विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां-राजा विक्रमादित्य और साधु

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां-

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां-राजा विक्रमादित्य और साधु

बहुत समय पहले की बात है। विक्रमादित्य नामक राजा उज्जैन पर शासन करते थे। वे अपने समय के सभी शासकों में बहुत लोकप्रिय और निडर थे। एक दिन जब वे दरबार का काम देख रहे थे, तो एक साधु उनके पास आया। उसने उन्हें एक फल दिया। राजा के अनुसार, वह फल उन्हें दरबार में भेंट किया गया था, इसलिए उस पर सारी प्रजा का अधिकार था। उन्होंने खजांची से कहा कि उस फल को लेप लगाकर सावधानी से रख दिया जाए। 

 

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां-

अगले दिन साधु फिर दरबार में आया और उसने राजा विक्रमादित्य को एक अन्य फल भेंट किया। इस तरह साधु बारंबार राजा के पास आने लगा। वह हर बार राजा को एक फल भेंट में देता और वापस चला जाता। साधु राजा से किसी भी तरह की कोई बात नहीं करता था। 

एक दिन साधु ने दरबार में आकर राजा से कहा, “हे राजन! वे सारे फल कहां हैं, जो मैंने आपको दिए थे?” राजा उसे उस जगह पर ले गए, जहां वे सारे फल रखे गए थे। साधु ने राजा से कहा कि वह उनमें से एक फल काटे। जब राजा ने फल काटा, तो वह हैरान रह गया। उस फल के भीतर एक रत्न छिपा था। यानी हर फल में एक रत्न था। 

साधु ने मुस्कराकर कहा, “राजन, मैं आपको और भी ऐसे रत्न दे सकता हूं। आपकी राजधानी और प्रजा संपन्न हो जाएंगी। लेकिन आपको भी मेरे लिए कुछ करना होगा।” राजा ने एक पल सोचा और बोले, “मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?” 

साधु ने कहा, “राजन! टनकपुर के जंगल में पीपल का एक पेड़ है, जिस पर एक शव उल्टा लटका हुआ है। आपको वह शव लाकर मुझे देना होगा।” यह सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने पूछा, “वह किसकी लाश है? आप वह लाश लेकर क्या करेंगे या उससे मेरी प्रजा का भला कैसे हो सकता है, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है।” 

साधु ने राजा विक्रमादित्य को बताया कि उस लाश में बेताल नामक एक भूत रहता है। राजा ने कहा, “अपनी प्रजा के कल्याण के लिए मैं वह शव लाकर तुम्हें अवश्य दूंगा।” 

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां-

साधु ने कहा, “आप अगली अमावस्या को इस काम के लिए निकल सकते हैं। मैं अपने आश्रम में आपका इंतजार करूंगा।” । 

इस तरह अगली अमावस्या की रात राजा विक्रमादित्य टनकपुर के जंगल की ओर गए। कई घंटों की खोज के बाद उन्हें पीपल का वह पेड़ दिखाई दिया। उन्होंने लाश को खींचकर नीचे उतारा, उसे अपने कंधों पर रखा और साधु के आश्रम की ओर चल दिए।

यदि राजा की जगह कोई दूसरा होता, तो उसे डर लगता, लेकिन वे तो निडर होकर आगे बढ़ते जा रहे थे। वे बहुत वीर थे। जब भी प्रजा की भलाई का कोई काम होता, तो वे कभी पीछे नहीं हटते थे। उनकी इसी खूबी के कारण प्रजा उन्हें बहुत चाहती थी। 

जब राजा विक्रमादित्य थोड़ी दूर पहुंच गए, तो उन्हें एक आवाज सुनाई दी। लाश में रहने वाला बेताल भूत उनसे बातें कर रहा था, “तुम कौन हो और मुझे कहां ले जा रहे हो?” 

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां

राजा ने बताया, “मैं उज्जैन का राजा विक्रमादित्य हूं। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाने आया हूं।” बेताल ने उनसे पूछा, “तुम क्यों ले जाना चाहते हो? तुम्हें मेरे बारे में किसने बताया?” 

राजा ने जवाब दिया, “एक साधु ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया है। उसे तुम्हारी जरूरत है। लेकिन तुम कौन हो?” बेताल ने कहा, “राजा विक्रम, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है।” राजा ने कहा कि वह अपनी शर्त बताए। 

बेताल बोला, “मैं समय बिताने के लिए तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगा। तुम अपनी मंजिल पर पहुंचने से पहले, अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकालना। अगर तुम रास्ते में बोले, तो मैं उड़कर वापस पीपल के पेड़ पर पहुंच जाऊंगा। फिर तुम्हें दोबारा वहां तक वापस जाना होगा और उसी तरह मुझे अपने कंधों पर लादकर लाना होगा।” । 

राजा ने पूछा, “तुम मेरे साथ चलने से इन्कार नहीं करना? भले ही तुम हजार बार वापस चले जाओ, मैं तुम्हें हर बार लेने आऊंगा। मैंने साधु को वचन दिया है और मैं अपने वचन से पीछे नहीं हटता।” 

विक्रम बेताल की रहस्यमयी कहानियां

बेताल ने राजा की बात मान ली। वह बोला, “राजन! मैं जानता हूं कि तुम एक न्यायी और प्रजापालक राजा हो। अब तुम मेरी कहानी ध्यान से सुनो। 

कहानी सुनने के बाद तुम्हें मेरे प्रश्नों का उत्तर भी देना होगा। अगर तुमने उत्तर नहीं दिया, तो मैं तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।” 

राजा विक्रमादित्य ने कहा, “बेताल, तुम जानते हो कि सत्य की हमेशा जीत होती है। मैं अपना वचन नहीं तोड़गा। मैं तुम्हारी कहानी सुनने को तैयार हूं।” बेताल बोला, “मैं तुमसे यही उम्मीद रखता हूं कि तुम अपना वचन अवश्य निभाओगे।” इतना कहकर बेताल अपनी कहानी सुनाने लगा। उसकी कहानी सुनना राजा विक्रमादित्य की विवशता थी। 

विक्रम बेताल की  कहानियां-नेत्रहीन पुत्र

एक दिन एक बूढ़ा आदमी अपने दो नेत्रहीन बेटों के साथ राजा के दरबार में गया और बोला, “महाराज! मुझे अपने व्यवसाय में भारी घाटा हुआ है। अगर आप मुझे सोने के एक हजार सिक्के उधार दे दें, तो मैं आपका एहसान मानूंगा। मैं अपने बेटों को आपके पास छोड़ जाता हूं। मेरे बेटे देख नहीं सकते, लेकिन वे बहुत गुणी हैं। मेरा बड़ा बेटा घोड़ों का पारखी है और छोटा बेटा हर तरह के रत्नों की परख कर सकता है।” 

यह सुनकर राजा आश्चर्य चकित रह गया। उसने बूढ़े की बात मान ली और उसे सोने के एक हजार सिक्के देकर विदा कर दिया। 

विक्रम बेताल की  कहानियां

दिन बीतने लगे। एक दिन दरबार में घोड़ों का एक व्यापारी आया। वह राजा को एक अरबी घोड़ा बेचना चाहता था। राजा ने नेत्रहीन लड़के से घोड़े की परख करने को कहा। उस लड़के ने घोड़े को छूकर परखना शुरू किया। यह देखकर घोड़े के व्यापारी को गुस्सा आ गया। उसने कहा, 

“महाराज! भला एक अंधा लड़का घोड़े की परख कैसे कर सकता है?” तभी वह लड़का बोला, “महाराज! यह घोड़ा न खरीदें। यह अपने सवार को चोट पहुंचा सकता है।” 

विक्रम बेताल की  कहानियां

राजा ने एक पल के लिए कुछ सोचा, फिर कहा, “एक अच्छे घुड़सवार को इसकी सवारी करने के लिए बुलाओ।” ज्यों ही घुड़सवार उस पर बैठने लगा, घोड़े ने उसे पटक दिया। घोड़े का व्यापारी बोला, “यह मेरे साथ तो कभी ऐसा बर्ताव नहीं करता।” अंधे लड़के ने कहा, “दरअसल, यह घोड़ा किसी भी ग्वाले को चोट नहीं पहुंचाता। क्या तुम पहले ग्वाले थे?” घोड़े का व्यापारी हड़बड़ाकर बोला, “तुम्हें कैसे पता चला?” ।

अंधे लड़के ने जवाब दिया, “वह तो मैंने तुम्हारे घोड़े को सूंघकर ही जान लिया था।” 

कुछ दिनों बाद एक जौहरी अमूल्य रत्न लेकर दरबार में आया। राजा ने छोटे लड़के को उसकी परख के लिए बुलाया। 

विक्रम बेताल की  कहानियां

छोटे लड़के ने रत्न को अपनी हथेलियों में रखकर कई बार मला। फिर वह राजा से बोला, “महाराज! यह रत्न अनमोल है, परंतु जो भी इसे रखेगा, उसके लिए यह अशुभ होगा। यह रत्न इस जौहरी के परिवार में दो मौतों का कारण बन चुका है।” 

राजा ने जौहरी की ओर देखा, तो उसने शर्म से अपनी आंखें झुका लीं। यह बात सच थी। जौहरी राजा से माफी मांगने लगा। राजा ने उसे माफ कर दिया और वह अपना-सा मुंह लेकर चला गया। 

राजा दोनों अंधे लड़कों का हुनर देखकर हैरान हो गया। उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि कोई अंधा व्यक्ति इतना समझदार हो सकता है। राजा ने सोचा कि उन दोनों लड़को को अपना मंत्री बनाया जा सकता है। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि उनके पिता के आते ही वह दोनों लड़कों को अपने दरबार में रख लेगा। 

कुछ दिनों बाद बूढ़ा आदमी वापस आया, तो राजा ने कहा, “मैंने तुम्हारे बेटों की प्रतिभा देख ली है, तुम में क्या गुण है?” 

बूढ़ा आदमी बोला, “मैं आपको किसी भी व्यक्ति की असलियत बता सकता हूं।” 

राजा ने पूछा, “अच्छा बताओ, मैं कौन हूं?”

बूढा बोला, “आप एक चोर के बेटे हैं।” 

यह सुनकर राजा को गुस्सा आ गया। उसने बूढ़े और उसके दोनों बेटों के सिर को धड़ से अलग करने का आदेश दे दिया। 

जब कहानी खत्म हुई, तो बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, “विक्रम! बता, क्या उस राजा का न्याय उचित था? जल्दी बोल, वरना तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।” 

विक्रम बेताल की  कहानियां

राजा विक्रमादित्य ने जवाब दिया, “नहीं, यह उचित नहीं था, लेकिन इसमें बूढे का भी दोष है। उसे इस बात का एहसास नहीं था कि वह राजा को क्या बताने जा रहा है। उसे बोलने से पहले सोचना चाहिए था।” 

बेताल बोला, “राजा विक्रमादित्य! तुम्हारा उत्तर प्रशंसनीय है, लेकिन तू बोला, इसलिए मैं वापस जा रहा हूं।” इतना कहकर बेताल पीपल  के पेड़ की ओर उड़ चला और राजा उसके पीछे दौड़े।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

twenty + sixteen =