लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

गिरजाघर की घड़ी ने जब एक-एक करके बारह घंटे बजाए तो पुराने पीपल की सबसे ऊंची पुंगी पर बैठा रात-पांखी अपने डैने फड़फड़ाता हुआ थरथराया और पेड़ के कोटर में जा बैठा। कुहासे से ढकी जनवरी की उस सर्द रात की धुंध भी जैसे आहिस्ता-आहिस्ता ठिठकी। बूंद-बूंद रोशनी बिखेरते जुगनू अहाते में बनी। कब्रों की पुश्त पर उड़ने लगे। वह पूरे चांद की रात थी, लेकिन बादलों की स्याही ने पीले निरीह चांद को उस सर्दी में उभरने ही नहीं दिया था। 

पूर्व दिशा में बहती तेज, सर्द हवा के थपेड़ों को अपनी पथरीली दीवार पर झेलता दिल्ली का लाल किला उस रात भी खामोशी, अंधियारे और सन्नाटे में गुम था। उसके बुर्ज और कंगूरे, बारादरियां और मुंडेरें सब मानो गहरी धुंध में डूब गए थे।

लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

तभी लालकिले के उस घुप्प अंधियारे में भीतर बने नौबतखाने के दरवाजे से ऊंचा-पूरा एक अंग्रेज दाखिल हुआ। उसके सिर पर फैल्ट हैट था, जिस्म पर भारी ओवरकोट और मुंह में चुरुट। उसके भारी जूतों की आवाज लाल किले की खामोशी को तोड़ रही थी। ‘खट खट खट् ‘ की आवाज करता हुआ बड़े ही इत्मीनान से वह नौबतखाने के गलियारे में चहलकदमी कर रहा था। 

उसी वक्त लालकिले के चौकीदार के हाथ की आधी फूटी चिमनी वाली लालटेन रोशनी कम धुआं ज्यादा उगलती नौबतखाने में दाखिल हुई। अपनी कोठरी में लिहाफ में दुबका हुआ था वह बूढ़ा मुलाजिम। लेकिन गलियारे में हो रही चहलकदमी की आवाज ने उसे चौकन्ना कर दिया था और अपनी फूटी चिमनी वाली लालटेन उठाकर वह नौबतखाने में आ गया था। लालकिले के उस प्रशस्त, पथरीले कक्ष में कभी शहनाइयां बजा करती थीं और नौबतें झरती थीं, लेकिन अरसे से वह हिस्सा सुनसान पड़ा हुआ था। परंतु शीत की उस सिहरती रात कौन आ गया था उस उपेक्षित वीराने में। 

लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

बूढ़े चौकीदार अनवर ने लालटेन ऊपर उठाई तो धीमी, म्लान पीताभा में फिरंगी साहब नजर आए। उस चौकीदार को देख कर वे बोले, “किधर जाता है 

चौकीदार?” 

गोरे हुक्काम को बिलकुल अपने सामने देखकर बूढ़े अनवर की तो मानो घिघ्यी ही बंध गई। वह बोला, “गस्त पर हैं, हुजूर, गश्त पर ।” 

“ठीक है, ठीक है, अपना ड्यूटी करो,” कहकर गोरे साहब हंसे। फिर अवाक अनवर के देखते ही देखते कुहासे में विलीन हो गए। हां, सचमुच ही हवा में घल गए वे साहब। दहशतजदा अभागा चौकीदार मारे खौफ के नौबतखाने में ही अचेत हो गया। 

कौन थे गोरे साहब? कोई नहीं जानता। 

वे महावीर प्रसाद द्विवेदी भी नहीं जानते, जिन्होंने अपनी अब दुर्लभ हो गई पुस्तक, ‘अद्भुत आलाप’ में इस अजूबे का बड़ी ही रहस्यमयता से ब्योरा दिया है। ‘सरस्वती’ के यशस्वी संपादक और मूर्धन्य कवि-समालोचक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन् 1903 में ‘अद्भुत आलाप’ नामक विचित्र कथाओं से भरे जिस ग्रंथ का सृजन किया था, उसमें लालकिले में भटकने वाली इस फिरंगी अशरीरी काया का भी जिक्र है। लेकिन सिर्फ यही अशरीरी क्यों, उन कुछ और भी रहस्यमयी आत्माओं का उल्लेख महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया है, जिनका भेद आज तक कोई जान नहीं पाया। 

ऐसा कहा जाता है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि जिस वीराने में चालीस दिन तक चिराग न जले, वहां कुछ ऐसी शक्तियां कब्जा जमा लेती हैं, जिन्हें पिशाच कहा जाता है। देखने वालों का कहना है कि लाल किले के कुछ सुनसान हिस्सों में कभी-कभार ऐसी आत्माएं नजर आई हैं। उनकी खासियत है कि वे किसी को परेशान नहीं करतीं, बशर्ते उनका अपमान न किया जाए। 

लेकिन यदि उनके साथ बदतमीजी की जाए तो कहा जाता है कि तब अंजाम वही होगा, जिसको चौकीदारों के एक समूह ने सन् 1908 की एक रात भोगा था। 

वे सब नामुराद लालकिले के एक कमरे में बैठे बरसात की उस रात मुगल बादशाहों का मजाक उड़ा रहे थे। खासकर उन मुगलों का, जिनमें कुछ शारीरिक ऐब था। उनमें से एक मुगल शाहजादा युसुफ बख्त भी था, जो कुछ-कुछ लंगड़ा कर चलता था। एक नौजवान चौकीदार युसुफ बख्त का जिक्र करते हुए बोला, “क्या बेढब चाल थी उसकी एक पैर यहां, एक पैर वहां ।” 

इस पर सारे चौकीदार हंसने लगे। 

तभी हवा का एक झोंका आया और कमरे में रखी लालटेन की लौ कंपकंपाने लगी। बिजली भी चमकी। फिर पूरा आसमान तेज गर्जना से भर आया। 

दूसरा चौकीदार बोला, “और अपने वह बहादुरशाह जफर, दाढ़ी कितनी. सफेद हो गई थी उनकी बस, थोड़ी-सी नील देने की जरूरत भर थी और भी ज्यादा चमकने लगती। वाह, क्या जलवा था उनकी दाढ़ी का?” 

लेकिन उसका वाक्य पूरा होता, इससे पहले ही एक बेहद भयानक अट्टहास लालकिले की उस खामोश सुनसान बरसाती रात में उभरा। ऐसा अट्टहास कि सुनने वाले का खून पानी हो जाए, मारे दहशत के और कमरे के बीचोबीच शून्य में से एक शक्ल अवतरित हुई और गुर्रा कर बोली, “तुम बदतमीजों को किसने यहां पर रखा है?” 

लगभग 7 फीट का कद था उस अशरीरी का। बेहद सख्त चेहरा था उसका, तमतमाया हुआ और आंखें जैसे जल रही थीं। वह अशरीरी जिस तरह से आया था उसी तरह से हवा में घुल भी गया था। 

शायद वह वही पहलवान था, जिसे बहादुरशाह जफर ने अपनी खिदमत में रखा था। बतलाया जाता है कि वह पहलवान लालकिले के पिछवाड़े आधी रात को जब-तब सूने मैदान में दंड-बैठक करता हुआ, अपनी मौत के लगभग पौने दो सौ बरस बाद आज भी अकसर नजर आ जाता है। लालकिले में फिरंगियों का प्रतिरोध करते समय उसकी गर्दन कैप्टन हडसन ने कलम कर दी थी। 

लेकिन वह हसीना कौन है जो अब भी लालकिले में तैनात अफसरों के घरों के दरवाजे रात के दो बजे के बाद खटखटाती है-खासकर बरसात की भीगी रातों में। 

सन् 1954 में कैप्टन कुलदीप कपूर लालकिले में नियुक्त थे। लालकिले में स्थित पुरानी बैरकों और तलघरों के प्रबंधन का जिम्मा था उन पर। बरसात की उस रात तेज हवा दिल्ली के हर दरवाजे को खटखटा रही थी। कैप्टन कुलदीप कपूर के बंद दरवाजे पर भी दस्तक हुई-खट खट खट्। कैप्टन कपूर अकेले ही रहते थे। नींद कच्ची थी उनकी। दरवाजे पर हो रही आवाज से उनकी आंख खुल गई। बाहर बरसात का शोर था और हवा का भी। कैप्टन कुलदीप कपूर असमंजस में अपने बिस्तर पर-बंद दरवाजे को स्थिर दृष्टि से देखते हुए उत्कर्ण से बैठे रह गए। 

दरवाजे पर दस्तक दोबारा हुई। इस दफा आवाज भी सुनाई दी, “दरवाजा खोलिए, सुन रहे हैं न, खुदा के वास्ते मुझे भीतर आने दीजिए।” 

कुलदीप कपूर चिहुंके। 

किसी औरत की लरजती हुई आवाज थी। उसमें आरजू भी थी और इसरार भी। पुरअसर उस पुकार की उपेक्षा कैप्टन कपूर नहीं कर पाए। आनन-फानन में वे उठे और दरवाजा खोल दिया। 

बरसाती हवा का एक तेज झोंका आया और साथ ही बरसात की बोछार भी-जो कमरे में बिछे कारपेट को गीला कर गई। आधी रात के अधेरे में घुली हुई बरसात की धुंध थी। तब भी बेहद खूबसूरत, वही कमउम्र लड़की कैप्टन कपूर को नजर आ गई। वह दहलीज पर अचकचाई हुई खड़ी थी। जिस्म पर बेहद कीमती जरी का लिबास, सलमा सितारा टंकी हुई ओढ़नी, पैरों में बेशकीमती जूतियां। किसी शाही खानदान की लगती थी वह हसीना। उसके कपड़े भीगे हुए थे। दूध और आलते से मिले-जुले रंगत वाली देह थी और बड़ी-बड़ी आंखें थीं। चेहरे पर झूल आई लटों से पानी टपक रहा था। 

कैप्टन कपूर को सामने देखकर वह चिहुंकी और फिर परेशान होकर किंचित पीछे हटी। 

“हाय अल्ला, मैं गलत जगह आ गई।” घबराए हुए लहजे में वह बोली, “मुआफ कीजिए आप वो नहीं हैं।” और उसने गलियारे में दौड़ लगा दी। उसकी हैरानी, परेशान आवाज उस निविड़ रात्रि के सन्नाटे में गूंजती रही, ‘रुकिए मेरे सरताज मैं आ रही हूं।’ 

लालकिले में भटकती आत्माएं का अनसुलझे रहस्य

उस रहस्यमयी मुस्लिम स्त्री को देखने वाले कैप्टन कपूर ही अकेले नहीं थे। इससे पहले सन् 1892 में कर्नल फोरसाइथ ने भी उसे देखा था, उसके बाद सन् 1896 में मेजर राबिंसन ने और फिर सन् 1956 और 1959 की दो बरसात की भीगी रातों में लालकिले में तैनात दो संतरियों ने भी। वही बरसात, भीगा बेशकीमती लिबास, चेहरे पर हैरानी, बड़ी-बड़ी आंखों में भटकती किसी की तलाश और किले के सन्नाटे में गूंजती आवाज-रुकिए मेरे सरताज, मैं आ रही हैं और पत्थरों को खटखटाती उसके कदमों की आहट।’ 

कौन है वह हसीना? पिछले डेढ़ सौ बरसों से लालकिले में किसे तलाश कर रही है वह? कोई नहीं जानता। कोई जानेगा भी नहीं। 

लेकिन क्या बहादुरशाह जफर भी लालकिले के सूने गलियारों में अक्सर चहलकदमी करते हैं? 

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो ‘अद्भुत आलाप’ में अपने अफसर विंसेट डफ के तजुर्बे का संदर्भ देकर यही लिखा है कि कर्नल डफ झांसी में महावीर प्रसाद द्विवेदी के उच्चाधिकारी थे और तबादले के बाद दिल्ली के लालकिले में तैनात कर दिए गए थे। इसी लालकिले में उनकी गोरी मेम लिली डफ काफी बीमार हो गई थी। उन पर कोई इलाज कारगर नहीं हो रहा था। बेहद परेशान थे डफ साहब। 

अगस्त की उस काली रात का वाकया है यह। मूसलाधार बरसात हो रही थी। सड़कें सुनसान हो गई थीं। चारों तरफ गहरी निस्तब्धता थी। बेचैन डफ साहब अपनी अधबेहोश पड़ी मेम के सिरहाने से उठकर खिड़की तक चले आए थे। अपनी बीवी की बीमारी ने उन्हें काफी उदास कर दिया था। 

तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दी, “फिरंगी साहब, फिरंगी साहब।” 

खिड़की के बाहर से आ रही थी वह आवाज । और फिर वही गंभीर स्वर दोबारा सनाई दिया, “फिक्र मत करो, लो इसे संभालो सब ठीक हो जाएगा। इसे अपनी बेगम की बांह पर पहना देना।” 

डफ साहब चौंके। उन्होंने देखा कि खिड़की के बाहर नीचे जमीन पर एक बूढ़ा मुसलमान खड़ा था। उसकी जरीदार टोपी की कलगी में लगा हीरा बेहद अद्भुत आभा से चमक रहा था। गले में बड़े-बड़े मोतियों का हार था। घुटनों तक झूल आई थी उसकी कीमती शेरवानी। बिलकुल शाही लिबास था उस बूढ़े, कुलीन व्यक्ति का। 

‘क्या ये बहादुरशाह जफर हैं?’ कैप्टन डफ ने सोचा। तस्वीरों में देखा तो आखिरी मुगल की याद आ गई थी उन्हें और वे हैरत में थे।

तभी ‘खट्’ से आकर उनके पास कुछ गिरा। डफ साहब ने नजरें उठाईं। वे बूढ़े सज्जन गायब थे। डफ साहब ने उस ताबीज को अपनी बीमार बीवी लिली डफ की बांह पर बांध दिया। दो रोज में ही वे ठीक हो गईं। 

लेकिन उसी रात वह ताबीज उनकी बांह से अपने आप गायब हो गया। कहां गया ताबीज, पता ही नहीं चल पाया। 

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