मोटर गाड़ी का आविष्कार किसने किया था |Motar Car ka avishkar kisne kiya tha

मोटर गाड़ी का आविष्कार किसने किया था

मोटर गाड़ी का आविष्कार किसने किया था |Motar Car ka avishkar kisne kiya tha

आज सभी मोटर गाड़ियों अर्थात् मोटर कारों से परिचित हैं। मोटर गाड़ी अर्थात् मोटर से चलने वाली गाड़ी। आज विविध प्रकार की मोटर गाड़ियां देखने को मिलती हैं, अधिकांश मोटर गाड़ियां एक-दूसरे से आकार-प्रकार में अलग होती हैं और अलग-अलग नाम से पुकारी जाती हैं।

जिन दिनों मोटर गाड़ी का आविष्कार नहीं हुआ था, | उन दिनों लोगों के पास यातायात के साधन के रूप में बैलगाड़ी और घोडागाड़ी थी, जो लकड़ी की बनी होती थी और उन्हें खींचने के लिए बैल, सांड और घोड़े जैसे पशुओं का प्रयोग किया जाता था। दूर की यात्रा में भी ये वाहन ही काम आते थे, किन्तु इस तरह यात्रा करने में एक तो समय बहुत लगता था, दूसरे यात्रा असुरक्षित भी थी।

यह स्थिति मात्र हमारे भारत में ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व में थी।

अट्ठारहवीं शताब्दी की बात है, फ्रांस के एक इंजीनियर ने यातायात के तत्कालीन साधनों व यात्रा की कठिनाइयों पर गहनता से सोच-विचार किया और कुछ ऐसाआविष्कार करने का निश्चय किया, जिससे यातायात सरल हो जाए।

अचानक उस इंजीनियर के मन में एक विचार कौंधा। सहसा आए अपने विचार पर वह खुशी से उछल पड़ा। उसइंजीनियर का नाम था-ऑगस्ट निकोलस!

सन् 1763 ई. में उस इंजीनियर ने एक गाड़ी तैयार की। ऑगस्ट ने गाड़ी में गैस इंजन लगाया था अर्थात् वह गाड़ी भाप की शक्ति से चलती थी, मगर वह गाड़ी बहुत भारी थी। वैसे वह देखने में भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। उस मोटर गाड़ी की गति ढाई मील प्रति घण्टा थी। उस गाड़ी में सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसमें पानी डाला जाता था और जब पानी भाप बनकर उड़ जाता था, तब उसमें पुनः पानी भरने की आवश्यकता पड़ती थी। – इसके सात वर्ष बाद, सन् 1770 ई. में एक और मोटर गाड़ी का आविष्कार हुआ। वह मोटर गाड़ी पहले वाली मोटर गाड़ी की भांति भाप से नहीं चलती थी, बल्कि उसे पैट्रोल डालकर चलाया जाता था। उसका स्वरूप आजकल बनने वाली मोटर गाड़ी जैसा नहीं था, बल्कि वह मोटर गाड़ी तांगे की शक्ल में थी, जिसमें मात्र चार लोग ही बैठ सकते थे।

सन् 1830 ई. में उस मोटर गाड़ी में और सुधार किए गए। उस मोटर गाड़ी में दस से बारह लोग बैठ सकते थे। वह मोटर गाड़ी सात मील प्रति घण्टा की गति सेचलती थी। वह भी पहली मोटर गाड़ी की तरह आकर्षक नहीं थी। साथ ही उसके स्टार्ट होते ही इतनी भयानक आवाज होती थी कि लोग डर जाते थे। इतना ही नहीं, जब वह चलती थी, तो उसे देखकर कुत्ते भी जोर-जोर से भौंकने लगते थे। लोग कंकड़-पत्थर मारने लगते थे। लोग उसे मोटर गाड़ी ही समझें, इसके लिए गाड़ी के आगे लाल रंग की एक झण्डी लगा दी गई थी।

मोटर गाड़ी का आविष्कार किसने किया था

सन् 1870 ई. में जर्मनी के इंजीनियर कार्ल बेंज ने अपना पहला इंजन बनाया, जिससे  सारी दुनिया में हड़कम्प-सा मच
गया। यह एक प्रोटोटाइप इंजन था। जर्मनी के मैन होम क्षेत्र में बेन्ज ने एक बेन्ज एण्ड कम्पनी की स्थापना की, जिसमें उन्होंने सन् 1879 ई. में गेसोलीन के इंजन बनाने शुरूकिए। उन्होंने अपना पहला इंजन एक ट्रायलसाइकिल के पिछले हिस्से में लगाया। इस इंजन में विद्युत से ज्वलन क्रिया होती थी और इंजन को पानी से ठण्डा किया जाता था। कुछ ही महीनों में बेन्ज ने अपनी गाड़ी के इंजन में सफलता प्राप्त की और वे विश्व में मोटर गाड़ी बनाने के अगुवा बन गए। ।

उनके द्वारा बनाई गई पहली कार आठ मील प्रति घण्टा की गति से चलती थी। उन्होंने अपनी बनाई हुई कार का जब जन प्रदर्शन किया, तो उनकी गाड़ी एक दीवार से जा टकराई, जिससे लोगों के दिमाग में भय पैदा हो गया।

उधर, पैट्रोल से चलने वाली सन् 1830 ई. की अविष्कृत मोटर गाड़ी में सन् 1885 ई. में जर्मनी के इंजीनियर डैमलर ने काफी सुधार किए। सबसे पहले उन्होंने उस मोटर गाड़ी की आवाज में सुधार किया। साथ ही उसकी गति को भी बढ़ाया। वह मोटर गाड़ी पन्द्रह किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से चलने लगी थी।

इसी बीच फ्रांस के एक इंजीनियर पीनार्ड ने परिश्रम करके एक बहुत अच्छी मोटर गाड़ी तैयार की, मगर उस गाड़ी की गति तेज नहीं थी। काफी सोच-विचार के बाद भी पीनार्ड अपनी गाड़ी में तत्काल कोई सुधार नहीं कर सके। उन दिनों आज की तरह मोटर गाड़ियों के पहियों में रबड़ की टायर-ट्यूब नहीं होती थी। पहिए लकड़ी, लोहे अथवा ठोस रबड़ के बने होते थे। उन पहियों की रगड़ से सड़कें खराब हो जाती थीं और गाड़ियां भी खड़-खड़ की आवाजें करती थीं।

इधर, जर्मनी के इंजीनियर कार्ल बेंज की पहली मोटर गाड़ी सन् 1888 ई. में बाजार में बिक्री के लिए आई। इसके छः वर्ष बाद जर्मनी से इंग्लैण्ड में इस मोटर गाड़ी का आयात हुआ।

उन्हीं दिनों मोटर गाड़ी के पहियों में संयुक्त राज्य अमेरिका के एक नागरिक ने बहुत बड़ा सुधार किया। उस इंजीनियर का नाम था-जॉन डनलप! यह वही डनलप है, जिनके नाम पर डनलप के टायर बिकते हैं।

पेशे से जॉन डनलप पशु चिकित्सक थे। सन् 1887 ई. की बात है। उन्होंने अपने नौ वर्षीय बेटे के लिए एक ट्राइसाइकिल खरीदी, जिसमें ठोस रबड़ के टायर लगे हुए थे। जब उनका बेटा ऊबड़-खाबड़ सड़क पर इस साइकिल को चलाता था, तो उसे झटके लगते थे। जब जॉन डनलप ने इस बात को देखा, तो उन्होंने सन् 1888 ई. में ऐसा टायर बनाया, जिसमें हवा भरी हुई रबड़ की ट्यूब थी। इस ट्यूब के कारण वह टायर ऊबड़-खाबड़ सड़क पर भी झटका नहीं देता था। इस तरह डनलप ने पहला टायर बनाया।

सन् 1890 ई. में बेल फास्ट की एक कम्पनी ने टायर निर्माण का कार्य आरम्भ किया। इन ट्यूब युक्त टायरों से मोटर गाड़ियां तेजी से भागने लगीं।

अक्टूबर, सन् 1908 ई. में अमेरिकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने मॉडल टी कार का निर्माण किया। मगर फोर्ड को उन कारों की उत्पादन दर से कोई सन्तोष नहीं था, क्योंकि उनकी बनाई हुई कार बहुत महंगी थी। उन्होंने कार की कीमत को कम करने के लिए प्रयास किए। उनका विचार था कि उनकी कार एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए होनी चाहिए, जिसे प्रत्येक व्यक्ति खरीद सके। ।

उन दिनों एक कार का निर्माण करने के लिए एक साथ कई लोगों को काम करना पड़ता था। अपने-अपने काम को निपटाने के लिए छोटे-मोटे काम करने में बीस से तीस मिनट का समय लग जाता था।

इस परेशानी को हल करने के लिए फोर्ड ने सबसे पहले कार के विभिन्न अवयवों को अलग-अलग हिस्सों में रखना आरम्भ किया। कार बनाने वाले कारीगर एक-एक करके इन अवयवों को कार में फिट करते थे। इस तरह से कार निर्माण में तीव्रता आई। इस तरह फोर्ड ने कार निर्माण में काफी तीव्रता लाने की चेष्टा की, किन्तु वे फिर भी सन्तुष्ट नहीं हुए। व्यक्ति को अपने स्थान से इधर-उधर गति करनी पड़तीथी, जिससे कार्य करने वाले व्यक्ति का काफी समय नष्ट होता था।

इस कारण फोर्ड ने ऐसी पद्धति का विकास किया, जिसमें कार फर्श पर रोल हो जाती थी और उसका निर्माण कार्य जल्द ही पूर्ण हो जाता था। सन् 1915 ई. में उनकी पद्धति से कार निर्माण कार्य में इतनी उन्नति हुई कि एक वर्ष में दस लाख कार बनाने का उनका उद्देश्य पूर्ण हो गया। यह एक क्रान्तिकारी प्रगति थी।देखते-ही-देखते फोर्ड नामक मोटरगाड़ियां सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो गईं। ।

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