पौराणिक प्रेम कहानियाँ-नल और दमयंती की पौराणिक प्रेम कहानी

नल दमयंती की पौराणिक प्रेम कहानी

पौराणिक प्रेम कहानियाँ:नल -दमयंती की पौराणिक प्रेम कहानी

बहुत प्राचीन समय की बात है। तब विदर्भ देश में राजा भीम राज किया करते थे। वे बहुत पराक्रमी और सर्वगुण-सम्पन्न थे, किंतु एक दुःख के कारण वे सदैव । व्यथित रहते थे। उनके कोई संतान न थी। 

एक दिन उनके यहां दमन नाम के एक महर्षि पधारे। राजा और रानी ने महर्षि की भरपूर सेवा-सुश्रूषा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारे यहां एक कन्या तथा तीन पुत्र उत्पन्न होंगे। महर्षि के वरदान. स्वरूप योग-काल आने पर राजा भीम के घर में एक कन्या और तीन पुत्र उत्पन्न हुए। राजा ने कन्या का नाम दमयंती तथा पुत्रों के नाम दम, दान्त एवं दमन रखे। दमयंती रूप, तेज और यश में तीनों लोकों में अद्वितीय थी। 

उधर, निषध देश में उन दिनों राजा वीरसेन शासन किया करते थे। उनके दो पुत्र थे, नल एवं पुष्कर। राजा के ये दोनों पुत्र अलग-अलग रानियों से उत्पन्न हुए थे। दोनों में नल बड़े थे, अतः राजा वीरसेन ने उन्हें ही राजगद्दी का अधिकारी बनाया। इस कारण छोटे भाई पुष्कर के मन में उनके प्रति विद्वेष की भावना पैदा हो गई। वृद्धावस्था आने पर जब राजा वीरसेन के मन में वैराग्य की भावना पैदा हुई तो उन्होंने राजमुकुट अपने बड़े बेटे नल को पहनाकर वन की ओर प्रस्थान कर दिया। राज्य चलाने का दायित्व नल के जिम्मे आ गया, जिसे उन्होंने बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर लिया। वे बड़ी कुशलता के साथ राज्य का संचालन करने लगे। 

राजा नल जितने धर्म-परायण और पराक्रमी थे, उतने ही सुंदर भी थे। उन्होंने वेद और शास्त्रों का अध्ययन किया था और वे संसार की समस्त कलाओं में पारंगत थे। उन्हें पशु-पक्षियों की बोली समझने में भी महारत हासिल थी। 

एक दिन वे राजमहल के उपवन में टहल रहे थे, तभी उनकी नजर अपने उपवन में बने छोटे-से सरोवर के निकट घूमते हुए कुछ हंसों पर पड़ी। वे हंस बहुत ही सुंदर थे। राजा नल उन्हें पकड़ने के लिए लालायित हो उठे। वे दबे पांव उनके निकट पहंचे। बाकी के सारे हंस तो उड़ गए, परंतु एक हंस को उन्होंने पकड़ लिया। 

उस हंस के पंख सोने के थे। राजा नल उसे देखकर आश्चर्यचकित हो उठे, तभी वह हंस मनुष्यों की भाषा में बोल उठा-‘हे राजन! मुझे मारना मत, मैं तुम्हारा बहुत प्रिय कार्य करूंगा।’ 

राजा नल तो पहले से ही हंस के सोने के पंखों को देखकर चकित थे। अब उसे मनुष्यों की भाषा में बोलते देखकर और भी चकित हो उठे। उन्होंने हंस से पूछा- ‘बताओ तो, तुम मेरा क्या प्रिय कार्य करोगे?’ 

हंस बोला-‘हे राजन! हम हंस दूर-दूर के देशों की यात्रा करते रहते हैं। मैंने इस संसार में आप जैसा सुंदर और शोभनीय पुरुष कोई दूसरा नहीं देखा। इसी प्रकार मैंने विदर्भ के राजा भीम की पुत्री दमयंती जैसी रूपवती राजकुमारी कहीं नहीं देखी। मुझे ऐसा लगता है कि विधाता ने आप दोनों को एक-दूसरे के लिए ही बनाया है, लेकिन जिस प्रकार आप राजकुमारी दमयंती के रूप और गुणों से परिचित नहीं हैं, उसी प्रकार राजकन्या दमयंती भी आपके रूप और गुणों से अपरिचित है। यदि आप मुझे मुक्त कर दें तो मैं यहां से सीधा विदर्भ देश की राजधानी में राजकन्या दमयंती के महल के उद्यान में जाऊंगा और सारी बातें बताने के बाद उसके सम्मुख आपके रूप और गुणों की इस प्रकार प्रशंसा करूंगा कि राजकुमारी दमयंती इतनी प्रभावित हो जाए कि आपको देखे बिना ही अपने होने वाले पति के रूप में आपका वरण कर ले। 

‘यदि ऐसा है तो मैं तुम्हें मुक्त करता हूं।’ राजा नल ने हंस को छोड़ते हुए कहा- ‘मेरा परिचय देने के बाद राजकुमारी दमयंती को यह भी संदेश देना कि तुमसे उसके रूप और गुणों की प्रशंसा सुनकर मेरे मन में उसके प्रति प्रेम जाग उठा है और मैंने अपनी जीवन-संगिनी के रूप में उसका वरण कर लिया है।’ 

आपका यह संदेश मैं राजकुमारी दमयंती तक अवश्य पहुंचा दूंगा।’ हंस ने कहा और अपने साथियों के साथ उड़ता हुआ विदर्भ देश की दिशा में चला गया।

हंस अपने साथियों सहित राजकुमारी दमयंती के उद्यान में उतरा। दमयंती उस समय अपनी सहेलियों के साथ उद्यान में टहल रही थी। वह अपने होने वाले पति के विषय में सोच रही थी।

 उसे पता चला गया था कि निकट भविष्य में ही उसके विवाह के लिए उसके पिता एक स्वयंवर का आयोजन करने वाले हैं। यद्यपि स्वयंवर में अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का उसे पूर्ण अधिकार था, लेकिन यह सोचकर वह चिंतित थी कि चारणों और भाटों द्वारा सुनी गई प्रशस्ति और शारीरिक सौंदर्य तथा सौष्ठव को देखकर वह जिस व्यक्ति का वरण करेगी, क्या वह व्यक्ति गुणवान और शीलनिष्ठ भी होगा। 

दमयंती के उद्यान में पहुंचकर हंस निद्वंद्व भाव से इधर-उधर घूमने लगे। ढेर-सारे सुंदर राजहंसों को अपने उपवन में देखकर दमयंती और उसकी सखियां आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगीं, तभी उनमें से एक हंस फुदकता हुआ दमयंती के समीप आ गया। 

राजकुमारी के समीप पहुंचकर हंस ने उससे कहा–‘राजकुमारी दमयंती! इस संपूर्ण संसार में तुम्हारे जैसी रूप, गुण और कलाओं में पारंगत कोई और स्त्री नहीं है। ठीक इसी प्रकार निषध देश के राजा नल जैसा सर्वगुण-संपन्न पुरुष इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है।’ 

नल दमयंती की पौराणिक प्रेम कहानी

राजा नल की तरह राजकुमारी दमयंती भी एक हंस को मनुष्यों की बोली में बोलते देखकर विस्मित रह गई। 

फिर उसे लगा कि कुछ देर पहले वह जिस चिंता में घुली जा रही थी, अब वह चिंता कम होती जा रही है। 

कुछ सोचकर उसने एक लंबी सांस ली और हंस से बोली-‘लेकिल हंस! यह तो आवश्यक नहीं कि महाराज नल स्वयं स्वयंवर में पधारें। इस प्रकार के निमंत्रण तो राजाओं के पास पहुंचते ही रहते हैं। वे प्रत्येक स्वयंवर में जाते भी नहीं हैं। यदि वे न आए तो मैं उनका किस प्रकार वरण कर सकूँगी?’ 

यह सुनकर हंस ने दमयंती को आश्वस्त किया-‘राजकुमारी दमयंती, तुम चिंता न करो। मैंने तुम्हारे रूप-सौंदर्य और गुणों से महाराज नल को भली-भांति परिचित करा दिया है। बिना देखे ही वे तुम्हें प्रेम करने लगे हैं और उन्होंने अपनी पत्नी के रूप में तुम्हारा वरण कर लिया है। मैं तुम्हें यहां यही संदेश देने के लिए आया हूं, ताकि तुम दोनों को सुयोग्य और मनोवांछित जीवन-साथी मिल सके।’ 

 ‘मैं तुम्हें वचन देती हूं कि स्वयंवर में राजा नल के गले में ही वर माला डालूंगी और यदि वे किसी कारणवश स्वयंवर में नहीं आ सके, तब मेरी वरमाला किसी अन्य राजा के गले में नहीं पड़ेगी। 

राजकुमारी दमयंती के मुख से उसके उद्गार सुनकर हंस संतुष्ट हो गया और वह अपने साथियों सहित आकाश मार्ग से उत्तर दिशा की ओर उड़ गया। 

कुछ दिन बाद विदर्भ के राजा भीम ने स्वयंवर की तिथि निश्चित कर दी और सब राजाओं को स्वयंवर में आने का निमंत्रण भेज दिया। निश्चित तिथि पर राजा लोग अपने-अपने हाथी-घोड़ों और रथों पर सवार होकर विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर में पहुंचने लगे। 

राजा भीम ने सब राजाओं का यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया और उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी। 

इसी बीच नारदजी घूमते हुए इंद्रलोक में पहुंचे और देवराज इंद्र तथा अन्य देवताओं को दमयंती के स्वयंवर का समाचार दिया। देवता भी नारदजी की बात सुनकर स्वयंवर में जाने के लिए तैयार हुए और अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर विदर्भ राज्य में जाने के लिए चल पड़े। इन देवताओं में देवेन्द्र के अतिरिक्त यम, अग्नि एवं वरुण भी थे। 

आकाश मार्ग से गुजरते हुए देवताओं की दृष्टि रथ में सवार राजा नल पर पड़ी। वे जानते थे कि मानव होते हुए भी राजा नल उनसे कहीं श्रेष्ठ हैं। अपने मार्ग से नल को हटाने के लिए, तब उन कुटिल देवताओं ने तुरंत एक योजना बना डाली। वे अपने विमानों को छोड़कर पृथ्वी पर आकर राजा नल के मार्ग में खड़े हो गए। जब राजा नल का रथ उनके समीप पहुंचा, तो नल ने उन्हें पहचानकर अपना रथ रोक लिया और रथ से नीचे उतरकर उन्हें श्रद्धा और आदर के साथ प्रणाम किया। 

हे राजन! हमने देवलोक में आपकी कीर्ति सुनी है। आप सत्यवादी और धर्म-परायण हैं। हम सभी आपके मानवोचित गुणों से भी भली-भांति परिचित हैं। हम जानते हैं कि जब आप एक बार किसी को वचन देते हैं, तो उसे अवश्य पूरा करते हैं। क्या आप हमारी भी एक याचना को पूरी करेंगे?’ 

‘आदेश दीजिए देवराज इंद्र!’ नल ने विनम्रतापूर्वक कहा- ‘मैं प्राणपण से आपके आदेश का पालन करूंगा।’ 

देवराज इंद्र ने तब अपने तीनों साथियों का परिचय देकर कहा-‘हम लोग निषध नरेश भीम की कन्या के स्वयंवर में भाग लेने जा रहे हैं। हमारी इच्छा है कि राजकुमारी दमयंती हम चारों में से किसी एक का वरण करे। हम आपके द्वारा अपनी यह इच्छा राजकुमारी तक पहुंचाना चाहते हैं।’ 

 लेकिन देवराज! मैं स्वयं भी तो राजकुमारी दमयंती से विवाह की इच्छा लेकर कुंडिनपुर जा रहा हूं। ऐसी स्थिति में मैं आपके आदेश का पालन कैसे कर सकता हूं।’ नल ने विवशता जताई। 

लेकिन आप अभी-अभी तो हमें वचन दे चुके हैं, हमारे हर आदेश का पालन करने को।’ वरुण ने कहा। 

राजा नल सोच में पड़ गए, लेकिन वे वचन दे चुके थे, अतः उन्होंने इंद्र से कहा-‘देवराज इंद्र ! दमयंती का महल बहुत बड़ा है। बाहर प्रहरी होंगे और महल के अंदर उसकी सेविकाएं तथा सखियां । ऐसी स्थिति में मैं महल में प्रवेश कैसे कर पाऊंगा?’ 

‘उसकी चिंता आप न करें।’ इंद्र ने कहा- ‘मैं आपको अपनी अदृश्य शक्ति प्रदान किए देता हूं। इससे आप तो सबको देख सकेंगे, किंतु आपको कोई नहीं देख सकेगा। कोई व्यक्ति तभी आपको देख पाएगा जब आप ऐसा चाहेंगे।’ 

राजा नल सहमत हो गए और देवेंद्र से प्राप्त अदृश्य शक्ति के द्वारा वे बड़ी सुगमता के साथ राजकुमारी के अंतःपुर में प्रवेश कर गए। किसी ने उन्हें न तो देखा और न ही टोका। 

राजकुमारी दमयंती के समक्ष पहुंचकर राजा नल प्रकट हो गए। उनके इस तरह अचानक प्रकट हो जाने से राजकुमारी पलभर के लिए नेत्र फाड़े विस्मित रह गई। उसने आश्चर्यभरे स्वर में पूछा-‘श्रीमान! आप कौन हैं और इतने प्रहरियों के रहते हुए मेरे अंतःपुर में कैसे आ गए ?’ 

नल ने कहा-‘राजकुमारी! मैं निषध देश का राजा नल हूं, लेकिन इस समय मैं देवराज इंद्र तथा लोकपाल यम, वरुण और अग्नि का दूत बनकर आपके सम्मुख प्रस्तुत हुआ हूं।’ 

नल का नाम सुनते ही दमयंती के हर्ष की सीमा न रही। उसने नल को सम्मानपूर्वक नमन किया और बोली-‘महाराज! मैं हंस के द्वारा आपके संबंध में बहुत कुछ जान गई हूं। मैं मन-ही-मन निश्चय कर चुकी हूं कि स्वयंवर में पति के रूप में मैं आपके ही गले में वरमाला डालूंगी।’ 

‘नहीं राजकुमारी! मैं तो एक सामान्य-सा मानव हूं।’ नल ने कहा- मैं तो देवताओं के समक्ष एक धूल के कण के बराबर भी नहीं हूं। देवताओं ने मुझे तुम्हारे पास यह संदेश देकर भेजा है कि तुम स्वयंवर में देवराज इंद्र, अग्नि, वरुण एवं यम में से ही किसी एक का वरण करो।’ 

‘नहीं महाराज!’ दमयंती ने निश्चयात्मक स्वर में कहा-‘यह असंभव है। मैं एक आर्य कन्या हूं और कोई आर्य कन्या जब एक बार हृदय से किसी को पति रूप में स्वीकार कर लेती है, तो उसके होते हुए किसी अन्य पुरुष की ओर देखना तक उसके लिए पाप बन जाता है। मैंने पूर्ण निश्चय कर लिया है कि स्वयंवर में वरमाला सिर्फ आपके ही गले में डालूंगी।’ 

‘राजकुमारी! मैं देवताओं का दूत हूं। यदि तुमने मेरा वरण किया तो क्या यह धर्म के प्रतिकूल नहीं होगा?’ नल ने कहा। 

 नहीं महाराज!’ दमयंती ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया-‘आपने जो दूत कार्य करना था, वह आप कर चुके। आपने देवताओं का संदेश मुझ तक पहुंचाने का वचन दिया था, सो आपने मुझे पहुंचा दिया। आपने धर्मपूर्वक अपने वचन का पालन कर दिया है, लेकिन आपने देवताओं को यह वचन थोड़े ही दिया है कि आप स्वयंवर में हिस्सा नहीं लेंगे। आप स्वतंत्र हैं और मैं भी स्वतंत्र हूं कि अपने पति के रूप में किसका चयन करूं, किसका नहीं। आप स्वयंवर में अवश्य पधारें। मैं उन देवताओं की उपस्थिति में ही आपका वरण करूंगी। इससे आपकी मर्यादा पर तनिक भी आंच नहीं आएगी। 

निर्धारित तिथि को स्वयंवर का आयोजन किया गया, तभी नारदजी घूमते-घूमते वहां आ पहुंचे। उन्होंने इंद्र को बताया कि दमयंती ने मन-ही-मन राजा नल को पति रूप में वरण करने का निश्चय कर लिया है और आपका संदेश पाकर भी वह अपने निश्चय पर अटल है। उन्होंने देवताओं को समझाया कि वे वापस इंद्रलोक लौट जाएं, जिससे कि वे अपमानित होने से बच जाएं। 

सुनकर देवराज बोले-‘हे मुनिवर! जब यहां तक आ ही गए हैं, तो अब स्वयंवर में आप अवश्य चलेंगे। इस प्रकार राजकुमारी दमयंती के प्रेम की परीक्षा भी कर लेंगे।

तब इंद्र आदि चारों देवताओं ने राजा नल का रूप धारण कर लिया और स्वयंवर के आयोजन-कक्ष में जा बैठे। राजा भीम के आदेशानुसार स्वयंवर की घोषणा हुई और दमयंती अपने हाथों में वरमाला लिए अपनी सखियों के साथ आयोजन-कक्ष में पहुंच गई। वह एक-एक राजा के सामने से गुजरने लगी। जिस भी राजा के समीप वह पहुंचती, चारण और भाट उस राजा की विरुदावली का बखान करने लगते थे। धीरे-धीरे वह एक ऐसे स्थान पर पहुंच गई, जहां नल की आकृति में पांच व्यक्ति बैठे हुए थे। दमयंती अंतःपुर में नल को पहले ही देख चुकी थी, लेकिन उसी की आकृति के पांच व्यक्तियों को सभा-स्थल मैं बैठे देखकर वह भ्रमित हो उठी। विवश होकर उसने मन-ही-मन देवताओं का स्मरण करते हुए कहा-‘हे देवताओ! यदि मैंने सच्चे मन से राजा नल से प्रेम किया है और उन्हें पति रूप में स्वीकार कर लिया है, तो मुझे ऐसी शक्ति दीजिए, जिससे मैं वास्तविक राजा नल को वरमाला पहना सकू।’ 

राजकुमारी दमयंती की इस मौन प्रार्थना को सुनकर देवराज इंद्र को बहुत प्रसन्नता हुई। तब वह स्वयं तीनों लोकपाल अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए। राजकुमारी दमयंती ने बिना हिचक के वरमाला नल के गले में पहना दी। देवराज इंद्र ने उठकर राजा नल और दमयंती को आशीर्वाद दिया और बिना मांगे ही उन्हें दो वरदान दिए। इसी प्रकार यम, अग्नि एवं वरुण ने भी उन्हें दो-दो वरदान दिए। 

वरदान देकर चारों देव देवलोक को चले गए। शुभ तिथि में राजा नल और दमयंती का विवाह संपन्न हो गया। 

जब देवराज इंद्र तीनों लोकपालों के साथ देवलोक को लौट रहे थे, तो मार्ग में उन्होंने कलियुग को आते देखा। उन्होंने उससे पूछा कि वह कहां जा रहा है? 

कलियुग ने तब बताया कि वह राजकुमारी दमयंती के स्वयंवर में जा रहा है, क्योंकि उसने उसके विषय में ऐसा सुना है कि वह देवताओं और अप्सराओं से भी अधिक सुंदर है। 

कलियुग की बात सुनकर इंद्र ने कहा-‘हे कलियुग! अब तुम्हारा वहां जाना व्यर्थ है, क्योंकि राजकुमारी का तो विवाह हो चुका है। हम लोग उसके स्वयंवर से ही आ रहे हैं। उसने निषध देश के राजा नल को पति रूप में चुन लिया है।’ 

देवराज के यह कहने पर कलियुग ने क्रोधित होकर कहा-‘देवताओं के होते हुए भी दमयंती ने एक साधारण-से मानव को चुनकर देवताओं का घोर अपमान किया है। मैं इस अपराध के लिए उसे क्षमा नहीं करूंगा। दमयंती के साथ-साथ अब राजा नल को भी इसका दंड भोगना पड़ेगा। मैं उन्हें सुख से जीवन व्यतीत नहीं करने दूंगा।’ 

देवराज इंद्र ने कलियुग को बहुत समझाया, उससे क्रोध त्याग देने की प्रार्थना की, किंतु वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। वह देवराज इंद्र का अनुरोध ठुकराकर निषध देश की राजधानी की ओर चल पड़ा। वहां पहुंचकर वह इस ताक में रहने लगा कि कब राजा नल धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करें और कब उसे उनके शरीर में प्रवेश पाने का अवसर मिले। 

इसी प्रतीक्षा में बारह वर्ष बीत गए। राजा नल धर्म के आचरण के अनुसार राज्य का संचालन करते रहे। इस बीच उनके यहां दो संतान भी उत्पन्न हो गईं-पुत्र इंद्रसेन एवं पुत्री इंद्रसेना। 

एक दिन राजकार्य में राजा को देरी हो गई। उन्होंने मूत्र त्यागने के पश्चात अपने हाथ नहीं धोए और संध्यावंदन करने के लिए बैठ गए। 

बस, फिर क्या था, कलियुग को अवसर मिल गया। उसने राजा नल के शरीर में प्रवेश कर लिया। 

राजा नल के शरीर में प्रविष्ट होकर कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया। फिर वह दूसरे रूप में पुष्कर के पास पहुंचा और उससे कहा- ‘तुम राजा नल के साथ जुआ खेलो। मैं तुम्हारी सहायता करूंगा। जुए में तुम राजा का राजपाट जीत जाओगे और इस प्रकार निषध देश का राजा बनने का तुम्हारा अधूरा स्वप्न पूर्ण हो जाएगा।’ पुष्कर ने उसकी बात मानकर अपने पासे उठा लिए और राजभवन की ओर चल पड़ा। 

राजभवन में पहुंचकर पुष्कर ने बहुत ही विनम्रतापूर्वक नल को जुआ खेलने के लिए आमंत्रित किया। राजा नल ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया, क्योंकि कलियुग उन पर पहले ही प्रभाव डाल चुका था। दमयंती ने उन्हें द्यूत-क्रीड़ा न खेलने के लिए बार-बार मना किया, किंतु कलियुग का प्रभाव पड़ने से राजा नल ने उसका आग्रह स्वीकार नहीं किया। दोनों जुआ खेलने लगे। कलियुग के प्रभाव से राजा नल के पासे उल्टे पड़ने लगे। पुष्कर लगातार जीतता गया। परिणाम यह निकला कि राजा नल जुए में अपना सर्वस्व हार बैठे। 

दमयंती ने अपने पति को हारते देखा तो उसने अपने विश्वस्त सारथि वार्ष्णेय को बुलाकर अपने दोनों बच्चे अपने पिता के पास कुंडिनपुर भेज दिए। साथ ही वार्ष्णेय को उसने यह भी कह दिया कि वह बच्चों को कुंडिनपुर में छोड़कर चाहे तो वहीं राजमहल में कार्य कर ले और अगर उसकी इच्छा किसी अन्य राजा के पास काम करने की हो, तो वह वहां काम कर सकता है। सारथि वार्ष्णेय ने दमयंती के आदेशानुसार राजकुमार इंद्रसेन और राजकुमारी इंद्रसेना को उसके नाना के पास ले जाकर सौंप दिया और स्वयं अयोध्या के राजा के यहां सारथि का कार्य करने चला गया। 

जुए में पराजित हो जाने के बाद राजा नल और दमयंती ने अपने आभूषण और राजसी वस्त्र उतारकर पुष्कर को सौंप दिए और केवल एक वस्त्र पहनकर राजमहल से बाहर निकल आए। 

जब निषध देश पर पुष्कर का अधिकार हो गया तो उसने सिंहासन पर बैठते ही पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि कोई भी प्रजाजन नल और दमयंती को आश्रय न दे, जो कोई ऐसा करेगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। इतना ही नहीं, जो इन दोनों से तनिक भी सहानुभूति प्रकट करेगा, उसे भी मृत्युदंड दिया जाएगा। 

पुष्कर के इस आदेश को सुनकर निषध देश की समूची प्रजा भयभीत हो गई। मृत्युदंड के भय से किसी ने भी राजा नल और दमयंती को आश्रय नहीं दिया, बल्कि जब वे राजमहल से निकलकर वन की ओर जा रहे थे, तो उन्हें देखकर नगरवासियों ने अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिए। 

भूखे-प्यासे नल और दमयंती कई दिनों तक पैदल चलते रहे। एक वन में पहुंचकर वे भूख-प्यास से निढाल होकर एक वृक्ष की छाया में बैठ गए, तभी नल की निगाह वहां जमीन पर दाना चुगते हुए कुछ पक्षियों पर पड़ी। 

उन्होंने अपना वस्त्र उतारकर उन पक्षियों की ओर फेंका, जिससे कि कुछ पक्षी पकड़कर वे अपने पेट की आग बुझा सकें, लेकिन हाय रे दुर्भाग्य! पक्षी तो हाथ आए नहीं, बल्कि वे नल का वस्त्र भी अपने साथ उड़ा ले गए। नल और दमयंती का मन इस घटना से और भी दुखी हो उठा। नल ने दमयंती की आधी साड़ी लपेट ली और दोनों एक ही वस्त्र लपेटकर आगे बढ़ने लगे। 

राजभवनों में पली-बढ़ी राजकुमारी ने जीवन में कभी कठिनाइयां देखी ही नहीं थीं। अब जब उसे कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ रहा था, तो भूख-प्यास एवं थकान ने जैसे उसके पैरों के गति ही छीन ली थी। जब वह थकान के कारण निढाल हो गई तो एक चौराहे पर जाकर बैठ गई। नल ने उससे कहा-‘रानी! यह दाईं ओर का रास्ता विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर जाता है। सीधा रास्ता है। तुम किसी से पूछे बिना, थोड़े ही दिनों में अपने माता-पिता के पास पहुंच जाओगी। तुम्हारे दोनों बालक भी वहीं हैं। तुम वन के दुखों और भूख-प्यास को सहन नहीं कर पाओगी, इसलिए मेरा कहना मानो और कुंडिनपुर चली जाओ।’ नल ने दमयंती को समझाते हुए कहा- ‘मैं पुरुष हूं और एक राजा होने के कारण मुझे हर प्रकार का दुख सहने की शिक्षा दी गई है। मैंने राजा होते हुए भी हर प्रकार के संकट का सामना करना सीखा है। मैं इन दुखों को आसानी से बर्दाश्त कर लूंगा।’ 

दमयंती ने दृढ़ता से इंकार में सिर हिलाया और बोली-‘नहीं स्वामी! संकट की इन घड़ियों में मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। पति तो वन में दुख और भूख-प्यास सहन करता हुआ भटकता फिरे और पत्नी राजभवन जाकर सुख से रहे, यह पत्नी का धर्म नहीं है। मेरा जीवन और मरण अब आपके साथ ही है। मैं आपको छोड़कर कहीं दूसरे स्थान पर जाने के विषय में सोच भी नहीं सकती।’ 

राजा नल ने दमयंती को बहुत समझाया, लेकिन दमयंती अपनी जिद पर अड़ी रही। निराश होकर नल उसी वृक्ष के नीचे लेट गए। थकी-हारी दमयंती भी लेट गई। राजा नल की तो चिंता के कारण पलकें तक नहीं झपकीं, लेकिन थकी होने के कारण दमयंती गहरी निद्रा में सो गई। 

जब राजा नल ने दमयंती को सोते देखा तो वे उठकर बैठ गए। उन्होंने सोचा कि दमयंती उन्हें छोड़कर अपने माता-पिता के पास नहीं जाएगी, इसलिए मुझे ही इसे सोती हुई छोड़कर यहां से चल देना चाहिए। अकेली रह जाने पर इसे विवश होकर कुंडिनपुर जाना ही पड़ेगा। यह निश्चय करके उन्होंने बिना कोई आवाज किए दमयंती की आधी साड़ी फाड़कर लपेट ली और उसे वृक्ष के नीचे अकेला सोता छोड़ बड़ी तेजी से एक ओर चल पड़े। 

अगले दिन सुबह के समय दमयंती की नींद टूटी। उसने आस-पास नजरें घुमाईं, लेकिन नल उसे कहीं दिखाई नहीं दिए। उसने सोचा कि शायद भोजन-पानी की तलाश में इधर-उधर निकल गए होंगे, शीघ्र ही लौट आएंगे, किंतु उसे प्रतीक्षा करते-करते दोपहर का समय हो गया और फिर वह दोपहर भी रात में बदल गई तो वह बेहद चिंतित हो उठी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह जोर-जोर से अपने स्वामी को पुकारते हुए पागलों की तरह वन में इधर-उधर भटकने लगी। उसका विलाप सुनकर अपने-अपने घोंसलों में बैठे पक्षी और वन में विचरण करने वाले पशु भी द्रवित हो गए। दमयंती को अपने शरीर का कोई होश नहीं था। 

उसके मुंह से बस यही शब्द बार-बार निकल रहे थे-‘हाय स्वामी! तुम कहां हो? हाय, तुम मुझ अभागी को छोड़कर कहां चले गए?’ घंटों तक दमयंती इसी प्रकार विलाप करते हुए नल की तलाश में इधर-उधर भटकती रही और उसी हालत में एक विशालकाय अजगर के निकट पहुंच गई। अजगर ने उसे देखते ही अपना विकराल मुंह फाड़ दिया। उसके भयानक मुख को देखकर दमयंती भयाक्रांत होकर सहायता की गुहार लगाने लगी। 

सौभाग्य से उसकी करुण पुकार एक बहेलिए के कानों तक पहुंच गई। वह तेजी से दौड़ता हुआ दमयंती के पास पहुंचा। अजगर दमयंती को निगलने ही वाला था कि बहेलिए ने निशाना साधकर अपना बाण चला दिया। बाण ने अजगर का जबड़ा चीर डाला। दमयंती उसकी पकड़ से मुक्त हो गई। 

बहेलिया तब उसे एक सरोवर के निकट ले गया। उसने दमयंती से कहा-‘लगता है, तुमने कई दिन से स्नान नहीं किया। पहले तुम सरोवर में स्नान कर लो। तुमने शायद कई दिनों से भोजन भी नहीं किया। मेरे पास थोड़ा-सा भोजन है। भोजन करने के बाद अपने बारे में बताना कि तुम कौन हो और इस भयानक वन में क्यों भटक रही हो?’ 

दमयंती ने सरोवर में स्नान कर बहेलिए के दिए हुए रूखे-सूखे भोजन से अपने पेट की आग बुझाई। फिर उसने उसे अपने और अपने पति के विषय में संक्षेप में सब-कुछ बता दिया। 

दमयंती अप्सराओं से बढ़कर सुंदर थी। उसके सौंदर्य को देखकर बहेलिए के मन में वासना जाग उठी। बहेलिए की आंखों में धधकती वासना की आग को देखकर दमयंती ने उससे उसका स्त्रीत्व भंग न करने की प्रार्थना की, किंतु बहेलिए ने उसकी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह दमयंती की ओर बढ़ने लगा। 

अपने स्त्रीत्व पर आंच आती देखकर दमयंती ने मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना की-‘हे परमेश्वर! मेरी रक्षा करो! यदि मैंने स्वप्न में भी अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष का चिंतन न किया हो तो यह बहेलिया इसी क्षण भस्म हो जाए।’ 

और जैसे ईश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। अचानक बहेलिए के चारों ओर अग्नि का एक घेरा उठा और उसने बहेलिए को अपनी चपेट में ले लिया। बहेलिया धू-धू करके जलने लगा। देखते-ही-देखते उसका शरीर अग्नि में जलकर भस्म हो गया। बहेलिए से छुटकारा पाकर दमयंती फिर आगे बढ़ चली। 

कई दिनों तक वन में भटकने के बाद दमयंती एक आश्रम में पहुंच गई। उस आश्रम में अनेक ऋषि-मुनि रहते थे। दमयंती ने वहां पहुंचकर उन ऋषि-मुनियों से अपनी व्यथा-कथा कह सुनाई। उसकी करुण कथा सुनकर ऋषि-मुनियों ने दमयंती को आश्वासन दिया कि बहुत शीघ्र ही उसका खोया हुआ पति उसे मिल जाएगा और उन्हें अपना राजपाट भी मिल जाएगा। 

आश्रम से प्रस्थान करने के बाद दमयंती को व्यापारियों का एक दल मिला जो चेदि देश की राजधानी जा रहा था। दमयंती उस दल के साथ यात्रा करते हुए चेदि देश पहुंच गई। 

राजभवन के पास दुखी हालत में भटकती हुई दमयंती को राजमाता ने देख लिया और उसे अपने राजमहल में बुलवा लिया। उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा, तो दमयंती ने अपनी दुखद कथा राजमाता को सुना दी, लेकिन उसने अपना और अपने पति का वास्तविक नाम नहीं बताया। इस पर राजमाता ने उसे अपनी पुत्री सुनंदा की सेविका के रूप में रहने की अनुमति दे दी। 

अब सुनिए नल के विषय में कि उन पर क्या गुजरी! वे अपनी पत्नी दमयंती को निर्जन वन में अकेला सोता छोड़कर तेजी से बढ़ते हुए एक ऐसे वन में जा पहुंचे, जिसमें भीषण आग लगी हुई थी। वे उस जलते हुए वन से बचकर निकलने का उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक उनके कानों में ‘बचाओ-बचाओ’ की करुण पुकार पड़ी। वह झपटते हुए आगे बढ़े तो उन्होंने एक विशाल नाग को आग की लपटों में जलते हुए देखा। उन्हें आते देखकर वह नाग चिल्लाया-‘राजा नल, मैं कर्कोटक नाग हूं। मेरी रक्षा करो, मुझे इस भीषण आग से बचाओ।’ 

राजा नल को उस पर दया आ गई। उन्होंने नाग को आग की लपटों से बाहर निकाल लिया, लेकिन जब वे उसे लेकर सुरक्षित स्थान की ओर बढ़ने लगे तो अचानक नाग ने उन्हें डस लिया।

नाग के दंश से नल का सारा शरीर नीला पड़ने लगा। उनके शरीर में दर्द की तीव्र लहरें उठने लगीं। वे दुखी स्वर में बोले-‘नागराज ! यह तुमने क्या किया? मैंने तुम्हारी जान बचाई और तुमने मुझको ही डस लिया! मेरे उपकार का अच्छा बदला चुकाया तुमने!’ 

‘राजा नल!’ नाग बोला- ‘मैंने तुम्हारे उपकार का बदला ही तो चुकाया है। अब तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा। तुम्हारे शरीर में कलियुग ने निवास कर लिया था। अब मेरे विष से उसे अत्यधिक पीड़ा होगी और वह तुम्हारे शरीर को छोड़कर चला जाएगा। मेरे विष के प्रभाव से कोई हिंसक पशु और शत्रु तुम पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर पाएगा। युद्ध में हमेशा तुम्हारी विजय होगी। अब तुम अपना नाम बाहुक रखकर अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के यहां चले जाओ। तुम अश्व विद्या में भी अन्य विद्याओं की तरह कुशल हो। तुम उनके अश्वों की देखभाल करना और वह तुम्हें धूत-क्रीड़ा के ऐसे रहस्य बता देंगे, जिनकी सहायता से तुम पुष्कर को पराजित कर अपना राज्य वापस ले सकोगे। तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे पुत्र एवं पुत्री भी तुम्हें मिल जाएंगे। जब तुम्हें मेरी आवश्यकता हो, उस समय मुझे स्मरण कर लेना। मेरा स्मरण करने-भर से तुम्हारा यह कुरूप शरीर फिर से सुंदर बन जाएगा।’ यह कहकर नाग ने नल को एक दिव्य वस्त्र दिया और अपने लोक चला गया। 

राजा नल ने वह दिव्य वस्त्र पहन लिया और अयोध्या की ओर चल पड़े। 

अयोध्या में पहुंचकर नल ने राजा ऋतुपर्ण को अपना परिचय ‘बाहुक’ कहकर दिया और अपने अश्वों से संबंधित ज्ञान की जानकारी उसे दी तो राजा ने नल को अपना सारथि नियुक्त कर दिया। वहां नल की मुलाकात अपने पूर्व सारथि वार्ष्णेय से भी हुई, किंतु उस रूप में वह नल को पहचान ही नहीं पाया। 

उधर कुंडिनपुर में राजा भीम को सब समाचार विदित हो चुके थे। नल के बेटे इंद्रसेन और उसकी बेटी इंद्रसेना ने अपने नाना को सब-कुछ बता दिया था कि किस प्रकार उनके पिता जुए में अपना सर्वस्व हार गए थे। राजा भीम को यह जानकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने राज्य के सुयोग्य ब्राह्मणों को बुलाया और उनसे कहा-‘तुम लोगों में से जो भी व्यक्ति राजा नल और दमयंती के विषय में कोई खबर लेकर आएगा, मैं उस व्यक्ति को माला-माल कर दूंगा।’ पुरस्कार पाने के लोभ में अनेक ब्राह्मण राजा नल और दमयंती की खोज में निकल पड़े। 

सुदेव नाम का एक ब्राह्मण चेदि देश में जा पहुंचा, जहां उसने राजमहल में सेविका के रूप में काम करती हुई दमयंती को पहचान लिया। उस ब्राह्मण ने जब यह बात राजमाता को बताई तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। दमयंती की माता और चेदि नरेश की रानी बहनें थीं। राजमाता ने कुछ सैनिकों के साथ उस ब्राह्मण और दमयंती को उसके पिता के पास पहुंचा दिया। 

कुछ दिन बाद दमयंती ने ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें अपने पति नल के साथ राजधानी से निकलकर उसे सोती छोड़कर जाने तक की सारी घटनाएं सुनाते हुए कहा-‘हो सकता है मेरे पति वेश बदलकर कहीं रह रहे हों। यदि उन जैसा कोई व्यक्ति आप लोगों को कहीं दिखाई दे तो आप उसे इन घटनाओं का थोड़ा-सा संकेत दे दें। यदि वह व्यक्ति विस्तार से इन घटनाओं को बता दे तो समझ लेना कि वही व्यक्ति राजा नल है। 

एक ब्राह्मण राजा नल को खोजता हुआ अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण की राजसभा में पहुंच गया। उसने बिना नाम बताए नल द्वारा सोती हुई दमयंती को छोड़कर चले जाने की घटना का वर्णन पहेली के रूप में किया और राजसभा में उपस्थित सभी लोगों से उस पहेली का अर्थ समझाने के लिए कहा। राजसभा में कोई भी व्यक्ति उस पहेली को हल नहीं कर सका, लेकिन जब वह ब्राह्मण राजसभा से उठकर बाहर आ रहा था, तब नल ने उसे अपना नाम बाहुक बताकर उससे कहा-‘हे ब्राह्मण! 

जो स्त्रियां कुलीन होती हैं उन पर कितनी ही विपत्तियां क्यों न आन पड़ें, वे अपने शील की रक्षा करती हुईं अपने स्त्रीत्व की शक्ति से स्वर्ग पर भी विजय प्राप्त कर लेती हैं। यदि किसी कारणवश उनका पति उन्हें त्याग भी दे, तब भी उस पर क्रोध नहीं करतीं। पति के प्रति उनके प्रेम में कभी कमी नहीं आती।’ 

ब्राह्मण ने कुंडिनपुर लौटकर दमयंती को बाहुक के कहे हुए शब्दों को दोहराने के बाद बताया-‘सारथि बाहुक अश्व-शास्त्र का महान ज्ञाता है और स्वादिष्ट भोजन बनाने में तो उसका कोई जवाब ही नहीं। वह एक बहुत ही कुशल रसोइया है।’ 

ब्राह्मण की बातें सुनकर दमयंती समझ गई कि उसके पति राजा नल बाहुक के रूप में राजा ऋतुपर्ण के पास रह रहे हैं। तब उसने अपने माता-पिता से परामर्श करके एक योजना बनाई और उस ब्राह्मण से कहा कि वह तत्काल अयोध्या चला जाए और राजा ऋतुपर्ण से यह कहे कि राजा नल का कहीं पता नहीं चल रहा है, इसलिए दमयंती ने स्वयंवर करने का निश्चय किया है। कल सूर्योदय होते ही वह स्वयंवर में दूसरा पति वरण करेगी। 

ब्राह्मण उसका आदेश मानकर तत्काल अयोध्या लौट गया और राजा ऋतुपर्ण को दमयंती के स्वयंवर की सूचना दे दी। 

राजा ऋतुपर्ण ने तब बाहक को बुलाकर उससे कहा-‘बाहुक, कल सूर्योदय होते ही विदर्भ देश की राजकुमारी का स्वयंवर है। मैं इस स्वयंवर में जाना चाहता हूं। तुम अश्व-संचालन में पारंगत हो। क्या तुम स्वयंवर के समय से पहले मुझे पहुंचा सकते हो? 

राजा ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल सोच में पड़ गए। उन्हें पत्नी दमयंती पर पूरा भरोसा था। वे अच्छी तरह से जानते थे कि दमयंती मृत्यु को तो गले लगा सकती है, लेकिन पति के रूप में किसी दूसरे पुरुष का वरण कदापि नहीं कर सकती। लेकिन सच्चाई का पता तो वहां जाने पर ही चल सकता था, इसलिए उन्होंने दमयंती के प्रेम और उसकी पति-भक्ति की परीक्षा लेने के लिए वहां जाने का निश्चय करके राजा ऋतुपर्ण से कह दिया कि वह स्वयंवर से बहुत पहले उन्हें विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में पहुंचा देगा। 

राजा ऋतुपर्ण रथ पर सवार हो गए तो बाहुक ने घोड़ों के कान में मंत्र फूंककर रथ को वेग से चलाना शुरू कर दिया। सहसा मार्ग में हवा के झोंके से राजा ऋतुपर्ण का उत्तरीय (एक प्रकार का मफलर जो गले में डाला जाता है) गले से निकलकर उड़ गया। उन्होंने बाहुक से कहा- ‘बाहुक! तनिक रथ को रोको । मेरा उत्तरीय उड़कर नीचे जा गिरा है। 

बाहुक ने हंसकर कहा-‘व्यर्थ है महाराज! जिस स्थान पर उत्तरीय उड़ा था वह तो यहां से एक योजन (पांच कोस) पीछे छूट गया है। वापस उस स्थान पर लौटेंगे तो देर हो जाएगी। 

राजा ऋतुपर्ण बाहुक के रथ-संचालन पर मुग्ध होकर बोले- ‘बाहुक! अयोध्या वापस लौटकर तुम मुझे अश्व विद्या सिखाना। उसके बदले में मैं तुम्हें गणित विद्या का ज्ञान करा दूंगा। उदाहरण के लिए तुम उस सामने वाले वृक्ष को देखो। मैं अपने गणित द्वारा यह पता लगा सकता हूं कि उस वृक्ष पर कितने फल और कितने पत्ते हैं।’ 

‘यह तो बहुत ही आश्चर्यजनक बात है महाराज!’ बाहुक ने आश्चर्यचकित होकर कहा-‘तनिक बताइए तो कितने फल और कितने पत्ते हैं उस वृक्ष पर?’ 

‘उस वृक्ष पर पांच करोड़ पत्ते और दो हजार पिचानवे फल लगे हैं। चाहो तो तुम गिनकर देख सकते हो।’ राजा ने अपने गणितीय अध्ययन से बाहुक को बताया। 

बाहुक ने रथ रोक दिया। उसने नीचे उतरकर बात-ही-बात में उस वृक्ष को काट डाला, फिर उसने वृक्ष के फल और पत्तों को गिना। वे बिल्कुल उतने ही निकले जितने कि राजा ऋतुपर्ण ने बताए थे। 

‘आपकी गणित विद्या अद्भुत है महाराज!’ नल ने आश्चर्यचकित होकर कहा। 

‘बाहुक!’ राजा ऋतुपर्ण बोले-‘मैं गणित विद्या की तरह पासों को अपने नियंत्रण में करने की कला में भी निपुण हूं। अपने ज्ञान से मुझे यह पता लग जाता है कि द्यूत-क्रीड़ा में सामने बैठे प्रतियोगी को कैसे हराया जा सकता है।’ 

‘महाराज! यदि आप शीघ्र कुंडिनपुर पहुंचना चाहते हैं तो मुझे पासों को वश में करने वाली विद्या को सिखाइए। मैं आपको अश्व-संचालन की विद्या सिखा दूंगा।’ नल ने कहा। 

राजा ऋतुपर्ण ने मार्ग में ही नल को पासों को नियंत्रण में करने वाली विद्या सिखा दी। बाहुक बने नल ने भी राजा ऋतुपर्ण को अश्व-संचालन से संबंधित विद्या का ज्ञान करा दिया। 

बाहुक के अश्व-संचालन के कौशल से राजा ऋतुपर्ण समय से पहले ही कुंडिनपुर जा पहुचे। राजा भीम ने बड़े सम्मान के साथ उनका स्वागत-सत्कार किया और अतिथिशाला में उनके रहने की व्यवस्था करा दी। 

रथ आने की आवाज सुनते ही दमयंती ने पहचान लिया कि जो भी सारथि रथ का संचालन कर रहा है, वह उसका पति ही है। उसने अपनी सेविका केशिनी के साथ अपने पुत्र और पुत्री को अश्वशाला में भेजा, ताकि बाहुक की वास्तविकता का पता लगाया जा सके। वर्षों बाद अपने पुत्र और पुत्री को देखकर बाहुक के रूप में राजा नल की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। केशिनी के पूछने पर उन्होंने बताया कि इसी उम्र के उनके भी पुत्र-पुत्री हैं, जिन्हें उन्होंने वर्षों से देखा नहीं है। केशिनी बाहुक की सभी चेष्टाओं को बड़े ध्यान से देखती रही। उसने देखा कि दरवाजा छोटा होने पर बाहुक झुकता नहीं है, बल्कि दरवाजा ही अपने आप ऊंचा हो जाता है। खाली पड़े हुए घड़ों पर उसकी दृष्टि पड़ते ही खाली घड़े अपने आप जल से भर जाते हैं। घास के पूले को सूर्य की ओर करते ही अग्नि अपने आप प्रज्वलित हो जाती है। अग्नि का स्पर्श करने से उसका हाथ नहीं जलता। फूलों को जब वह मसलता है तो मुर्टाने या टूटने की बजाय वे और अधिक खिल जाते हैं। उनकी सुगंध भी पहले की अपेक्षा बढ़ जाती है। भोजन बनाने की कला में भी उसका ज्ञान विलक्षण है और वह एक कुशल रसोइया है। 

केशिनी ने जब ये सारी बातें दमयंती को जाकर बताईं तो उसे विश्वास हो गया कि बाहुक कोई और नहीं, बल्कि उसका पति राजा नल ही है। तब उसने अपने माता-पिता से अनुरोध कर बाहुक को अपने अंतःपुर में बुलवा लिया। 

दमयंती ने बाहुक रूपी राजा नल से पूछा-‘एक धर्मात्मा पति एक दिन अपनी पत्नी को वन में सोती छोड़कर चला गया था। क्या तुमने उसे कहीं देखा है?’ 

राजा नल ने उत्तर दिया-‘दमयंती, मैं ही तुम्हारा वह अभागा पति हूं। कलियुग के प्रभाव के कारण मैं तुम्हें छोड़कर चला गया था। अब कर्कोटक नाग के विष के कारण कलियुग मेरे शरीर से बाहर निकल गया है। लेकिन क्या एक पतिव्रता पत्नी अपने पति के जीवित होते हुए भी दूसरे पति का वरण कर सकती है? मैं राजा ऋतुपर्ण को तुम्हारे स्वयंवर में भाग लेने के लिए ही यहां लाया हूं।’ 

तब दमयंती ने उसके द्वारा ब्राह्मणों द्वारा उसकी खोज कराने की सारी कहानी कह सुनाई। दमयंती ने कहा-‘स्वामी! आपकी खोज कराने का इससे अच्छा उपाय कोई और नहीं था, क्योंकि सारे संसार में कोई ऐसा अश्व-विद्या का जानकार नहीं है, जो इतने थोड़े समय में राजा ऋतुपर्ण को अयोध्या से लेकर कुंडिनपुर तक ला सके।’ 

नल को उसकी बात पर विश्वास हो गया। कर्कोटक नाग के कथनानुसार तब उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप में आने की इच्छा प्रकट की और तत्काल ही उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप प्राप्त हो गया। 

नल को देखकर सभी प्रसन्न हो उठे। राजा ऋतुपर्ण को यह जानकर बहुत गर्व महसूस हुआ कि नल जैसा प्रतापी राजा कुछ समय तक उसका सारथि बनकर रहा था। वह खुशी-खुशी अयोध्या वापस लौट गया। 

राजा नल कुछ दिन तक अपनी सुसराल में रहते रहे, फिर वे अपनी पत्नी और अपने बच्चों को लेकर निषध राज्य में चले गए। उन्होंने वहां जाकर अपने भाई पुष्कर से कहा-‘हे भाई! मैंने इतने दिनों बाहर रहकर बहुत धन कमाया है। मेरी इच्छा है कि तुम एक बार फिर मेरे साथ जुआ खेलो। मैं अपनी पत्नी सहित सारे धन को दांव पर लगाता हूं। तुम भी सारे राजपाट, धन-दौलत को एक ही बार में दांव पर लगा दो। यदि तुम्हारी इच्छा जुआ खेलने की न हो तो फिर मेरे साथ द्वंद्व युद्ध करो। एक रथ पर तुम चढ़ो और दूसरे पर मैं । युद्ध में जो जीत गया वही इस राज्य का स्वामी बन जाएगा। तुम मेरे दोनों प्रस्तावों में से एक को स्वीकार करो। चाहे जुआ खेलो या फिर मेरे साथ युद्ध करो। 

नल के मुख से यह सुनकर पुष्कर हंसने लगा और जुए में अपनी जीत निश्चित समझकर बोला-‘हे नल ! तुम मेरे साथ जुआ खेलो। मैं तुम्हें जुए में हराकर तुम्हारे धन सहित तुम्हारी पत्नी को जीतकर धन्य हो जाऊंगा।’ 

पुष्कर का यह कथन सुनकर नल को बहुत क्रोध आया। उन्होंने पुष्कर से कहा- ‘पुष्कर! यदि तुमने बिना जुआ खेले एक शब्द भी दमयंती के विषय में कहा तो मैं तत्काल तुम्हारा सिर काट डालूंगा।’ नल के यह वचन सुनकर पुष्कर भयभीत हो गया और उसी समय नल के साथ जुआ खेलने के लिए तत्पर हो गया। नल क्योंकि राजा ऋतुपर्ण से पासों के विषय में बहुत-सा ज्ञान प्राप्त कर चुके थे, अतः वे संभलकर चालें चलने लगे। अब उनके शरीर से कलियुग भी निकल चुका था, अतः उन्होंने एक ही दांव में पुष्कर का राज, धन व सारी संपत्ति जीत ली। 

जुआ में पुष्कर का सर्वस्व जीतकर राजा नल ने उससे कहा- ‘पुष्कर! तुमने पहले मुझसे जुआ खेलकर जो जीत हासिल की थी, वह तुम्हारा काम नहीं था, वह तो कलियुग का काम था। मैं कलियुग का दंड तुम्हें देना नहीं चाहता, इसलिए मैं तुम्हारे प्राण नहीं लूंगा। मैं तुम्हें क्षमादान देता हूं। तुम्हारा जो हिस्सा पहले था, वह अब भी मैं तुम्हें देता हूं। मैं तुमसे हमेशा वैसा ही प्रेम करता रहूंगा, जैसा हम दोनों भाइयों में पहले था। तुम मुझसे कोई भय मत करो और पहले के समान ही सुखपूर्वक राजभवन में रहते रहो। मेरे हृदय में तुम्हारा प्रेम कभी कम नहीं होगा।’ 

नल की ऐसी उदारता देखकर पुष्कर का चेहरा शर्म से झुक गया। उसने अपने भाई से क्षमा मांगी। उदारहृदयी राजा नल ने उसे गले से लगा लिया। इतना ही नहीं उन्होंने उसे राज्य का आधा भाग विधिपूर्वक दे दिया। राजा नल के पुनः राज्य संभालने पर नगरवासियों ने प्रसन्न हो बहुत बड़ा उत्सव मनाया और सारे नगर को दीप-मालिकाओं से सजाया। राजा नल और दमयंती के दुख के दिन अब समाप्त हो चुके थे और नया सवेरा उनका स्वागत कर रहा था। 

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