Motivational Status in Hindi-जो डर, चिन्ता एवम् तनाव से लड़ नहीं सकता, वह भरी जवानी में ही मर जाता है

Motivational Status in Hindi

Motivational Status in Hindi- जो डर, चिन्ता एवम् तनाव से लड़ नहीं सकता, वह भरी जवानी में ही मर जाता है, (Who Can Not Fight Against Fear, Anxiety & Tension, Dies An Untimely Death) 

1.जिसे हम नहीं जानते, वही हमें रहस्यपूर्ण लगता है. वस्तुतः उसी से हमें डर लगता है. और जैसे ही हम उसे जान लेते हैं, वह कोई रहस्य नहीं रह जाता, जाना-पहचाना सा लगता है. डर निकल जाता है. अर्थात् न जानने तक ही डर लगता है. इसलिए जानने से पहले डरने का कोई औचित्य नहीं है, जिसे अभी जाना ही नहीं, जिसे देखा परखा ही नहीं, उससे डर किस बात का? तो डर छोड़िए, जो करना हो, जिसे जानना हो, तत्काल आरम्भ करिए.

2. हम आज की नहीं, सदैव अनिश्चित ‘कल’ की चिन्ता करते रहते हैं, भविष्य के प्रति असुरक्षित अनुभव करते हैं. किन्तु यदि हम केवल वर्तमान की ही चिन्ता करेंगे तो बाकी सभी चिन्ताओं से मुक्त रहेंगे. जिसकी वस्तुतः हमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए, अफसोस कि वही हमारी चिन्ता का सबसे बड़ा कारण बन जाता है. इसलिए हमें ‘जो है, उसी की चिन्ता करनी चाहिए, ‘जो अभी नहीं है’, उसकी चिन्ता करने से बचना चाहिए.

3. सभ्यता ने व्यक्ति पर ढेर सारे प्रतिबन्ध लगा रखे हैं. यदि वह समाज के नियमों का अनुपालन करता है तो उसमें ‘अहम्’ पैदा हो जाता है और यदि वह नियमों के विरूद्ध चलता है तो ‘अपराध बोध’ का भाव पैदा हो जाता है. अब वह ‘अहम् भाव से गर्वित रहे या अपराध बोध से ग्रसित रहे ? यही द्वन्द्व उसके तनाव का मुख्य कारण है. इसलिए यदि तनाव मुक्त रहना हो तो ‘अहम्’ से बचिए. और पूर्ण सतर्क रहने पर भी यदि कोई गलती हो जाए तो कभी अपराध बोध से ग्रसित मत होइए. गलती को तुरन्त स्वीकार कर लीजिए और उसे सुधार लीजिए.

4. जैसे-जैसे विकास की दौड़ बढ़ती है, तनाव की मात्रा भी बढ़ती रहती है. तनाव का सम्बन्ध न भाव से है, न अभाव से है, केवल ‘स्वभाव’ से है. इसलिए स्वभाव से भाव की ओर उन्मुक्त रहें, तनाव से मुक्त रहेंगे. तनाव मुक्त रहने पर ही सफलता की ओर बढ़ सकेंगे. तनाव में रहकर तो आप कुछ भी ठीक से नहीं कर सकेंगे.

5. वस्तुतः डर, चिन्ता एवम् तनाव जीवन के आवश्यक अंग हैं. जिसमें इनका नितान्त अभाव हो, वह या तो पागल हो सकता है, या परमात्मा हो सकता है. कम से कम मनुष्य तो नहीं हो सकता. मनुष्य की ये स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ हैं, किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं, कि व्यक्ति सदैव ही डर, चिन्ता व तनाव से ग्रस्त रहें.

6. व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्ति है कि वह कभी चिन्ताओं से मुक्त होना ही नहीं चाहता है. यदि संयोग-वश वह चिन्ता मुक्त हो भी जाय तो यही सबसे बड़ी चिन्ता का कारण बन जाता है. इसलिए चिन्तित रहने की आदत छोड़िए. जिसकी भविष्य में होने की आशंका हो, उसके लिए अभी से चिन्ता करने का कोई औचित्य नहीं है. यदि आपका सोच सकारात्मक होगा और अकारण चिन्तित रहने की आदत छोड़ देंगे तो जिसकी आपको आशंका है, वह घटित ही नहीं होगा. चिन्ता एक प्रकार की कायरता है, जो व्यक्ति के जीवन को अंधकार से भर देती है.

7. डर और आशंकाओं के कारण ही हम समाज व समूह में रहना पसंद करते हैं. फिर भी हम इनसे मुक्त कहाँ हो पाते हैं. ‘जो हो गया’ उसकी चिन्ता और ‘जो होने वाला है’ उसकी आशंकाओं से सदैव घिरे रहते है. जबकि सच्चाई यह है कि ‘जो हो चुका’ उसे अब ‘अनहुआ’ नहीं किया जा सकता और ‘जो होने वाला है उसे ‘हुआ’ नहीं माना जा सकता. अर्थात् केवल वर्तमान को पकड़ कर ही आगे बढ़ा जा सकता है.

8. अफवाहों के कारण भी आशंकाओं का जन्म हो जाता है. आशंकाओं के कारण ही डर एवम् तनाव पैदा होते हैं. डर से चिन्ता, चिन्ता से तनाव और तनाव से ‘नर्वसनेस’ आती है. यह ‘नर्वसनेस’ ही कई रोगों का कारण बन जाती है. जो तनाव पर काबू पा लेता है, वह कई बीमारियों पर नियन्त्रण कर लेता है. साहसी एवम् बुद्धिजीवी डर, चिन्ता एवम् तनाव से लड़ता हुआ तमाम बाधायें पार कर लेता है.

9. कहते है कि ‘चिता’ तो केवल एक बार ही जलाती है, परन्तु चिन्ता हर क्षण जलाती है. इसलिए जल-जल कर जीने की बजाय हँस-हँस कर जीना ही जिन्दगी का मकसद होना चाहिए. हँसते एवम् हँसाते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन का अभिप्राय होना चाहिए. अक्सर हम ऐसी आशंकाओं से व्यथित रहते हैं, जिनमें से नब्बे प्रतिशत तो कभी घटित ही नहीं होती हैं. यदि हम आंशकित न रहें, तो बहुत संभव है, शेष दस प्रतिशत भी घटित न हों. इसलिए हर हाल में मस्त रहें. डर, चिन्ता एवं तनाव से कभी त्रस्त न रहें.

दृष्टान्त- एक राज्य पर आक्रमण होने वाला था. इसलिए राजा ने सैन्य बल बढ़ाने के लिए अपने राज्य के सभी युवकों को सेना में भर्ती करने का अभियान चालू कर दिया. एक-एक योग्य युवक ढूँढ़ा जाने लगा. इस पर ‘चिन्तामणि’ नामक एक युवक अत्यधिक चिन्तित हो उठा. वह फौज की नौकरी से डरता था. उसने भर्ती से बचने के लिए एक उपाय ढूँढ़ लिया. थोड़ा झुककर चलने लगा. करीब साल भर तक झुक कर ही चलता रहा. भर्ती होने से तो बच गया, किन्तु पुनः सीधा नहीं हो सका. झुक कर चलने से उसकी मांसपेशियाँ जकड़ गईं. अब सदा के लिए झुक कर चलना ही उसकी नियति बन गई. 

Hindi Status- जब एक द्वार बन्द होता है, तब दूसरा अवश्य खुल जाता है (When One Door is Closed, The Other is Certainly to Open) 

Hindi Status

1.सुख और दुःख तो जिन्दगी में ऐसे आते रहते हैं, जैसे रात और दिन. वैसे रात और दिन के भी अपने-अपने सुख और दुःख होते हैं. देखा जाय तो सुख और दुःख बराबर ही होते हैं. यदि हम केवल सुखों को महत्व देंगे तो दुःखों को प्रभावहीन करते चलेंगे और यदि दुःखों को महत्व देंगे तो सुखों को नगण्य करते चलेंगे. अर्थात् सुखी या दुःखी रहने का विकल्प हमारे पास ही विद्यमान है. जब सुख का कोई एक मार्ग बन्द हो जाता है तो उसका अर्थ यही नहीं कि इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग ही नहीं है.

2. जब सुख का कोई द्वार बन्द होता है तो बहुत कुछ कह कर बन्द होता है. अगर आप अंधे और बहरे नहीं हैं तो एक नहीं, अनेक दरवाजे खुलते नजर आयेंगे, अगर आप आशावादी और सकारात्मक हैं तो कीचड़ में भी कमल खिलते नजर आयेंगे. नकारात्मक सोच वाले को कमल की बजाय कीचड़ ही कीचड़ नजर आयेगा. पर याद रखें, कमल कीचड़ में ही खिलता है.

3. यदि आप किसी बड़ी उपलब्धि की आस लगाये बैठे हैं, उसके लिए संघर्षरत भी हैं, किन्तु एक दिन अचानक पता चलता है कि अब यह संभव नहीं है, तब आपको अत्यधिक कष्ट पहुँचता है. पर जरा हिसाब तो लगाइए, आपने खोया ही क्या है ? अभी तो आपको कुछ मिला ही नहीं था, केवल कल्पना में ही था. यह भी मत सोचिए कि आपका परिश्रम व्यर्थ चला गया. याद रखें, परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता. आपका यही परिश्रम किसी दूसरे कार्य में सहभागी अवश्य बनेगा और आपको इससे भी बड़ी उपलब्धि दिलायेगा.

4. याद रखें, सुख के जितने द्वार बन्द होंगे, उतने ही नये द्वार खुलते चले जायेंगे. जितने अवसर बन्द होंगे, उतने ही नये-नये अवसर मिलते चले जायेंगे. अपनी सफलताओं से सीखते चलें, ताकि उन्हें दोहराया जा सके. अपनी विफलताओं से भी सीखते चलें, ताकि उन्हें दोहराया न जा सके. यह तो तय है कि एक के बन्द होने पर दूसरा दरवाजा अवश्य खुल जाता है, किन्तु दुर्भाग्यवश हम खुले हुए को नहीं, बल्कि बन्द दरवाजे को ही देखते रहते हैं और कुढ़ते रहते हैं. यही सबसे बड़ी त्रासदी है. 

5.जहाँ कोई एक संभावना समाप्त होती है, वहीं पर दूसरी संभावना अवाप्त होती है. संभावनाओं का जोड़ ही जिन्दगी है, भावनाओं का जोड़ ही बन्दगी है. जिन्दगी संभावनाओं से अलग कुछ हो भी नहीं सकती. संभावनाओं के अभाव में कुछ प्राप्ति हो भी नहीं सकती. जो आपने सोचा, उसे पा लेना ही सफलता नहीं है, उससे भी अधिक लगातार पाते रहना ही सफलता है. जब कोई सफलता, विफलता में बदल जाती है, तब उस विफलता से भी कोई सफलता अवश्य निकल आती है.

6. केवल सफलता में ही सुख नहीं मिलता, कभी-कभी विफलता में भी सुख मिल जाता है. ‘फल’ तो ‘सफलता’ और ‘विफलता’ दोनों में ही विद्यमान होता है. किन्तु हमें केवल सफलता में ही ‘फल’ दिखाई देता है, विफलता में नहीं. दोनों में ‘फल’ देखना ही असली सफलता है.

7. जिस सुखचार (Easement) का आप उपभोग करते चले आ रहे हैं, कभी-कभी वह अचानक बन्द हो जाता है. परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि अब जीवन में कोई सुविधा बची ही नहीं, बहुत संभव है, इससे भी बड़ी संभावना आपकी प्रतीक्षा कर रही हो. किन्तु जो मानसिक रूप से तैयार रहता है, वही एक के बाद एक सुविधायें प्राप्त कर सकता है.

8. जब आप आपत्ति में टूटते नहीं, हताश नहीं होते और अपना कार्य भरपूर साहस, एवम् विश्वास के साथ करते रहते हैं, तब आपको पता ही नहीं चलेगा कि आपत्ति भी आयी थी. जब आपकी एक बस छूट जाय तो विचलित मत हो जाइए, बस स्टेण्ड का भी आनन्द उठाइए. अगली बस अधिक सुविधाजनक मिलेगी, तब यही सोचिए कि आपको तो इसी बस से जाना था. जो चली गई, वह आपके लिए थी ही नहीं,

9. देखा जाय तो इस अस्तित्व में कुछ भी सुरक्षित नहीं है. जीवन सुन्दर है, क्योंकि असुरक्षित है. सुख से आनन्द मिलता है, क्योंकि सुख असुरक्षित है. दुःख से विश्वास जगता है, क्योंकि दुःख भी असुरक्षित है. यदि सब कुछ सुरक्षित और सुनिश्चित हो जाय तो फिर जीवन में कोई रस ही नहीं रह जायेगा. अर्थात् असुरक्षा और अनिश्चितता के कारण ही जीवन में रस का अस्तित्व है. हर कदम पर सफल होना जरूरी नहीं है, किन्तु हर कदम का सफलता की तरफ उठना जरूरी है.

दृष्टान्त- किसी राजा के यहाँ धर्मराज नामक एक नौकर था. उसका काम था आने जाने वाले सामान को तोलना. वह ईमानदार और विवेकशील था. अन्य कामदार उससे दुःखी थे. वह चालाकी और हेराफेरी को फौरन पकड़ लेता था. एक दिन सबने मिल कर शिकायत कर दी कि धर्मराज हर काम में कमीशन माँगता है. राजा ने नाराज होकर धर्मराज को घुड़साल में घोड़ों की लीद उठाने में लगा दिया. धर्मराज ने वहाँ भी अपना धर्म-तराजू चालू रखा, घोड़ों की खुराक और लीद को नियमित रूप से तौलकर दर्ज करने लगा. घोड़ों की देखभाल करने वालों को उसने बता दिया कि उसे राजाजी को हिसाब देना है. इस पर सब घबरा गये. दाने-पानी में हैराफैरी कम-से-कम हो गई. घोड़े हष्ट-पुष्ट होने लगे. साथ ही इस मद में बचत भी होने लगी. राजा को आश्चर्य हुआ. एक दिन राजा ने अचानक घुड़साल का निरीक्षण किया. धर्मराज को लीद तौलते हुए देखकर राजा को असलीयत समझने में देर नहीं लगी. राजा ने खुश होकर धर्मराज को खजान्ची के पद पर बिठा दिया. अर्थात् आप तो अपना काम ईमानदारी और सूझ-बूझ के साथ करते रहें. छोटा दरवाजा बन्द होगा तो बड़ा तैयार रहेगा. 

नींद से जागो, मगर सपने छोड़कर (Awake, But Leaving Behind The Dreams) 

Hindi Status

1.जब आपको अच्छा सा सपना आ रहा हो और सपना पूरा होने से पहले ही यदि अचानक नींद खुल जाए तो आप यही चाहेंगे कि काश पुनः नींद आ जाए और अधूरा सपना पूरा हो जाए. लेकिन ऐसा होता नहीं है. तब आपके पास दो विकल्प बचते हैं. प्रथम तो यह कि उस सुनहरे सपने को वास्तविक जीवन में पूरा कर लिया जाए, लेकिन ऐसा भी अक्सर हो नहीं सकता. द्वितीय यह कि नींद में देखे गये सपनों को भुला दिया जाए और पूरे होश के साथ वास्तविक धरातल पर सपने बुने जायें और जोश के साथ उन्हें पूरे किये जायें. तब एक ही सूत्र बनता है, नींद से जागो, मगर सपने छोड़कर.

2. वस्तुतः जीवन कोई सपना नहीं है, किन्तु जीवन के सपने होते हैं. जीवन तो जागने का नाम है. अगर बिना जगे ही जी लिया तो जीवन सपना ही है. अगर हम सजग होकर सपने देखेंगे, तो उन्हें साकार होते हुए भी देख सकेंगे. जैसे हम सोचेंगे, वैसे ही हमारे सपने होंगे. और जैसे सपने होंगे, वैसे ही हम सोचेंगे. बेहतर तो यही है कि पहले सपने देखें, फिर सोचें और उन्हें साकार करें.

3. आगे बढ़ने के लिए सर्वप्रथम जागना जरूरी है. नींद वाले सपनों को तो नींद के लिए ही छोड़ देना चाहिए. जीवन की सफलता के लिए तो पूर्ण जागृत अवस्था में ही सपने देखने होंगे. तब कोई आश्चर्य नहीं कि जाग कर देखे गये सपने सो कर देखे गये सपनों में बदल जायें, यदि हम सोकर देखे गये सपनों को साकार करने में लग जायेंगे तो नींद से भी कट जायेंगे और जीवन से भी कट जायेंगे.

4. कहते है-‘जब जागो, तब ही सबेरा है.’ जागने के लिए न देर है, न सबेर है. जागने के लिए न उम्र बाधक है, न समय बाधक है, जो होश के साथ-सथ सचमुच जग जाय, वही सच्चा साधक है. जागना ही चाहें तो आप इसी क्षण जाग सकते हैं. इसी क्षण ‘बुद्धत्व’ को प्राप्त हो सकते है. बुद्धत्व के लिए लम्बी प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं है. प्रारम्भ में ‘बुद्धत्व’ एक सपना हो सकता है, परन्तु प्राप्त होने पर कोई भी सपना शेष नहीं रह जाता है.

5. वह गरीब नहीं, जिसके पास धन न हो. गरीब तो वही, जिसके पास कोई स्वप्न न हो. इसलिए स्वप्न दृष्टा बनें, स्वयम् सृष्टा बनें, स्पष्ट वक्ता बनें, स्वयम् सत्ता बनें. सार्थक विचारों में विचरण करें, पैरों में थिरकन भरें. सपने जो भी बुनें, उन्हें साकार करें, याद रखें, जब एक सपना पूरा होता है, तब उससे भी बड़ा सपना सामने खड़ा होता है. और जब उसे भी पूरा कर लिया जाता है, तब सपनों का अन्तहीन सिलसिला शुरू होता है. यही जीवन की सच्चाई है. इस सच्चाई के कारण ही दुनिया आज यहाँ तक आ पायी है.

6. जो सपने जागृत अवस्था में देखे जाते हैं, उनके पूरे होने की संभावना रहती है. किन्तु जो सपने निद्रावस्था में देखे जाते हैं, उनमें से अधिकांश तो याद ही नहीं रह पाते हैं. और जो याद रहते हैं, उन्हें वास्तविक जीवन में पूरा करना संभव नहीं हो सकता. सपनों में तो ऐसी-ऐसी घटनायें भी घटती रहती हैं, जिनकी हम जागृत अवस्था में कभी कल्पना भी नहीं कर पाते हैं. वैसे हम जागते और सोते समय कई वस्तुओं-अवस्थाओं के विषय में निरन्तर सोचते रहते हैं, जिनमें हमारी इच्छायें, अवचेतन में बैठी आंशकायें, ज्ञात-अज्ञात समस्यायें और उनके समाधान प्रमुख होते हैं. हमारा चिन्तन चौबीस घण्टे चलता रहता है. निद्रावस्था का चिन्तन किसी घटना विशेष का रूप ले लेता है. ऐसी घटना बड़ी अजीबोगरीब होती है, कभी भयानक होती है, कभी आनन्ददायक होती है. जागृत अवस्था में किया गया चिन्तन हमारी सृजनशीलता को बढ़ाता है, यही सफलता है.

7. याद रखें, सपने केवल सपने होते हैं, कभी अपने नहीं होते. पर अपने सभी सपने होते हैं. जिसे सपनों को अपना बनाने की कला आती हो, उसके लिए सपने भी अपने हो जाते हैं. कुछ भी कर गुजरने के लिए सपनों का होना जरूरी है. और सपनों को साकार करने के लिए जागना जरूरी है. इसलिए केवल सपने ही मत देखते रहिए. संभव सपनों का चयन करिए, उन्हें पूरे करने की ठोस एवम् कारगर योजना बनाइए, फिर निरन्तर आगे बढ़ते रहिए. तब एक दिन आपको लगेगा कि जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की थी, वह भी साकार हो चुकी है.

8. नींद के दौरान हर व्यक्ति को सपने आते हैं और खूब आते हैं. केवल गहरी नींद (Sound Sleep) के दौरान ही सपनों पर विराम लगता है, चिन्तन पर विराम लगता है. गहरी नींद का समय सबका अलग-अलग होता है. एक व्यक्ति के लिए भी हर रात गहरी नींद का समय अलग-अलग होता है. शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्ति के लिए यह समय दो घंटे तक का भी हो सकता है. विकसित देशों में तो यह समय मात्र आठ से दस मिनिट का ही रह गया है. योग के माध्यम से गहरी नींद के समय को बढ़ाया जा सकता है. हमारा मानसिक, शारीरिक एवम् आत्मिक स्वास्थ्य गहरी नींद के इसी समय पर निर्भर करता है. जितनी गहरी नींद उतने ही हम स्वस्थ रहेंगे.

9. जब कोई सुबह देर तक सोता है, उसके सपनों की संख्या भी बढ़ जाती है और सुबह के कुछ सपने याद भी रह जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि सुबह जल्दी उठा जाय. उठते ही हाथ-मुँह धोकर अन्य कार्यों में सक्रिय हो जायें, ताकि कम से कम सपने याद रह सकें. सपने अच्छे हो या बुरे, उन्हें याद रखना लाभप्रद नहीं है. लेकिन होश पूर्वक देखे गये सपनों को सदा याद रखें. और इन्हें साकार करने की दिशा में सदैव प्रयत्नशील रहें। यही जिन्दगी है.

दृष्टान्त- महात्मा बुद्ध के चरणों में किसी सत्तर वर्षीय भिक्षु ने सिर झुकाया. बुद्ध ने पूछा-‘तुम्हारी उम्र कितनी है ?’ भिक्षु ने कहा-‘चार साल’. उस समय राजा प्रसेनजित भी वहाँ बैठा हुआ था. उसने वृद्ध भिक्षु के उत्तर पर आश्चर्य प्रकट किया, तब बुद्ध ने राजा को समझाया-‘वस्तुतः भिक्षु की आयु चार वर्ष की ही है. इसे जागरण चार वर्ष पूर्व ही हुआ था. शेष आयु तो सपने देखने में ही चली गई. सपनों के कृत्यों का हिसाब कैसे रखा जा सकता है ? क्या आप सपनों में प्राप्त दौलत को अपनी वास्तविक दौलत में जोड़ सकते हो ?’ राजा को बात समझ में आ गई. 

असंभव के पीछे भागते रहने पर संभव भी हाथ से छूट जाता है (By Chasing the “Impossible” You Would Lose Even “Possible”) 

Hindi Status

1.कभी ऐसा कार्य आरम्भ न करें, जिसे बाद में बन्द न किया जा सके. कभी ऐसा व्यवहार न करें, जिसे बाद में सुधारा न जा सके. कभी ऐसा निर्णय न लें, जिसे आवश्यकतानुसार बदला न जा सके. जिस प्रकार चार लीटर क्षमता वाली बाल्टी में पाँच लीटर पानी नहीं भरा जा सकता, उसी प्रकार संभव को असंभव के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसलिए केवल संभव को ही साधिए.

2. प्रसन्नता को ढूँढ़ना परछाई को पकड़ना है. जिस प्रकार परछाई आपके कारण है, उसी प्रकार प्रसन्नता भी आपके कारण ही है. जिस प्रकार परछाई को पकड़ने के लिए खुद को पकड़ना होगा, उसी प्रकार प्रसन्नता को पाने के लिए अपने भीतर उतरना होगा. प्रसन्नता को बाहर खोजना असंभव है. संभावना भीतर ही है. अपने भीतर उतर कर तो देखिए.

3. असंभव है ‘कल’ और संभव है ‘आज’. इसलिए केवल आज को पकड़ें, केवल वर्तमान को पकड़ें. प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते चलें. ‘कल’ तो स्वतः ही ‘आज’ बनता चला जायेगा. अर्थात् केवल संभव को पकड़ें, तब असंभव भी धीरे-धीरे संभव होता चला जायेगा. संभव के माध्यम से ही असंभव की ओर बढ़ते रहें, कभी असंभव से शुरूआत न करें.

4. आपका अपने अलावा कुछ भी होना संभव नहीं है. आप देश के राष्ट्रपति हो जायेंगे, तब भी ‘आप’ ही रहेंगे. दूसरों की नजरों में आप ‘राष्ट्रपति’ होंगे, किन्तु अपनी नजर में तो ‘आप’ ही होंगे. इसलिए केवल ‘स्वयम्’ हो जाइए. और कुछ होने की आवश्यकता नहीं है.

5. तीन सूत्र सदा याद रखें-(क) प्रेम में कभी कंजूसी न करें. (ख) बहुत अधिक की अपेक्षा न करें. (ग) दुनिया में प्रथम होने की कभी चाह न करें. आज तक कोई प्रथम स्थान पर पहुँच भी नहीं पाया है. कोई प्रथम स्थान होता भी नहीं है, हो भी नहीं सकता. जैसे ही कोई प्रथम स्थान की घोषण करता है, घोषणा पूरी होने से पहले ही ‘प्रथम स्थान’ आगे खिसक जाता है. इसलिए आप दूसरों की बजाय अपने ही स्थान की चिन्ता करें. जो स्थान आपने प्राप्त कर लिया, उससे ऊपर बढ़ने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहें. दूसरों की तुलना न करते हुए अपने स्थान में निरन्तर सुधार करते चलें. तुलना सदैव अपने आप से ही करें. यही सफलता का राज है, यही सफलता की कला है. 6. यह तो संभव है कि आप अपनी योग्यता एवम् क्षमता से अधिक कार्य कर सकते हैं, किन्तु अपने से कई गुना आगे चलने वालों की योग्यता एवम् क्षमता से अधिक कार्य कर पाना संभव नहीं है. आप अपनी क्षमता से अधिक से अधिक दोगुना कार्य कर सकते हैं, किन्तु दस गुना नहीं कर सकते. पर हाँ, धीरे-धीरे क्षमता बढ़ाते चलेंगे तो एक दिन दस गुना भी कर सकेंगे. उससे आगे भी बढ़ सकेंगे, किन्तु ‘संभव’ के रास्ते से ही बस कुछ संभव हो सकता है.

Hindi Status

7. ‘जो है’, उससे हम कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकते, इसीलिए ‘जो नहीं है। उसके पीछे ही भागते रहते हैं. हमारे दुःखों का मूल कारण भी यही है. और यह दौड़ कभी खत्म होने वाली नहीं है. इसलिए ‘जो है’ उसे सुरक्षित करते चलें. ‘जो हो सकता है उसके लिए प्रयत्नशील रहें. तब असंभव भी संभव बनता चला जायेगा.

8. जिसे ‘असंभव’ समझा जाय, उसके विषय में एक सैकिण्ड भी क्यों सोचा जाय. ‘मुझे पता है, मैं देश का राष्ट्रपति नहीं बन सकता’ तब सोचकर समय एवम् ऊर्जा क्यों नष्ट की जाय. परन्तु दूसरी तरफ यह भी सच है कि जिसने कभी सोचा तक भी नहीं, कभी-कभी ऐसा व्यक्ति भी राष्ट्रपति बन जाता है. इसलिए एकदम किसी असंभव कार्य को हाथ में न लें. अन्यथा असंभव तो कभी संभव नहीं होगा, किन्तु जो संभव है, वह भी हाथ से छूटता चला जायेगा.

9. जो भी संभव हो, उसे प्राप्त करते चलें, जो भी प्राप्त हो, उसे संभालते चलें. यदि आप पीछे मुड़कर देखने की आदत छोड़ देंगे तो जो आज असंभव है, उसे भी संभव कर लेंगे. इसलिए जिसके भी पीछे दोड़ें, संभव समझ कर ही दौड़ें. किन्तु कभी असंभव के साथ होड़ न करें. ‘जो नही है’ उसका रोना न रोयें. अन्यथा ‘जो है वह भी नजर अंदाज हो जायेगा.

दृष्टान्त- एक दिन एक अजनबी नदी किनारे स्थित श्री रामकृष्ण परमहंस के आश्रम पर पहुंचा और उसने परमहंस से पूछा-‘आपका नाम तो काफी चर्चित है, किन्तु आपके पास कौनसी सिद्धि है, यह बताइए?’ इस पर परमहंस ने सहज भाव से जवाब दिया-‘मेरे पास कोई सिद्धि नहीं है, सिर्फ माँ है, देवी माँ.’ अजनबी-‘फिर तो आपके पास कुछ भी नहीं है. मेरे पास सिद्धि है कि मैं पानी पर चल कर नदी पार कर सकता हूँ.’ इस पर स्वामी रामकृष्ण ने पूछा-‘बहुत अच्छा, किन्तु यह तो बताइए कि इस सिद्धि को प्राप्त करने में कितने वर्ष लगाये ? अजनबी ने बताया-‘पूरे बीस साल.’ इस पर स्वामी जी ने समझाया-‘देखिए नदी पार से मेरा दूध वाला दो पैसे किराया देकर नाव से रोजाना आता-जाता है. अब आप ही बताइए, जो काम दो पैसे में हो सकता है, उसके लिए जीवन के अमूल्य बीस साल खराब करने का क्या तुक है ?’ अजनबी निरूत्तर हो गया. 

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