मोटिवेशनल टिप्स इन हिंदी-प्रत्येक कार्य को इस प्रकार करें, जैसे पहली बार कर रहे हों

मोटिवेशनल टिप्स इन हिंदी

मोटिवेशनल टिप्स इन हिंदी- प्रत्येक कार्य को इस प्रकार करें, जैसे पहली बार कर रहे हों (Do Every Work, Every Time, As if You Are Doing it For The First Time) 

1.जो भी आप करें, जब भी करें, हर बार ऐसे करें, जैसे पहली बार ही कर रहे हों. जो भी आप देखें, जितनी बार देखें, हर बार ऐसे देखें, जैसे पहली बार देख रहे हों. जो भी खायें, जितनी बार खायें, हर बार यही सोचकर खायें, जैसे पहली बार खा रहे हों, तब आप कभी बोर नहीं होंगे. सदैव तरो-ताजा एवम् आनन्दित रहने का यही एक मात्र आसान तरीका है.

2. यदि गहराई से देखा जाए तो किसी भी कार्य की पुनरावृत्ति नहीं हो सकती. किसी भी स्थिति, परिस्थिति, मनःस्थिति और समय की प्रवृत्ति की आवृत्ति नहीं हो सकती. जीवन का हर क्षण नया ही होता है, इसलिए हर क्षण स्वागत योग्य होता है. जो हर क्षण का स्वागत करता है, वो कभी पुराना हो ही नहीं सकता.

3. रोज-रोज एक जैसे कार्य करते रहने पर व्यक्ति ऊब जाता है. धीरे-धीरे वह एक-रसता, नीरसता और निराशा में डूब जाता है. इन सबसे बचने के लिए बस अपने सोच में परिवर्तन करना होगा. हर कार्य को हर बार ऐसे करना होगा, जैसे पहली बार कर रहे हों. इसके लिए एक छोटे से अभ्यास की आवश्यकता है. हमें गत को, विगत को, कल को भूलने का अभ्यास करना होगा. धीरे-धीरे जब हम इस अभ्यास में सफल हो जायेंगे, तब हमें हर दिन, हर क्षण नया ही लगेगा. तब हर कार्य हमारे लिए नया ही होगा.

4. आप रोजाना उसी पलंग पर सोते हैं, आपके संसाधन वैसे ही होते हैं. तमाम दिनचर्या, कार्यकलाप, खाना-पीना, परिधान, वाहन, परिजन, सहयोगी सब कुछ वही. प्रकटतः सब कुछ पुराने ढर्रे पर ही लगता है. इसलिए नीरसता आती है, कार्यक्षमता घटती चली जाती है. इसलिए यदि आप नीरसता से बचना चाहते हैं, अपनी कार्यक्षमता को हर क्षण बढ़ती हुई देखना चाहते हैं तो अपने संसाधनों, कार्य-कलापों और सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को इस नजरिये से देखिए, जैसे पहली बार ही देख रहे हों.

5. जिस प्रकार आप नदी के बहते पानी में दुबारा नहीं नहा सकते, उसी प्रकार किसी काम को दुबारा नहीं कर सकते. याद रखें, समय का प्रवाह तो पानी से भी कई गुना तेज होता है. सब कुछ समान होने पर भी हर क्षण बहुत कुछ बदलता रहता है. इस तरह हर कार्य हर क्षण नया ही होता है, किसी कार्य की कोई पुनरावृत्ति नहीं होती. जिस क्षण हमें यह बुधत्व प्राप्त हो जाता है, उसी क्षण हमारा जीवन रूपान्तरित हो जाता है. और यह रूपान्तरण अभी, इसी वक्त घटित हो सकता है. इसके लिए कोई आयु या समय बाधक नहीं हो सकता. तो आइए, जीवन को बदल डालें. एक नयी शुरूआत करें. 

6.यात्रा-प्रवास, हास-परिहास, सोना-जगना, प्रेम-यौन सम्बन्ध, घूमना-फिरना, मिलना-जुलना, खाना-पीना, जैसे रोजमर्रा के कार्यों को इस प्रकार करें, जैसे प्रथम बार ही कर रहे हों, फिर देखिए, आपको हर कार्य में कितना आनन्द आता है. हर क्षण कितना नूतन नजर आता है. तब हर क्षण जीवन की नयी शुरूआत होगी. हर पल जीने योग्य होगा. हर समय उपभोग करने योग्य होगा. याद रखें, जीवन की सफलता इसी सोच पर निर्भर करती है.

7. प्रकृति के साथ ही व्यक्ति में भी प्रति क्षण परिवर्तन घटित होते रहते हैं और सभी प्राणी हर श्वास का, हर क्षण का स्वागत करते हैं. याद रखें, जो क्षण गया, वो लौट कर नहीं आ सकता, जो काम हमने कर लिया, उसे दुबारा नहीं किया जा सकता. अब तो जो भी करेंगे, नया ही होगा. हर बार नया होगा. इसलिए जरूरी है कि नया समझ कर ही करें. हर बार नया समझ कर करने में जो आत्मानुभूति होगी, जो आनन्द की अनुभूति होगी, वह शब्दातीत ही होगी.

8. ध्यान रहे, खुशी बाजार से खरीदी नहीं जा सकती, वह तो आपके भीतर से ही आ सकती है. और भीतर की खुशी भी खुशी-खुशी तब ही आयेगी, जब आपके मन की स्लेट हाथों-हाथ साफ होती चली जायेगी. स्लेट को साफ रखने के लिए कुछ विशेष नहीं करना होगा, केवल हर क्षण को नया क्षण और हर कार्य को नया कार्य समझना होगा.

9. आप वही हैं, जो आपके विचार हैं. आपके विचार वही हैं, जो आपके संस्कार हैं. संस्कारों में परिवर्तन किये बगैर, विचारों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता. विचारों में परिवर्तन किए बगैर आप आधुनिक नहीं हो सकते, आज से नहीं जुड़ सकते. आज से जुड़े बगैर आप सफल नहीं हो सकते. और संस्कारों को परिष्कृत करने का एक ही उपाय है कि आप सदैव ताजगी से, नवीनता से भरे रहें. चाहत तो कभी पूरी नहीं हो सकती, किन्तु सदा तरो-ताजा रहने की चाहत तो पूरी हो ही सकती है. तब इससे बड़ी चाहत का कोई महत्व नहीं रह जायेगा.

दृष्टान्त- स्वामी विवेकानन्द एक बार जर्मनी के दौरे पर थे. वे दार्शनिक ड्यूसेन के मेहमान थे. उन दिनों ड्यूसेन जर्मन भाषा की एक दार्शनिक पुस्तक पढ़ रहे थे. स्वामीजी को बताया कि पुस्तक बड़ी अद्भुत है, गूढ़ है, पन्द्रह दिनों से पढ़ी जा रही है. इस पर स्वामी जी ने आग्रह किया-‘क्या आप एक घण्टे के लिए पुस्तक दे सकेंगे ?’ ड्यूसन-‘क्यों नहीं. लेकिन इतने कम समय में आप कितनी पढ़ सकेंगे ?’ स्वामी जी-पढ़ नहीं पायेंगे तो क्या, देख तो लेंगे ही.’ स्वामी जी एकान्त में अध्ययनरत हो गये. एक घण्टे बाद लौटाते हुए बोले-‘पुस्तक वाकई अद्भुत है.’ ड्यूसन ने जिज्ञासा की-‘क्या आपने पूरी पढ़ ली है ? स्वामी जी ने कहा-‘हाँ, पढ़ भी ली है और समझ भी ली है.’ इस पर ड्यूसन ने अपनी कई शंकायें उठाई और स्वामी जी ने व्याख्या सहित शंकाओं का समाधान कर दिया. ड्यूसन हैरान था. पूछने लगा-‘स्वामी जी, जल्दी पढ़ने का तरीका उसे भी बताया जाय.’ स्वामी जी बोले-‘बहुत आसान है, जब भी मैं कोई पुस्तक पढ़ता हूँ, यही सोचकर पढ़ता हूँ कि इस विषय में पहली पुस्तक ही पढ़ रहा हूँ, अपने समस्त पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों को दूर रखकर ही पढ़ता हूँ.’ 

मोटिवेशन इन हिंदी-एक समय में एक ही काम करें (Take Up One Task At One Time

मोटिवेशन इन हिंदी-

1.यदि आप सब कुछ बनना चाहेंगे तो याद रखें, कुछ भी नहीं बन पायेंगे. यदि आप एक साथ दो नावों पर पैर रखना चाहेंगे तो कैसे रख पायेंगे ? इसलिए पहले अपने कार्यों की प्राथमिकतायें तय करें, फिर प्राथमिकतानुसार कार्यों को क्रमशः करते रहें. एक साथ एक से अधिक कार्य करना चाहेंगे तो एक भी कार्य ठीक से नहीं कर पायेंगे.

2. यदि आप एक ही समय में एक से अधिक कार्य हाथ में ले लेंगे तो सभी कार्यों को बराबर समय और महत्व कैसे दे पायेंगे ? तब सभी कार्यों से एक सी गुणवत्ता, एक सी उत्पादकता और एक से परिणाम कैसे ले पायेंगे? याद रखें, व्यक्ति का मस्तिष्क एक समय में किसी एक ही विषय पर प्रभावी ढंग से एकाग्र हो सकता है. इसलिए एक समय में अपनी पूरी ऊर्जा किसी एक ही कार्य पर केन्द्रित करें 

3.यदि आपके अधीन या आपके नियन्त्रण में या आपकी हिस्सेदारी में एक से अधिक कार्य चल रहे हों तो उन सबके प्रबन्धन की स्वतन्त्र व्यवस्थायें करें. आप सभी कार्यों का निरीक्षण एक साथ नहीं कर सकते, सबकी समीक्षा भी एक साथ नहीं कर सकते. इसलिए प्रत्येक कार्य का बारी-बारी से निरीक्षण करें, सबकी बारी-बारी से समीक्षा करें, सबके लिए अलग-अलग समय निर्धारित करें, तब ही आप अपने कार्यों के प्रति न्याय कर सकेंगे.

4. अपने ध्यान को एक समय में किसी एक ही कार्य पर फोकस किया जा सकता है. ध्यान को जितने बड़े क्षेत्र पर फोकस किया जाता है, उतना ही प्रकाश छितरा हुआ एवम् कमजोर होगा. इसलिए एक समय में एक ही कार्य को सर्वोत्तम प्राथमिकता दें, ताकि उसे सफलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सके. उसके बाद दूसरा कार्य हाथ में लें, ताकि उसे बिना किसी तनाव व दबाव के पूरा किया जा सके, आप अपनी समूची शारीरिक एवम् मानसिक ऊर्जाओं को एक समय में किसी एक कार्य पर ही केन्द्रित कर सकते हैं.

5. याद रखें, आगे बढ़ने के लिए दोनों पैर एक साथ आगे नहीं बढ़ाये जा सकते. चलते समय दोनों हाथ एक साथ आगे की ओर नहीं चलाये जा सकते. हाथ और पैर तो अपनी ही गति से बारी-बारी से चलेंगे, उसी प्रकार अपने कार्यों को भी बारी-बारी से करते रहें, वरना आप एक भी कार्य को ठीक से नहीं कर सकेंगे. जिस प्रकार आप एक स्थान पर स्थिर खड़े होकर अपने चारों ओर नहीं देख सकते, उसी प्रकार किसी एक कार्य पर केन्द्रित हो कर अन्य कार्य नहीं कर सकते. चारों ओर देखने के लिए तो आपको क्रमशः घूमना ही पड़ेगा.. गतिविधियाँ और भावनायें साथ-साथ चलती हैं. गतिविधियों पर तो नियन्त्रण किया जा सकता है, किन्तु भावनाओं पर नियन्त्रण करना जरा कठिन है. अनियन्त्रित भावनाओं के चलते हम किसी भी गतिविधि को समग्रता के साथ सम्पन्न नहीं कर सकते. जब हम किसी दुकान पर पंखा खरीदने जाते हैं, तब हमें केवल पंखे की ही बात करनी चाहिए. सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ पंखा कैसे खरीद सकते हैं, इसी पर पूरी ताकत लगानी चाहिए. पंखा खरीदते समय यदि हम कूलर और एयर कण्डीश्नर की भी जानकारी करते रहेंगे तो पंखा भी ठीक से नहीं खरीद सकेंगे.

7. कोई व्यक्ति दुकानदार होने के साथ-साथ साहित्यकार भी हो सकता है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि वह दोनों कार्य एक साथ करे. यदि वह ऐसा करेगा तो दोनों में से एक भी कार्य को ठीक से सम्पन्न नहीं कर सकेगा. किसी के भी प्रति न्याय नहीं कर सकेगा. जरा सोचिए, यदि वह ग्राहक को कविता सुनाने लगे और श्रोता को सामान बेचने लगे तो कितना बड़ा अनर्थ हो जायेगा. तब उसके पास न कोई ग्राहक आयेगा और न कोई श्रोता ही. जब ग्राहक न हो, तब कविता लिखी जा सकती है और जो ग्राहक न हो, उसे सुनाई भी जा सकती है.

8. हर कार्य में चित्त की एकाग्रता अपेक्षित होती है. एक समय में एक से अधिक कार्य हाथ में ले लेने पर एकाग्रता भंग होगी, तनाव बढ़ेगा, दिमाग फटने लगेगा. ऐसी स्थिति में थोड़ा विश्राम करें. सभी कार्यों को डायरी में लिख लें, प्राथमिकतायें तय कर लें. फिर प्राथमिकतानुसार सभी कार्य निपटाते चलें, किन्तु सभी कार्यों को एक साथ निपटाने की कोशिश न करें, वर्ना काम तो क्या निपटेंगे, हो सकता है, आप निपट जायें.

9. एक ही पत्थर से एक ही समय में दो पक्षी मारने की कोशिश न करें, वरना दोनों ही पक्षी उड़ जायेंगे. बेहतर तो यही है कि पत्थर फैंकने से पहले अपना पूरा ध्यान किसी एक ही पक्षी पर केन्द्रित करें. यदि उसी पत्थर से लक्षित पक्षी की आड़ में बैठा दूसरा पक्षी भी मर जाता है तो यह मात्र एक संयोग ही होगा. संयोग से भिन्न भाग्य कुछ भी नहीं होता. इसलिए एक समय में एक ही लक्ष्य पर संधान करें.

निष्कर्षमनुष्य का मस्तिष्क एक मिनट में सामान्यतः सात से दस विषयों पर विचार कर सकता है, किन्तु विचारों की एकाग्रता एवम् क्रियान्विति के लिए जितने कम विषय होंगे, उतने ही कारगर होंगे. कार्य के दौरान यदि आपके पास, नोट बुक, फोन, फैक्स, कम्प्यूटर, वाहन, निजी सहायक, स्टॉफ, सहयोगी आदि उपलब्ध हों तो आप एक मिनट में एक से अधिक विषयों पर विचार करते हुए अपने निर्णयों के क्रियान्वयन हेतु आदेश दे सकते हैं और क्रियान्वयन सम्बन्धी फीडबैक प्राप्त कर सकते हैं. विचारों, समस्याओं और सुझावों को यदि आप हाथों-हाथ नोट करते चलेंगे तो सुविधाजनक रहेगा. तब किसी समस्या को भूल नहीं पायेंगे और क्रमशः सभी पर विचार करते हुए निर्णय लिए जा सकेंगे. 

जीवन में अपनाने वाली अच्छी बातें- काम के दौरान ही आराम करें (Take Rest During Your Working Hours) 

1.जिस प्रकार कार की बैट्री कार को चलाने के दौरान ही चार्ज होती रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति को भी काम के दौरान ही रिचार्ज होते रहना चाहिए. क्या आपने कभी कार के पहियों को आराम करते देखा है ? कार के खड़ी होने पर भी गाड़ी का वजन तो पहियों पर ही होता है. पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि पहिए आराम नहीं करते. आप भी पहियों की तरह ही आराम कर सकते हैं.

2. जिन्दगी एक ऐसा सफर है, जो निरन्तर जारी रहता है, चलते रहने का नाम ही जिन्दगी है. जिस प्रकार एक यात्री यात्रा के दौरान ही आराम के क्षण ढूँढ लेता है, उसी प्रकार काम के दौरान भी आराम के क्षण ढूँढ़े जा सकते हैं. काम के दौरान आराम भी जरूरी है और आराम के साथ काम भी जरूरी है. यदि आप काम छोड़कर आराम करना चाहेंगे तो हो सकता है आराम ही करते रह जायें,

3. बेकार बैठ कर नहीं, काम करके अपने आपको थकाइए. फालतू की गपशप, ताश, शतरंज, उपन्यास आदि से अपने आपको मत थकाइए. उपयोगी एवम् उत्पादक कार्यों में ही अपनी शक्ति लगाइए. ऐसे कार्यों से होने वाली थकान ही सार्थक थकान होती है. इसलिए आराम को आराम का नहीं, काम का हिस्सा बनाइए. बेकार बैठ कर कोई ठीक से आराम भी नहीं कर सकता. और फालतू की थकान आसानी से उतरती भी नहीं है.

4. यदि आपका काम अक्सर कुर्सी पर बैठ कर ही होता है, तो आप कुर्सी पर बैठे-बैठे भी सुस्ता सकते हैं. थोड़ी सी झपकी भी ले सकते हैं. अपने विचारों को थोड़ा विराम भी दे सकते हैं. कुर्सी को घुमाकर या थोड़ा पीछे झुकाकर हाथ, पैरों व गर्दन को थोड़ा आराम भी दे सकते हैं. बीच-बीच में कुर्सी से उठ कर खड़े भी हो सकते हैं. याद रखें, केवल आपको ही नहीं, कुर्सी को भी आराम की जरूरत होती है. जब भी कुर्सी पर बैठें, व्यस्त रहें। व्यस्तता के दौरान ही आराम करें, कुर्सी पर बैठने के बाद यदि आपके पास पर्याप्त काम नहीं है, तो यही आपकी थकान का सबसे बड़ा कारण होगा.

5. यदि आपका कार्य ऐसा है, जिसके लिए अक्सर खड़ा रहना पड़ता है, अथवा प्रायः घूमना फिरना पड़ता है तो आपको खड़े-खड़े अथवा चलते हुए आराम करना चाहिए. काम के दौरान ही आप अपने हाथ-पैर सीधे कर सकते हैं. अपने सहकर्मियों के साथ हँसी-मजाक कर सकते हैं. इस तरह खुद हल्के रहकर दूसरों को भी हल्का रख सकते हैं. अर्थात् काम के दौरान ही आराम के क्षण ढूँढ़िए, काम के साथ ही थोड़ा विश्राम करिए.

6. काम के साथ आराम करने का सबसे बढ़िया तरीका है, वर्तमान में जीना. न भूत का अफसोस, न भविष्य की चिन्ता, इसी का नाम है, आनन्द में जीना. याद रखें, आदमी अपने वर्तमान से नहीं, भूत व भविष्य के कारण अधिक थकता है. आदमी काम से नहीं, सोचने से अधिक थकता है. इसलिए न भूत की सोचें, न भविष्य की सोचें, केवल वर्तमान की सोचें. सोचें ही नहीं, केवल व्यस्त रहें, फिर कुछ भी सोचने की आवश्यकता नहीं रहेगी.

7. काम के दौरान जब भी फुरसत मिले, उसका पूरा-पूरा सदुपयोग करें. फुरसत के क्षणों में टी.वी. देखें, कुछ पढ़ें, मौन रहें अथवा योग करें. बच्चों के साथ खेलना, हँसी-मजाक करना, दिल खोलकर हँसना थकान मिटाने के कुछ आसान तरीके हैं. आप अपनी सुविधा एवम् रूचि के अनुसार विश्राम के तरीके ईजाद कर सकते हैं.

8. आप जो भी करें, तनाव मुक्त होकर करें. हर काम मुस्कराहट के साथ आनन्द युक्त होकर करें, तब आपको थकावट होगी ही नहीं. याद रखें, मुस्कराहट अपने आपमें सबसे बड़ी आराम-थैरेपी है. मानसिक रूप से आलसी बनने पर अधिक थकावट होती है. अपने कार्य को बेगार समझने पर सबसे अधिक थकावट होती है. याद रखें, थकान भी जरूरी है, विश्राम भी जरूरी है. थकान के बिना विश्राम का और विश्राम के बिना थकान का कोई अर्थ नहीं है, असली थकान तो काम से ही आ सकती है.

9. जरा सोचिए, क्या सूर्य, पृथ्वी, चांद सितारे एक क्षण भी ठहर सकते हैं ? क्या इन्हें आराम नहीं चाहिए? प्रकृति की हर वस्तु आराम करती है, किन्तु अपनी निरन्तरता को बनाये रखते हुए करती है. जब आपके हृदय सहित सभी शारीरिक अंग बिना रूके सौ साल से भी अधिक समय तक कार्य कर सकते हैं, तब आप क्यों नहीं कर सकते ? फिर आपको तो चौबीस घण्टों में से केवल आठ घण्टे ही औसतन काम करना पड़ता है. एक कार्यशील व्यक्ति के लिए आठ घण्टों की नींद पर्याप्त होती है. सोने, नहाने धोने, खाने-पीने, घूमने-फिरने, हास-परिहास के घण्टों में कमी करके काम के घण्टों में वृद्धि की जा सकती है. और याद रखें, काम के दौरान अलग से आराम करने की आवश्यकता नहीं है, काम के दौरान ही आराम किया जा सकता है.

दृष्टान्त- ईमारती पत्थरों की खदानों के एक मालिक ने एक बार लेखक को बताया कि वह पिछले पन्द्रह वर्षों से सोया ही नहीं है. लेखक द्वारा आश्चर्य व्यक्त करने पर खान मालिक ने स्पष्ट किया कि वह थोड़ी देर के लिए सोता तो है, किन्तु किसी बेडरूम में पलंग पर नहीं सोता. खानों में पत्थर खनन का कार्य रात और दिन चलता रहता है. वह भी एक खान से दूसरी खान पर चलता रहता है. रात को जब भी नींद आने लगती है, वह घण्टे दो घण्टे के लिए किसी भी पत्थर पट्टी पर लेट जाता है और सो लेता है. नींद खुलते ही फिर घूमना आरम्भ कर देता है. काम के दौरान आराम करने का यह तरीका जरा कठिन है. सबके लिए संभव भी नहीं है. पर अपवाद सब जगह मिल जाते हैं. 

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