Mythological Story in hindi-त्रिदेवों का जन्म की कथा

Mythological Story in hindi-त्रिदेवों का जन्म की कथा

Mythological Story in hindi-त्रिदेवों का जन्म की कथा

अत्रि-अनसूया की कथा 

महर्षि अत्रि एक ऐसे ऋषि थे जो अपने नाम के अनुसार तीनों गुणों सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण-से अलिप्त थे। उनको न किसी प्रकार की कामना थी, न किसी से राग-द्वेष था और न ही किसी प्रकार का लोभ-मोह था। 

उनकी पत्नी अनसूया भी उसी प्रकार पति जैसा ही व्यवहार तथा विचार रखती थीं। एक बार ब्रह्मा जी ने उनकी ऐसी वृत्ति देखकर कहा-“हे मुनिवर! आप दोनों अब संतान उत्पन्न करें, जिससे आप जैसे सुयोग्य पुत्र पैदा हों और सदाचार को विस्तार हो।” 

अत्रि ने कहा-‘हे ब्रह्मदेव! सृष्टि रचना के लिए आप स्वयं तथा संतति विस्तार के लिए दक्ष प्रजापति यह कार्य कर ही रहे हैं। हम तो तप करना चाहते हैं। यही हमारा सुख है और यही हमारे लिए श्रेष्ठ कर्म है।” 

अत्रि ने कहा- “हे ब्रह्मदेव! सृष्टि रचना के लिए आप स्वयं तथा संतति विस्तार के लिए दक्ष प्रजापति यह कार्य कर ही रहे हैं। हम तो तप करना चाहते हैं। यही हमारा सुख है और यही हमारे लिए श्रेष्ठ कर्म है।” 

ब्रह्मा जी ने कहा-“आपके ये विचार उत्तम हैं, आप तप-कर्म ही करें।” 

अत्रि अपनी पत्नी सती अनसूया के साथ दण्डकारण्य के शान्त एकान्त निर्जन वन में एकाग्रचित्त होकर निष्काम भाव से तपस्या करने लगे। तप से कुछ फल पाने या वर पाने की उनकी कोई कामना न थी। 

तपस्वी जीवन में उन्होंने धूप, शीत, वर्षा की भी परवाह नहीं की। प्राण वायु के सहारे अपने को जीवित रखा। अनेक वर्षों के पश्चात तीनों देव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने प्रसन्न होकर उन्हें एक साथ दर्शन दिए। कहा-“अत्रि, उठो। तम्हारी इस कठोर तपस्या ने हम तीनों को प्रभावित किया, इसलिए हम तीनों एक साथ आपकी इच्छित मनोकामना पूरी करने आए हैं।” 

अत्रि ने अनसूया के साथ आंखें खोली तो सामने सचमुच ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े थे। अत्रि पत्नी सहित उनके चरणों पर गिर पड़े और भाव-विह्वल हो स्तुति करने लगे। 

देवों से कहा-“प्रभो क्या मांगू? मुझे धन और यश की कामना नहीं और न ही देव-लोक, स्वर्ग-लोक तथा बैकुण्ठ में वास करने की इच्छा है। मोक्ष भी नहीं चाहिए। हमें आपका दर्शन हो गया है। हमारा तप सफल हुआ।” 

देवों ने कहा-“अत्रि! कुछ न कुछ वर तो मांगना पड़ेगा, अन्यथा हमारे प्रसन्न होने की मर्यादा घट जाएगी। इसलिए कुछ मांगो अवश्य।” 

अत्रि भाव-विह्वल होकर हाथ जोड़कर बोले-“समझ नहीं आ रहा है कि क्या मांगू। हमें तो आपके दर्शन की अभिलाषा थी, वह पूरी हुई। अब और कोई कामना नहीं है, फिर भी वर देने का इतना ही आग्रह है तो इच्छा है, इसी प्रकार नित्य आपके दर्शन हम दोनों करते रहें। इसलिए, प्रभो आप तीनों ही मेरे यहां पुत्र रूप में जन्म लें, आप सबकी बाल लीलाओं का नित्य आनंद दर्शन मिलता रहेगा। हे ब्रह्मदेव! आपने एक बार हमें सृष्टि करने का आदेश भी दिया था, इससे आपकी उस आज्ञा का पालन भी हो जाएगा।” 

ब्रह्मा हंस पड़े। श्रीविष्णु और शिव ने अत्रि की यह प्रार्थना स्वीकार की और कहा- “भक्त की इच्छा अवश्य पूरी होगी।” 

कुछ वर्ष पश्चात अनसूया की तीन संतानें हुईं। विष्णु के अंश से जन्मा बालक दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से जन्मे बालक का नाम चंद्रमा और शिव के अंश से जन्मे पुत्र का नाम दुर्वासा हुआ। इन तीनों पुत्रों के जन्म से अत्रि-अनसूया का जीवन धन्य हो गया। योगी-यति जिनका दर्शन एक बार पाने के लिए कठोर तपस्या करते हैं, वही तीनों देवता अत्रि-अनसूया के आंगन में बाल-रूप में किलकारियां मारते हुए रहते थे। इन तीनों बालकों के पालन-पोषण तथा उनकी बाल-लीलाओं को देखते हुए उन्हें अपार सुख मिलता था। 

सती अनसूया की कथा

अनसूया महान पतिव्रता थीं। त्रेता युग में राम-लक्ष्मण और सीता वनवास का समय व्यतीत करने के लिए जब दण्डकारण्य में आए थे, तब वे महर्षि अत्रि के आश्रम में रुके थे। अनसूया ने सीता को अनेक उपदेश दिए थे तथा उनके शरीर पर कई प्रकार के लेप तथा अंगराग लगाए जिससे उनके शरीर पर जंगली हवा का कोई प्रभाव न पड़े। 

अत्रि ने भाव-विह्वल होकर राम से कहा-“नारायण, आप नरलीला कर रहे हैं। दुष्टों तथा राक्षसों का विनाश करने के लिए ही आपने वन में आने की आज्ञा स्वीकार की है। दण्डकारण्य में अन्य ऋषि-मुनि भी आपके दर्शन करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कृपा करके उन्हें भी आप अपने दर्शन देकर कृतार्थ करें।” श्रीराम ने तब अन्य ऋषि-मुनियों को दर्शन देकर उनकी इच्छा पूरी की। 

महर्षि अत्रि को आकाश में स्थित सप्तर्षि मंडल में एक प्रमुख स्थान प्राप्त है। सप्तऋषियों में से ये एक ऋषि माने जाते हैं। 

mythological stories of india in hindi-अजामिल की कथा 

नारायण नाम की महिमा प्राचीन काल में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण कान्यकुब्ज (वर्तमान कन्नौज नगर) में रहता था। प्रारम्भिक जीवन में वह बहुत ही सदाचारी तथा ब्राह्मणोचित कर्म करने वाला था। वह नियमित रूप से यज्ञ, हवन आदि करके सात्विक जीवन बिताता था। 

दुर्योग से एक बार वह किसी दुराचारिणी स्त्री के प्रेम में पड़ गया और उसे अपनी पत्नी बनाकर रहने लगा। उसकी कुसंगति के कारण उसके विचार दूषित हो गए और दुष्कर्मों से वह अपनी जीविका चलाने लगा। लूट-पाट तथा हत्या जैसे बुरे कामों में हमेशा लगा रहता था। दासी से इसके दस पुत्र थे। उनमें से सबसे छोटे पुत्र से उसे बड़ा मोह था। उसका नाम उसने नारायण रखा था। 

पत्नी तथा सन्तानों की तरफ से निन्दित कर्मों को बढ़ावा देने के कारण अजामिल और भी बुरे कर्मों में लगा रहा। चोरी, झूठ, लूटपाट तथा हत्या जैसे जघन्य कामों के साथ वह मद्यपान भी अधिक करने लगा, जिससे उसका स्वास्थ्य भी खराब हो गया। 

एक बार वह बहुत बीमार पड़ा। उसकी सेवा के लिए कोई भी न आता। अब उसे पता लगा कि जिनके भरण-पोषण के लिए वह निन्दित कर्म करता रहा, वही लोग अब उसे पूछते तक नहीं। बीमारी के कारण वह अशक्त होकर खाट पर ही पड़ा रहता था। उसमें स्वयं उठने-बैठने तथा चलने-फिरने की भी शक्ति न रही। छोटा बेटा नारायण ही उसकी पुकार सुनकर उसके पास आता और उसकी बात सुनता। इसलिए वह हमेशा उसको ही ‘नारायण नारायण’ नाम लेकर पुकारता। 

उसको असाध्य रोग हो गया था। एक दिन उसे जब आभास हुआ कि वह नहीं बचेगा और उसका प्राणान्त हो जाएगा तो व्याकुल होकर वह अपने छोटे पुत्र को ‘नारायण-नारायण’ कहकर पुकारने लगा। जब तक नारायण उसके पास नहीं पहुंचा, उसने ‘नारायण-नारायण’ की रट लगाए रखी। नारायण जब उसके पास आया तो उसने जीवन से निराश एवं विह्वल होकर उसका हाथ पकड़कर कहा ‘नारायण-नारायण! तू आ गया है’ इतना कहते-कहते ही उसका प्राणान्त हो गया। शरीरान्त होने पर उसके जीव को लेने के लिए यमदूत आ पहुंचे और उसके जीव को नरकलोक में ले जाने लगे। तभी वहां विष्णु जी के दूत भी आ गए, जो उसे बैकुंठ धाम ले जाने के लिए आए थे। उन्होंने यमदूतों से कहा-“तुम लोग अजामिल के जीव को नरक नहीं ले जा सकते। मरते समय इसने कई बार भगवान विष्णु को ‘नारायण-नारायण’ कह पुकारा था, अतः अब यह जीव स्वर्ग का अधिकारी है।” 

यमदूत हंसकर कहने लगे-“इसके सारे जीवन का लेखा-जोखा चित्रगुप्त की बही में लिखा है। उसके अनुसार यह पूरे जीवन में हमेशा दुष्ट और पाप कर्मों में लिप्त रहा। तुम जो ‘नारायण’ की बात करते हो, तो यह नारायण के रूप में विष्णु भगवान को नहीं पुकार रहा था। यह तो अपने छोटे बेटे को उसका नाम लेकर बुला रहा था।” 

देवदूतों ने कहा-“प्रारंभिक जीवन में यह सत्कर्मी था। एक स्त्री की कुसंगति में पड़कर इसने पाप कर्म किए हैं। इस सबके बाद बेटे के नाम के बहाने ही सही, यह हमेशा ‘नारायण-नारायण’ कहता रहता था और अन्त समय में इसने ‘नारायण-नारायण’ कहते हुए अपने प्राण त्यागे, इसलिए यह जीव इतने पुण्य से ही बैकुंठ लोक जाने का अधिकारी है। इसको हम अपने साथ बैकुंठ लोक में ले जाएंगे।” 

इस प्रकार अजामिल ‘नारायण’ के नाम की महिमा से बैंकुठ जाने का अधिकारी बन गया। 

indian mythological stories in hindi-कृष्ण-जरासंध युद्ध प्रसंग

सच्चाई की जीत 

कंस की दोनों पत्नियां मगध राज जरासंध की पुत्रियां थीं। कंस की मृत्यु के बाद वे अपने पिता के यहां चली गईं। अपनी पुत्रियों के वैधव्य की सूचना पाकर जरासंध को घोर दुख हुआ। अत्यंत क्रोधित होकर उसने यदुवंश के नाश का प्रण कर लिया। उसने अपनी विशाल सेना लेकर मथुरा को चारों ओर से घेर लिया। 

कृष्ण-जरासंध युद्ध प्रसंग

श्रीकृष्ण ने तो अवतार ही पृथ्वी का भार उतारने के लिए लिया था। जब जरासंध जैसा पापी स्वयं ही असुरों को इकट्ठा करके लाया है तो जिस काम के लिए अवतरित हुए हैं, उसे करना चाहिए। इसी विचार के साथ श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप का ध्यान किया। भगवान के दो दिव्य रथ आकाश से उतरे। उनमें भगवान के आयुध-चक्र, गदा, धनुष, तरकश आदि तथा बलराम के हल और मूसल थे। 

दोनों भाई शस्त्रों से सुसज्जित होकर रथों पर बैठे। श्रीकृष्ण के रथ पर गरुड़ की ध्वजा थी और बलराम के रथ पर तालध्वजा। नगर से बाहर निकलते ही श्रीकृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाया। शंख की भयानक ध्वनि से शत्रुओं के हृदय कांप उठे। 

जरासंध ने आगे बढ़कर कहा, “मुझे तेरे साथ लड़ने में लाज आती है। त अपने मामा का हत्यारा है। मैं तेरे साथ नहीं लडूंगा। बलराम ! यदि तुममें हिम्मत है तो आ जा। तेरे साथ मैं लडूंगा। या तो मैं मरूंगा या तुझे मारूंगा।” 

श्रीकृष्ण ने कहा, “वीर पुरुष इतना बढ़-चढ़कर नहीं बोला करते।” 

कृष्ण-बलराम की सेना जरासंध की महासमुद्र जैसी सेना के सामने बहुत ही छोटी थी, फिर भी दोनों भाइयों ने जरासंध की सेना को तहस-नहस कर दिया। भगवान कृष्ण के धनुष से अनगिनत बाण निकल रहे थे। बलराम के हल-मूसल से बड़े-बड़े वीरों का मर्दन होने लगा। जरासंध की संपूर्ण सेना का नाश हो गया, तब बलराम जी ने जरासंध को बांधकर श्रीकृष्ण के चरणों में डाल दिया। श्रीकृष्ण ने सोचा, इसे छोड़ देना ही चाहिए ताकि यह बार-बार सेना लेकर आए और मैं उसका नाश करता रहूं। कृष्ण ने उसकी उपेक्षा के साथ उसे छोड़ दिया। 

जरासंध लज्जित होकर अपनी राजधानी लौट आया। जरासंध के साथी राजाओं ने उसे समझा-बुझाकर पुनः मथुरा पर आक्रमण करने की सलाह दी। 

इस तरह जरासंध ने सत्रह बार मथुरा पर आक्रमण किया। हर बार श्रीकृष्ण ने उसकी सारी सेना नष्ट कर दी। अट्ठारहवीं बार प्रबल आक्रमण करने के विचार से जरासंध ने खूब भारी तैयारी करके राजधानी से कूच किया। उसी समय नारद द्वारा भेजा हुआ कालयवन अपने तीन करोड़ म्लेच्छों के साथ मथुरा पर चढ़ आया। 

कृष्ण-जरासंध युद्ध प्रसंग

श्रीकृष्ण-बलराम ने रणनीति तैयार कर ली-एक ओर कालयवन था तो दूसरी ओर जरासंध। ऐसे में यदि एक ओर से ध्यान हट गया तो हमारे बंधु-बांधव मारे जाएंगे, यह सोचकर दोनों भाइयों ने समुद्र के भीतर एक विशाल नगर बनवाया, जिसमें वायु भी प्रवेश नहीं कर सकती थी। भगवान के स्मरण करते ही विश्वकर्मा ने द्वारिकापुरी का निर्माण कर दिया और रातों-रात मथुरावासियों को सोते हुए ही उसमें पहुंचा दिया। विश्वकर्मा ने दिव्य नगर बनाया था। इन्द्र ने सुधर्मासभा भेज दी। उस सभा में बैठकर भूख-प्यास तथा अधर्म छू भी नहीं सकते थे। 

श्रीकृष्ण बलराम के साथ शस्त्र धारण किए ही मथुरा के विशाल द्वार से निकले। 

कालयवन ने एक दिव्य, अद्भुत पुरुष को देखा तो उसने शीघ्र ही पहचान लिया कि यही वासुदेव हैं ! यह बिना शस्त्र के ही इधर आ रहा है। कालयवन कृष्ण की ओर दौडा। कष्ण ने उसे देखा तो रण छोडकर दूसरी ओर मुंह करके भाग निकले। आगे-आगे रण छोड़ नाथ, पीछे-पीछे कालयवन। कृष्ण भागते-भागते एक गुफा में घुस गए। कालयवन भी पीछे-पीछे गुफा में गया। वह चिल्ला रहा था, “अरे, अपने आपको वीर पुरुष कहलाता है, अब रण छोड़कर क्यों भाग रहा है।” 

उस गुफा में एक पुरुष सो रहा था। श्रीकृष्ण ने अपना दुपट्टा उसे ओढ़ा दिया और स्वयं एक खंभे की ओट में छिप गए। कालयवन ने देखा तो सोचा-कृष्ण ही यहां छिपकर सो गया है। उसने एक लात सोए हुए पुरुष पर जमा दी। वह पुरुष क्रोध से उठ बैठा। उसने कालयवन की ओर दृष्टि डाली। कालयवन उसी समय भस्म हो गया। वह इक्ष्वाकुवंश के मुचुकुंद नामक प्रतापी राजा थे। जब देवासुर संग्राम चल रहा था, उस समय राजा मुचुकुंद ने देवताओं की बहुत समय तक रक्षा की थी। इन्द्र ने उस समय राजा को कहा था कि मोक्ष के अतिरिक्त आप जो भी मांगेंगे हम वही आपको देंगे। राजा मुचुकुंद ने निद्रा का ही वर मांगा था। देवताओं ने उन्हें विश्राम करने के लिए निद्रा का वरदान दिया और कहा था-‘तुम्हारी निद्रा भंग करने वाला अपने-आप भस्म हो जाएगा।’ 

कालयवन के भस्म हो जाने पर श्रीकृष्ण भगवान ने राजा मुचुकुंद को दर्शन दिए और उन्हें ज्ञानोपदेश देकर परमपद प्राप्त करने का वर दिया। मुचुकुंद बदरिकाश्रम में जाकर भगवान की आराधना करने लगे। 

कृष्ण मथुरा लौट आए उन्होंने कालयवन की सेना का संहार किया और सारा धन छीनकर द्वारिका चलने की तैयारी करने लगे। इतने में जरासंध अपनी विशाल सेना के साथ अट्ठारहवीं बार मथुरा पर आक्रमण के लिए आ धमका। श्रीकृष्ण ने ऐसा दिखावा किया जैसे वे भयभीत हो गए हैं और रथ, धन आदि छोड़कर पैदल ही भागने लगे। जरासंध भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण ऊंचे पवर्षण पर्वत पर चढ़ गए। जरासंध ने खूब ढूंढा, लेकिन उन्हें कृष्ण कहीं नजर नहीं आए। तब उसने पर्वत में आग लगा दी। कृष्ण ने देखा, पर्वत जल रहा है तो ऊपर से पृथ्वी पर कूद पड़े और समुद्र से घिरी द्वारिकापुरी में पहुंच गए। जरासंध ने समझा कृष्ण पर्वत की आग में जलकर भस्म हो गए; अतः अपनी राजधानी लौट आया। धर्म और सत्य को कोई जला पाया है भला। वह कभी नष्ट नहीं होता। 

mythological stories in hindi-राजा बलि की कथा 

लक्ष्मी कहां रहती हैं

एक बार इन्द्र ने बड़ी कठिनता से राजा बलि को ढूंढ निकाला। उस समय वे छिपकर किसी खाली घर में गदहे के रूप में कालक्षेप कर रहे थे। इन्द्र और बलि में कुछ बातें हो रही थीं। बलि ने इन्द्र को तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया तथा काल की महत्ता बतलाई। बात दोनों में चल रही थी कि एक अत्यन्त दिव्य स्त्री बलि के शरीर से निकल आई। उसे देख इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बलि से पूछा-“दानवराज! तुम्हारे शरीर से यह प्रभामयी कौन-सी स्त्री बाहर निकल पड़ी? यह देवी है अथवा आसुरी या मानुषी?” 

 

mythological stories in hindi-राजा बलि की कथा 

बलि ने कहा-“न यह देवी है, न मानुषी और न आसुरी। यह क्या है तथा इसे क्या अभिप्रेत है, सो तुम इसी से पूछो।” 

“देवी! तुम कौन हो और असुरराज को छोड़कर मेरी ओर क्यों आ रही हो?” 

इस पर वह प्रभामयी शक्ति बोली-“देवेन्द्र! न तो मुझे विरोचन जानते है और न उनके पुत्र ये बलि ही। पण्डित लोग मुझे दुस्सहा, विधित्सा, भूति, श्री औ लक्ष्मी के नामों से पुकारते हैं। तुम और दूसरे देवता भी मुझे नहीं जानते।” 

इन्द्र ने पूछा-“आर्ये ! तुम बहुत दिनों तक बलि के पास रहीं। अब बलि में कौन-सा दोष और मुझमें गुण देखकर उन्हें छोड़ मेरे पास आ रही हो?” 

लक्ष्मी ने कहा- “देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से धाता, विधाता कोई भी नहीं हटा सकता। काल के प्रभाव से ही मैं एक को छोड़कर दूसरे के पास जाती हूं। इसलिए तुम बलि का अनादर मत करो।” 

इन्द्र ने पूछा, “सुन्दरी! तुम अब असुरों के पास क्यों नहीं रहना चाहतीं?” 

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लक्ष्मी बोलीं-“जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रहते हैं, मैं वहीं रहती हूं। असुर इस समय इनसे विमुख हो रहे हैं। पहले ये सत्यवादी, जितेन्द्रिय और ब्राह्मणों के हितैषी थे। पर अब ये ब्राह्मणों से ईर्ष्या करने लगे हैं, जठे हाथ घी छूते हैं, अभक्ष्य-भोजन करते और धर्म की मर्यादा तोड़कर मनमाना आचरण करते हैं। पहले ये उपवास और तप में लगे रहते थे। प्रतिदिन सूर्योदय के पहले जागते और रात में कभी दही या सत्तू नहीं खाते थे। रात के आधे भाग में ही ये सोते थे, दिन में तो ये कभी सोने का नाम नहीं लेते थे। दीन, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी तथा स्त्रियों पर दया करते तथा उनके लिए अन्न-वस्त्र की व्यवस्था करते थे। व्याकुल, विषादग्रस्त, भयभीत, रोगी, दुर्बल, पीड़ित तथा जिसका सर्वस्व लुट गया हो, उसको सदा ढाढ़स बंधाते तथा उसकी सहायता करते थे। पहले ये कार्य के समय परस्पर अनुकूल रहकर गुरुजनों तथा बड़े-बूढ़ों की सेवा में सदा दत्तचित्त रहते थे। ये उत्तम भोजन बनाकर अकेले ही नहीं खाते थे। पहले दूसरों को देकर पीछे अपने उपभोग में लेते थे। सब प्राणियों को अपने ही समान समझकर उन पर दया करते थे। चतुरता, सरलता, उत्साह, निरहंकारता, सौहार्द्र, क्षमा, सत्य, दान, तप, पवित्रता, दया, कोमल वाणी और मित्रों से प्रगाढ़ प्रेम-ये सभी गुण इनमें सदा मौजूद रहते थे। निद्रा, आलस्य, अप्रसन्नता, दोषदृष्टि, अविवेक, असंतोष और कामना-ये दुर्गुण इन्हें स्पर्श तक नहीं कर सके थे। पर अब तो इनकी सारी बातें निराली तथा विपरीत ही दीख पड़ती हैं। धर्म तो इनमें अब रह ही नहीं गया है। ये सदा काम-क्रोध के वशीभूत रहते हैं। बड़े-बूढ़ों की सभाओं में ये गुणहीन दैत्य उनमें दोष निकालते हुए उनकी हंसी उड़ाया करते हैं। वृद्धों के आने पर ये लोग अपने आसनों पर से उठते भी नहीं। स्त्री पति की, पुत्र पिता की आज्ञा नहीं मानता। माता, पिता, वृद्ध, आचार्य, अतिथि और गुरुओं का आदर इनमें उठ गया। संतानों के उचित लालन-पालन पर ध्यान नहीं दिया जाता। इनके रसोइये भी अब पवित्र नहीं होते। छोटे बालक आशा लगाकर टकटकी बांधे देखते ही रह जाते हैं और दैत्य लोग खाने की चीजें अकेले चट कर जाते हैं। ये पशुओं को घर में बांध देते हैं, पर चारा और पानी देकर उनका आदर नहीं करते। ये सूर्योदय तक सोए रहते हैं तथा प्रभात को भी रात ही समझते हैं। प्रायः दिन-रात इनके घर में कलह मचा रहता है। अब इनके यहां वर्ण संकर संतानें होने लगी हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणों और मूों को ये एक-समान आदर या अनादर देते हैं। ये अपने पूर्वजों द्वारा ब्राह्मणों को दी हुई जागीरें नास्तिकता के कारण छीन लेते हैं । शिष्य अब गुरुओं से सेवा करवाते हैं। पत्नी पति पर शासन करती है और उसका नाम ले-लेकर पुकारती है।

संक्षेप में ये सब-के-सब कृतघ्न, नास्तिक, पापाचारी और स्वैरी बन गए हैं। अब इनके बदन पर पहले का-सा तेज नहीं रह गया। इसलिए देवराज ! अब मैंने भी निश्चय कर लिया कि इनके घर में नहीं रहूंगी। इसी कारण से दैत्यों का परित्याग करके तुम्हारी ओर आ रही हूं। तुम मुझे स्वीकार करो। जहां मैं रहूंगी, वहां आशा, श्रद्धा, धृति, क्षान्ति, विजिति, संतति, क्षमा और जया-ये आठ देवियां भी मेरे साथ निवास करेंगी। मेरे साथ ही ये सभी देवियां भी असुरों को त्यागकर आ गई हैं। तुम देवताओं का मन अब धर्म में लग गया है, अतएव अब हम तुम्हारे ही यहां निवास करेंगी।” 

तदनन्तर इन्द्र ने उन लक्ष्मीजी का अभिनन्दन किया। सारे देवता भी उनका दर्शन करने के लिए वहां आ गए। तत्पश्चात सभी लौटकर स्वर्ग में आए। नारदजी ने लक्ष्मीजी के आगमन की प्रशंसा की। फिर पुनः सभी ने बाजे-गाजे के साथ पुष्प और अमृत की वर्षा की। तब से फिर अखिल संसार धर्म तथा सुखमय हो गया। 

indian mythological stories with morals in hindi-युधिष्ठिर कथा प्रसंग 

असत्य का प्रभाव महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य पाण्डव सेना का संहार कर रहे थे। जो भी पाण्डव पक्ष का वीर उनके सामने पड़ता, उसी को मार गिराते। बड़े-बड़े महारथी चिन्तित हो उठे थे। आचार्य के हाथ में शस्त्र रहते तो उन्हें कोई पराजित कर नहीं सकता था। वे स्वयं शस्त्र रख दें, तभी विजय सम्भव है। युद्ध के प्रारम्भ में उन्होंने स्वयं बताया कि कोई अत्यन्त अप्रिय समाचार विश्वस्त व्यक्ति के द्वारा सुनाई पड़ने पर वे शस्त्र त्यागकर ध्यानस्थ हो जाया करते हैं। पाण्डवों की विपत्ति के नित्य सहायक श्रीकृष्ण ने सबको यह बात स्मरण कराई। भीमसेन को एक उपाय सूझ गया। वे द्रोण पुत्र अश्वत्थामा से युद्ध करने लगे। युद्ध करते समय भीम अपने रथ से उतर पड़े और अश्वत्थामा के रथ के नीचे गदा लगाकर रथ के साथ उसे युद्ध भूमि से बहुत दूर फेंक दिया। कौरव सेना में एक अश्वत्थामा नाम का हाथी भी था। भीम ने एक ही आघात से उसे भी मार दिया और तब द्रोणाचार्य के सम्मुख जाकर पुकार-पुकारकर कहने लगे-‘अश्वत्थामा मारा गया। अश्वत्थामा मारा गया।’ 

द्रोणाचार्य चौंके, किन्तु उन्हें भीमसेन की बात पर विश्वास नहीं हुआ। युधिष्ठिर से सच्ची बात पूछने के लिए उन्होंने अपना रथ बढ़ाया। इधर, श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा-“महाराज! आपके पक्ष की विजय हो, इसका दूसरा कोई उपाय नहीं। आचार्य के पूछने पर, अश्वत्थामा मारा गया यह बात आपको कहनी ही चाहिए। मेरे कहने से आप यह बात कहें।” 

धर्मराज युधिष्ठिर किसी प्रकार झूठ बोलने को प्रस्तुत नहीं थे, किन्तु श्रीकृष्ण का कहना वे टाल भी नहीं सकते थे। द्रोणाचार्य ने उनके पास आकर पूछा कि क्या भीमसेन की बात सत्य है तो बड़े कष्ट से उन्होंने कहा-‘अश्वत्थामा मारा गया’ असत्य उनसे फिर भी बोला नहीं गया। उनके मुख से आगे निकला-‘मनुष्य वा हाथी’ परन्तु जैसे ही युधिष्ठिर ने कहा-‘अश्वत्थामा मारा गया’ वैसे ही श्रीकृष्ण ने अपना पांचजन्य शंख बजाना प्रारम्भ कर दिया। युधिष्ठिर के अगले शब्द उस शंख ध्वनि के कारण द्रोणाचार्य सुन ही नहीं सके। 

धर्मराज युधिष्ठिर का रथ उनकी सत्यनिष्ठा के प्रभाव से सदा पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर ही रहता था, किन्तु इस छल के वाक्य के बोलते ही उनके रथ के पहिए भूमि पर लग गए और आगे से उनका रथ भी दूसरे रथों के समान भूमि पर ही चलने लगा। 

hindu mythology stories in hindi-सृञ्जय की कथा 

लोभ का दुष्परिणाम प्राचीन काल में सृञ्जय नाम के एक नरेश थे। उनके कोई पुत्र नहीं था, केवल एक कन्या थी। पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों की सेवा प्रारम्भ की। राजा के दान एवं सम्मान से संतुष्ट होकर ब्राह्मणों ने देवर्षि नारद से राजा के पुत्र होने की प्रार्थना की। ब्राह्मणों की प्रार्थना से द्रवित होकर देवर्षि ने राजा से पूछा “तुम कैसा पुत्र चाहते हो?” 

अब राजा सृञ्जय के मन में लोभ आया। उन्होंने प्रार्थना की-“आप मुझे ऐसे पुत्र का वरदान दें जो सुन्दर हो, स्वस्थ हो, गुणवान हो तथा उसके मल-मूत्र, थूक-कफ आदि स्वर्णमय हों।” 

देवर्षि ने कुछ सोचकर ‘एवमस्तु’ कह दिया। 

उनके वरदान के अनुसार राजा को थोड़े दिन में पुत्र प्राप्त हुआ। उस पुत्र का नाम राजा ने सुवर्णष्ठीवी रखा। अब सृञ्जय के धन क्या ठिकाना था। उनके पुत्र का थक तथा मल-मूत्र-सभी स्वर्ण होता था। राजा ने अपने राजभवन के सब पात्र, आसन आदि स्वर्ण के बनवा लिए। इसके अनन्तर उन्होंने पूरा राजभवन ही स्वर्ण का बनवाया। उसमें दीवार, खंभे, छत तथा भूमि आदि सब सोने के थे। 

राजा के पुत्र सुवर्णष्ठीवी का समाचार सारे देश में फैल गया। दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे। डाकुओं ने भी यह समाचार पाया। उनके अनेक दल परस्पर मिलकर उस राजकुमार का हरण करने का प्रयत्न करने लगे। अवसर पाकर एक 

रात दस्यु राजभवन में घुस आए और राजकुमार को उठा ले गए। 

वन में पहुंचने पर दस्युओं में विवाद हो गया। अधिक समय तक राजकुमार को जीवित छिपाए रखना अत्यन्त कठिन था। सबने निश्चय किया कि सुवर्णष्ठीवी को मारकर जो स्वर्ण मिले, उसे परस्पर बांट लिया जाए। उन निर्दयी दस्युओं ने राजकुमार के टुकड़े कर डाले किंतु उसके शरीर से उन्हें एक रत्ती भी सोना नहीं मिला। 

लोभ के वश होकर राजा सृञ्जय ने ऐसा पुत्र मांगा कि उसकी रक्षा असम्भव हो गई। उन्हें पुत्र-शोक सहन करना पड़ा। लोभवश डाकुओं ने राजकुमार की हत्या की। 

जिस लोभ के कारण वे केवल पाप और दण्ड के भागी बने। उस लोभ से किसी को कुछ लाभ न हुआ। 

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