मोटिवेशनल टिप्स इन हिंदी-‘ज्ञान’ शक्ति व सफलता में बदल जाता है, जब उसे जीवन में उतारा जाता है

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मोटिवेशनल टिप्स इन हिंदी- ‘ज्ञान’ शक्ति व सफलता में बदल जाता है, जब उसे जीवन में उतारा जाता है (Knowledge is Converted Into Strength & Success When it is Applied to Life) 

1.आप बहुत बड़े विद्वान हो सकते हैं, सबसे बड़े ज्ञानवान हो सकते हैं, किन्तु ‘ज्ञान’ का सदुपयोग तब ही संभव है, जब उसे व्यवहार में लाया जाय, इसलिए अपने अर्जित ज्ञान का अधिक से अधिक सदुपयोग करते चलें और ज्ञान को सफलता में बदलते चलें. याद रखें, ज्ञान से बड़ी कोई शक्ति नहीं है..

2. हर व्यक्ति प्रगति चाहता है, निरन्तर गति चाहता है. उसमें न केवल जिजीविषा है, अपित गौरव के साथ जीने की तत्वगत मौलिक आंकाक्षा भी है. किन्तु इसके लिए उसे अपनी प्रतिभा को बाहर लाना पड़ेगा, अपने कार्य-कलापों में अर्जित ज्ञान का सदुपयोग करना पड़ेगा. वरना ‘ज्ञान’ उस धन के समान है, जो जमा तो है, किन्तु जिस पर ब्याज नहीं मिल पा रहा है. याद रखें, जो धन बिना किसी उपयोग के जमा होता है, वह दिनों-दिन कम होता चला जाता है. इसलिए ‘ज्ञान’ को गतिशील ‘शक्ति’ में बदलते रहें.

3. ‘ज्ञान’ का सदुपयोग ही विकास है और दुरूपयोग विनाश है. ज्ञान का सदुपयोग किस प्रकार करना है, यह पूर्णतः आपकी सूझ-बूझ पर निर्भर करता है. ज्ञान ‘विकास-गंगा’ में तब ही बदल पाता है, जबकि उसका सही वक्त पर सही ढंग से उपयोग किया जाय. ‘ज्ञान’ इच्छा की आँख है, ‘ज्ञान’ व्यक्तित्व की परख है, ‘ज्ञान’ आत्मा की किश्ती है. वस्तुतः ‘ज्ञान’ ही स्वर्ग है और ‘अज्ञान’ ही नरक है.

4. ज्ञान का प्रवाह नदी के प्रवाह की तरह है, जिसे मोड़ा तो जा सकता है, किन्तु रोका नहीं जा सकता. ज्ञान का प्रवाह विद्युत् प्रवाह की तरह है, जिसे हाथों-हाथ काम में तो लिया जा सकता है, किन्तु आरक्षित करके नहीं रखा जा सकता. ज्ञान खर्चने पर बढ़ता चला जाता है और न खर्च ने पर घटता चला जाता है.

5. ज्ञान के उपयोग से ही आपके गुणों की पहचान हो सकती है. सदुपयोग से सद्गुणों और दुरूपयोग से अवगुणों का आविर्भाव होता है. आनन्द तो आत्मा का गुण है, किन्तु ज्ञान रूपी प्रकाश के बिना आनन्द की पहचान भी संभव नहीं है. याद रखें, पत्थर हीरा भी बन जाता है, जब उसे ज्ञान की कसौटी पर तराशा जाता है. तराशने की कला जिसे आती है, सफलता उसी की दासी बन जाती है.

6. केवल शब्दों की पूजा करने से ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता. ‘ज्ञान’ के लिए तो गहरे में उतरना ही पड़ेगा. ‘साक्षर’ का उल्टा ‘राक्षस’ भी होता है, इसे भी याद रखना ही पड़ेगा. जब ज्ञान को व्यवहार में नहीं उतारा जाता, तब यही ज्ञान गले की फांस बन जाता है. अर्थात् प्रयोगों के माध्यम से आप जितना सीख सकते हैं, उतना पुस्तकों के माध्यम से नहीं सीख सकते. किसी कार्य के विषय में अनुभव के आधार पर ही लिखा जा सकता है, बिना अनुभव के लिखना सार्थक नहीं हो सकता. इसलिए ज्ञान को कर्म में बदलो, कर्म को अनुभव में बदलो और अनुभव से ज्ञान में अभिवृद्धि करते चलो. यही सफलता का शाश्वत मंत्र है.

7. जब तक परमात्मा की झलक न मिले, तब तक जीवन अधूरा है. जब तक जीवन में सफलता न मिले, तब तक ज्ञान अधूरा है और याद रखें, परमात्मा की झलक व्यक्तिगत अनुभव से ही मिल सकती है. अनुभव के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. जीवन संग्राम में कूदे बिना अनुभव की उपलब्धि नहीं हो सकती. अनुभव की उपलब्धि के बिना यह जिन्दगी आपकी नहीं हो सकती.

8. होने का नाम जिन्दगी है, खोने का नहीं. जगने का नाम जिन्दगी है, सोने का नहीं. जरा ध्यान दें, ज्ञान की चदरिया ओढ़ कर सोने से भी क्या कभी कुछ पाया जा सकता है ? ज्ञान को व्यवहार में और व्यवहार को सफलता में बदलते चलें, ताकि लोग आपको आपके बाद भी याद रख सकें. गहराई से देखा जाय तो संसार का अर्थ होता है, ‘समय’. समय अर्थात् मन. यूँ समय और मन एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं. इसलिए समय और मन का सदुपयोग करते चलें. अपने उपलब्ध ज्ञान को ऊर्जा में बदलते चलें. ऊर्जा को सफलता में बदलते चलें. यही आपके होने का अर्थ है.

9. ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है, यह शक्ति ही सफलता है. सफलता ही सबसे बड़ी भक्ति है, भक्ति ही सबसे बड़ी व्याकुलता है. इस व्याकुलता को कार्य-रूप में रूपान्तरित करते चलें. व्याकुलता में भी कभी होश न खोयें. यह न भूलें कि हजारों मील की यात्रा भी एक-एक कदम चल कर ही पूरी होती है. एक साथ दो कदम तो कोई उठा भी नहीं सकता. इसलिए समुचित जानकारी के साथ कदम दर कदम बढ़ाते चलें और हर कदम से कुछ न कुछ सीखते चलें.

दृष्टान्त- एक व्यक्ति नदी किनारे रहता था, किन्तु उसे तैरना नहीं आता था. उसने तैरना सिखाने वाली दो-तीन पुस्तकों का अध्ययन किया. जानकार लोगों से तमाम जानकारियाँ प्राप्त की, किन्तु तैरने का आत्मविश्वास अर्जित नहीं कर सका. छिछले पानी में तैरने का अभ्यास किया, किन्तु व्यर्थ रहा. अन्ततः वह किसी अच्छे तैराक के पास पहुँचा. तैराक उसे नदी के गहरे घाट पर ले गया और तैरने की बारीकियाँ समझाने लगा. इसी दौरान तैराक ने उसे अचानक पानी में धक्का दे दिया और देखने लगा. जिज्ञासु पानी में ऊपर नीचे होने लगा. अपने आपको बचाने का लक्ष्य ही उसके सामने था. पानी में हाथ-पैर मारने लगा और अन्ततः किनारे आ लगा. तैराक ने पकड़कर उसे बाहर निकाला. जिज्ञासु इस बार खुद ही पानी में कूद गया और आसानी से तैरने लगा. अर्थात् जानकारी को अमल में लाना जरूरी है. 

प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी बनिए (Be Owner of Impressive Personality) 

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1.आपका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो कि आपको देखते ही या आपकी आवाज सुनते ही लोग प्रभावित हो उठे. व्यक्तित्व इतना चुम्बकीय हो कि लोग आपको बार-बार देखने एवम् सुनने के लिए लालायित हो उठे. यानी करिश्माई व्यक्तित्व के धनी बनिए, ताकि आपकी उपस्थिति ही अपने आप में एक करिश्मा हो.

2. व्यक्तित्व का सम्बन्ध उस चेतना से होता है, जो व्यक्ति के व्यवहार, आचरण एवम् मनोभावों को नियन्त्रित करती है. व्यक्तित्व का सम्बन्ध उस आन्तरिक शक्ति से होता है, जो इच्छा शक्ति, अभिरूचि, आत्मविश्वास, उत्साह एवम् सकारात्मक सोच को विकसित करती है. आपका व्यक्तित्व आपके चरित्र पर निर्भर करता है. आपका चरित्र ही आपकी पहचान है. आपकी पहचान ही आपका व्यक्तित्व है. इसलिए बस व्यक्तित्व पर ध्यान दें, सभी गुण अपने आप आपके प्रभावी व्यक्तित्व में जुड़ते चले जायेंगे.

3. सदैव प्रसन्न रहें और हर समस्या का समाधान प्रसन्नता के साथ करें, अपने आस-पास का वातावरण खुशनुमा रखें और हर क्षण का स्वागत प्रसन्नता के साथ करें, प्रसन्नता ही ईश्वर प्रदत्त वह सम्पत्ति है, जो फेफड़ों में स्वच्छ वायु का संचार करती है. स्वच्छ वायु ही दिल, दिमाग एवं शरीर को स्वस्थ रखती है. व्यक्तित्व वस्तुतः प्रसन्नता, आरोग्यता एवम् बुद्धिमता पर निर्भर करता है.

4. जैसा आपका उठना-बैठना, चलना-फिरना, सुनना-सुनाना, बोलना-गुनगुनाना, सजना-सवंरना, खाना-पीना, हास-परिहास होगा, वैसा ही आपका व्यक्तित्व होगा. जो कुछ आपके चेहरे से झलकेगा, वह आपके वस्त्र, शरीर और शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होगा. इसलिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर ही ध्यान केन्द्रित करें. एक प्रभावी एवम् अनुकरणीय व्यक्तित्व विकसित करें.

5. कम से कम बोलें, नपा-तुला बोलें, सारगर्भित बोलें, अधिकार पूर्वक बोलें, केवल लोगों की बुराई के लिए ही मुँह न खोलें, किसी की बुराई करके अपनी अच्छाई प्रदर्शित न करें. जहाँ तक हो सके, दूसरों की अच्छाई ही करें. यदि यह संभव न हो तो तटस्थ रहें. आपकी तटस्थता आपको कई बुराइयों से बचा कर रखती है. अच्छे श्रोता बनें. अपनी बात पर कायम रहें. जो कायम रह सके, वही बोलें. दूसरों के व्यवहार को उचित सम्मान दें. तर्क करें, किन्तु कुतर्क न करें, सदैव सतर्क रहें.

6. चिन्ता छोड़ें, चिन्तनशील बनें. मन को छोड़ें, मननशील बनें. ईर्ष्याद्वेष से ऊपर उठे, क्षमाशील एवम् विवेकशील बनें. तब आपके चेहरे पर जो आभा छलकेगी, वह स्थायी होगी, सच्ची होगी, प्रभावी होगी. छोटी-छोटी बातों को भी उतना ही महत्व दें, जितना कि बड़ी बातों को दिया जाता है. अपनी उन गलतियों से भी सीखने की आदत डालें, जिन्हें कि अक्सर भुला दिया जाता है.

7. कुछ न कुछ सीखते रहने की भूख बनाये रखने पर ही आप नयी-नयी जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं. अपनी विविध जानकारी एवम् विशिष्ट कार्यशैली के कारण ही आप सबसे अलग नजर आ सकते हैं. इसलिए सदैव जिज्ञासु बने रहें. हर सफलता के बाद अगली सफलता के लिए बैचेन रहें. सोचने, समझने, समीक्षा करने एवम् प्रतिक्रिया व्यक्त करने के सबके तरीके अलग-अलग होते हैं. इसमें शरीर के तीनों भाग शरीर, आत्मा एवम् प्रवृत्ति काम करते हैं. इन सब पर आपके व्यक्तित्व की छाप होनी चाहिए. हर तरीके पर अपनी विशिष्ट शैली अपनाते हुए अपनी पहचान अलग ही बनाइए.

8. लोगों से न अधिक नजदीकी बनायें और न अधिक दूरी ही. लोगों को न अपनी कमजोरी बनने दें और न मजबूरी ही. खुद के बारे में कभी कोई गलतफहमी न पालें. दूसरों को समझने में कभी भूल न करें. याद रखें, सफलता और विफलता दो धारणायें मात्र हैं. यदि आपके व्यक्तित्व पर सफलता सम्बन्धी धारणा अधिक प्रबल हो तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता.

9. विचारों से ही शब्द बनते हैं और शब्द ही क्रिया में ढलते हैं. क्रियायें ही आदतें बनती हैं और आदतों से ही व्यक्तित्व संवरते हैं. व्यक्तित्व को शब्दों से नही, अपने विशिष्ट कार्यकलापों से अभिव्यक्त होने दें. अपने शब्दों को बदहजमी में न बदलने दें. याद रखें, शब्दों की बदहजमी सबसे खतरनाक होती है, इसलिए शब्दों के चयन, शब्दों के प्रयोग और शब्दों के उच्चारण में पूरी सावधानी बरतें. आपके व्यक्तित्व की प्रथम झलक आपके चेहरे से छलकती है और द्वितीय झलक आपके बोलने के अंदाज से मिलती है.

निष्कर्ष- प्रभावी व्यक्तित्व का धनी वही हो सकता है 1. जो दृढ़ विश्वासी हो, पर घमण्डी नहीं हो. 2. जो स्वाभिमानी हो, पर अभिमानी नहीं हो. 3. जो नरमदिल हो, पर कमजोर न हो. 4. जो बहादुर हो, पर असभ्य नहीं हो. 5. जो दृढ़ हो, पर अड़ियल नहीं हो. 6. जो शान्त हो, पर ठण्डा नहीं हो. 7. जो जिन्दगी से प्यार करता हो, पर मृत्यु से डरता नहीं हो. 8. जो ईमानदार हो, पर संवेदनहीन नहीं हो. 9. जो चरित्रवान् हो, पर शंकालु न हो. 10. जो कम बोलने वाला हो, पर बहरा न हो. 11. जो सदैव प्रसन्न रहता हो, पर दूसरों को अप्रसन्न नहीं करता हो. 12. जो वर्तमान में जीता हो, किन्तु दूसरों का वर्तमान नहीं छीनता हो. 13. जो चिन्तनशील हो, पर चिन्ताग्रस्त न हो. 14. जिसका आभामण्ड विकसित हो, पर महिमा मण्डित न हो. 15. जो आशावादी हो, पर निरा भाग्यवादी न हो. 

नेतृत्व दक्षता विकसित करिए (Develope Leadership Ability) 

1.जब भी आप कोई कार्य आरम्भ करते हैं, वस्तुतः उसी क्षण से नेतृत्व आरम्भ हो जाता है. कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जिसे आप अकेले कर सकें. हर कार्य में प्रत्यक्षतः या परोक्षतः किसी न किसी का सहयोग अवश्य लेना पड़ता है. अपने आप से काम लेना, दूसरों से काम लेना, आपकी नेतृत्व क्षमता पर ही निर्भर करता है. समुचित नेतृत्व क्षमता के बिना आप कोई भी कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं कर सकते. इसलिए सर्वप्रथम अपने आचरण-विचरण एवम् कार्य परिस्थितियों पर नियन्त्रण करना सीखें, फिर अपने परिजनों एवम् सहयोगियों पर नियन्त्रण करना सीखेंऔर अपनी नेतृत्व क्षमता में निरन्तर अभिवृद्धि करते रहें,

2. नेतृत्व के लिए श्रेष्ठता अपेक्षित है और श्रेष्ठता के लिए आत्मविश्वास. आत्मविश्वास से ही आभामण्डल खिलता है और आभामण्डल के लिए आत्मप्रकाश अपेक्षित है. कमजोर चरित्र से आप नेतृत्व नहीं कर सकते. इसलिए जब आप सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, नैतिकता, समयबद्धता, वचनबद्धता, मानसिक दृढ़ता, शक्ति, साहस, स्थिरता एवम् गंभीरता को अपने चरित्र के अंग बना लेंगे, तब ही आप नेतृत्व प्रदान करने के सच्चे अधिकारी होंगे.

3. नेता कोई जन्मजात नहीं होता, नेता तो बनना पड़ता है. शक्ल से तो कोई नेता नहीं होता, नेतृत्व तो विकसित करना पड़ता है. किसी बड़े उद्देश्य की ओर उठने वाला हर कदम नेतृत्व भरा होता है, नेता वही, जो लोगों के दिल जीत ले. दिल से चलकर जो दिमाग तक जीत ले. याद रखें, नजर चुराने वाला कभी नेता नहीं बन सकता.

4. जब आप हर काम को अपने तरीके से करने एवम् करवाने के इच्छुक होंगे, जब आप लोगों की हाँ में हाँ मिलाते हुए नहीं चलेंगे, अच्छे-बुरे सभी परिणामों के लिए तैयार रहेंगे, सबको साथ लेकर चलते रहेंगे, सबको प्रभावित करने की क्षमता अर्जित कर लेंगे, तब आप सचमुच नेता बन जायेंगे.

5. अपार क्षमताओं के बावजूद भी हर व्यक्ति नेता नहीं बन सकता. नेता तो वही बन सकता है, जो अपनी नेतृत्व क्षमताओं का समुचित विकास कर लेता है. हर व्यक्ति नेतृत्व करना चाहता है, पर कर नहीं पाता है. हर व्यक्ति शक्ति चाहता है, हर व्यक्ति शासन करना चाहता है, ‘हर व्यक्ति’ के लिए यह संभव हो सकता है, बशर्ते कि वह ‘हर व्यक्ति’ की श्रेणी से निकल कर ‘विशिष्ट व्यक्ति’ की श्रेणी में आ जाय. ‘विशिष्टता’ को उपलब्ध होकर ही कोई नेता हो सकता है.

6. प्रभावी नेतृत्व के लिए कुछ अपेक्षित योग्यतायें-(क) अपने मिशन की समुचित जानकारी, (ख) सबको संगठित करने एवम् संगठित रखने सम्बन्धी क्षमता. (ग) आचरण, विचरण एवम् भाषण पर नियन्त्रण. (घ) सबके साथ सम्मान एवम् समानतापूर्वक व्यवहार. (ड.) कुशल प्रबन्धन, (च) दूरदर्शिता. (छ) सकारात्मक सोच. (ज) सबको साथ लेकर चलने की भावना. (झ) प्रभावशाली व्यक्तित्व, (ञ) अनुकरणीय कृतित्व. (ट) मैदान न छोड़ना. (ठ) यथास्थिति वाद को तोड़ना. (ड) अपनी अलग पहचान बनाना. 

7.नेतृत्व करने का अर्थ अधिक से अधिक नेता पैदा करना होता है, न कि अनुगामी पैदा करना. अनुगामी पैदा करने वाला कुछ भी हो सकता है, किन्तु ‘नेता’ नहीं हो सकता. असली नेता वही होता है, जो अपने बाद भी मिशन को चालू रखने के लिए पर्याप्त नेतागण छोड़ कर जाता है. नेता वही, जो मजबूत नींव पर विश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.

8. जो सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रेरणा देता है, जो समूची मानव जाति को प्रभावित कर देता है, वही महान नेता कहलाता है. जिसमें तर्क शक्ति एवम् अविलम्ब निर्णय लेने की क्षमता हो, जिसमें कर्म शक्ति एवम् अनुशासन सम्बन्धी दक्षता हो, वही नेता बन सकता है. जो स्वयम् अपने को नेता घोषित न करे, जो स्वतः ही नेता बन जाय, वस्तुतः वही नेता है. जब कोई यह समझने लगता है कि वही लोगों का नेतृत्व कर रहा है, तब वह वस्तुतः किसी न किसी अन्य व्यक्ति के नेतृत्व में होता है. देखा जाय तो यहाँ कोई भी सर्वोच्च नेता नहीं है, किन्तु नेतृत्व के गुण हर व्यक्ति में हो सकते हैं.

9. नैतिकता के बल पर ही कोई नेता बन सकता है. लोगों के दुख दर्द में शामिल होने वाला ही नेता बन सकता है. भावनायें भड़काने वाले भाषण देने और जलसों का नेतृत्व करने से कोई नेता नहीं बन सकता. नेतृत्व की परख तो कठिनाइयों के समय ही होती है. जिसकी कथनी और करनी पर भरोसा किया जा सके, जो दूरगामी परिणामों को सामने रखकर चल सके, जो दूसरों को शक्तिशाली बनाने में कामयाब हो सके, जो सबकी सलाह से उपयोगी योजनायें बना सके, जो पारदर्शिता के साथ सबका समर्थन प्राप्त कर सकें, वही असली नेता है. निष्कर्ष 

(क) महान दार्शनिक अरस्तु ने अपने शिक्षण को सदाचार तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि शिष्यों को नेतृत्व क्षमता से सुसम्पन्न करने का लक्ष्य भी सामने रखा. जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आता था, वह सदाचार के साथ-साथ अपने पराक्रम को उभारने का प्रयत्न भी करता था. अरस्तु का मानना था कि पराक्रमी नेतृत्व वाला व्यक्ति ही अपना और दूसरों का भला कर सकता है. ऐसे व्यक्ति में ही बिगड़ी हुई परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता होती है. लोग ऐसे व्यक्ति के पीछे स्वतः ही चल पड़ते हैं. अर्थात् नेतृत्व के गुण तो हर व्यक्ति में होने चाहिए. बल्कि हर व्यक्ति नेतृत्व के गुणों के साथ ही पैदा होता है, बस उन्हें विकसित करने की आवश्यकता है. (ख) स्वयम् से साक्षात्कार करें, चिन्तन करें. यह पता लगावें कि आप किन विषयों/क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकते हैं ? किन लोगों का नेतृत्व कर सकते हैं ? फिर अच्छी तैयारी के साथ कार्य आरम्भ करें. जिन लोगों से आपको काम लेना हो, सर्वप्रथम उनके स्तर का पता लगावें. फिर उन्हें उन्हीं के नजरिये से देखें, कार्यों की गतिविधियों को उन्हीं के नजरिये से देखें, तब उनसे काम लेना आसान हो जायेगा. जिनसे काम लेना हो, उनके साथ मानवीय व्यवहार करें. अपनत्व की भावनायें विकसित करें. सदैव प्रगति के लिए सोचें. सुधार के नये-नये तरीके सोचें. प्रगति के लिए सामूहिक उत्तरदायित्व कायम करें. निष्कर्षत:-यही नेतृत्व की प्रमुख शर्ते हैं. 

प्रबन्धन क्षमता बढ़ाइए (Enhance Your Management Skills)

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1.आप अपने आपको, अपने कार्य-कलापों एवम् व्यवसाय को जिस दक्षता, समयबद्धता, योजनाबद्धता एवम् परिणाम-आबद्धता के साथ संचालित करते हैं, वही आपकी प्रबन्धन क्षमता है. वस्तुतः प्रबन्धन क्षमता ही सफलता की गारण्टी है. प्रबन्धन क्षमता की तो जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यकता पड़ती है.

2. अच्छा प्रबन्धक वही हो सकता है, जो अपने सहकर्मियों/अधीनस्थों की अपेक्षा अधिक कार्य करने की क्षमता रखता हो. व्यक्ति जब खुद कार्य करता है, तब वह सीखता भी है और अपने सहकर्मियों को प्रेरित भी करता है. दूसरों से अधिक से अधिक कार्य लेने की कला को ही प्रबन्धन क्षमता कहा जाता है. अपने उपलब्ध समय में आशातीत अभिवृद्धि करने की दक्षता को ही प्रबन्धन क्षमता कहा जाता है. याद रखें, कुशल प्रबन्धन क्षमता से अपने समय को बढ़ाया जा सकता है. और कम से कम समय में अधिक से अधिक अर्जित किया जा सकता है.

3. एक कुशल प्रबन्धक बनने के लिए सर्वप्रथम अपने कार्य का अच्छी तरह अध्ययन करें, सही समय पर सही योजना तैयार करें, संभावित लक्ष्य निर्धारित करें. कार्मिकों को समुचित रूप से प्रशिक्षित करें. कार्य वातावरण विनिर्मित करें, मशीनरी एवम् कच्चे माल आदि की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करें. सभी पर पूर्ण निगरानी एवम् नियन्त्रण रखें. तैयार माल का सही समय पर सही मूल्य पर विक्रय करें. समय पर बकाया की वसूली करें. पूँजी का रोटेशन न बिगड़ने दें. तब आपके उद्योग को, आपके उपक्रम को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता.

4. किसी भी कार्य को आसान या कठिन बनाना आपके हाथ में है. आसान बनाने के लिए डायरी का उपयोग करें, दिन भर के कार्यो को सूचीबद्ध कर लें. डायरी के आधार पर प्राथमिकतानुसार एक-एक करके कार्यों को निपटाते चलें. अपना समय खुद निकालें. ‘नहीं’ कहने में सख्त रहें. फोन, वार्ता, बैठक, आने वालों से मिलना आदि सभी दैनिक कार्यो को योजनाबद्ध एवम् समयबद्ध तरीके से करें. यदि ऐसा नहीं करेंगे तो आसान से आसान कार्य भी अत्यधिक कठिन हो जायेगा.

5. जिस क्षेत्र में आप काम कर रहे हैं या करना चाहते हैं, उसके सम्बन्ध में सर्वप्रथम यह विचार करें कि आप यही क्यों करना चाहते हैं ? आप कार्यस्थल पर कैसी परिस्थितियाँ एवम् व्यवस्थायें चाहते हैं ? वर्तमान में कौनसी परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हैं और कौनसी प्रतिकूल हैं ? प्रतिकूल को अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है ? अनुकूल परिस्थितियों का अधिक से अधिक सदुपयोग कैसे किया जा सकता है ? आदि प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करते हुए उन्हें सुलझाते चलें.

6. प्रबन्धन क्षमता के लिए कुछ अपेक्षित योग्यतायें-(क) प्रभावशाली व्यक्तित्व. (ख) अनुकरणीय कृतित्व. (ग) सक्षम नेतृत्व क्षमता, (घ) कार्यों की समुचित जानकारी, (ड.) कार्मिकों के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी, (च) आधारभूत ढाँचागत संसाधनों की जानकारी. (छ) मानवीय, आर्थिक एवम् भौतिक संसाधनों का पूरा-पूरा सदुपयोग. (ज) लाभ-हानि का नियमित आंकलन करना. (झ) धैर्य एवम् परिपक्वता. (ञ) अनुशासन प्रियता. (ट) अधीनस्थ, वरिष्ठ और व्यवसाय से जुड़े ग्राहक एवम् जन साधारण के साथ समन्वय पूर्वक व्यवहार. (ठ) कोष एवम् समय का समुचित प्रबन्धन. (ड) परिणाम जन्य नजरिया. (ढ) सुधारात्मक एवम् आशावादी दृष्टिकोण.

7. अपनी आवश्यकताओं एवम् प्राथमिकताओं के अनुरूप कार्ययोजना बनाइए. जहाँ अभी आप हैं, वहाँ आपकी उपयोगिता क्या है ? इसका हिसाब लगाइए. दूसरों को दोष देने की बजाय आत्म निरीक्षण करें, अपनी कमजोरियों को पहचानें और उन्हें स्वीकार करें. कमजोरियों को दूर करने के प्रयास करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहें. सदैव साहस एवम् आत्मविश्वास से ओतप्रोत रहें और दूसरों को भी प्रेरित करते रहें. तब ही आप एक अच्छे प्रबन्धक सिद्ध हो सकते हैं.

8. कुशल प्रबन्धक बनने के लिए अपेक्षित है, कार्य एवम् घर के बीच समन्वय स्थापित करना. सफल प्रबन्धक होने के लिए अपेक्षित है, अपने कार्य के प्रति गहरी आस्था प्रदर्शित करना. प्रभावी प्रबन्धन के लिए वर्तमान स्थिति एवम् सुधारात्मक पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान देना, आवश्यक है. पहले स्वयम् सीखिए, फिर अपने सहयोगियों को सिखाइए. पहले अपने दिमाग को सीखने, काम करने एवम् बचत करने के लिए तैयार करें, फिर दूसरों को समझायें, तब ही आप एक कुशल प्रबन्धक बन सकेंगे.

9. दिन की शुरूआत दिनभर में किये जाने वाले कार्यों की सूची से करें. महत्वपूर्ण कार्यों को प्राथमिकता के साथ सम्पन्न करें. शाम को अपने कार्यों की समीक्षा करें. जो भी काम हाथ में लें, उसके सम्बन्ध में कोई शंका न रखें और दूसरों को भी न रखने दें. अपने बटुए की बजाय अपने दिमाग को सदा खुला रखें, दूसरों की पसंद-नापसंद का भी ध्यान रखें. अपनी कार्यप्रणाली, कार्यों की मात्रा एवम् निर्धारित लक्ष्यों के सम्बन्ध में प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दें और फिर हर स्टेज पर मूल्यांकन करते रहें, ताकि किसी को कोई शंका न रहे. दृष्टान्त 

किसी बड़े व्यवसायी द्वारा एक अनाथालय चलाया जा रहा था, जिसमें करीब एक हजार बच्चे थे. बच्चों के दूध के लिए अलग से एक अधिकारी एवम् कुछ कर्मचारी तैनात थे, फिर भी शुद्ध दुध नहीं मिल पा रहा था. व्यवसायी ने एक बड़ा अधिकारी और लगा दिया, किन्तु दूध में पानी घटने की बजाय बढ़ गया. निगरानी के लिए एक अधिकारी और लगा दिया, किन्तु दूध और पतला हो गया. क्योंकि कमीशन तीन बिन्दुओं पर देना पड़ता था. व्यवसायी ने स्थिति को भांपते हुए अन्ततः तीनों अधिकारियों एवम् सम्बन्धित कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से हटा दिया. ठेका बन्द कर दिया और अनाथालय के बाहर ही एक सरकारी डेयरी का बूथ खुलवा दिया. डेयरी से दूध लेकर गर्म करके बच्चों को वितरित करने हेतु पाँच बड़े बच्चों की एक समिति बना दी गई. भोजन, नाश्ता, खेल-कूद आदि के लिए भी इसी तरह समितियों का गठन कर लिया गया. अब बच्चों को पूरा एवम् शुद्ध दूध मिलने लगा. भोजनादि अन्य व्यवस्थाओं में भी इसी तरह के गुणात्मक सुधार सामने आने लगे. 

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