Most important Essay topics for UPSC 2022-राष्ट्रमण्डल और भारत (Commonwealth and India) | राष्ट्रमंडल Drishti IAS

राष्ट्रमण्डल और भारत

Most important Essay topics for UPSC 2022- राष्ट्रमण्डल और भारत (Commonwealth and India) |राष्ट्रमंडल Drishti IAS

राष्ट्रमण्डल कुछ ऐसे स्वतंत्र देशों का संगठन है जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन थे और जिनकी आंतरिक तथा बाह्य नीतियों का संचालन ब्रिटिश सरकार द्वारा होता था, परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ बराबरी के संबंध स्थापित कर लिये हैं। दूसरे शब्दों में राष्ट्रमण्डल देशों का ऐसा संगठन है जिसके सब सदस्य स्वतंत्र हैं तथा उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक दूसरे के साथ सहयोग और मित्रता के भाव से काम करते हैं। वे हर प्रकार से अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में पूर्णरूपेण स्वतंत्र हैं। उन्हें ब्रिटिश सम्राट के प्रति किसी प्रकार की वफादारी रखना आवश्यक नहीं है। 

“राष्ट्रमण्डल कुछ ऐसे स्वतंत्र देशों का संगठन है जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन थे…” 

राष्ट्रमण्डल एक ऐसा संगठन है जो किसी कानून या इकरार पर आधारित नहीं है, इसका विकास क्रमशः हुआ है। 1887 में ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश प्रतिनिधियों की औपचारिक बैठक में ब्रिटिश साम्राज्य’ के नाम से इसकी शुरुआत हुई। 1907 के सम्मेलन में इसका नाम बदलकर ‘इम्पीरियल कान्फ्रेंस’ कर दिया गया और 1931 के ‘वेस्ट मिनिस्टर अधिनियम’ के अंतर्गत इसका नाम बदल कर ‘ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल’ कर दिया गया। 1947 में जब भारत ने स्वतंत्र गणराज्य के साथ-साथ इसका सदस्य बने रहने की इच्छा प्रकट की तो इससे ब्रिटिश शब्द हटा दिया गया और इसका नाम केवल ‘राष्टमण्डल’ कर दिया गया। ब्रिटेन की महारानी इस संगठन की अध्यक्षता करती हैं। वर्तमान में इसके सदस्य देशों की संख्या 54 है। 

राष्ट्रमण्डल के निम्न उद्देश्य हैं- 

  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सदस्य राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बनाना।
  • अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और मानव कल्याण संबंधी समस्याओं को हल करना।
  • लोकतंत्र के आदर्शों तथा मानवीय अधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान बढ़ाने में सहयोग देना। 

यदि राष्ट्रमण्डल की विशेषताओं पर विचार किया जाए तो । इसकी निम्न विशेषताएं दृष्टिगत होती हैं- 

  • राष्ट्रमण्डल के सभी सदस्य राष्ट्र स्वतंत्र व समान हैं। 
  • राष्ट्रमण्डल के सभी सदस्य राष्ट्रों की पहचान यह है कि इसके राजदूत एक-दूसरे के देश में उच्चायुक्त कहे जाते हैं।
  • राष्ट्रमण्डल देश एक-दूसरे के नागरिकों को अपने यहां विशिष्ट प्रकार की सुविधाएं प्रदान करते हैं।
  • राष्ट्रमण्डल कोई निश्चित उत्तरदायित्वों वाला कठोर वैधानिक या सैनिक संगठन नहीं है वरन् मैत्री, विश्वास, स्वेच्छा व सद्भाव पर आधारित ऐसा मानवीय संगठन है जो अपने सदस्य राष्ट्रों को विशेषाधिकार और सुविधाएं प्रदान करता है।
  • इसमें ब्रिटिश सम्राट या साम्राज्ञी के प्रति किसी प्रकार की राजभक्ति होना आवश्यक नहीं है। 

भारत 1947 तक ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था, किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रिटेन की प्रभुसत्ता से पूर्ण स्वतंत्र हो गया। अपने संविधान के अंतर्गत वह इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र था कि वह राष्ट्रमण्डल का सदस्य बना रहे अथवा न रहे। इस पर राष्ट्रमण्डल में सम्मिलित होने के लिए किसी प्रकार का नैतिक अथवा राजनीतिक बंधन नहीं था। 

अनेक भारतीय इस बात के पक्ष में थे कि भारत को राष्ट्रमण्डल का सदस्य नहीं रहना चाहिए। उनका कहना था कि परतंत्रता के समय अंग्रेजों ने देश पर अनेक अत्याचार किये हैं। इसके अतिरिक्त इसका सदस्य बने रहने से दासता की भावना बनी रहेगी तथा हमारे ऊपर अनेक प्रकार के नैतिक बंधन रहेंगे। परंतु पं. जवाहरलाल नेहरू भारत को राष्ट्रमण्डल का सदस्य बने रहने के पक्ष में थे। उन्होंने 19 मई, 1947 को संविधान सभा में राष्ट्रमण्डल का सदस्य बने रहने की घोषणा करते हुए कहा था, “वर्तमान विश्व में जबकि विनाशकारी शक्तियां सक्रिय हो रही हैं, हम युद्ध के कगार पर खड़े हुए हैं। मेरे विचार में किसी संस्था में ऐसे समय में संबंधों की समाप्ति उचित नहीं है। ऐसे समय में इस प्रकार के सहयोगी समुदाय का सदस्य होना आवश्यक है, जिससे संसार को कोई लाभ पहुंचता हो। न केवल भारत हेतु अपितु समस्त संसार हेतु राष्ट्रमण्डल की सदस्यता आवश्यक है। इससे भारत को लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सहयोग प्राप्त होगा।” 

26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने पर देश की मंत्रि-परिषद ने भारत की राष्ट्रमण्डलीय सदस्यता बनाये रखने का निर्णय किया। 

“राष्ट्रमण्डल देशों के शिखर सम्मेलनों में अनेक वैश्विक मुद्दों और समस्याओं को लेकर विचार-विमर्श होते रहे हैं जिसमें निशस्त्रीकरण, रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध, आंतकवाद, पर्यावरण, विकासशील देशों में निर्धनता उन्मूलन, लोकतंत्र के सशक्तीकरण आदि मुद्दे महत्त्वपूर्ण हैं।” 

राष्ट्रमण्डल के सदस्य बने रहने से भारत की प्रभुसत्ता पर किसी प्रकार की आंच नहीं आई है। दूसरे शब्दों में भारत की स्वाधीनता स्वतंत्रता तथा विदेश नीति के संबंध में किसी प्रकार की बाधा नहीं आई है। वस्तुतः समयानुसार उसकी उपयोगिता ही सामने आयी है। 1962 में जब चीन ने भारत पर अचानक आक्रमण किया उस समय ब्रिटेन तथा अन्य राष्ट्रमण्डलीय देशों जैसे कनाडा और आस्ट्रलिया ने भारत को सैनिक साज-सामग्री की सहायता प्रदान की। इसके अतिरिक्त आर्थिक क्षेत्र में कोलंबो योजना के अंतर्गत ब्रिटेन ने भारत को दुर्गापुर के इस्पात कारखाने के लिए 1 करोड़ 50 लाख डालर की सहायता प्रदान की। 

परंतु राष्ट्रमण्डल के कार्यों का एक पहलू ऐसा भी है जब उसने पक्षपातरहित सिद्धांत की उपेक्षा की। उदाहरणार्थ कश्मीर के प्रश्न को लेकर राष्ट्रमण्डल में सदैव पाकिस्तान का अनुचित पक्ष लिया गया। इससे भारतीय जनता को राष्ट्रमण्डल की सदस्यता की उपयोगिता पर स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न हो गया और ऐसा भी समय आया 

जब 1969 में इंदिरा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में घोषित किया कि यदि आवश्यकता हई तो भारत राष्टमण्डल की सदस्यता का परित्याग कर देगा। 

इसके बाद लगभग दो दशक से अधिक समय तक भारत ब्रिटेन संबंधों में विरोधी रुख भले ही न रहा हो, किन्तु दूरी अवश्य बनी रही। 1993 से पुनः भारत-ब्रिटेन संबंधों में प्रगाढ़ता आई है और भारत का राष्ट्रमण्डल के प्रति विश्वास बढ़ा है और भारत की भूमिका भी बढ़ी है। इससे राष्ट्रमण्डल की उपयोगिता भी बढ़ रही है। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक दो वर्षों में राष्ट्रमण्डलीय शासनाध्यक्षों का 

सम्मेलन (चोगम) होता है। राष्ट्रमण्डल देशों के शिखर सम्मेलनों में | अनेक वैश्विक मुद्दों और समस्याओं को लेकर विचार-विमर्श होते रहे हैं जिसमें निशस्त्रीकरण, रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध, आंतकवाद, पर्यावरण, विकासशील देशों में निर्धनता उन्मूलन, लोकतंत्र के सशक्तीकरण आदि मुद्दे महत्त्वपूर्ण हैं। 

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