मनोबल बढ़ाने का मंत्र-दूसरों से काम लेना ही सबसे बड़ा काम है

morale boosting mantra

मनोबल बढ़ाने का मंत्र-दूसरों से काम लेना ही सबसे बड़ा काम है  (The Most Important Task is To Get Some Thing Done By The Others) 

1.वस्तुतः वर्तमान व्यवस्था में हमारे नब्बे प्रतिशत कार्य दूसरों पर निर्भर करते हैं. ऐसी अवस्था में दूसरों से काम लेने की हमारी क्षमता पर ही हमारी सफलता निर्भर करती है. देखा जाय तो एक दूसरे के लिए कार्य करना ही हमारा प्रमुख कार्य है, और यदि हम दूसरों से काम लेने की कला में पारंगत हैं तो यही हमारी सबसे बड़ी कला है. यही सफलता है.

2. यह सही है कि आदमी अकेला कुछ भी नहीं कर सकता. परिजन, सहकर्मी, अधीनस्थ, वरिष्ठ, ग्राहक, उपभोक्ता, व्यापारी और आमजन के सहयोग के बिना आदमी बिल्कुल अपंग होता है. उसे हर स्तर पर हर क्षण किसी न किसी का सहयोग लेना ही पड़ता है. आदमी जितना व्यवहार कुशल होता है, जितना संवेदनशील होता है, उतना ही लोगों से काम ले पाता है, जितना दूसरों से काम ले पाता है, उतना ही सफल हो पाता है.

3. जिसे हर व्यक्ति और हर शक्ति से काम लेने की कला आती है, सचमुच सफलता उसके पीछे-पीछे दौड़ी चली आती है. जिसे दिलों की तख्ती पर अपनत्व की पंक्ति लिखने की कला आती है, लोगों की संवेदनायें उसके पीछे-पीछे चली आती हैं. इसलिए हर व्यक्ति, हर शक्ति, हर सत्ता और हर दिल से जुड़ने की कला विकसित कीजिए, लोगों से काम लेना आसान हो जायेगा.

4. यह महत्वपूर्ण नहीं कि आप खुद कितना वजन उठा सकते हैं, महत्वपूर्ण तो यही है कि आप दूसरों से कितना वजन उठवा सकते हैं. आप अपने शरीर के वजन की तुलना में आधा वजन भी शायद ही उठा सकें, किन्तु लोगों की मदद से समूचा पहाड़ भी उठा सकते हैं, याद रखें, सबको चौबीस घण्टे ही मिलते है, और आप अकेले इस सीमित समय में असीमित कार्य नहीं कर सकते. किन्तु जब आप दूसरे लोगों को अपने कार्य से जोड़ने में कामयाब हो जाते है, तब आपके पास अपार समय होता है.

5. यह दुनिया इच्छुक लोगों से भरी पड़ी है. कुछ काम करने के इच्छुक होते हैं और कुछ काम करवाने के. पहली श्रेणी के लोगों का काम आसान है, वहीं दूसरी श्रेणी के लोगों का काम इतना आसान नहीं है. जो लोग दूसरों से काम लेने में दक्ष हो जाते हैं, वे ही सफलतम व्यक्ति हो जाते हैं.

6. यह भी सही है कि जब आप खुद काम करेंगे, तब ही दूसरे भी काम करेंगे. जिस निष्ठा, आस्था और विश्वास के साथ आप काम करेंगे, उतने ही परिश्रम एवम् विश्वास के साथ दूसरे भी काम करेंगे. जब आप दूसरों का सहयोग नहीं करेंगे, तब दूसरों से सहयोग की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं. इसलिए पहले खुद काम करें, दूसरों का भरपूर सहयोग करें, अपनत्व, स्नेह एवम् विश्वास के माध्यम से आप सबका सहयोग प्राप्त कर सकते हैं.. 

7.अपने परिवार को ही लीजिए. परिवार के हर सदस्य को अपना-अपना कार्य बखूबी करना पड़ता है. काम के साथ ही एक-दूसरे का आदर भी करना पड़ता है, जब हर सदस्य परिवार के हर कार्य को अपना कार्य समझकर करता है, तब हर सदस्य महत्वपूर्ण हो जाता है. इसी तरह आपसे जुड़ने वाले भी आपके परिवार के ही सदस्य हो जाते हैं, इसलिए हर सहयोगी को महत्वपूर्ण समझिए. महत्व देकर ही किसी से काम लिया जा सकता है. कुछ देकर ही किसी से कुछ लिया जा सकता है.

8. अपने अधीनस्थ को पर्याप्त महत्व दें, उसे एक पहचान दें. समय-समय पर उसके कार्यों की प्रशंसा करें. उसे नाम से सम्बोधित करें, उसकी कार्यक्षमता का सही-सही आंकलन करें. उसकी सुविधाओं का ध्यान रखें, पारिवारिक सम्बन्ध बनाये रखें. फिर देखें कि उससे काम लेना कितना आसान है, बशर्ते कि आपमें दार्शनिक गाइड बनने की क्षमता हो.

9. अपने सहकर्मियों एवम् वरिष्ठ महानुभावों का पूरा सम्मान करें. परस्पर सम्यक समन्वय बनाये रखें, एक-दूसरे को पूरा नैतिक समर्थन दें. सदा मर्यादापूर्ण व्यवहार करें, सबकी इच्छाओं का आदर करें, तब आपके सहयोगी और आपके वरिष्ठ भी अपना काम अच्छी तरह से सम्पादित करेंगे और आपके सहयोग के लिए सदा तैयार रहेंगे.

सुकरात उवाच –सुकरात अपने शिष्यों से अक्सर कहा करते थे-‘जो अनजान है और अपने को जानकार समझता है, उससे बचकर रहना. जो अनजान है और अपने आपको अनजान ही समझता है, उसे सीखने का अधिकार है. उसे सिखाना. जो जानकार तो है, किन्तु अपनी जानकारी के प्रति शंकालु है, उसे जगाना. जो जानकार है और अपनी जानकारी के प्रति आस्थावान है, ऐसे व्यक्ति के पीछे चलना.’ अर्थात् हमें किसी से काम लेने से पूर्व उसकी सामान्य जानकारी के सम्बन्ध में जानना होगा. उसे उक्त चार श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी में रखना होगा, तब उससे काम लेना काफी आसान हो जायेगा. 

जो अपने काम में डूब जाता है, वो ही सफलता को उपलब्ध हो पाता है (Successful is One, Who is Deeply Devoted to His Work) 

1.सफलता के लिए अक्ल की उतनी जरूरत नहीं पड़ती, जितनी समर्पण की पड़ती है. समर्पण के लिए उत्सर्ग की उतनी जरूरत नहीं पड़ती, जितनी संघर्ष की पड़ती है. देखा जाय तो हर क्षण चुनौतीपूर्ण और संघर्ष भरा होता है. इसलिए हर चुनौती को स्वीकार करते हुए लगातार संघर्षरत रहने वाला ही सफल हो सकता है.

2, वस्तुतः काम ही पूजा है, अर्चन है. काम ही राम है. राम का अलग से सिमरन करना तो पाखण्डियों का काम है. काम को ही आराध्य समझने वाला भगवत्ता को प्राप्त हो सकता है. काम को जिन्दगी समझने वाला ही सफलता को प्राप्त हो सकता है. गीता में योगी राज कृष्ण ने इसे ही कर्मयोग कहा है 

‘नियतं कुरू कर्म त्वं कर्म जयायो ह्यकर्मणः । 

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ।।’

3. जिस प्रकार बगुले का ध्यान पानी की सतह पर आने वाली मछली पर रहता है, उसी प्रकार एक सफल व्यक्ति का ध्यान अपने लक्ष्य पर ही रहता है. जिस प्रकार एक ड्राईवर का ध्यान सामने सड़क पर होता है, उसी प्रकार कर्मशील व्यक्ति का ध्यान केवल अपने कर्म मार्ग पर ही रहता है. कर्म से अलग वस्तुतः जीवन का कोई अर्थ भी नहीं है. कर्म के अतिरिक्त व्यक्ति का कोई पुरूषार्थ भी नहीं है. जीवन की समूची प्रक्रिया कर्म से प्रारम्भ होती है और कर्म पर ही समाप्त हो जाती है.

4. जो काम नहीं करना चाहता, वह जल्दी ही जिन्दगी से ऊब जाता है. और जो ऊब जाता है, वह बीच में ही डूब जाता है. याद रखें, डूबने के लिए पानी का होना जरूरी नहीं है. और ऊबने के लिए काम का होना जरूरी नहीं है, पर जिन्दगी के लिए काम का होना जरूरी है और काम के लिए जिन्दगी का होना जरूरी है. इसलिए काम में उतर कर जिन्दगी को सार्थक बनाइए.

5. जीने का नाम ही जिन्दगी है और जिन्दगी का नाम ही काम है. और काम ही बन्दगी है. जो अपने काम में उतर जाता है, उसका चेहरा स्वाभाविक चमक-दमक से भरा होता है. जो काम को ही जीवन का पैगाम समझता है, उसका मन धूप के रूप की खनक से भरा होता है. आपके चेहरे की चमक ही आपकी पहचान होनी चाहिए. तन की खनक ही आपके मन की पहचान होनी चाहिए. इसके लिए आपको अपने काम में डूबना होगा. 

6.जो उत्साह, उमंग और उद्यम से भरा होगा, उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. जो न कभी दखल करता है और न दखल सहता है, उसे काम करने से कोई रोक नहीं सकता, जो अपने काम से काम रखता है, वही सफलता को अपने नाम करता है। जो काम को ही जिन्दगी का मकसद मान लेता है, वही सफलता का वरण कर सकता है.

7. जो आधे-अधूरे मन से काम करता है, वो डर, चिन्ता और आशंका से भर जाता है. जो तन और मन से अपने को व्यस्त रखता है, वो निश्चितता, आशा और विश्वास से भर जाता है. काम का दिखावा करने वाला दूसरों को नहीं, खुद को ही धोखा देता है. और खुद को धोखा देने वाला कभी धोखे से उबर नहीं सकता. अपने काम में उतर जाइए, हर धोखे से उबर जाइए.

8. होशपूर्वक अपने व्यवसाय का चयन करें, जोशपूर्वक सफलता का आयोजन करें. अपने कर्म को ही पुरूषार्थ समझें, कर्म को ही जीने का अर्थ समझें। जब आपकी पहचान आपके नाम से नहीं, बल्कि आपके काम से होने लगे, तब ही जीवन को सार्थक समझें, जब आपके काम की पहचान आपके नाम से होने लगे, तब ही अपने काम को सार्थक समझें. काम में उतर कर तो देखिए, पहचान तो अपने आप ही बनती चली जायेगी.

9. जो कर्त्तव्यनिष्ठ नहीं है, जो कर्म के प्रति समर्पित नहीं है, वो भार है, पृथ्वी पर. वो भार है समाज पर, और भार है अपने आप पर, देश की गरीबी में, मानवता की बदनसीबी में, ऐसे लोगों का सबसे बड़ा योगदान है. और जो अपने कर्तव्य पथपर निश्चल, निरन्तर समर्पण के साथ अग्रसर है, वही मानवता के लिए वरदान है.

दृष्टान्त –ध्यानचन्द एक दिन किसी योगीराज के पास पहुँचा और उसे अपने घर पर आने के लिए आमन्त्रित किया. और निवेदन किया कि वह तो सुबह-शाम थोड़ा सा ध्यान कर लेता है, किन्तु उसकी घरवाली कोई ध्यान नहीं करती. उसे ही थोड़ा समझाना है, शायद ध्यान में उतर जाय, योगीराज दूसरे ही दिन सुबह ध्यानचन्द के घर चला आया. उस वक्त ध्यानचन्द अन्दर कमरे में ‘ध्यान’ कर रहा था. योगीराज ने पूछा-‘कहाँ है ? ध्यानचन्द.’ घरवाली ने बताया-‘वे तो इस वक्त बाजार गये हुये हैं और अपने जूते पंसद कर रहे हैं. यह सुनकर ध्यानचन्द को गुस्सा आ गया. वह बाहर आकर जोर से चिल्लाया-‘बाबा, देख लीजिए, मैं यहीं पर हूँ और यह झूठ बोल रही है.’ इस पर घरवाली बोली-‘बाबा, यहाँ बैठ कर आँखें बन्द कर लेने से कोई ध्यान नहीं हो सकता. इनका मन तो जूतों की दुकान पर ही था.’ बाबा स्थिति को समझ चुके थे. आगे पूछताछ करने पर ध्यानचन्द को स्वीकार करना पड़ा कि उस वक्त वह बाजार जाकर जूते खरीदने की सोच रहा था. तब घरवाली बोली-‘बाबा, मैं तो अपने काम में इस कदर डूब जाती हूँ कि मुझे अलग से ध्यान करने की आवश्यकता ही नहीं रहती. किन्तु ये अपना समय भी खराब करते हैं और ध्यान में भी नहीं उतर पाते. बाबा, इन्हें जरा समझाइए, ध्यान में कैसे उतरा जाता है. बाबा दोनों को आशीर्वाद देते हुए चले गये. 

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