पुराणों की कथाएं-नल और दमयंती कथा 

नल और दमयंती कथा 

पुराणों की कथाएं-नल और दमयंती कथा 

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

जुए का दुष्परिणाम 

विदर्भ नरेश की पुत्री दमयन्ती का विवाह राजा नल के साथ हुआ था। नल ने धर्मानुसार प्रजा का रंजन करके ”राजा’ नाम को सार्थक किया था। उसके रूप- गुण सम्पन्न एक पुत्र और एक सुन्दर पुत्री हुई जिनका नाम इन्द्रसेन और इन्दसेना था। 

एक दिन नल के कपटी एवं दुष्ट भाई पुष्कर ने नल को जुआ खेलने को नियंत्रण दिया। द्यूतप्रिय (जुए के शौकीन) राजा नल ने जुआ खेलना स्वीकार कर लिया। कलिकाल से प्रभावित राजा नल पुष्कर के साथ दो महीने तक जुआ खेलते रहे|दमयन्ती एवं मन्त्रियों ने राजा को समझाने की बहुत चेष्टा की, परन्तु नल ने किसी की एक न सुनी और दांव पर दांव लगाते गए और हर बार हारते गए। 

यह देखकर भविष्य में सर्वनाश की आशंका से दमयन्ती ने अपने विश्वासी सारथी के साथ अपने पुत्र इन्द्रसेन एवं पुत्री इन्द्रसेना को राजा भोज के पास कुण्डिनपुर भेज दिया। 

इधर, राजा नल जुए में सारा राज्य एवं धन हार गए। उन्होंने अपने शरीर से सारे बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण उतार दिए और साधारण वस्त्र धारण करके वह जंगल की तरफ चल दिए। 

पति-परायणा दमयन्ती भी केवल एक साड़ी पहनकर उनके साथ ही चल पड़ी। दमयन्ती के साथ नल तीन दिन नगर के बाहर भूखे पड़े रहे मगर पुष्कर की कठोर आज्ञा के कारण कोई भी नगरवासी उन्हें आश्रय नहीं दे सका। 

भूख से व्याकुल राजा नल चौथे दिन कुछ फल-फूल खाकर दमयन्ती के साथ जंगल की तरफ आगे बढे। वहां उन्होंने कुछ सुनहरे पंखों वाले सुन्दर पक्षियों को उड़ते देखा। उन्हें पकडने के लिए राजा ने अपनी धोती फेंकी। वे पक्षी उनकी धोती लेकर ही उड़ गए। 

कुछ समय पहले जो एक शक्तिशाली राजा थे, अब वही राजा नल नंगे बदन भूख से व्याकुल, अपनी प्रिया के साथ दुख भोगते हुए जंगल में भटकन लगे। 

नल ने सुकुमारी दमयन्ती को अपने पीछे दख पाते देखकर उसे बार-बार उसके पिता के घर चले जाने को कहा। 

इससे अत्यन्त दुखी होकर दमयन्ती ने कहा-“प्राणनाथ! बार-बार आपके इस संकल्प का विचार करके मेरा हृदय फटा जाता है। आप राज्यभ्रष्ट हुए, धनहीन हुए, आपके शरीर पर वस्त्र तक नहीं रहे और आप भूख और थकावट से व्याकुल हो रहे हैं, इस विपत्तिकाल में आपको अकेले छोड़कर मैं कैसे जा सकती हैं? मैं छाया की तरह साथ रहकर आपकी सेवा करूंगी और आपके इस महान दुःख को दूर करूंगी। आप जो बार-बार मुझसे विदर्भ-देश जाने की बात करते हैं, इससे मझे बड़ा दुख होता है।” 

दमयन्ती के ये वचन सुनकर राजा नल चुप हो गए और दमयन्ती के साथ एक छायादार वृक्ष के नीचे ठहर गए। दमयन्ती को तो लेटते ही नींद आ गई पर दमयन्ती की चिन्ता से व्याकुल राजा नल की आंखों में नींद कहां? 

 

नल और दमयंती कथा 

उन्होंने सोचा यदि मैं इसे यहां छोड़ जाऊंगा तो यह अपने पिता के पास विदर्भ-देश जाकर सुखपूर्वक रहेगी, नहीं तो मेरे साथ रहकर यह दुख-ही-दुख पाएगी। 

यह सोचकर राजा नल ने दमयन्ती की साड़ी का आधा हिस्सा तलवार से काटकर धारण कर लिया और उसे वहीं हिंस्र जन्तुओं से भरे भयंकर जंगल में भगवान के भरोसे छोड़कर चल दिए। 

इधर, जब दमयन्ती की नींद खुली तो वह नल को अपने पास न देखकर जोर-जोर से उन्हें पुकारती   और शोक एवं विलाप करती हुई हिंसक जीवों से युक्त तक जंगल में घूमने लगी। घूमते-घूमते वह एक महाकाय अजगर के पास जा पहुंची। अजगर दमयन्ती को निगलना ही चाहता था कि दमयन्ती का विलाप सनकर एक शिकारी वहां आ पहुंचा और उसने अजगर को मारकर दमयन्ती को बचा लिया। तदनन्तर उस शिकारी के मन में पाप आ गया और उसने सती के सामने पाप का प्रस्ताव रखा। 

शिकारी के दुष्ट भाव को जानकर दमयन्ती ने बड़े रोषपूर्ण शब्दों में कहा “यदि मैंने राजा नल के सिवाय अन्य पुरुष का स्वप्न में भी चिन्तन किया हो तो यह मृगजीवी शिकारी प्राणरहित होकर गिर पड़े।” 

यह कहकर दमयन्ती ने तीक्ष्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा, शिकारी सती के प्रभाव से तुरन्त भस्म हो गया। 

यह कहकर दमयन्ती ने तीक्ष्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा, शिकारी सती के प्रभाव से तुरन्त भस्म हो गया। 

 इसके बाद दमयन्ती पति वियोग में व्याकुल होकर पहाड़ों, नदियों, सरोवरों    एवं जंगल के पशु-पक्षियों से पति का पता पूछती और विलाप करती हई बहुत दिनों तक जंगल में भटकती रही। 

दमयन्ती के दुखों का कोई ठिकाना नहीं था। इस प्रकार अनेक कष्ट सहती हर्ड दमयन्ती चेदिदेश में जा पहुंची और वहां की राजमाता, जो रिश्ते में उनकी मौसी थी, उनके पास जाकर रहने लगी। 

इधर, जब दमयन्ती के पिता राजा भीम को नल-दमयन्ती के इस दुख की खबर मिली तो उन्होंने अनेक सुयोग्य ब्राह्मणों को उनकी खोज में भेजा। सुदेव नाम का एक ब्राह्मण खोजते-खोजते चेदिदेश जा पहुंचा और उसने दमयन्ती को पहचान लिया। राजमाता की आज्ञा लेकर दमयन्ती अपने पिता के घर आ गई और अपने पति की खोज में ब्राह्मणों को भेजकर रात-दिन उनके वियोग दुख से जलती हुई उनकी प्रतीक्षा करने लगी। 

अन्त में जब उसे पर्णद नामक एक ब्राह्मण के द्वारा पता लगा कि राजा नल बाहुक नाम रखकर सारथी रूप से छिपकर अयोध्यापति राजा ऋतुपर्ण के यहां रहते हैं, तो उसने पुन: स्वयंवर के बहाने राजा ऋतुपर्ण के साथ नल को भी बुलवा लिया और उन्हें अच्छी तरह पहचानकर उनके साथ कुछ दिन अपने पिता के यहां सुखपूर्वक रहती रही। 

तत्पश्चात राजा नल ने एक बार फिर पुष्कर को जुए के लिए आमंत्रित किया। इस बार उन्होंने जए में पुष्कर को हरा दिया और अपना राज्य वापस ले लिया फिर वे दमयन्ती के साथ रहकर सुखपर्वक राज्य करने लगे। 

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Puranic stories – Nal and Damayanti Katha

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Side effects of gambling

The daughter of the King of Vidarbha, Damayanti, was married to King Nal. Nal made the name “Raja” meaningful by dyeing the subjects according to religion. He had a son and a beautiful daughter named Indrasen and Indasena.

One day Null’s hypocrite and evil brother Pushkar gave Nal the control of gambling. King Nal, a gambler (fond of gambling), accepted gambling. The Kalikal-influenced king continued to gamble with Nal Pushkar for two months. Damayanti and the ministers tried very hard to convince the king, but Nal listened to no one and bets and loses each time.

Seeing this, in the fear of future apocalypse, Damayanti sent her son Indrasen and daughter Indrasena with their confidant Sarathi to Kundinpur near Raja Bhoj.

Here, the king lost all the kingdom and wealth in Nal gambling. He removed all the valuable clothes and jewelery from his body and wearing simple clothes, he walked towards the forest.

Husband-Parayana Damayanti also walked with him wearing only a sari. Nal remained hungry outside the city for three days with Damayanti, but no city dweller could shelter him due to Pushkar’s strict orders.

Disturbed by hunger, King Nal proceeded towards the jungle with Damayanti after eating some fruits and flowers on the fourth day. There he saw some beautiful birds with golden wings flying. The king threw his dhoti to catch them. Those birds flew away with their dhoti.

Some time ago, who was a powerful king, now the same king Nal bare body distraught with hunger, wandering in the forest while suffering with his beloved.

Nal saw Sukumari Damayanti looking after him and asked him to go back to his father’s house again and again.

Damned by this, Damayanti said- “Prannath! After thinking of your resolve again and again, my heart is torn. You are disgusted, moneyless, don’t wear clothes on your body and you are distraught with hunger and tiredness. , How can I leave you alone in this crisis? I will serve you as a shadow and will overcome this great sorrow of you. You who talk to me again and again to Vidarbha country, I feel very sad it happens.”

Hearing these words of Damayanti, King Nal fell silent and stayed under a shady tree with Damayanti. Damyanti fell asleep as soon as she lay down, but distraught over Damyanti’s worry, where did Raja Nal sleep?

He thought that if I leave it here, it will go happily to Vidarbha-country with its father, otherwise it will be sad to be with me.

Thinking this, King Nal cut half of Damayanti’s sari and took it with a sword and left it there in the fierce forest full of the Hissar animals, leaving the trust of God.

Here, when Damayanti woke up, she did not see the tap near her and started to roam in the forest till loudly calling them and mourning and mourning violent creatures. While walking, she reached a giant dragon. The dragon wanted to swallow Damayanti that a hunter came there after he wished Damayanti and he saved Damayanti by killing the dragon. Subsequently, the hunter got sin and offered sin in front of Sati.

Knowing the evil spirit of the hunter, Damayanti said in great fury, “If I had contemplated the dream of a man other than King Nal, then this antelope hunter fell dead.”

Saying this, Damayanti looked at him with a sharp eye, the hunter was instantly consumed by the influence of Sati.

Saying this, Damayanti looked at him with a sharp eye, the hunter was instantly consumed by the influence of Sati.

After this, Damayanti was distraught in her husband’s discord and asked her husband’s address from the mountains, rivers, lakes and birds of the forest and mourned for many days in the forest.

Damayanti’s sufferings had no whereabouts. Thus, after suffering a lot of hardship, Damayanti reached Chedidesh and the mother-in-law, who was her maternal aunt in the relationship, started living with him.

Here, when Damayanti’s father Raja Bhima got the news of this misery of Nal-Damayanti, he sent many well-qualified Brahmins in search of him. While searching for a Brahmin named Sudev, he reached Chedidesh and recognized Damayanti. Taking the permission of the Rajmata, Damayanti came to her father’s house and sent Brahmins in search of her husband and started waiting for them day and night with their disconnection burning with sorrow.

Finally, when he was discovered by a Brahmin named Parnad that Raja Nal resided here with Ayodhyapati Raja Rituparna by hiding the name of Bahuk, he again summoned Nal with King Rituparna on the pretext of Swayamvara and gave him well Recognizing, she lived happily with her father for a few days.

After that Raja Nal once again invited Pushkar for gambling. This time he defeated Pushkar in Jaya and regained his kingdom, then he lived with Damayanti and began to reign happily.

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