नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ-कर्म ही पूजा,भरोसा हुआ सच,वसुधैव कुटुंबकम्,अहं का विसर्जन

नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ-कर्म ही पूजा

नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ-कर्म ही पूजा

बात उस समय की है, जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति थे। हुआ यूं कि बंदेलाल नाम का एक कर्मचारी जो राष्ट्रपति भवन की मर्यादा को समझता तो जरूर था, पर अपने आलसीपन व लापरवाही की हद को पार किए जा रहा था। शीघ्र ही उसकी शिकायत राजेंद्र बाबू के पास तक पहुंच गई। एक दिन राजेंद्र बाबू जाड़े के दिनों में जब धूप का आनंद ले रहे थे तो एक कर्मचारी ने जाकर उनसे कहा कि आप बंदेलाल को नौकरी से निकाल दें। शिकायतकर्ता की बात गौर से सुनकर राष्ट्रपति ने कहा, “ठीक है, कल सुबह उसे बर्खास्त कर देंगे।” 

दूसरे दिन राजेंद्र बाबू तड़के उठकर तौलिया व साबुनदानी लेकर उक्त कर्मचारी के कमरे में पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने बंदेलाल को आवाज लगाई। आवाज सुनते ही सभी कर्मचारी हकबका गए कि आज राष्ट्रपति यहां कैसे आ गए। तब तक राष्ट्रपति हॉल में प्रवेश कर बंदेलाल के बेड के पास पहुंच चुके थे। उनके हाथ में तौलिया और साबुनदानी देखकर बंदेलाल काफी लज्जित हो गया। महामहिम ने विनोदी स्वर में उससे कहा, “उठो बंदेलाल जी, स्नान कर लो।” इतना सुनते ही बंदेलाल महामहिम के चरणों में गिर गया और उनसे क्षमा मांगने लगा। 

तब राष्ट्रपति ने कहा, “इसमें क्षमा मांगने की क्या बात है। कल तुम्हारी लापरवाही की शिकायत आई थी और सभी तुम्हें नौकरी से निकाल देने की बात कह रहे थे। परंतु हम तुम्हारी तनख्वाह में दस रुपये प्रतिमाह की वृद्धि करते हैं 

और चलो नहा-धो लो।” इस पर बंदेलाल बहुत शर्म महसूस करते हुए गिड़गिड़ाकर बोला, “हुजूर! अब हमें माफ कर दीजिए और हमारी तनख्वाह में भी वृद्धि न करें।” 

उदारमना राजेंद्र बाबू ने उसे क्षमा कर दिया। तब से कर्मचारियों की कोई भी शिकायत उनके पास फिर न पहुंची और बंदेलाल तो उनकी सेवा में इस तरह से जुटा, जैसे कर्म ही उसकी पूजा हो। 

नैतिक कहानी-भरोसा हुआ सच

एक बार एक विद्यालय में प्रधानाचार्य द्वारा परीक्षाफल घोषित किया जा रहा था। परीक्षाफल की घोषणा के बाद एक बालक ने प्रधानाचार्य से कहा, “सर! मेरी परीक्षा की कॉपियां जांचने में जरूर कोई चूक हुई है। मैं अनुत्तीर्ण नहीं हो सकता।” बालक की बात सुनकर प्रधानाचार्य को क्रोध आ गया। उन्होंने उसे डांटते हुए कहा, “तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं। परीक्षा में तुम अनुतीर्ण हो गए हो।” प्रधानाचार्य की डांट सुनने के बाद भी वह बालक यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि वह परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया है। तभी स्कूल का चपरासी दौड़ता हुआ वहां पहुंचा और प्रधानाचार्य से बोला, “सर! गजब हो गया। आपने छात्रों को उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण की जो सूची सुनाई है, वह गलत है। सही सूची तो यह है।” कहते हुए चपरासी ने वह सूची प्रधानाचार्य को पकड़ा दी। 

नैतिक कहानी-भरोसा हुआ सच

इस बीच वह लड़का जो बार-बार अपने अनुत्तीर्ण न होने की बात कह रहा था, सभी विद्यार्थियों के हास्य का पात्र बन चुका था। उसके एक सहपाठी ने उससे कहा, “बड़ा आया पढ़ने वाला, अनुत्तीर्ण हो गया।” दूसरा बोला, “हम सब तो पढ़ते नहीं थे, फिर भी पास हो गए।” सभी हंसने लगे। प्रधानाचार्य ने सभी विद्यार्थियों को पुन: मैदान में बुलवाया और बोले, “हमें अफसोस है कि पहले गलत सूची से परीक्षाफल सुना दिया गया था। इस सही सूची में पहला स्थान उसी लड़के का है, जो बार-बार कह रहा था कि मैं अनुत्तीर्ण नहीं हूं।” फिर प्रधानाचार्य ने उस बालक को मंच पर बुलाकर पुरस्कृत किया और कहा, “आगे चलकर तुम अवश्य ही बहुत उन्नति करोगे।” वह बालक आगे चलकर देश का प्रथम राष्ट्रपति बना। उस बालक का नाम था-राजेंद्र प्रसाद। 

सार यह है कि पूर्ण आत्मविश्वास से कोई भी कार्य करने पर शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त होती है। अतः हमें कोई भी अच्छा कार्य करते समय स्वयं में आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। कहा भी गया है कि जहां आत्मविश्वास है, वहीं जीत है। 

वसुधैव कुटुंबकम्

चीन में एक समय ऐसा भी था, जब उसके कुछ शहरों में विदेशी लोगों के प्रवेश पर पाबंदी थी। यदि भूलवश कोई विदेशी उन शहरों में चला जाता तो चीनी मरने-मारने पर आमादा हो जाते थे। प्राय: दूसरे देशों से आने वाले लोग इस नियम को याद रखते थे और उन शहरों में नहीं जाते थे। आखिर अपनी जान तो सभी को प्यारी होती है। 

वसुधैव कुटुंबकम्

एक बार स्वामी विवेकानंद चीन की यात्रा पर गए। वे कई शहरों में भ्रमण करते रहे। फिर उनकी इच्छा ऐसा शहर देखने की हुई, जहां विदेशियों का प्रवेश वर्जित था। दो जर्मन यात्री भी वहां जाना चाहते थे, किंतु उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी। 

स्वामी जी ने उन दोनों का साहस जगाया और एक दुभाषिए को समझा बुझाकर अपने साथ लेकर उस शहर की ओर चल पड़े। सारे रास्ते दुभाषिया स्वामी जी को समझाता रहा, “अभी भी वक्त है, वापस लौट चलो अन्यथा प्राणों से हाथ धो बैठोगे।” किंतु स्वामी जी नहीं माने। आखिर वे उस शहर में पहुंच ही गए। 

जब चीनियों ने उन्हें देखा तो वे हथियार लेकर उन्हें मारने के लिए दौड़ पड़े। उन्हें देखकर जर्मन यात्रियों और दुभाषिए के गले सूख गए, किंतु स्वामी जी निर्भयता और प्रेमपूर्वक भाव से चीनियों से कहा, “क्या आप अपने भाइयों से प्रेम नहीं करते?” 

यही बात दुभाषिए ने दोहरा दी। चीनी यह सुनते ही स्वामी जी के पैरों में झुक गए और उस दिन से वह प्रतिबंध भी हट गया। सार यह है कि जब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना हम मनसा-वाचा-कर्मणा से जीने लगते हैं तो सारे भेद, विरोध व विवाद समाप्त होकर एकता, सौहार्द व प्रेम की स्थापना होती है। महर्षि पतंजलि ने कहा है, जो प्रेम में स्थिर हो जाता है, उसके पास द्वेष आ ही नहीं सकता। 

सद्गुणों में संतुलन 

संत के जीने का अपना ही ढंग होता है। उनका आचार-व्यवहार अत्यंत संतुलित होता है। इसी संतुलन के कारण ही तो किसी बात में ‘प्रथम’ न होने के बावजूद वे सर्वश्रेष्ठ हैं। ऐसी ही एक बानगी देखिए इस वार्तालाप में  एक दिन एक धनी व्यापारी ने लाओत्जु से पूछा, “तुम्हारा शिष्य येन कैसा है?” 

लाओत्जु ने उत्तर दिया, “उदारता में वह मुझसे श्रेष्ठ है।” आपका शिष्य कुंग कैसा व्यक्ति है?” व्यापारी ने फिर पूछा। 

“मेरी वाणी में उतना सौंदर्य नहीं है, जितना उसकी वाणी में है।” लाओत्जु ने बताया। 

“आपका शिष्य चांग कैसा व्यक्ति है?” व्यापारी ने आगे पूछ लिया। 

“मैं उसके समान साहसी नहीं हूं।” लाओत्जु ने बताया। जर व्यापारी हैरान रह गया। फिर वह बोला, “अगर आपके शिष्य किन्हीं 

गुणों में आपसे श्रेष्ठ हैं तो फिर वे आपके शिष्य क्यों हैं? ऐसे में तो वे आपके गुरु होने चाहिए और आपको उनका शिष्य।” 

लाओत्जु ने मुस्कराते हुए कहा, “वे सभी मेरे शिष्य इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने मुझे गुरु के रूप में स्वीकार किया है और उन्होंने ऐसा इसलिए किया है, क्योंकि वे यह जानते हैं कि किसी सद्गुण विशेष में श्रेष्ठ होने का अर्थ ज्ञानी होना नहीं है।” 

“तो फिर ज्ञानी कौन है?” व्यापारी ने पूछा। 

लाओत्ज ने उत्तर दिया, “वह, जिसने सभी सद्गुणों में संतुलन स्थापित कर लिया हो।” 

कहानी जो सीख दे- अहं का विसर्जन

चक्रवर्ती सम्राट भरत ने जब समस्त भूमंडल को जीत लिया तो वे देवराज इंद्र के पास पहुंचे। उन्होंने इंद्र के सामने दावा प्रस्तुत किया, “देवराज! संभवतः मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं जिसने समस्त भूमंडल पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। मुझे अपनी कीर्ति को अक्षय और अमर बनाना चाहिए और इसके लिए मुझे वृषभाचल पर जाकर अपना नाम अंकित करना चाहिए।” भरत की धारणा थी कि वहां उनका पहला नाम होगा। 

कहानी जो सीख दे- अहं का विसर्जन

देवराज इंद्र ने भरत के कथन से सहमति व्यक्त की और कहा, “आप जाइए और वृषभाचल पर अपना नाम अंकित कर आइए। वहां ऐसे व्यक्ति को ही अपना नाम अंकित करने का अधिकार है, जिसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली हो।” 

सम्राट भरत बड़े इठलाते हुए वृषभाचल की ओर चल पड़े। पर यह क्या? वहां पहुंचकर तो उनके पैर ही ठिठक कर रह गए कि अपना नाम कहां लिखें। शिखर पर ही नहीं पूरे पर्वत पर नाम ही नाम लिखे हुए थे। वे सारे नाम उन लोगों के थे जिन्होंने अपने पौरुष और पराक्रम से समस्त भूमंडल को जीत लिया था। नाम इतनी अधिक संख्या में थे कि नया नाम अंकित करने की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं थी। 

भरत खिन्न हो गए। वे पर्वत शिखर से उतरकर इंद्र के पास पहुंचे और बोले, “देवराज! शिखर पर तो कहीं कोई स्थान खाली नहीं, जिस पर मेरा नाम लिखा जा सके। पूरे पर्वत पर चक्रवर्ती सम्राटों के नाम अंकित हैं। अब आप ही कोई स्थान बता दीजिए, जहां मैं अपना नाम अंकित कर सकूँ।” 

यह सुनकर देवेंद्र बोले, “किसी का नाम मिटा दीजिए और अपना नाम अंकित कर दीजिए। मुझे जहां तक ज्ञात है, युग-युगांतर से यही क्रम चलता आ रहा है। मेरे पिताजी भी बताते थे कि न मालूम कब से यह परंपरा चली आ रही है। उन्हें भी इस बारे में कुछ मालूम नहीं था। 

“तब तो फिर मेरा नाम भी मिटाकर भविष्य में कोई चक्रवर्ती सम्राट अपना नाम लिख जाएगा।” सम्राट भरत ने पूछा। इंद्र ने इस प्रश्न पर अपनी विवशता जताई। 

 वे बोले, “इस संबंध में कुछ नहीं किया जा सकता सम्राट।” 

“तब फिर अपना नाम अंकित करने से क्या लाभ?” भरत भारी-सी आवाज में बोले। 

उनका अहं विगलित होकर पानी-पानी हो गया। वे अनुभव करने लगे कि कितना विराट और अनादि-अनंतकाल से चला आ रहा है यह जगत? इस विराट और विषम जगत में अपना अस्तित्व, अपना स्थान है ही कितना? यह सोचना तो गलत ही होगा कि हमसे पहले किसी अन्य ने यह काम न किया हो, जो मैंने कर लिया है। 

कुछ सोचकर सम्राट भरत इंद्रलोक से वापस चले आए। उनका अभिमान जाता रहा था। उस अहं का विसर्जन होते ही उनके मन को इतनी शांति मिली जितनी कि उन्हें समस्त भूमंडल को जीतने के बाद भी नहीं मिली थी। 

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