मतलब है कि इच्छुक लोगों को अन्यत्र ऊँचे दरों पर काम मिल रहा है। इससे रोजगार मुहैया कराने का सरकार पर बोझ कम हो जाता है।

हालांकि यह देखकर भी आश्चर्य होता है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग कहीं ज्यादा हैं तो वहाँ भी काम की मांग काफी कम है और वहाँ नरेगा के तहत काम की मांग अभी भी नहीं की जा रही। आश्चर्य लगता है कि ऐसे लोग बिना काम के निठल्ले बैठे रहते हैं, जबकि नरेगा में भरपूर कार्य अवसर पैदा किये जा सकते है। उन्हें न केवल नरेगा से काम मिलेगा बल्कि गाँव में उत्पादक संसाधन खड़े करने का मौका मिलेगा। इससे गाँव के लोगों का मूल जीवन-स्तर बेहतर होगा। 

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