भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा-वत्सासुर का वध

भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा-वत्सासुर का वध

भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा-वत्सासुर का वध

एक बार मथुरा के दुष्ट राजा कंस ने वत्स नामक एक राक्षस से कहा कि वह भगवान कृष्ण का वध कर आए। वत्सासुर गरजा, “भला मेरे आगे भी कोई टिक सकता है। अगर मैंने भगवान कृष्ण को मार गिराया, तो सभी राक्षस मेरे बल का लोहा मान जाएंगे।” 

इस तरह वत्सासुर वृंदावन जा पहुंचा और छिपकर श्रीकृष्ण की गतिविधियों पर नजर रखने लगा। उसने सोचा कि वह बछड़े का रूप धारण करके उनके दल में शामिल हो जाएगा। ऐसे में भगवान कृष्ण और बलराम को किसी तरह का कोई संदेह नहीं होगा। फिर वत्सासुर ने बछड़ा बनकर श्रीकृष्ण पर हमला करने की योजना बना ली। 

फिर जब सारे बछड़े इधर-उधर घास चरने लगे, तो श्रीकृष्ण और बलराम यमुना नदी के किनारे खेल में जुट गए। तब वत्सासुर ने तत्काल अपना रूप बदला और अन्य बछड़ों के साथ-साथ चरने लगा, ताकि दोनों भाइयों की नजर उस पर न पड़ सके। 

श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे। उन्हें उसी समय पता चल गया कि कोई न कोई गड़बड़ अवश्य है। उन्होंने बलराम के साथ खेलना बंद किया और उन्हें पेड़ के पीछे आने का संकेत किया। फिर भगवान कृष्ण बलराम से बोले, “भैया! अभी तो दिखाई नहीं दे रहा है, लेकिन एक दुष्ट राक्षस रूप बदलकर हमारे बछड़ों के दल में शामिल हो गया है। 

भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा-वत्सासुर का वध

अगर हम थोड़ी-सी चतुराई दिखाएं, तो उसे पकड़ सकते हैं।” 

तत्पश्चात दोनों भाइयों ने एक योजना तैयार कर ली, ताकि दुष्ट राक्षस को पकड़ा जा सके। फिर वे दोनों चुपके से बछड़ा रूपी वत्सासुर के पास गए और उसे घेर लिया। राक्षस वत्स यह बात नहीं जान सका। 

इसके बाद भगवान कृष्ण ने वत्सासुर को टांगों और पूंछ से पकड़कर हवा में गोल-गोल घुमाना शुरू कर दिया। तत्पश्चात उसे एक ओर जोर से उछाल दिया। बछड़ा रूपी वत्सासुर धड़ाम के साथ धरती पर गिरा 

और उसके प्राण निकल गए। वत्सासुर ने सोचा था कि बछड़े का रूप धारण करके भगवान कृष्ण और बलराम को मारना आसान होगा, लेकिन उनकी चतुराई के आगे उसकी एक न चली। वह अपने बनाए जाल में स्वयं ही उलझ गया और बेमौत मारा गया। बलराम और अन्य ग्वाले राक्षस वत्स के मरने पर खुशी से झूम उठे। वे लोग सोच रहे थे कि आने वाले समय में भगवान कृष्ण और बलराम सभी दुष्टों एवं राक्षसों का सफाया कर देंगे। 

उधर जब यह समाचार राजा कंस को मिला, तो वह बुरी तरह बौखला गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। भगवान कृष्ण और बलराम को मारने की उसकी सभी योजनाएं असफल होती जा रही थीं। 

श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा- बकासुर और श्रीकृष्ण

बकासुर कंस का परम मित्र था। उसने निश्चय किया कि वह श्रीकृष्ण को मारने के लिए एक नया उपाय करेगा। फिर वह एक विशाल पक्षी का रूप धारण करके वृंदावन पहुंच गया। वहां सभी ग्वाले यमुना नदी के किनारे पानी पी रहे थे और उनके बछड़े हरी-हरी घास खाकर अपनी भूख मिटा रहे थे। तभी ग्वालों ने उस राक्षस को देखा, जिसने एक विशाल पक्षी बक का रूप धारण कर रखा था। श्रीकृष्ण के अलावा बाकी सभी ग्वाले डरकर पीछे हट गए, जो किसी बड़ी चट्टान के समान लग रहा था। 

बकासुर अपने विशाल पंजों और चोंच द्वारा भगवान कृष्ण पर हमला करने के लिए उनकी ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण शांत भाव से खड़े रहे। जब बकासुर उनके पास पहुंचा, तो ग्वाले यह देखकर डर गए कि उसने भगवान कृष्ण को अपनी चोंच से पकड़ा और एक ही सांस में निगल गया।

“कृष्ण! कृष्ण!! यह कैसे हो सकता है? हाय! अब हमारी जान कौन बचाएगा?” सभी ग्वाले दुख के कारण चिल्लाने लगे। 

श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा- बकासुर और श्रीकृष्ण

जब भगवान कृष्ण बकासुर के गले तक पहुंचे, तो उसके गले में पीड़ा और जलन होने लगी। वह सांस लेने के लिए तड़पने लगा। सभी लोग हैरानी से उसे देखने लगे। ऐसे में बकासुर ने परेशान होकर अपनी चोंच खोल दी और श्रीकृष्ण बड़े आराम से बाहर आ गए। 

तत्पश्चात बकासुर ने अपनी बची हुई ताकत बटोरी और भगवान कृष्ण पर अपने तीखे पंजों एवं विशाल पैरों से हमला कर दिया। भगवान कृष्ण ने उसकी चोंच पकड़ी और उसे चीरकर दो टुकड़े कर दिए। इसके बाद उन्होंने इतनी आसानी से बकासुर को मौत के घाट उतारा कि सभी ग्वाले उन्हें देखते रह गए। 

इस घटना से साफ पता चलता है कि इतना बड़ा राक्षस भी भगवान कृष्ण के बल के आगे कुछ नहीं था। वे कुछ ही पलों में दुष्ट से दुष्ट राक्षसों का नाश कर सकते थे। शीघ्र ही अन्य राक्षसों के बीच यह समाचार फैल गया कि धरती से राक्षसों तथा दुष्टों का अंत करने के लिए ही भगवान विष्णु ने स्वयं जन्म लिया है। 

जब भगवान कृष्ण ने दुष्ट बकासुर का वध किया, तो आकाश से देवताओं ने उन पर पुष्पों की वर्षा की। वैसे इन सभी घटनाओं से लोग बहुत खुश होते थे, लेकिन मां यशोदा को अपने पुत्र कृष्ण की सलामती की चिंता रहती थी। 

श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा- बकासुर और श्रीकृष्ण

जब भी किसी राक्षस के मरने का समाचार मिलता, तो गांव वाले मारे खुशी के झूम उठते। लेकिन मां यशोदा के मन को चैन नहीं मिलता था। उन्हें लगता था कि अगर किसी दिन कोई बड़ा या अधिक बलशाली राक्षस आ गया, तो वह उनके बालकों को हानि पहुंचा सकता है। वे अक्सर अपने पति नंद से इस बारे में बातें करतीं, तो नंद उन्हें दिलासा देकर शांत कर देते थे कि हमारा पुत्र कोई साधारण इन्सान नहीं है। 

krishna katha in hindi- श्रीकृष्ण और जंगल की आग

एक दिन सभी ग्वालों की गायें जंगल में इधर-उधर चर रही थीं और श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे। तभी वे गायें रास्ता भटककर घने जंगल की ओर निकल गईं। सभी लोग उन्हें हर जगह तलाश करने लगे, लेकिन उन गायों का कोई पता नहीं चल रहा था। तब श्रीकृष्ण अपनी जादुई बांसुरी बजाने लगे। अक्सर गायें उनकी बांसुरी की आवाज सुनकर वापस आ जाती थीं, लेकिन उस दिन उनका कोई पता नहीं चला। तभी बहुत दूर से गायों के रंभाने का स्वर सुनाई दिया। श्रीकृष्ण और उनके मित्र उन आवाजों का पीछा करते-करते घने जंगल के बीच जा पहुंचे। 

krishna katha in hindi- श्रीकृष्ण और जंगल की आग

सभी लोगों को यह देखकर बहुत दुख हुआ कि जंगल में भयंकर आग लगी थी और गायें आग से घिरी होने के कारण बाहर नहीं आ पा रही थीं। ग्वाले चिल्लाए, “कृष्ण! कृष्ण!! हमारी मदद करो।” ऐसे में भगवान कृष्ण ने उन्हें दिलासा दिया, “तुम लोग चिंता मत करो। अपनी आंखें बंद करो और जब तक मैं न कहूं, अपनी आंखें मत खोलना।” जब उनके दोस्तों ने ऐसा किया, तो भगवान कृष्ण ने अपनी योगशक्ति के । बल पर जंगल की सारी आग को निगल लिया। 

तत्पश्चात भगवान कृष्ण अपने मित्रों से बोले, “अब तुम लोग अपनी आंखें खोल सकते हो।” जब सबने आंखें खोलीं, तो जंगल की भयंकर आग बुझ चुकी थी। सभी ग्वाले श्रीकृष्ण की तारीफ करते हुए अपने घर वापस चल पड़े। किसी भी गाय को कोई नुकसान नहीं हुआ था। 

krishna katha श्रीकृष्ण और कामधेनु 

जब भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र का घमंड तोड़ दिया, तो देवलोक से कामधेनु नामक एक गाय उनसे भेंट करने के लिए धरती पर आई। देवताओं के धाम से आई कामधेनु के पास दिव्य शक्तियां थीं और वह किसी भी प्राणी की इच्छा पूरी कर सकती थी। 

krishna katha -श्रीकृष्ण और कामधेनु 

कामधेनु ने श्रीकृष्ण से कहा, “आप उन सभी गायों की रक्षा कर रहे हैं, जो मेरी संतानें हैं। हमारे लिए आप देवों के भी देव हैं। ब्रह्मा जी ने हमें निर्देश दिया है कि हम आपका अपने इंद्र के रूप में अभिषेक करें और अपने इंद्र के रूप में आपको स्थापित करें।”

यह कहकर कामधेनु ने स्वर्ग से लाए पवित्र जल और अपने दूध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया। फिर उसने भगवान श्रीकृष्ण से कहा, “प्रभु! आज से आप ‘गोविंद’ कहलाएंगे। आप गोविंद हैं, क्योंकि आप गौ तथा सारे संसार की रक्षा करते हैं। भगवान इंद्र तो केवल देवताओं के देवता हैं, परंतु आप सभी सजीवों के देवता हैं।” 

यह बात सुनकर गांव वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। इसके बाद कामधेनु ने श्रीकृष्ण से विदा ली और देवलोक वापस चली गई। 

Mythology story of Lord Krishna- सुदर्शन का उद्धार

शिवरात्रि का दिन था। वृंदावन के लोग अंबिका वन में विश्राम कर रहे थे। आधी रात बीत चुकी थी। तभी एक जहरीला नाग नंद बाबा को डसने के लिए आगे बढ़ा। नंद बाबा मदद के लिए चिल्लाए। उनकी आवाज सुनकर कुछ गांव वाले जाग गए और उस नाग को डंडों से मारने लगे, लेकिन उसने नंद बाबा को अपने मुंह में पकड़ रखा था। वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था। 

Mythology story of Lord Krishna- सुदर्शन का उद्धार

तभी भगवान कृष्ण ने नाग को अपने पैर से छुआ और उसने अपनी केंचुल छोड़ दी। फिर वह नाग एक सुंदर दैवीय प्राणी के रूप में बदल गया और भगवान कृष्ण के आगे प्रणाम करके बोला, “प्रभु! मैं एक विद्याधर हूं। मेरा नाम सुदर्शन है। एक बार मैंने एक अत्यंत बदसूरत मुनि को देखा। मुझे अपनी सुंदरता का बहुत घमंड था, इसलिए मैं उनका मजाक उड़ाने लगा। उनका नाम अंगिरा था। उन्होंने मुझे नाग बनने का शाप दे दिया और कहा कि जब भगवान कृष्ण अपने पैर से मेरे शरीर का स्पर्श करेंगे, तभी मैं अपने असली रूप में आ सकूँगा।” यह कहकर सुदर्शन वहां से चला गया और वृंदावन के लोग भगवान कृष्ण का स्तुति गान करने लगे। 

भगवान कृष्ण ने इस घटना के बारे में सबको बताते हुए कहा, “हमें कभी किसी का उपहास नहीं करना चाहिए। ईश्वर ने जिस प्राणी को जिस रूप में बनाया है, वह उसी रूप में जीता है। यहां किसी की मर्जी नहीं चलती।” 

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