मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस-आत्मविश्वास ही सफलता की आस है,इच्छा शक्ति : सबसे बड़ी शक्ति

मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस-आत्मविश्वास ही सफलता की आस है

मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस-आत्मविश्वास ही सफलता की आस है (Self Confidence is The Only Hope For Success) 

1.आत्मविश्वास की चाबी से ही सफलता का ताला खुलता है. आत्मविश्वास के गमले में ही प्रसन्नता का फूल खिलता है. आत्मविश्वास रूपी पत्तों के बिना तो जीवन रूपी झाड़ में पतझड़ ही पतझड़ है. आत्मविश्वास के बिना न हास है, न परिहास है, आत्मविश्वास के बिना तो आप अपने आपको खड़ा भी नहीं कर सकते. विश्वास के बिना तो विश्व की कल्पना भी नहीं कर सकते. वस्तुतः विश्वास ही जीवन का भूगोल है, विश्वास ही इतिहास है.

2. याद रखें, जिन्दगी की मोटर आत्मविश्वास रूपी करन्ट से ही चल सकती है. जिस प्रकार मोटर चलाने के लिए लगातार करन्ट की जरूरत पड़ती है, उसी प्रकार जिन्दगी के लिए निरन्तर आत्मविश्वास की जरूरत पड़ती है, आप में जितना अधिक आत्मविश्वास होगा, उतना ही निर्बाध गति से आपका जीवन चलता रहेगा. लगातार चलना ही सफलता है.

3. प्रकृति ने तो सबको भरपूर आत्मविश्वास के साथ ही पैदा किया है, किन्तु व्यक्ति अपने आत्मविश्वास को पहचानने में अक्सर गलती कर बैठता है. आत्मविश्वास तो हमारे भीतर भरा पड़ा है, बस उसे विश्वास के साथ बाहर लाना होता है. योजनाबद्ध तरीके से काम करते रहने, गलतियों से सीखते रहने एवम् वचन निभाते चलने पर आत्मविश्वास बढ़ता चला जाता है. व्यक्ति विफलता की ओर अग्रसर तब ही होता है, जब उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लग जाता है. इसलिए आत्मविश्वास को कभी कमजोर न पड़ने दें.

4. सच बोलने की आदत डालने में वर्षों लग जाते हैं, जबकि झूठ बोलने की आदत डालने में एक सैकिण्ड भी नहीं लगता. सच बोलना जितना कठिन है, झूठ बोलना उतना ही आसान है. जब सच बोलने की आदत पड़ जाती है, तब आत्मविश्वास की आस जग जाती है. सचमुच, सच से बड़ा कोई विश्वास नहीं हो सकता, इसलिए जब भी सोचें, सच ही सोचें. जब भी बोले, जहाँ भी बोलें, सच ही बोलें. साथ ही सच बोलने के संभावित परिणाम झेलने के लिए तैयार भी रहें.

5. याद रखें, तूफान जिस भयंकरता से आता है, उतना ही जल्दी उतर भी जाता है. जिन्दगी के हर तूफान का आत्मविश्वास के साथ आसानी से मुकाबला किया जा सकता है. विश्वास ही जीवन की प्रेरक शक्ति है, विश्वास ही वास्तविक भक्ति है, हमें विश्वास करना चाहिए कि शक्ति न्याय पर टिकी है और न्याय विश्वास पर. जब हमें न्याय पर पूरा-पूरा विश्वास हो जाता है, तब हमें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता.

6. चाहे कितनी ही कठिनाइयों से आप जूझ रहे हों, चाहे कितने ही बुरे दौर से आप गुजर रहे हों, यदि आपके भीतर भरपूर आत्मविश्वास है तो आप जल्दी ही उबर जायेंगे. कहते हैं, उम्मीद पर ही दुनिया कायम है. अपने आप पर, अपनी क्षमताओं पर, अपने परिवेश पर विश्वास करके तो देखें, आपका विश्वास ही आपकी प्रथम एवम् अन्तिम योग्यता बन जायेगा.

7. जब आप आत्मविश्वास से भरे होते हैं, तब आपके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती है, आपकी चाल-ढाल और वाणी में एक अलग ही दमक होती है. तब आपकी शारीरिक भाषा एवम् आपके परिधान सब कुछ आत्मविश्वास से ओत-प्रोत होते हैं. लोग आप पर सहज ही विश्वास कर सकेंगे. जब आप अपने आप पर विश्वास करेंगे, तब ही दूसरों पर विश्वास कर सकेंगे. जब दूसरों पर विश्वास करेंगे, तब ही दुनिया पर विश्वास कर सकेंगे. विश्वास के बिना आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते.

8. माना कि आप शारीरिक, मानसिक एवम् आर्थिक दृष्टि से सक्षम हैं, अपने कार्यों को पूरी दक्षता एवम् भरपूर क्षमता के साथ करते चले आ रहे हैं, फिर भी यदि पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे हैं तो मान कर चलें कि कहीं न कहीं आत्मविश्वास की कमी अवश्य है, इसलिए सर्वप्रथम इस कमी को पहचानें और आत्मविश्वास बढ़ायें.

9, आत्मविश्वास तो एक अन्तर्निहित ऊर्जा है. इस ऊर्जा को शक्ति में रूपान्तरित करते चलना है और शक्ति को सफलता में. चरित्र से साहस पैदा होता है और साहस से योग्यता जन्मती है. योग्यता से विश्वास और विश्वास से सम्मानित जीवन का आधार बनता है. वस्तुतः सम्मानपूर्वक जीना ही वास्तविक सफलता है.

दृष्टान्त –दो व्यक्ति किसी जंगल से गुजर रहे थे. दुर्घटनावश दोनों एक कुएं में गिर गये. कुएं के पानी पर दोनों तैरने लगे. थोड़ी देर में एक अन्य यात्री वहाँ से गुजरा, उसने कुएं में गिरे व्यक्तियों को बताया कि आस-पास कोई आबादी नहीं है, कोई रस्सी भी नहीं है, बचा पाना मुश्किल है, कुएं में गिरा एक व्यक्ति थोड़ा सा बहरा था. उसने समझा कोशिश जारी रखो, कोई न कोई मदद अवश्य मिल जायेगी. सो वह तैरता रहा, किनारों को पकड़ता रहा. इसी बीच दूसरा व्यक्ति समझ चुका था कि अब बचना मुश्किल है. थोड़ी देर में वह थक कर पानी में डूब गया और मर गया. किन्तु बहरे व्यक्ति ने प्रयास जारी रखे. उसने कुएं की दीवार पर हाथों से छोटे-छोटे खड्डे बना कर ऊपर चढ़ना शुरू किया. जब आठ-दस फिट चढ़ गया, तब बाहर खड़े यात्री को ध्यान आया कि उसके सिर पर पगड़ी भी तो है. उसने अपनी पगड़ी कुएं में लटकाई, किन्तु प्रयासरत व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाई. पगड़ी दो चार फिट ही दूर थी. सो बहरे व्यक्ति ने प्रयास तेज कर दिये. गिरता रहा, चढ़ता रहा. अन्ततः पगड़ी को पकड़ने में सफल हो गया. बाहर वाले व्यक्ति की मदद से वह कुएं से बाहर निकल आया. निकलते ही पगड़ी वाले से लिपट गया. धन्यवाद देते हुए बोला-‘मैं थोड़ा बहरा जरूर हूँ, परन्तु आपकी विश्वास भरी बातें समझ जरूर रहा था.’ अर्थात् आत्मविश्वास के लिए थोड़ा बहरा होना भी जरूरी है. 

motivational quotes in hindi for success-इच्छा शक्ति : सबसे बड़ी शक्ति (Will Power is The Biggest Power) 

motivational quotes in hindi for success

1.जब भी सुलगायें, पूरी आग सुलगायें, अधूरी आग से पूरी आँच नहीं मिल सकती. जब भी जगायें, पूरी इच्छा जगायें, अधूरी इच्छा शक्ति से कामयाबी नहीं मिल सकती. इच्छा शक्ति धुएं और धुंध से बचाती है. इच्छा शक्ति हताशा और निराशा से बचाती है. यदि व्यक्ति में इच्छा शक्ति न हो तो मनुष्य और जानवर में कोई विशेष अन्तर नहीं रह जायेगा. दृढ़ इच्छा शक्ति ही सफलता का प्रथम एवम् अन्तिम नियामक बिन्दु है.

2. यदि भरपूर इच्छा शक्ति हो तो आप पहाड़ भी तोड़ सकते हैं. यदि प्रबल इच्छा शक्ति हो तो समय की धारा को भी मोड़ सकते हैं. भय, आशंका, अविश्वास, जड़ता, कुंठा, आदि को हटाने के लिए इच्छा शक्ति ही एकमात्र साधन है. जिन्दगी में कुछ भी होने से पहले अपने आपको जानना जरूरी है. किन्तु इच्छा शक्ति के बिना तो न कुछ जानना संभव है, न कुछ होना.

3. आदमी जरा उल्टा चलता है. पहले आवश्यकतायें पैदा करता है, फिर इच्छा प्रकट करता है. आरम्भ में आधी-अधूरी इच्छा शक्ति से ही काम चलाने के प्रयास करता है. और जब काम नहीं चलता, तब प्रबल इच्छा शक्ति की तरफ बढ़ता है. विफलता का सबसे बड़ा कारण भी यही है, इसलिए यदि किसी कार्य में आपको सफलता प्राप्त करनी हो तो सर्वप्रथम प्रबल इच्छा शक्ति पैदा करो, फिर कार्य आरम्भ करो, जब किसी कार्य को आरम्भ कर दिया जावे, तब अपनी इच्छा शक्ति को निरन्तर इतनी मजबूती देते चलो कि कार्य सतत एवम् निर्बाध रूप से चलता रहे.

4. याद रखें, रोते रहने एवम् भाग्य को कोसते रहने से कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है. दूसरों से जलते रहने एवम् दूसरों पर दोष डालते रहने से आपका कुछ भी भला होने वाला नहीं है. अपनी इच्छा शक्ति को सुदृढ़ बनायें, पूर्ण दृढ़ता के साथ बढ़ते जायें, तब न भाग्य की जरूरत पड़ेगी, न प्रारब्ध की. भाग्य के भरोसे कभी भाग्य बदलने वाला नहीं है.

5. माना कि आपके पास बहुत कुछ है, मगर इच्छा शक्ति नहीं, तो कुछ भी नहीं है. यदि आप प्रबल इच्छा शक्ति के मालिक हैं तो फिर कुछ भी मुश्किल नहीं है, आप जिसके लिए सोचते हैं और जिसे पाने में विश्वास रखते हैं, उसे पा भी सकते हैं, बशर्ते कि मजबूत इच्छा शक्ति हो. अकेली इच्छा शक्ति से काम नहीं चलेगा, इच्छा शक्ति के साथ ही दृढ़ आत्मविश्वास, प्रत्येक क्षण का सदुपयोग, कठोर परिश्रम एवम् कार्य की निरन्तरता अपेक्षित है.

6. अच्छे का अर्थ होता है ‘जोड़ना’ और बुरे का अर्थ होता है ‘तोड़ना.’ इच्छा शक्ति होने का अर्थ ही ‘अच्छा’ होता है और इच्छा शक्ति का अभाव ही ‘बुरा’ होता है. इसलिए सर्वप्रथम स्वयम् को प्रबल इच्छा शक्ति से भरिए, फिर उपलब्ध आन्तरिक ऊर्जा को कार्य में रूपान्तरित करिए, जब कर्म कार्य से जुड़ जायेगा, तब भाग्य स्वतः ही सफलता की ओर मुड़ जायेगा. 

7.दूसरों की कुत्सित इच्छाओं के आगे न झुकने की इच्छा शक्ति पैदा करें. तथाकथित चालाक लोगों के प्रति नहीं, कर्म के प्रति भक्ति पैदा करें. अपनी इच्छा को ही अपना मित्र बनायें. यह बेदर्द दुनिया आपको अपनी इच्छाओं पर नचाना चाहेगी. यदि आप दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी हैं तो आपको दूसरों की ओर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

8. ‘इच्छा’ को सबसे पहले मन में जगायें, फिर दिल के माध्यम से दिमाग तक लायें, दिमाग द्वारा अनुमोदित हो जाने पर ‘इच्छा’ को एक मंत्र, एक मिशन के रूप में अंगीकार करें. मंत्र को तंत्र द्वारा साधते हुए तपायें. बार-बार दोहरायें, फिर क्रियान्वित करें. याद रखें, इच्छा से बड़ा न कोई मंत्र है, न कोई यंत्र है. इच्छा ही सब कुछ है, इच्छा ही सर्वत्र है.

9. मन की एकाग्रता से ही ‘इच्छा शक्ति’ के विकास में सहायता मिलती है. भूत को याद करते रहने एवम् भविष्य की आंशकाओं से घिरे रहने से इच्छा शक्ति कमजोर पड़ने लग जाती है. इसलिए केवल वर्तमान में जीते हुए सुदृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आगे बढ़ते रहें. इच्छा शक्ति को चेतना से जोड़ें, चेतना को कर्म से जोड़ें और कर्म को आत्मविश्वास से जोड़ें. फिर सब कुछ अपने आप जुड़ता चला जायेगा. अपने आपको अपने आप से जोड़ना ही सफलता है.

दृष्टान्त एक कुत्ता किसी झील के किनारे घूम रहा था, उसे जोर की प्यास लगी तो वह पानी पीने हेतु झील की तरफ बढ़ा. जैसे ही उसने झील में झाँका, उसे झील के अन्दर एक और कुत्ता दिखाई दिया. पानी के अन्दर के कुत्ते को देखते ही बाहर वाला कुत्ता भौंकने लगा. अन्दर का कुत्ता भी भौंकता हुआ प्रतीत हुआ. कुत्ते ने स्थान बदला, किन्तु प्रतिबिम्ब वाले कुत्ते ने पीछा नहीं छोड़ा. बार-बार स्थान बदला गया, किन्तु हर स्थान पर पानी वाला कुत्ता भी मौजूद था. प्यास बढ़ती गई. अन्ततः कुत्ते ने अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत किया और भौंकता हुआ पानी में कूद पड़ा. पानी के हिलने पर प्रतिबिम्बित कुत्ता गायब हो गया. तब कुत्ते ने आराम से पानी पिया और देर तक पानी में स्नान भी किया. कुत्ते की आंशका निर्मूल सिद्ध हो चुकी थी. अर्थात् अगर दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ प्रयास जारी रखें जायें तो धीरे धीरे तमाम आशंकायें स्वतः ही निर्मूल होती चली जायेंगी. इच्छा शक्ति तो जीने की पहली शर्त है. इच्छा शक्ति तो वस्तुतः एक पहेली है, जिसके कारण ही दुनिया ने इतनी तरक्की की है. जैसे-जैसे पहेली के हल ढूँढ़ने के प्रयास किये जाते हैं, इच्छा शक्ति उतनी ही प्रबल होती चली जाती है. 

सम्प्रेषण दक्षता ही सबसे बड़ी क्षमता है (Communication Skill is The Biggest Quality) 

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1.जब कोई संदेश एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक, एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस तक, एक सरकार से दूसरी सरकार तक, एक समाज से दूसरे समाज तक, एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र तक अथवा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया जाता है, तो इसे ही सम्प्रेषण कहा जाता है. सम्प्रेषण के बिना तो कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता. सम्प्रेषण एक कला है और जो इस कला में जितना दक्ष होगा, उतना ही सफल होगा.

2. आज तक दुनिया में जो कुछ भी अच्छा हुआ है, वह अच्छे सम्प्रेषण के कारण ही हुआ है और जो कुछ भी बुरा हुआ है, वह बुरे सम्प्रेषण के कारण ही हुआ है. जो कुछ भी हो रहा है और आगे होगा, वह सब सम्प्रेषण के कारण ही हो रहा है और सम्प्रेषण के कारण ही होगा. यानी दुनिया की प्रगति में सम्प्रेषण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. सम्प्रेषण जितना सहज, स्पष्ट, परिपूर्ण एवम् त्वरित होगा, उतना ही प्रभावशाली होगा.

3. आज सम्प्रेषण एवम् प्रसारण के साधन तो लगातार बढ़ रहे हैं. लोग नये-नये माध्यम रोज गढ़ रहे हैं. फिर भी सम्प्रेषण में कहीं न कहीं कोई न कोई त्रुटि अवश्य है, वरना समाज में इतनी विसंगतियाँ, इतनी दृष्प्रवृत्तियाँ आज नहीं होती. आज व्यक्ति का मन दिल से और दिल दिमाग से काफी दूर होता चला जा रहा है. व्यक्ति अपने परिवार से, अपने समाज से कटता चला जा रहा है. बेटा बाप से, भाई भाई से, शिक्षार्थी शिक्षक से दूरी बढ़ाता चला जा रहा है. कारण कि समुचित संवाद का अभाव है.

4. संदेशक के स्तर पर दोषपूर्ण सम्प्रेषण-1. यथासमय संदेश न देना. 2. उचित एवम् सम्बन्धित व्यक्ति तक संदेश पहुँचाना सुनिश्चित न करना. 3. उचित माध्यम एवम् उचित भाषा का उपयोग न करना. 4. संदेश का स्पष्ट व बोधगम्य न होना. 5. संदेश प्राप्तकर्ता की योग्यता का ध्यान न रखना. 6. संदेश प्राप्तकर्ता को समझ में आया या नहीं, इसकी फिक्र न करना. 7. संदेश पहुँचाने के बाद क्रियान्विती सम्बन्धी प्रगति (Feed Bak) प्राप्त नहीं करना. 8. सम्प्रेषण से पूर्व संदेशक द्वारा ठीक से न समझना. 9. संदेशक का सकारात्मक न होना. 10. संदेशक का दूरदर्शी एवम् मर्मस्पर्शी न होना.

5. संदेश प्राप्तकर्ता के उत्तरदायित्व-1. संदेश को उचित माध्यम एवम् उचित भाषा में ही प्राप्त किया जाए. 2. यदि ठीक से समझ में न आये तो वापस पूछा जाए. 3. यदि संदेश पर अमल करना संभव नहीं हो तो संदेशक को तत्काल तदानुसार अवगत करवा दिया जाय. 4. संदेश यदि प्राप्तकर्ता से सम्बन्धित न हो तो तुरन्त स्पष्ट कर दिया जाय. 5. संदेश छोटा हो या बड़ा, मुख्य बिन्दु अवश्य नोट कर लिए जायें. 6. संदेश पर तत्काल अमल करना आरंभ कर दिया जाय. 7. संदेशक को फीड बेक अवश्य दिया जाय. 8. संक्षिप्त संदेशों के विस्तृत आशय भली प्रकार समझ लिए जायें. 9. विस्तृत संदेशों का संक्षिप्तीकरण कर लिया जाय, ताकि याद रखना आसान हो सके. 10. संदेश को कान या आँख से ही नहीं, मन से भी प्राप्त किया जाय.

6. आज तक पृथ्वी पर जितने भी उपद्रव हुये हैं, जितने भी युद्ध-महायुद्ध हुए हैं, वे सब दोषपूर्ण सम्प्रेषण के कारण ही हुए हैं. आज तक विश्व में जितने भी अनुसंधान हुए हैं, जितने भी विकासात्मक कार्य हुए हैं, वे सब प्रभावी एवम् दोष रहित सम्प्रेषण के कारण ही हुए हैं. विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा निरक्षरता एवम् निर्धनता ही है और इनका मुख्य कारण संवादहीनता ही है. दोषपूर्ण सम्प्रेषण के कारण ही विकास आम आदमी तक नहीं पहुंच पा रहा है 7. मन की बात दिल तक और दिल की बात दिमाग तक पहुँचाना भी एक प्रकार का सम्प्रेषण ही कहलाता है. एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक बिना शब्द, बिना संकेत और बिना ध्वनि के संदेश पहुँचाना भी सम्प्रेषण ही कहलाता है. सम्प्रेषण की इस ऊँचाई को छूना सबसे बड़ी कुशलता है और सम्प्रेषण की कुशलता ही सफलता है. 8. जो स्वयम् के साथ ठीक से संवाद स्थापित नहीं कर सकता, वह अपनी बात प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित नहीं कर सकता. किसी संदेश को सम्प्रेषित करने से पूर्व अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है. अपने आपको सम्प्रेषित करना ही सम्प्रेषण दक्षता की प्रथम आवश्यकता है. जब आप किसी बात को ठीक से समझ लेंगे, तब ही दूसरों को ठीक से समझा सकेंगे. 9. सम्प्रेषण चाहे ऊपर से नीचे हो, नीचे से ऊपर हो, आगे से पीछे हो, दायें से बायें हो, समानान्तर या वृत्ताकार हो, हमें अपने आपको अच्छा संदेशक और अच्छा प्राप्तकर्ता सिद्ध करना पड़ेगा. हम हर वक्त सुनाने में ही व्यस्त रहते हैं, मगर अफसोस कि हम ठीक से सुना भी कहाँ पाते हैं. दूसरों को सुनना तो अपमान समझते हैं, इसलिए लाभ की बात भी नहीं सुन पाते हैं. सुनाने से ज्यादा सुनना चाहिए, सुनने से ज्यादा गुनना चाहिए.

दृष्टान्तएक राजा के महल में एक अधेड़ सेवक कार्यरत था. उसका काम था, राजा के शयन कक्ष की सफाई एवम् सजावट करना. एक दिन सेवक ने सोचा-‘राजा जी के पलंग पर सोने पर कैसा लगता होगा ? यही जानने के लिए वह राजा जी के लिए नियत स्थान पर चद्दर औढ़ कर लेट गया. अभी राजा व रानी के आने में काफी वक्त था, सो वह सोचने लगा-‘काश मेरा भी ऐसा महल होता, ऐसा पलंग होता.’ सोचते-सोचते उसे अचानक नींद आ गई. थोड़ी देर बाद रानी जी सोने के लिए अपने नियत समय पर आ गई. शयन कक्ष की धीमी रोशनी में उसे यही लगा कि आज राजा जी जल्दी ही महफिल खत्म कर आ गये और सो गये हैं. रानी जी इतमिनान से अपने स्थान पर सो गई और थोड़ी देर में उसे भी नींद आ गई. थोड़ी देर बाद राजा जी झूमते हुए पधारे. अपने स्थान पर किसी अन्य को सोता हुआ देख कर आग बबूला हो गये. राजा जी ने आव देखा न ताव, अपनी तलवार निकाली और पलंग पर सोये हुये व्यक्ति का सिर गरदन से अलग कर दिया. रानी जी हड़बड़ा कर उठ गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी-‘राजाजी को किसी ने मार दिया. इस पर राजा जी बोले-‘चुप, मैं तो यहाँ खड़ा हूँ.’ रानी जी बोली-‘मैं तो पलंग पर आपको ही समझ रही थी, फिर यह कौन था ?’ रोशनी तेज कर देखने पर पता चला कि वह तो उनका वफादार सेवक था. सम्प्रेषण में गेप रह जाने के कारण राजा-रानी अपने एक वफादार एवम् बेकसूर सेवक से हाथ धो बैठे थे. अब पछताने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते थे. 

निर्णय लेने में कभी विलम्ब न करें (Decision Making is Never To Be Delayed) 

motivational quotes in hindi for success

1.किसी भी कार्य की सफलता हमारी निर्णय क्षमता एवम् तत्परता पर निर्भर करती है. सही समय पर सही निर्णय लेने की प्रवृत्ति नब्बे प्रतिशत सफलता सुनिश्चित करती है. निर्णय लेने में जितना विलम्ब होगा, कार्य उतना ही पिछड़ता चला जायेगा. कार्य उतना ही संदिग्ध और कठिन होता चला जायेगा. समय पर निर्णय न ले पाना ही हमारी सबसे बड़ी विफलता होगी.

2. हम अपने पिछले अनुभवों के आधार पर नब्बे प्रतिशत निर्णय तो तत्काल ही ले सकते हैं. बस केवल दस प्रतिशत निर्णय ही ऐसे रह जाते हैं, जिनके विषय में जरा सोचना पड़ता है, और सोचने में जितना विलम्ब होगा, निर्णय लेना उतना ही कठिन होता चला जायेगा. तब हो सकता है, हम कोई निर्णय ही न ले सकें. निर्णय को विलम्बित करना, कार्य को स्थगित करना है और कार्य को स्थगित करना, कार्य से हटना है,

3. वस्तुतः हर क्षण एक निर्णायक क्षण होता है. निर्णय लेने में विलम्ब करने का अर्थ निर्णय के महत्व को ही नकारना होता है. कहा जाता है कि न्याय में विलम्ब करने का अभिप्राय न्याय को नकारना ही होता है. विलम्बित निर्णय से कितना बड़ा अन्याय होता है, इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता. इसलिए जो भी निर्णय लेना हो, तत्काल लें, निर्णय ऐसा लें, जिस पर तत्काल अमल किया जा सके.

4. यह सही है कि गलत एवम् विलम्ब से लिए गये निर्णयों के नतीजे हमें उम्र भर भुगतने पड़ते हैं. वक्त के इतने थपेड़े पड़ने पर भी हम अपने ही गलत निर्णयों के दलदल में सड़ते रहते हैं. इसलिए गलत निर्णयों के प्रति दुराग्रह को छोड़ दें. कभी-कभी किसी कार्य में तात्कालिक रूप से कोई लाभ नहीं दिखता, किन्तु भविष्य में अनायास आशातीत लाभ मिल जाता है, ऐसे कार्य पर अमल जारी रखें, बीच में निर्णय न बदलें, बार-बार निर्णय बदलने का अर्थ होता है, कार्य को उलझा देना.

5. आदमी अपने गलत निर्णयों एवम् गलत कारनामों को सही ठहराने में ही पूरी जिन्दगी लगा देता है, किन्तु दुर्भाग्य कि वह इसमें कामयाब नहीं हो पाता है. यही उसकी सबसे बड़ी विडम्बना है, यही त्रासदी है. याद रखें, अब तक जो भी गलत हुआ है, गलत निर्णयों के कारण ही हुआ है. अब तक जो भी पछतावे के क्षण आये हैं, वे सब सही समय पर सही निर्णय न ले पाने के कारण ही आये हैं, इसलिए यथाशीघ्र उचित निर्णय लेना एवम् उस पर गंभीरतापूर्वक क्रियान्वयन आरम्भ कर देना ही सफलता की प्रथम एवम् अन्तिम सीढ़ी है. आदमी की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि जहाँ उसे बुद्धि से काम लेना चाहिए, वहाँ वह भावुक होकर दिल से काम लेता है. और जहाँ उसे दिल से काम लेना चाहिए, वहाँ वह बुद्धि से काम लेता है.

6. तत्काल निर्णय लेने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति ही सफलता की हर ऊँचाई को छू सकता है. शंकित, भ्रमित एवम् अनिर्णय की स्थिति में रहने वाला व्यक्ति अन्ततोगत्वा विफलता को ही प्राप्त होता है, इसलिए निर्णय लेने में कभी उहापोह की स्थिति में न रहें. जिस कार्य को आप करना नहीं चाहते या कर नहीं सकते, उसके विषय में सोचना ही छोड़ दें.

7. व्यक्ति काम करते रहने पर उतना नहीं थकता, जितना निर्णय न ले पाने के कारण थकता है. वक्त पर उपयुक्त निर्णय न ले पाना ही व्यक्ति की सबसे बड़ी विफलता है. जहाँ जरूरत हो, दूसरों की सलाह जरूर लें, किन्तु निर्णय पर्याप्त सोच समझ कर ही करें. जो अकेले में निर्णय लेने की क्षमता रखता है, सचमुच वही सफलता की ओर कदम बढ़ा सकता है.

8. कमजोर निर्णय क्षमता के कारण कभी-कभी छोटा सा निर्णय लेने में ही पूरा दिन लग जाता है. लेकिन इससे भी बड़ा दुर्भाग्य तब आता है, जब दूसरे ही दिन वह निर्णय भी बदलना पड़ जाता है. इसलिए जो भी निर्णय लें, हर दृष्टि से सोच विचार कर लें. अनुभवी लोगों से सलाह मशविरा करके लें. निर्णय बार-बार न बदलें. जब एक कदम बढ़ा दिया जाता है, तो दूसरा कदम तो अपने आप ही उठ जाता है. तब वापस मुड़ने या ‘यू-टर्न’ लेने को कोई औचित्य नहीं है.

9. आपकी अचल सम्पत्ति से लगी हुई यदि कोई सम्पत्ति बिक रही हो तो उसे खरीदने का निर्णय लेने में एक सैकिण्ड भी न लगायें. अन्यथा दूसरे ही दिन वह सम्पत्ति आपकी पहुँच से बाहर हो जायेगी. यदि कोई अचल सम्पत्ति अपेक्षाकृत सस्ती मिल रही हो तो उसे खरीदने में वक्त न लगायें, अन्यथा यही सम्पत्ति एक दिन आपकी क्रय शक्ति से बाहर हो जायेगी. यदि आपने हिम्मत करके सम्पत्ति खरीद ली तो एक दिन आप बैठे-बैठे ही करोड़पति हो जायेंगे. और तब आपको अपने निर्णय पर गर्व होगा.

दृष्टान्त- हायर सैकण्डरी पास करते ही मिस्टर ‘क’ का मैरिट के आधार पर इंजीनियरिंग में चयन हो गया. उस समय प्रि-टेस्ट नहीं होता था. किन्तु कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना उसके लिए जरा कठिन था. सो उसने तत्काल निर्णय लिया कि उसे इंजीनियरिंग के बजाय कॉलेज में प्रवेश ले लेना चाहिए. उसने विज्ञान विषय छोड़कर कला संकाय में प्रवेश लेने का निर्णय किया. कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही ‘क’ का चयन अध्यापक पद पर हो गया, किन्तु उसने नौकरी न करने का निर्णय लेते हुए अपना अध्ययन जारी रखा. अध्ययन के दौरान ही उसने एक संकल्प अवश्य कर लिया था कि उसे एक इंजीनियर से बड़ा बनना है, फलतः उसने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी आरम्भ कर दी और अन्ततः उसका चयन प्रशासनिक सेवा में हो गया. सेवा के दौरान कई इंजीनियर उसके अधीन रहे. मिस्टर ‘क’ को अपने निर्णयों के लिए कोई पछतावा नहीं था. त्वरित एवम् उचित निर्णयों के कारण ही वह जीवन में सफल हो सका था. 

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