Motivational story in Hindi-जीवन में प्रेरणा भर देने वाली सर्वश्रेष्ठ Motivational story

Motivational story in Hindi

Motivational story in Hindi-जीवन में प्रेरणा भर देने वाली सर्वश्रेष्ठ Motivational story

Motivational story-एक नन्हा-सा विचार जीवन में सहायक होता है 

सर्य भगवान को अर्घ्य चढ़ाने के लिए अंजलि में जल लिए वैवस्वत मनु मंत्र-जप कर रहे थे कि उन्हें अपनी हथेलियों में हलचल महसूस हुई. एक नन्हा-सा मीन-शिशु चिल्ला उठा-“मेरी रक्षा कीजिए, बड़ा होकर आपके काम आऊँगा.” मनु ने नवजात मीन-शिशु को अपने जल-पात्र में डाल दिया. फिर वह चिल्ला उठा-“मेरी रक्षा कीजिए.” अब उसे उन्होंने एक बड़े पात्र में डाल दिया, उसका आकार बढ़ने लगा-छोटे पात्र से बड़े पात्र में, फिर कुण्ड और सरोवर में हस्तानान्तरित करते हुए अन्ततः उसे सागर में प्रवाहित कर दिया. एकदिन महाप्रलय आया. उसी महामत्स्य ने मनु की रक्षा की. उन्हें सुरक्षित भूमि तक ले गए. हमारे मन में उठी कल्पना की एक छोटी-सी किरण हमारे जीवन में बड़े काम की वस्तु सिद्ध हो सकती है, 

motivational story in hindiअच्छे व्यक्ति की सर्वत्र आवश्यकता है 

Motivational story in Hindi

गुरुनानक एक बार घूमते-घूमते एक गाँव में उपदेश देने के लिए ठहरे थे. ग्राम टुवासियों ने उनका स्वागत बड़े धूमधाम से किया. जब वे चलने लगे तो आशीर्वाद स्वरूप कहा-“उजड़ जाओ” 

शाम को वे दूसरे गाँव में पहुँचे. वहाँ के लोग बदमाश थे. गुरुनानक को कटुवचन कह अपमानित किया. जब गाँव से चलने लगे, तो ग्रामवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा-“आबाद रहो”. 

एक शिष्य यह सब देख रहा था, उसने पूछा-” भगवन् यह क्या ? जिसने सम्मान दिया उसे आपने उजड़ने का और जिसने अपमानित किया उसे आबाद रहने का आशीर्वाद दिया. ऐसा क्यों?” गुरुनानक ने कहा-“अच्छे लोग घर छोड़कर जहाँ जाएंगे वहाँ सुरभि फैलाएंगे और दुष्ट अपने गाँव में सिमट कर रहें, वही अच्छा, अन्यथा अनर्थ ही फैलेगा न ?” गुरुनानक की बातों से शिष्य मंत्रमुग्ध हो गया. 

hindi motivational story-सृजनशीलता को पनपने का अवसर दें

Motivational story in Hindi

एक दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने अध्ययन कक्ष में बैठे थे. कभी-कभी उनकी दृष्टि किताब से हटकर तीन मूर्ति भवन के प्रांगण की ओर चली जाती. 

गर्मी का मौसम था-दोपहर का समय. लू चल रही थी. माली अपने घरों में जा छिपे थे. ठीक इस दुपहरी में एक नन्हा बालक आम्रवृक्ष के नीचे खड़ा डालियों से लटके आम्रफलों की ओर एकटक देख रहा था. वह लगातार उछल रहा था. उछल-उछल कर आमों को पकड़ना चाहता था. आम के फल उसकी पहुँच से बाहर थे. उसने एक तरकीब सोची. कुछ दूर पर बड़े-बड़े पत्थर रखे हुए थे. पत्थर के 

उन टुकड़ों को वह धीरे-धीरे ढकेलते हुए आम्रवृक्ष के निकट लाया कड़े श्रम के बाद एक पत्थर के ऊपर दूसरा रखकर वह आम को अपने हाथों से पकड़ लेना चाहता था, लेकिन मात्र दो अंगुल से वे ऊपर हो जाते. बेचारा छू नहीं पाता. अन्ततः उसने तीसरा पत्थर रखा, अब उसकी आँखें आशा से चमक उठी. धीरे-धीरे पत्थरों की ढेर पर उसने पाँव रखे. अब एक आम उसकी हथेली में आने ही वाला था कि पीछे से जोरों की आवाज आई-कौन है बे? आता हूँ. इतना कहना था कि पत्थर फिसल गए और वह बालक धड़ाम से धरती पर गिर पड़ा. नेहरू जी ने जैसे ही यह दृश्य देखा उन्हें माली पर क्रोध आ गया. किताब ज्यों-की-त्यों रखकर वे प्रांगण में दौड़े और माली को एक तमाचा जड़ दिया जो बालक के कान पकड़े हुए था. नेहरू जी माली को पीटते हुए डाँटने लगे और कहा-“बदमाश तूने बच्चे की मेहनत नष्ट कर दी. दूसरे दिन माली को प्रांगण से निकाल दिया गया. 

Motivational stories-नहीं चाहिए स्वर्ग-नरक 

एक बार महान सूफी-साधिका दिन में दोपहर के समय सिर पर एक घड़े में पानी और दूसरे हाथ में मशाल लेकर घर से निकली। उसको इस प्रकार घूमते देखकर लोग आश्चर्य से भर उठे और उसे देखने के लिए भीड़ लग गई। भीड में मौजद किसी व्यक्ति ने राबिया से पूछा, “दिन में दोपहर के समय आप ऐसा क्यों कर रही हैं?” 

राबिया ने उत्तर दिया, “मैं इस घड़े के पानी को नरक की आग पर डालकर उसे बुझाने जा रही हूं। साथ ही साथ इस मशाल से स्वर्ग को भी जला दूंगी जिससे कोई भी मनुष्य स्वर्ग या नरक के भय से प्रभु की आराधना न करे, बल्कि अपने भीतर सर्वव्यापी परमात्मा को खोजकर उसे सब जगह देखे, क्योंकि संसार में सभी लोग या तो भय से ईश्वर को याद करते हैं, या कुछ पाने की आकांक्षा से। ये दोनों ही भाव उपासना को मार देते हैं।

Motivational story-संशय त्यागो, सुख से रहो

रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि जिसके पास आत्मविश्वास है, उसके लिए असंभव भी संभव हो सकता है। आत्मविश्वास का अभाव ही मन में संशय को जाग्रत करता है, जिसे गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य का शत्र बताया है। 

अर्जुन संशयात्मक बुद्धि के कारण ही तो रणभूमि में कर्तव्य से विमुख हो रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उसका आत्मविश्वास बढ़ाया और विजयी बनाकर यश दिलवाया था। आत्मविश्वास कैसे बढ़ता है? 

एक दिन मैंने मंदिर में एक निर्धन व्यक्ति को यह प्रार्थना करते हुए देखा, “हे भगवन! मुझे ऐसा आशीर्वाद दें कि मेरे विचार शुद्ध हो जाएं।” 

मैंने उससे पूछा, “तुमने गोविंद से संसार के सुख-भोग को छोड़कर ऐसा आशीर्वाद क्यों मांगा?” 

उसने उत्तर दिया, “मैंने भगवान से ऐसा आशीर्वाद इसलिए मांगा, क्योंकि जब तक इंसान अपने आचरण से लोगों पर अच्छापन न जता दे, वह लोगों से अच्छे व्यवहार की आशा कैसे कर सकता है।” 

तात्पर्य यह है कि आत्मसम्मान से ही आत्मविश्वास बढ़ता है। आत्मविश्वास से ही जीवन में आत्म निर्भरता आती है। 

अफ्रीका में जब गांधी जी वकालत करते थे, तब वे एक दिन अपने सिर के बाल स्वयं काटकर कोर्ट में गए। उनकी खिल्ली उड़ाते हुए किसी ने उनसे कहा, “मिस्टर गांधी! सिर पर चूहे चढ़ गए थे, क्या?” 

उसका व्यंग्य सुनकर गांधी जी बोले, “मित्र! चूहे तो नहीं चढ़े मगर मेरे जैसे काले आदमी के बालों को गोरे हज्जाम कैसे छू सकते थे, इसलिए कैसे भी हों मुझे अपने हाथों से काटे बाल ही अधिक प्रिय हैं।” 

युद्ध नहीं, प्रेम मार्ग श्रेष्ठ है

सुविख्यात दार्शनिक ब्रूस बार्टन से एक दिन कुछ इतिहासकार और इतिहास के छात्र बातचीत कर रहे थे। संसार के महान व्यक्तियों के विषय में बातचीत होने लगी। 

ब्रूस बार्टन ने कहा, “मैं तो भारत के राजा अशोक को इतिहास की सबसे अग्रणी विभूति मानता हूं।” 

विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार ने कहा, “सर! अनेक देशों में ऐसे अनेक राजा व शासक हुए हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े राज्य जीते और उन पर सफलता के साथ लंबे समय तक शासन किया। इसके बावजूद आप युद्ध से पलायन करने वाले भारतीय राजा अशोक को सबसे महान क्यों मानते हैं?” 

बार्टन ने कहा, “अन्य राजाओं ने रक्तपात करके राज्य जीते। उन पर भले ही लंबे समय तक राज किया, किंतु उनकी अंतरात्मा हमेशा राजसत्ता के मद में आकंठ डूबी रही। अशोक एकमात्र ऐसे राजा थे, जो दिग्विजयी और शूरवीर होते हए भी अच्छे-बुरे के विषय में चिंतन करते थे। तभी तो एक दिन उनकी अंतरात्मा को रक्तपात करके जीते गए राज्यों के प्रति पश्चाताप की अनुभूति हई और रक्तपात का घातक रास्ता त्याग कर उन्होंने अहिंसा व प्रेम का जीवन जीने का संकल्प लिया। इसीलिए मैं रक्तपिपास राजाओं की अपेक्षा प्रेम व शांति को अंगीकार करने वाले अशोक को महानतम् शासक मानता हूं।” 

motivational story-सहन शक्ति

भगवान बुद्ध नगर में आए हुए थे। कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके शिष्यों को परेशान कर रखा था। इस पर शिष्य बुद्ध से कहने लगे, “इन लोगों ने तो बहुत परेशान कर रखा है। सहन नहीं हो पा रहा है। कहीं अन्यत्र चलिए।” 

बुद्ध ने कहा, “यदि ये लोग वहां भी पहुंच गए तो?” “भंते ! तब हम कहीं और चले जाएंगे।” “और यदि ये वहां भी पहुंच गए तो?” “तब हम अन्यत्र कहीं चले जाएंगे।” “यदि ये वहां भी पहुंच जाएं तो?” 

बुद्ध ने पूछा और फिर समझाया, “देखो। बाधाओं और जीवन में आने वाली कठिनाइयों से कभी कतराना नहीं चाहिए। ये तो सभी जगह आ सकती हैं। अत: श्रेष्ठ मार्ग तो यह है कि हम अपनी सहनशक्ति को ही बढ़ाएं। उससे जीवन का मार्ग सरल हो जाता है।” 

विश्वास की शक्ति 

भयकर तूफान से गेलीली झील का पानी बांसों उछलने लगा। जो नावें झील में चल रही थीं, वे बुरी तरह थरथराने लगीं। लहरों का पानी भीतर पहुंचने लगा तो यात्रियों के भय का पारावार न रहा।

एक नाव में एक कोने में कोई निर्द्वद्व व्यक्ति सोया पड़ा था। साथियों ने उसे जगाया। जागकर उसने तूफान की तरफ ध्यानपूर्वक देखा और फिर साथियों से पूछा, “आखिर इसमें डरने की क्या बात है? तूफान भी आते हैं, नावें भी डूबती हैं और मनुष्य भी मरते ही हैं। इसमें ऐसी क्या अनहोनी बात हो गई जो आप इतनी बुरी तरह से हड़बड़ा रहे है?” 

सभी यात्री उसका उत्तर सुनकर अवाक रह गए। उस निर्द्वद्व व्यक्ति ने कहा, “विश्वास की शक्ति तूफान से भी बड़ी है। तुम विश्वास क्यों नहीं करते कि यह तूफान क्षण भर बाद बंद हो जाएगा।” 

भयभीत यात्रियों के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उस अलमस्त ने आंखें बंद की और अपने अंतर की झील में उतरकर पूरी शक्ति से कहा, “शांत हो जा मूर्ख।” और तूफान तुरंत शांत हो गया। 

सहमे हुए नटखट बच्चे की तरह नाव का हिलना भी बंद हो गया और यात्रियों ने चैन की सांस ली। 

अब उस अलमस्त यात्री-जीसस क्राइस्ट ने यात्रियों से पूछा, “दोस्तो! जब विश्वास बड़ा है तो तुमने तूफान को उससे भी बड़ा क्यों मान लिया था?” फिर आगे बोले, “दिल को डर से निकालकर हिम्मत को स्थान देना चाहिए। तभी हर कार्य में सफलता प्राप्त हो सकती है।” 

motivational story-कर्म ही पूजा

बात उस समय की है, जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति थे। हुआ यूं कि बंदेलाल नाम का एक कर्मचारी जो राष्ट्रपति भवन की मर्यादा को समझता तो जरूर था, पर अपने आलसीपन व लापरवाही की हद को पार किए जा रहा था। शीघ्र ही उसकी शिकायत राजेंद्र बाबू के पास तक पहुंच गई। एक दिन राजेंद्र बाब जाड़े के दिनों में जब धूप का आनंद ले रहे थे तो एक कर्मचारी ने जाकर उनसे कहा कि आप बंदेलाल को नौकरी से निकाल दें। शिकायतकर्ता की बात गौर से सुनकर राष्ट्रपति ने कहा, “ठीक है, कल सुबह उसे बर्खास्त कर देंगे।” 

दूसरे दिन राजेंद्र बाबू तड़के उठकर तौलिया व साबुनदानी लेकर उक्त कर्मचारी के कमरे में पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने बंदेलाल को आवाज लगाई। आवाज सुनते ही सभी कर्मचारी हकबका गए कि आज राष्ट्रपति यहां कैसे आ गए। तब तक राष्ट्रपति हॉल में प्रवेश कर बंदेलाल के बेड के पास पहुंच चुके थे। उनके हाथ में तौलिया और साबुनदानी देखकर बंदेलाल काफी लज्जित हो गया। महामहिम ने विनोदी स्वर में उससे कहा, “उठो बंदेलाल जी, स्नान कर लो।” इतना सुनते ही बंदेलाल महामहिम के चरणों में गिर गया और उनसे क्षमा मांगने लगा। 

तब राष्ट्रपति ने कहा, “इसमें क्षमा मांगने की क्या बात है। कल तुम्हारी लापरवाही की शिकायत आई थी और सभी तुम्हें नौकरी से निकाल देने की बात कह रहे थे। परंतु हम तुम्हारी तनख्वाह में दस रुपये प्रतिमाह की वृद्धि करते हैं 

और चलो नहा-धो लो।” इस पर बंदेलाल बहुत शर्म महसूस करते हुए गिड़गिड़ाकर बोला, “हुजूर! अब हमें माफ कर दीजिए और हमारी तनख्वाह में भी वृद्धि न करें।”

उदारमना राजेंद्र बाबू ने उसे क्षमा कर दिया। तब से कर्मचारियों की कोई भी शिकायत उनके पास फिर न पहंची और बंदेलाल तो उनकी सेवा में इस तरह से जुटा, जैसे कर्म ही उसकी पूजा हो। 

गुस्से पर काबू

एक स्त्री को छोटी-छोटी बातों पर बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था। उसके इस स्वभाव से घर के सभी लोग बहुत परेशान थे। एक दिन एक साधु उसके घर आया। वह स्त्री साधु से बोली, “महाराज! मुझे बात-बात पर गुस्सा क्यों आ जाता है और चाहते हुए भी मैं उस पर काबू नहीं कर पाती। कृपया मुझे बताइए कि मैं अपने गुस्से पर कैसे काबू रखू।” 

यह सुनकर साधु उसे एक शीशी देते हुए बोला, “इस शीशी में से बूंद बंद करके दवाई निकलती है। जब भी तुम्हें गुस्सा आए तुम इस शीशी से तब तक दवाई पीना जब तक कि तुम्हारा गुस्सा शांत न हो जाए।” 

सात दिन बाद जब साधु उस स्त्री के द्वार पर आया तो वह स्त्री साधु के चरणों में गिरकर बोली, “महाराज! आखिर कौन-सी दवाई थी, जिसने एक हफ्ते में ही मुझे इतना बदल दिया। अब मुझे गुस्सा नहीं आता।” 

इस पर साधु बोला, “बेटी! उस शीशी में कोई दवाई नहीं, अपितु पानी था. गस्से को नियंत्रण में रखने का सबसे सरल उपाय मुंह को बंद रखना है। गस्से में इंसान जितना बडबडाता है बात उतनी ही बढ़ती जाती है और लडाई की नौबत आ जाती है।” 

स्त्री साध की बात समझते हुए बोली, “महाराज! आपने सत्य कहा। यदि हम गुस्से में सिर्फ चुप रहें तो व्यर्थ के विवाद उत्पन्न ही न हों।” 

 

motivational story for students दृढ़ संकल्प से सब कुछ सम्भव है 

छोटी चिड़िया टिटहरी ने सागर तट पर एक झाड़ी में अपना अण्डा दिया था. 

समुद्र में लहरें उठी और अण्डों को दूर बहा ले गयीं. टिटहरी के क्रोध की सीमा न थी. उसने समुद्र से अपने अण्डे माँगे. उसने वापस नहीं किये. टिटहरी कब चुप बैठने वाली थी? उसने संकल्प किया कि समुद्र को सुखा दूंगी. अपने नन्ही-सी चोंच में बालू भरकर समुद्र में डालने लगी. 

महर्षि अगस्त ने इसे देखा. वे टिटहरी की संकल्प शक्ति को देख मुग्ध हो गए. उन्होंने उसकी सहायता करने का विचार किया. 

सुनते हैं कि महर्षि अगस्त ने समुद्र का सारा जल सोख लिया और टिटहरी के अण्डे वापस कराये. कहा जाता है कि समुद्र के अनुनय-विनय के पश्चात् उन्होंने उसके जल को पुनः वापस कर दिया. 

motivational stories in hindi for students मितव्ययता बड़ों की पहचान है 

सर्दी का मौसम था. देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बाहर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. उन्होंने कहा-“मेरा कुर्ता-बंडी लाओ.” नौकर दौड़कर कुर्ता-बंडी लाया. नया नौकर था. शास्त्री जी ने कहा-“यह कुर्ता नहीं, फटा कुर्ता लाओ.” बगल में बैठे एक अतिथि चौंके और पूछा-“आपको बाहर जाना है, फटा कुर्ता क्यों माँग रहे हैं ?” शास्त्री जी ने कहा-“जाड़े में मैं फटा कुर्ता ही पहनता हूँ, क्योंकि कोट-बंडी में छिपाने का यही तो अवसर है.” अतिथि आँखें फाड़े देखते रह गए ऐसी थी शास्त्री जी की मितव्ययिता एवं सादगी. 

  true motivational story in hindi समाजसेवा से व्यक्तित्व निखरता है 

भयंकर बाढ़ का प्रकोप था. गंगा की बाढ़ में गाँव के गाँव बह गए. दूर-दूर तक गाँवों का कहीं नामोनिशान नहीं था. कोइलवर के पुल पर स्लीपर नहीं थे. केवल रेल की पटरियाँ ही थीं. राहत के रुपए कमर में बाँधे राजेन्द्र प्रसाद सोच रहे थे-पुल कैसे पार किया जाय. धारा तीव्र है. तैरकर जाना सम्भव नहीं. साथ में सहयोगी अब्दुल बारी भी कुछ सोच नहीं पा रहे थे. राजेन्द्र बाबू ने पूछा-“अभी कितने बजे हैं ?” बारी साहब ने कहा-“दस !” तब तो ट्रेन का खतरा नहीं है. क्यों नहीं हम दोनों पटरी पर रेंगते हुए नदी पार कर जायें. पीठ पर गठरी लिए हुए दोनों रेल लाइन के सहारे धीरे-धीरे रेंगने लगे. नीचे नदी प्रबल वेग से बह रही है और ऊपर दो स्वतन्त्रता सेनानी अपनी पीठ पर गट्ठर बाँधे राहत की सामग्री लिए रेल पटरी के सहारे रेंगते हुए नदी पार कर गये. लोगों के राहत की इतनी चिंता थी राजेन्द्र बाबू आगे चलकर भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने और भारत रत्न कहलाये. 

Real life Inspirational Story in Hindiयोगबल महान् है

कछ वर्ष पूर्व देहातों में यह परम्परा थी कि बरातियों से कन्या पक्ष के लोग ‘प्रश्न पूछते थे. एक गाँव में स्वामी जी (महर्षि सदाफल देव) बारात में गए थे. टेंट के बाहर चौकी के आसन पर विराजमान थे, तभी एक व्यक्ति दौड़ा आया और कहने लगा स्वामी जी गाँव की इज्जत तो मिटटी में मिल जाएगी.लोग संस्कृत में प्रश्न पूछ रहे हैं और इनमें से कोई संस्कृत जानता नहीं है. क्या किया जाय ? समस्या अति विकट है. बचाइए, स्वामी जी ने गाँव के एक चरवाहे को बुलाया जो निरक्षर था और आदेश देते हुए कहा-जाओ जबाव दो. 

वह चरवाहा जाकर महफिल में खड़ा हो गया, उसने अपने होठ खोले और धारा प्रवाह संस्कृत बोलता रहा. अजीब दृश्य था, एक गमछा पहने, गंजी धारण किये, एक चरवाहा संस्कृत बोल रहा है, वह भी प्रसंग के अनुकूल. लोग यह दृश्य देखकर भावविभोर हो गये. तालियों की गड़गड़ाहट से टेंट गूंज उठा. बाराती जीत गये. सबने एक स्वर से कहा-‘सद्गुरु भगवान की जय’. आध्यात्मिक पुरुष भैंसे से भी वेद पढ़ा सकते हैं. साहेब कबीर ने ऐसा ही कर दिखाया था. 

Best Hindi motivational storiesबलिदान महान् आदर्श है   

फाँसी के मात्र दो दिन पूर्व की बात है. राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की माँ अपने लाड़ले के अन्तिम दर्शन के लिए जेल आयी हैं. सहसा माँ को देखकर ‘बिस्मिल’ की आँखों में आँसू आ गए. मानस में अतीत की अनेक सुखद स्मृतियाँ साकार होने लगीं. फिर पुत्र की आँखों से झर-झर आँसू टपक पड़े. माँ ने देखा और बोल उठी-“मैं तो समझती थी, तुमने अपने पर विजय पायी है, किन्तु यहाँ तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है, जीवन-पर्यन्त देश के लिए आँसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो ? इस कायरता से अब क्या होगा ? तुम्हें वीर की भाँति हँसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूगी. मुझे गर्व है कि इस गए-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश के लिए स्वयं को बलिवेदी पर न्यौछावर कर रहा है. मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, उसके बाद तुम देश की चीज थे और उसी के काम आ गए. मुझे तनिक भी दुःख नहीं.” अपने आँसुओं पर अंकुश लगाते हुए ‘बिस्मिल’ ने कहा-“माँ ! तुम तो मेरे दिल को भली-भाँति जानती हो. मुझे अपनी मृत्यु पर तनिक भी दुःख नहीं है. आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु पर बहुत सन्तुष्ट हूँ और फाँसी के तख्ते की 

ओर जाते हुए उन्होंने यह शब्द कहे- 

“मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे ।

बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे |

जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे । 

तेरा ही जिक्र या तेरी जुस्तजू रहे ॥

फिर 

“वंदे मातरम्, भारत माता की जय”

के बाद 

“विश्वानिदेव सवितर्दुरितानि परसुव यदभद्रं तं न असुव”

           का उच्चारण करते करते फाँसी पर झूल गए. 

भगतसिंह को फाँसी की सजा हुई है. फाँसी से एक दिन पहले प्राणनाथ मेहता ने उन्हें एक पुस्तक दी ‘लेनिन की जीवनी’ पुस्तक पढ़ने में वे इस तरह तल्लीन हो गए कि सुधि नहीं रही कि उन्हें आज फाँसी लगनी है. जल्लाद उन्हें लेने जेल की कोठरी में आ गए. अभी एक पृष्ठ पढ़ना शेष रह गया था. उनकी दृष्टि पुस्तक के उसी आखिरी पृष्ठ पर थी कि जल्लाद ने चलने को कहा, भगतसिंह हाथ उठाकर बोले, “ठहरो, एक बड़े क्रान्तिकारी की दूसरी बड़े क्रान्तिकारी से मलाकात हो रही है.” जल्लाद वहीं ठिठक गए. भगतसिंह ने पुस्तक समाप्त की, उसे सोल्लास छत की ओर उछाला फिर दोनों हाथों से थामकर फर्श पर रखा और कहा, ‘चलो और वे मस्त भरे कदमों से फाँसी के तख्त की ओर बढ़ने लगे. उनके दृढ़ कदमों को जल्लाद निहारते रहे. 

23 मार्च, 1931 की संध्या. सात बज रहे हैं. फाँसी के तख्त की ओर तीन नवयुवक बढ़ रहे हैं. फाँसी की काली वर्दी पहना दी गयी है. बीच में भगतसिंह चल रहे हैं, सुखदेव उनकी बायीं ओर और राजगुरु दायीं ओर चल रहे हैं. भगतसिंह ने अपनी दाईं भुजा राजगुरु की बाईं भुजा में तथा बाईं भुजा सुखदेव की दाईं भुजा में डाल दी. तीनों ने नारे लगाए इन्कलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद. फिर गीत गाए 

“दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उलफत 

मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वतन आएगी ।”

और वे देखते-देखते फाँसी पर झूल गए. 

motivational stories ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखें 

राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के फाँसी का समय निकट था. उन्होंने अपने बारे में ठीक दो दिन पूर्व लिखना शुरू किया. उन्हीं के शब्दों में, “आज 16 दिसम्बर, 1927 ई. को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जबकि 19 तारीख को 6.30 बजे प्रातः ही इस शरीर को फाँसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है. अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही. यह सर्व शक्तिमान प्रभु की लीला है. सब कार्य उसकी इच्छानुसार ही होते हैं. यह परमपिता परमात्मा के नियमों का ही परिणाम है कि किस प्रकार किसको शरीर त्यागना होता है. मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र हैं. जब तक कर्मक्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-धारण के बन्धन में पड़ना ही होता है.

यह शास्त्रों का निश्चय है. यद्यपि वह परब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणामस्वरूप कौनसा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिए यह मेरा दृढ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अतिशीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकट सम्बन्धी या इष्ट मित्र के घर में जन्म ग्रहण करूँगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो. परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इस देश में जन्म दें, ताकि अपनी पवित्र वाणी देववाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुँचाने में समर्थ हो सकूँ.” 

Motivational story in Hindi

जहाँगीर के राज्य में चन्दूसाह नाम का एक सेठ था. उसने अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव गुरु अर्जुनदेव के समक्ष रखा था कि वे अपने पुत्र हरगोविन्द की शादी करें. अपने शिष्यों की राय से उन्होंने प्रस्ताव को ठुकरा दिया. इस पर चन्दूसाह नाराज हो बदले का अवसर ढूँढ रहा था. इसी बीच लोगों ने जहाँगीर के कान भर दिए कि गुरु-ग्रन्थ में बहुत सी बातें इस्लाम के विरुद्ध हैं. जहाँगीर ने गुरु को लाहौर बुलवाया. उनके आदेश पर उन तथाकथित धर्म विरुद्ध अंशों को गुरु-ग्रन्थ से निकालने के लिए कहा गया गुरु ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “गुरु-ग्रंथ में ईश्वर की प्रार्थना है, उन्हें निकालने का साहस कोई नहीं कर सकता.” जहाँगीर ने दो लाख रुपए का जुर्माना किया. गुरु ने कहा, मेरी सम्पत्ति अपनी कुछ नहीं, जो कुछ है सिखों का ट्रस्ट में है, उसमें से दण्ड भुगतान के लिए कुछ भी नहीं दिया जा सकता.”

फलतः गुरु अर्जुनदेव को गर्म लोहे के तवे पर बैठना पड़ा. ऊपर से उनके शरीर पर तप्त रेत डाली गयी. यह देखकर उनके शुभचिंतक मीर मियाँ ने कहा, “आदेश हो तो अभी मैं अपनी योगमाया से दुष्टों को दण्डित करता हूँ”, लेकिन गुरु ने मना कर दिया. उन्होंने कहा, “ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं डोलता, अतएव यदि यही उसकी इच्छा है, तो होने दो.” खुद चन्दू सेठ की पतोहू इससे द्रवित हो गुरु के पास शर्बत लेकर पहुंची. गुरु ने चन्दूसाह के घर से कुछ भी लेने से इनकार कर दिया, लेकिन उस युवती को आशीष दिया. गुरु को पाँच दिनों तक इसी प्रकार की यातनाएँ दी गयीं, लेकिन इन्होंने पूरी शान्ति से सब कुछ सहन किया और अन्तिम दिन रावी नदी की धारा में विलुप्त हो गए. अन्तिम बार शिष्यों को आशीष दिया. उनके होठों पर यही शब्द है, “हे प्रभु मुझे तेरा सुमिरन ही चाहिए और कुछ नहीं, तेरी जो इच्छा है, वही हो.” 

सुनते हैं कालान्तर में चन्दूसाह के गुनाहों का फल मिला. लाहौर की गलियों में पागल की भाँति घूमते-घूमते एकदिन चन्दूसाह की मौत हो गयी. 

मोटिवेशनल रियल लाइफ स्टोरीजविश्वास कभी न तोड़ें 

अपनी आत्मकथा में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने एक घटना का वर्णन अपनी फाँसी के दो दिन पूर्व किया-“मुझे कोतवाली लाया गया. चाहता तो गिरफ्तार नहीं होता. कोतवाली के दफ्तर में निगरानी में रखा सिपाही सो रहा था. मुंशी जी से पूछा-भावी अपात्ति के लिए तैयार हो तो जाऊँ ? मुंशी जी पैरों पड़ गए कि व्यापारी ने इनके द्वारा भेजे कुछ रुपयों के एवज में पूरा सामान भेज दिया. एक सप्ताह बीत गया. व्यापारी को पैसा नहीं गया. वह घबराने लगा. इधर घनश्याम दास ने देखा जूट का दाम बढ़ने वाला है. उन्होंने माल नहीं बेचा. कुछ दिन प्रतीक्षा करने की सोची. तब तक कोलकाता के व्यापारी से सूचना आयी कि पैसा भेज दें. घनश्याम दास के पास पैसा आया नहीं था फिर भी दूसरे से कर्ज लेकर भेज दिया. जब व्यापारी को यह ज्ञात हुआ कि माल अभी तक बिका नहीं, फिर भी घनश्याम दास ने पैसा भेज दिया, वह अभिभूत हो गया. 

अब क्या कहना था ? मात्र घनश्याम आदेश देते और सामान हाजिर घनश्याम की विश्वसनीयता के गुण ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया. 

Motivational story in Hindi

लेखक अजीब उलझन में है. वह एक अभियन्ता के साथ भाषण कला में भी रुचि रखता है. लोग इस काम के लिए समय-समय पर आमन्त्रित करते हैं. एक मास पूर्व उसकी एक प्रबन्धक से भेंट होती है वह शिक्षक दिवस पर उसे भाषण देने के लिए कहता है. शिक्षक-दिवस के इस कार्यक्रम में शहर के अनेक बड़े लोगों के साथ प्रबन्ध निदेशक भी मंच पर उपस्थित रहेंगे. लेखक की स्वीकृति पाकर प्रबन्धक निश्चिन्त हो जाता है. 

तभी लेखक की पत्नी की दुर्घटना हो जाती है. पूरा दाहिना हाथ जख्मी है. डॉक्टर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं कि क्या होगा. कहीं हाथ काटना न पड़े. 

नित्य अस्पताल की भागदौड़, पत्नी की गम्भीर स्थिति पर नौकरी की जिम्मेदारी. उसका मात्र एक ही अवलम्ब है-सद्गुरु ! जैसे रखे रहना है, हाथ काटना ही पड़े तो इसमें उसका योगदान जो भी होगा बचाने के लिए करेगा यदि फिर भी काटना पड़ा तो यह मान लेगा यह प्रारब्ध है, भोगना ही होगा. डॉक्टर तैयारी में लगे. ऑपरेशन सफल हो गया. डॉक्टर ने कहा, “आप पर ईश्वर की दया है, हाथ नहीं काटना पड़ेगा, लेकिन हाँ समय लगेगा, प्लास्टिक सर्जरी करना पड़ेगा.” लेखक अपनी पुस्तकें लेकर अस्पताल पहुंचा और वहीं अध्ययनरत रहता. मन में सदा सद्गुरु का चिन्तन, ध्यान भूमि पर. कष्ट तो था लेकिन कष्ट की अनुभूति हल्की हो गई थी. फिर भी मानसिक एवं शारीरिक कष्ट तो उसे झेलना ही था. कभी आशा, कभी निराशा. लेकिन सदा उसके मुँह से निकलता-‘शान आन बचाइए’. 

अब शिक्षक दिवस पर भाषण देने की इच्छा नहीं, उसके लिए कौन तैयारी करे ? वक्त कहाँ था ? उसने प्रबन्धक को सूचित किया, ‘महोदय ! मेरा व्याख्यान देना सम्भव नहीं.’ सुनते ही प्रबन्धक के ऊपर मानों वज्रपात हो गया. आप अन्तिम समय में यह क्या कहते हैं -मेरी नौकरी चली जाएगी. लेखक ने अपनी स्थिति स्पष्ट की, अपनी पत्नी की दुर्घटना के बारे में बताया. 

प्रबन्धक गिड़गिड़ा कर कहने लगा, “सर ! मैं आपकी स्थिति समझ रहा हूँ लेकिन समय इतना कम है-मैं अब किससे कहूँ ? आपका नाम सबको बता दिया गया है. प्रबन्ध निदेशक हमको क्या कहेंगे ?’ लेखक का मन पसीज गया. उसने कहा, “ठीक है मैं अवश्य ही आऊँगा, चाहे जो भी हो जाय.” 

लेखक मंच पर जाता है और धारा प्रवाह हिन्दी में शिक्षक दिवस, शिक्षकों के दायित्व और डॉ. राधाकृष्णन के जीवन के संस्मरण सुनाता है. तालियों की गडगडाहट के साथ वह मंच से उतरता है. चेहरा प्रसन्न है, कहीं कोई विषाद की रेखा नहीं. लेकिन तत्काल उसे अपनी पत्नी की याद आती है जो अस्पताल में कराह रही होगी. 

आज भी उसे अपने साहस, धैर्य और कर्तत्य-निष्ठा पर गर्व है. 

Hindi motivational stories– सफलता की शर्त है-सकारात्मक चिंतन 

एक दिन एक वन से गुजरते हुए नारद जी ने देखा एक मनुष्य ध्यान में इतना मग्न है कि उसके शरीर के चारों ओर दीमक का ढेर लग गया है. उसने नारद से पूछा-“प्रभो आप कहाँ जा रहे हैं ?” नारद ने कहा-“मैं बैकुन्ठ जा रहा हूँ.” “आप भगवान से पूछकर आयें कि मैं कब मुक्ति प्राप्त करूँगा”-उस व्यक्ति ने कहा. कुछ दूर जाने पर नारद जी ने एक दूसरे व्यक्ति को देखा जो कूद-फाँद कर रहा था कभी नाचता, कभी गाता, उसने भी नारद जी से कहा-“भगवान से पूछते आयें कि मैं मुक्त कब होऊँगा.” नारद जी ने उसे भी हाँ कही. 

लौटते समय दीमक वाले व्यक्ति ने पूछा-” भगवान ने मेरे बारे में क्या कहा ?” नारद जी ने कहा-“भगवान ने कहा कि मुझे पाने के लिए उसे चार जन्म और लगेंगे.” तब तो वह योगी विलाप करते हुए कहने लगा-“मैंने इतना ध्यान किया है कि मेरे चारों ओर दीमक का ढेर लग गया फिर भी मुझे चार जन्म और लेने पड़ेंगे.” नारद जी दूसरे व्यक्ति के पास गए उसने भी पूछा कि भगवान ने क्या कहा ? नारद जी ने उत्तर दिया-“भगवान ने कहा कि उसके सामने इमली का जो पेड़ है, उसके जितने पत्ते हैं, उतने ही जन्म उसे मुक्ति के लिए प्रयास करना पड़ेगा.” यह बात सुनकर वह व्यक्ति आनन्द से नृत्य करने लगा और बोला-“मैं इतने कम समय में मुक्ति प्राप्त करूँगा.” उसी समय देववाणी हुई-“मेरे बच्चे, तुम इसी क्षण मुक्ति प्राप्त करोगे.” वह दूसरा व्यक्ति इतना विश्वास युक्त एवं अध्यवसायी था. इसीलिए उसे यह पुरस्कार मिला. 

Hindi motivational stories

एक दिन घनश्याम दास बिड़ला कारखाना देखने गये. अचानक उनकी दृष्टि चहारदीवारी पर उग आये एक पीपल के पौधे पर पडी. उन्होंने एक प्रबन्धक से कहा-“देखते नहीं, दीवार पर पीपल उग आया है. कुछ ही दिनों में यह विशाल वृक्ष दीवार को तोड़ देगा. जल्द उसे उखड़वा दो.” प्रबन्धक ने सोचा-“पीपल को उखड़वाना तो अपराध है. इस पर देवता रहते हैं. उखड़वाने का अर्थ है-दैव कोप का भागी बनना इसे छोड़ देते हैं, बिड़ला जी को यह याद थोड़े ही रहेगा.” । 

दूसरे दिन घनश्याम दास फिर कारखाने आये और घूमते-घूमते वहीं पहुँच गये. उस पीपल के पौधे को वहीं देख आग बबूला हो गये. तुरन्त प्रबन्धक को बुलाया गया. पूछने पर उसने कहा- हुजूर पाप लगेगा. 

बिड़ला जी ने बगल में खड़े एक सहायक को बुलाया और पूछा-तुम इस काम को कर दो. कब करोगे ? उसने कहा-‘आज हो जायगा सर. 

फिर तीसरे दिन घनश्याम दास वहीं पधारे और देखा कि पीपल का पौधा अब दीवार पर नहीं है, बल्कि वहीं कुछ दूर जमीन में लगा दिया गया है. 

उन्होंने पहले प्रबन्धक की छुट्टी कर दी और दूसरे को पदोन्नति देते हुए कहा-तुममें सूझ-बूझ और साहस है, इसीलिए तुम्हें यह पदोन्नति दी गयी है. 

 motivational stories

श्री राम  के वन गमन का अवसर है. राजा दशरथ बहुत दुःखी हैं और अपनी जबान हार चुके हैं. कैकेयी ने अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का बनवास माँग लिया है, प्रजा दुःखी है, मंत्री और अन्य सभासद दुःखी हैं, लेकिन श्रीराम के चेहरे पर चिन्ता की कोई रेखा नहीं वे बिलकुल सहज भाव से अपनी माँ से अनुमति माँगने पहुंचते हैं. 

उल्टे अपनी माँ को समझाते हैं कि वह माता-पिता भाग्यशाली हैं जिनका पुत्र उनका चरण अनुरागी है. पिता के वचन की रक्षा के साथ उनके वन गमन में उनका बहुत बड़ा लाभ यह है कि उनकी चिर पोषित अभिलाषा की पूर्ति होगी. उन्हें ऋषि-मुनियों के दर्शन होंगे. 

माँ बिलखती रही, पिता बिलखते रहे, जनता तड़पती रही, श्रीराम सबको छोड़ वन चले गए. उन्होंने चुनौतियों को अवसर में बदल दिया. वह अवसर था अपने राज्य से दूर समस्त वृहत्तर भारत में भ्रमण, सत्संग एवं अपने आर्य-नीति का प्रचार, अवसर था दुष्ट राक्षसों के साथ युद्ध का ताकि ऋषियों के आध्यात्मिक प्रयास में राक्षसी बाधाएँ समाप्त हों, साथ ही समस्त भारत-लंकापर्यन्त रामराज्य की स्थापना का. इस कार्य ने श्रीराम को स्थायी कीर्ति दी. आज भी हम कठिनाइयों में जब घिर जाते हैं, कोई राह नहीं सूझती, राम याद आते हैं. उनका सकारात्मक चिंतन, उनका शौर्य, धैर्य, पराक्रम, निर्भयता और नीति आज भी हमें बल प्रदान करती है. मात्र उनके स्मरण से हमारे कमजोर बाजुओं में शक्ति का स्फुरण होता है. आज वही प्रभाव है कि हम उन्हें विष्णु का अवतार स्वीकार करते हैं और हर संकट की घड़ी में हे राम, राम-राम रटते हैं, जिसने हजारों वर्ष से भारतवर्ष को पतन से बचाया है चाहे आक्रमणकारियों ने हमें कितना ही प्रताड़ित क्यों न किया, हम मर न सके और कवि इकबाल को कहना पड़ा-“कुछ है कि इस्ती मिटती नहीं हमारी.” 

  Motivational stories in Hindi-शालीनता महापुरुषों का गुण है 

राजेन्द्र प्रसाद जब राष्ट्रपति भवन में थे उनकी सेवा के लिए एक नौकर नियुक्त हुआ जिसका नाम था तुलसी. तुलसी ईमानदार था, पर था लापरवाह. घर की सफाई करते-करते कभी-कभी वह कुछ सामान तोड़ देता. राजेन्द्र बाबू उसे बहुत बार कह चुके थे कि वह सावधानी से काम किया करे, लेकिन वह ध्यान ही नहीं देता… 

एक विदेशी अतिथि ने हाथी दाँत की एक कलम राष्ट्रपति जी को भेंट की थी. वे इसे सहेज कर यत्न से रखते थे और प्रेम से लिखते थे. एकदिन तुलसी ने घर को सजाने के क्रम में उस कलम को भी तोड दिया. राजेन्द्र बाबू को यह देख काफी दुःख हुआ कि बार-बार चेताने पर भी तुलसी ने गलती कर ही दी. उन्होंने सचिव को बुलाकर कहा-“आप तुलसी को मेरे काम के लिए अब नियुक्त नहीं करें, उसे कहीं अन्यत्र नियुक्त कर दें, जहाँ सामान टूटने की सम्भावना न हो.” 

तुलसी वहाँ से निकाल दिया गया. वह उद्यान में नौकरी में लग गया. 

दूसरे दिन अपने कमरे में सेवाकार्य में तुलसी को न पाकर राजेन्द्र बाबू बैचेन होने लगे. उन्होंने सोचा तुलसी ने जान-बूझकर तो कलम नहीं तोड़ी, काम करते समय उसका ध्यान कहीं अन्यत्र होगा गलती से यह टूट गयी. मैंने उसे अपने काम से निकालकर उसका अपमान किया है, उसकी भावना को ठेस पहुँचायी. 

अन्ततः सचिव को बुलाकर उन्होंने कहा-“तुरन्त तुलसी को मेरे पास भेजिए.” तुलसी अपराधी की भाँति डरा-डरा उनके समक्ष सिर झुकाये उपस्थित हुआ. अज्ञात सम्भावना के भय से वह काँप रहा था कि राजेन्द्र बाबू ने कहा-“तुलसी तुम मुझे क्षमा कर दो, मुझसे भूल हुई है, तुम्हें हटाकर.” 

तुलसी आश्चर्यचकित रह गया. गलती तो उसने की और बाबू उससे क्षमा माँग रहे हैं उसकी आँखों से अश्रुधारा बह चली. वह सोच नहीं पा रहा था कि क्या कहे, तब तक राजेन्द्र बाबू की आवाज सुनायी पड़ी-“जब तक तुम यह नहीं कह दोगे कि मैंने क्षमा किया मैं ऐसे ही तेरे सामने खड़ा रहूँगा.” अन्ततः तुलसी को कहना पड़ा-‘ठीक है, क्षमा किया’. उस दिन से तुलसी फिर राजेन्द्र बाबू की सेवा में लग गया. 

Motivational stories in Hindi

राजेन्द्र बाबू राष्ट्रपति भवन से अवकाश ग्रहण कर सदाकत आश्रम में पहुँचे. उन्हें उस जगह से बेहद प्रेम था. युवा क्रान्तिकारी के रूप में वह वहाँ रह चुके थे. उन्हीं दिनों का उनका एक किसान मित्र एक केस के सिलसिले में पटना आया था. सोचा जरा मिल लेते हैं अपने पुराने दोस्त राजेन्द्र से. देखें पहचानते हैं या नहीं. वह सदाकत आश्रम में पहुँचा. सिपाही जो वहाँ तैनात था, पूछा-“किसलिए आए हैं ?” किसान ने कहा-“राजेन्द्र बाबू से मिलना है.” सिपाही ने कहा-“अभी नहीं मिल सकते, साहब आराम कर रहे हैं.” राजेन्द्र बाबू खिड़की से दोनों की बातें सुन रहे थे. किसान झल्ला कर कह रहा था— अरे भाई हम लोग आन्दोलन में साथ थे, मिलने दो.” सिपाही ने कहा-“जाइए, सब लोग ऐसे ही कहते हैं.” 

राजेन्द्र बाबू ने भीतर से साथी की आवाज पहचान कर सिपाही से कहा “आने दीजिये.” किसान भीतर पहुँचा. यह देखकर आवाक् रह गया. अरे मैंने सोचा था कि वे शाही पलंग पर विश्राम कर रहे होंगे, कालीन बिछी होगी, यहाँ तो कुछ भी नहीं. राजेन्द्र बाबू बाँस की खटिया पर दरी डाल कर सो रहे हैं. किसान की आँखों में राजेन्द्र बाबू का वही पुराना स्वरूप देखकर विश्वास नहीं होता था कि इतने बड़े पद पर रहने वाला व्यक्ति बिलकुल नहीं बदला. इधर राजेन्द्र बाबू उसका हाथ पकड़कर रोने लगे और कहा-“हम जिन्दगी में कुछ ना कइनी.” किसान सोच में पड़ गया कि जो व्यक्ति देश के सबसे बड़े पद पर रहा, वह ऐसा क्यों कह रहा है. उसने कहा-“आप इतने बड़े पद पर रहे. बहुत कुछ किया अपने देश के वास्ते.” लेकिन राजेन्द्र बाबू अभी भी रोते हुए कह रहे थे-“ना भाई हम कुछ ना कइनी-कुछ ना.” धन्य थे राजेन्द्र बाबू. 

Motivational story in Hindi

महान् पुरुष अपने गुणों के कारण ही महान् होते हैं. जयशंकर प्रसाद के सन्दर्भ में यह शत-प्रतिशत सत्य है. इतने महान् साहित्यकार में अहम् का लेश भी नहीं था. एकदिन की बात है कि कालाकांकर के राजकुमार सुरेश सिंह उनसे मिलने गये. मकान के सामने एक व्यक्ति सुजनी की बगलवंदी पहने टहल रहा था. संध्या की वेला थी. सुरेश सिंह जी को वहाँ देखते ही-जयशंकर प्रसाद जी ने कहा-‘कहिये’ ? सुरेश सिंह जी ने अपना परिचय दिया और कहा “मैं पूज्य प्रसाद जी के दर्शन करना चाहता हूँ. उन्होंने मुझे बुलाया था. क्या आज उनके दर्शन हो सकेंगे?” 

प्रसाद जी ने स्नेह से कहा-“अरे आप ही सुरेश जी हैं ? बहुत जल्द आ गये. आइए, आइए. मैं ही जयशंकर हूँ.” 

एकदिन वही जयशंकर सहसा सुरेश सिंह के घर पहुंचे. उनके साथ एक व्यक्ति कुछ पुस्तकें लिये खड़ा था. सुरेश सिंह अभिभूत हो गए और कहा-“आपने बड़ा कष्ट किया.” 

कष्ट की क्या बात है ? आजकल रोज सवेरे टहलने निकलता हूँ. सोचा आज इसी ओर हो लूँ. लीजिए, आपके लिए अपनी कुछ पुस्तकें लाया हूँ. उन सभी पुस्तकों पर उनके हस्ताक्षर थे. 

इतने बड़े साहित्यकार में अहं छू नहीं पाया था. धन्य हैं ऐसे व्यक्ति जो विरले होते हैं. 

Motivational story 

राज्य सभा का सत्र चल रहा था. अध्यक्ष की कुर्सी पर देश के तत्कालीन ‘उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन विराजमान थे. शून्य काल के दौरान एक मंत्री कांग्रेस के ही एक सदस्य के प्रश्नों का जबाव दे रहे थे. तभी पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी कुर्सी से उठे और एक अन्य मंत्री के निकट पहुँचकर थोड़ी ऊँची आवाज में कुछ बोलने लगे. अध्यक्ष ने उनकी ओर घूर कर देखा और हठात् एक सशक्त आवाज हॉल में गूंज उठी ‘प्रधानमंत्री महोदय ! यह आप क्या कर रहे हैं ?’ सभी सदस्यों के कान खड़े हो गये. सभी सकते में आ गए. सोच ही रहे थे कि पंडित नेहरू को कहीं क्रोध तो नहीं आ गया ? अब क्या होगा? देश का एक दार्शनिक राजनेता एक लोकप्रिय राजनेता से जबाव तलब कर बैठा है. 

तभी पंडित नेहरू अपनी जगह से अपनी सीट की ओर बढ़ने लगे. वहाँ रुके और अध्यक्ष के समक्ष झुककर कहा, “शॉरी महोदय ! अब ऐसा कभी नहीं होगा.” डॉ. राधाकृष्णन के चेहरे पर मधुर मुस्कान फैल गयी. सभी सदस्य पंडित नेहरू के व्यक्तित्व के एक और गुण-अनुशासन से अभिभूत हो गये, जिन्होंने सदैव संसदीय मर्यादा का सर्वोपरि महत्व दिया और अपने आत्माभिमान को कभी ऊपर नहीं आने दिया. 

 वे सैकड़ों वर्षों तक साधना करते रहे. एक दिन ब्रह्मा ने प्रकट होकर कहा,  “वशिष्ठ के स्वीकार करने पर ही तुम ब्रह्मर्षि कहलाओगे.” विश्वामित्र के लिए यह असह्य था कि वे वशिष्ठ से प्रार्थना करें, इधर वशिष्ठ जब भी मिलते उन्हें ‘राजर्षि’ ही कहते थे. इससे क्रुद्ध होकर उन्होंने वशिष्ठ के सौ पुत्रों का वध करवा दिया. एक दिन वे क्रोध के वशीभूत होकर सज-धज कर गुरु वशिष्ठ को मारने आश्रम की ओर बढ़े. 

चाँदनी रात थी. आश्रम के प्रांगण में ब्रह्मवेदी पर बैठे गुरु वशिष्ठ से पत्नी अरुन्धती ने कहा, “कैसी निर्मल ज्योत्स्ना है.” वशिष्ठ ने कहा, “आजकल ऐसा ही निर्मल तेज विश्वामित्र के तप का है.” विश्वामित्र कुटिया के पीछे छिपे थे. अभी प्रहार करने ही वाले थे कि यह बात उनके कानों में पड़ी. उनका हृदय धिक्कार उठा, एकान्त में अपनी पत्नी के साथ बैठा अपने पुत्रों के हत्यारे की जो प्रशंसा कर रहे है, तू उन्हीं का वध करने आया है, धिक्कार है. उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र फेंक दिए और गुरु वशिष्ठ के चरणों पर गिर पड़े. महर्षि वशिष्ठ ने झुककर अपने हाथों से उठाते हुए कहा, ‘उठें ब्रह्मर्षि’. विश्वामित्र का अहंकार नष्ट हो चुका था. 

Motivational story in Hindi

राम-सीता का शुभ विवाह अब निश्चित हो चुका है. शिवजी का पावन धनुष श्रीराम के हाथों टूट चुका है. तभी परशुराम का आगमन होता है. वे पूछते हैं कि किसने धनुष तोड़ा ? लक्ष्मण और परशुराम का संवाद चलता है, लेकिन राम चुपचाप हैं. परशुराम लक्ष्मण को ‘रे नृप बालक काल वस’ तूने ऐसा किया है-कह देते हैं. लेकिन राम कहते हैं- 

नाथ शंभु धनु भंजनिहारा | 

होइएँ कोऊ एक दास तुम्हारा ||

अपने को क्रुद्ध परशुराम का दास कहना राम का शील है. इस तरह श्रीराम एक साथ ही शौर्य और शील का प्रदर्शन करते हैं. परशुराम सोचने लगे यह महापुरुष ही हो सकते हैं. शौर्य के साथ वाणी में संयम विरले लोगों में होता है और शिव का धनुष तोड़ना अति विरल कार्य है. सम्भव है ये अवतारी पुरुष हों वे परीक्षा लेने के लिए एक धनुष राम की ओर बढ़ाते हैं कि वह प्रत्यंचा चढ़ा दें, लेकिन यह क्या ? धनुष अभी हाथ से छूटा ही नहीं, किस आकर्षण शक्ति से यह खींच लिया गया है. राम अवतार है-यह अब निश्चित है. यह प्रसंग राम के वीरतापूर्ण व्यवहार से परशुराम के हृदय परिवर्तन की गाथा है. वे श्रीराम के चरणों पर साष्टांग प्रणाम करते हैं और अपने सद्गुणों के विकास के लिए तप करने चले जाते हैं. 

 

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