रसायन विशेषज्ञ वैज्ञानिक नागार्जुन की जीवनी

नागार्जुन की जीवनी

रसायन विशेषज्ञ वैज्ञानिक नागार्जुन की जीवनी

प्राचीन रसायन विशेषज्ञ नागार्जुन का जन्म सन् 931 ई० को सोमनाथ के निकट गुजरात के दैहक नामक जिले में हुआ था। उनके सम्बन्ध में आज भी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। लोगों का कहना है कि उनका देवी-देवताओं के साथ सम्बन्ध था तथा उनमें धातुओं को सोने में बदलने की शक्ति थी और अमृत बनाने का ज्ञान था। 

इन बातों की सच्चाई सिद्ध करना तो कठिन है, किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि रसायन प्राचीनकाल के कीमियागारों द्वारा विकसित किया गया था। उन दिनों हालांकि रसायन विज्ञान के प्रयोग के लिए आधुनिक युग जैसे बेहतरीन यंत्र नहीं थे, फिर भी लोग वैज्ञानिक प्रयोग करते रहते थे। नागार्जुन एक ऐसे ही कीमियागार थे, जो कृत्रिम ढंग से सोना बनाने और अमृत बनाने के अनेक प्रयोग कर चुके थे। 

उन्होंने ‘रसरत्नाकर’ नामक एक पुस्तक की रचना की थी। इस पुस्तक की शैली ऐसी है, जैसे नागार्जुन देवी-देवताओं से बात कर रहे हों।

‘रसरत्नाकर’ में पारे के यौगिक बनाने के प्रयोग दिए गए हैं। ‘रस’ का अर्थ ‘पारा’ होता है। इस पुस्तक में चांदी, सोना, तांबा आदि कच्ची धातुओं को निकालने के और उन्हें शुद्ध करने के तरीके दिए गए हैं। 

नागार्जुन ने पारे से पशुओं और पेड़-पौधों से संजीवनी बनाने के तरीके भी पुस्तक में दिए हैं। उन्होंने हीरा, मोती आदि को वनस्पति से बने तेजाबों में घोलने के ढंग भी लिखे हैं। इसके अतिरिक्त उनकी पुस्तक में खट्टा, दलिया, पौधे व फलों के रस से सम्बन्धी ज्ञान भी है। नागार्जुन ने प्राचीन कीमियागारों द्वारा विकसित उपकरणों का प्रयोग किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने प्रयोग के लिए अपने उपकरण विकसित किए। द्रवण और उर्ध्वपातन के लिए उन्होंने कुछ उपकरण भी विकसित किए थे। उन्होंने अपनी पुस्तक में उनके विषय में भी उल्लेख किया है। 

उनका कहना था यदि सोना बनाने की विधि विकसित न हो, तो कम-से-कम दूसरी धातु तो विकसित की ही जा सकती है। इन धातुओं में एक धातु का रंग पीला होता था, जिसकी चमक सोने जैसी होती थी। 

नागार्जुन उस समय के जाने-माने विद्वान् थे। उन्होंने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में ‘उत्तरतंत्र’ नामक पुस्तक भी लिखी। इस पुस्तक में कई प्रकार की औषधियां बनाने के तरीके दिए गए हैं। जिन तरीकों से शरीर को अरोग्य रखा जा सकता है, उनका वर्णन उन्होंने अपनी ‘अरोग्य मंजरी’ नामक पुस्तक में किया है। यही नहीं, उन्होंने कक्षपूततंत्र, योगसर और योगाष्टक नामक पुस्तकें भी लिखीं। 

विश्व को अपने ज्ञान के मोती देने वाले इस रसायन विशेषज्ञ की पुस्तकें आज भी रसायन शास्त्री अत्यन्त रुचि के साथ पढ़ते हैं। 

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