Model essays for UPSC-भूमण्डलीकरण के दौर में मीडिया अथवा बाजारवाद और पत्रकारिता 

Model essays for UPSC

Model essays for UPSC-भूमण्डलीकरण के दौर में मीडिया अथवा बाजारवाद और पत्रकारिता 

भूमंडलीकरण से आशय निर्बाध व्यापार प्रवाह, निर्बाध पूंजी प्रवाह और निर्बाध टेक्नोलॉजी प्रवाह से है। इसका मुख्य मकसद विभिन्न राष्ट्र-राज्यों को विश्व व्यापार संगठन के ढांचे के अधीन एकीकृत कर देना है। बढ़ते भूमंडलीकरण का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा है। चूंकि भूमंडलीकरण ने बाजारवाद को बढ़ाया है, अतएव इससे भी मीडिया प्रभावित दिख रहा है। यह कहना गलत न होगा आज का मीडिया बाजार के दबाव में है। भूमंडलीकरण के इस दौर में जब बाजार ने जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है, तो मीडिया इससे बच भी कैसे सकता है। भूमंडलीकरण का प्रभाव मीडिया पर सिर्फ बाजार के दबाव के रूप में नहीं दिख रहा है, बल्कि अन्य स्तरों मसलन भाषा और नीतियों के स्तर पर भी यह परिलक्षित हो रहा है। 

भूमंडलीकरण से प्रभावित आज का मीडिया अगंभीर और छिछला हो चुका है। यह भूमंडलीकरण का ही प्रभाव है कि पत्रकारिता को ‘बिकाऊ’ बनाने के प्रयास तेजी से हो रहे हैं और व्यावसायिकता की गलाकाट होड़ ने अखबारों को ‘प्रोडक्ट’ के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। अखबारी नीतियों के निर्धारण के स्तर पर जहां बाजार का वर्चस्व साफ दिख रहा है, वहीं भूमंडलीकरण के प्रभाव में भाषा पर भी नये-नये तरीके के ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जिन्होंने मीडिया के पारंपरिक स्वरूप को लगभग खंडित सा कर दिया है। 

‘भूमंडलीकरण से आशय निर्बाध व्यापार प्रवाह, निर्बाध पूंजी प्रवाह और निर्बाध टेक्नोलॉजी प्रवाह से है |

यह सच है कि भूमंडलीकरण ने मीडिया को आधुनिकता की पहचान दी है तथा इसकी गति और लय को बढ़ाया है, किन्तु यह भी सच है कि इस आधुनिक मीडिया में अगंभीरता और छिछलेपन की गुंजाइश बढ़ी है। ज्यादा से ज्यादा प्रसार के लिए खबरों को गढ़ने का अनैतिक चलन मीडिया में बढ़ा है। इसके पीछे धन कमाने की दिन । प्रतिदिन बढ़ती लालसा है। जब प्रसार ज्यादा होता है, तो विज्ञापन भी ज्यादा मिलते हैं, जो कमाई का मुख्य जरिया होते हैं। इसके अलावा सत्ता और शासन पर पकड़ भी मजबूत बनती है। इसीलिए प्रसार बढ़ाने के लिए ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाए जाते रहे हैं, जिनमें प्रासंगिकता, निष्पक्षता, पारदर्शिता, सटीकबयानी, सच और मूल्यों का कहीं कोई स्थान नहीं रहता है। मकसद सिर्फ सनसनी फैलाना होता है, ताकि प्रसार में तेजी से – इजाफा हो। जो हथकंडे अखबार प्रसार बढ़ाने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के अपना रहे हैं, वही हथकंडे इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा कुछ ज्यादा ही बेबाकी से टीआरपी बढ़ाने के लिए आजमाए जाते हैं। इन कारणों से समूचा परिदृश्य बाजार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह सब कुछ करने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा है, जिसे हम अश्लील या अभद्र कहते हैं तथा जिसका नैतिकता से कोई सरोकार नहीं होता है। 

भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण आज हमें मीडिया का कॉरपोरेट कल्चर से पूर्णतः आच्छादित वह औद्योगिक स्वरूप सामने है। जहां मूलभूत मूल्य और पेशागत पवित्रता गौण है। नवउदारवादी भूमंडलीकरण का प्रभाव ‘गॉसिप मार्केट’ के रूप में सामने दिख रहा है। उदारवादी व्यवस्था का प्रभाव मीडिया जगत में भी दिख रहा है। आज स्थिति यह है कि कोई भी इलेक्टानिक मीडिया के क्षेत्र में न सिर्फ आसानी से प्रवेश कर सकता है, बल्कि बाकायदा अपनी कंपनी बना कर इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है। इसे नवउदारवादी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की ही देन माना जाएगा कि अब मीडिया पर राज्य का पूर्ण स्वामित्व नहीं रहा। मीडिया पर सरकारी नियंत्रण की पकड़ ढीली हुई है। जो नियम-कायदे लागू भी हैं, उन्हें ताक पर रखकर हम विशुद्ध बाजारूपन का परिचय दे रहे हैं। 

‘भूमंडलीकरण के कारण मीडिया का केंद्रीकरण भी बढ़ा है।’ 

भूमंडलीकरण के चलते विज्ञापनों की स्पर्धा बढ़ी है। विज्ञापनों को छापने में नैतिकता का कोई स्थान नहीं है। विज्ञापनों को छापते समय खबरों और विज्ञापनों का प्रतिशत भी नहीं देखा जाता है। यदि विज्ञापन उपलब्ध हो जाएं तो अख़बार के सभी पृष्ठ इससे भरे जा सकते हैं। खबरे रहें या न रहें या विज्ञापन की इस भरमार को पाठक कितना ही कोसें, इसकी परवाह मीडिया घराने अब नहीं करते हैं। एक समय था, जब मानक के अनुसार यह सुनिश्चित किया जाता था कि खबरों के बीच कितना स्थान विज्ञापनों को दिया जाए, आज स्थिति एकदम अलग है। अब खबरों और विज्ञापनों के बीच जगह के बंटवारे की मानकों के अनुरूप कोई व्यवस्था नहीं है। आने वाले दिनों में यदि अखबार के सम्पादकीय पृष्ठों पर भी विज्ञापन छपने लगें, तो भूमंडलीकरण के इस नये रुझान से चकित होने की बात नहीं। टीवी चैनलों पर तो विज्ञापनों की बमबारी-सी देखने का मिलती है, जिससे उकताहट होने लगती है। विज्ञापनों की झड़ी हर चैनल पर लगी रहती है, जिसे दर्शकों को झेलना ही पड़ता है। ये कामर्शियल ब्रेक भी चुनकर उस समय होते हैं जब दर्शक रोमांच की हद पर हों या कोई नई सनसनी सामने आने वाली हो। 

भूमंडलीकरण के कारण मीडिया पर ग्लैमर का प्रभाव साफ दिख रहा है। जिंदगी और जमीन से जुड़ी असली तस्वीरें अब न तो समाचार पत्रों में दिखती हैं और न ही टीवी चैनलों पर। जिंदगी के हाशिए पर चला गया देश का वंचित तबका मीडिया के भी हाशिए पर चला गया। हमारे गांवों और लोक संस्कृति के दर्शन भी इसमें दुर्लभ हो गये हैं। यह बढ़ते ग्लैमर का ही प्रभाव है कि जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दों को नजरंदाज कर फिल्मी सितारों के शादी-ब्याह के समाचार, उनके निजी जीवन के चचे आदि चटखारों के साथ प्रकाशित किए जाते हैं। अब भूख से मरने वाले गरीब की खबर हाशिए पर चली गयी है, जबकि सिनेतारिका हेमा मालिनी के घर में तेंदुआ घुसने की खबर बेहद प्रमुखता से स्थान पाती है। रचनात्मकता और चिंतन का अभाव दिख रहा है। यही कारण है कि मीडिया में जिस ढंग से बढ़ती महंगाई, मुद्रास्फीति, गरीबी, बेरोजगारी एवं जन समस्याओं की चर्चा होनी चाहिए, वह होती नहीं दिखती है। 

भूमंडलीकरण के कारण मीडिया का केंद्रीकरण भी बढ़ा है। पिछले कुछ वर्षों में चंद बहुराष्ट्रीय निगमों ने मनोरंजन, समाचार, फिल्म आदि के भूमंडलीय बाजार पर जबरदस्त पकड़ बनाई है। विश्वव्यापी मीडिया आय के दो-तिहाई से भी अधिक हिस्से पर आठ मीडिया समूहों ने कब्जा जमा रखा है। भूमंडलीय पूंजीवाद ने पैसा कमाने की होड़ को इस कदर बढ़ा दिया है कि अब लोगों को गंभीर समस्याओं से दूर रखकर उन्हें बाजार की भूल-भुलैया में भटकाने का चलन बढ़ गया है। पैसे बटोरने की होड़ में परंपरागत मूल्य और नीतियां हाशिए पर चली गई हैं। 

भमंडलीकरण के प्रभाव के कारण भाषा के साथ भी खिलवाड़ शरू हो गया है। अब भाषा भी बाजार को ध्यान में रखकर गढ़ी जा रही है। भाषा के साथ नये-नये प्रयोग किए जा रहे हैं। इसके तहत ऐसे अखबारों का चलन बढ़ा है, जिनमें न तो शुद्ध हिंदी ही पढ़ने को मिलती है और न ही ये अखबार शुद्ध अंग्रेजी ही छाप पाते हैं। ‘बाई लिंगुअल’ (Bilingual) के नाम पर भ्रष्ट भाषा परोसी जा रही है। चैनल भी इससे अछूते नहीं हैं। चूंकि भूमंडलीकरण ने अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ाया है, अतएव क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में, इलेक्ट्रानिक माध्यमों से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में उसकी बहुलता रहती है। जहां वह क्षेत्रीय भाषाओं को ‘रीप्लेस’ कर सकती है, वहां उसने उसे कर दिया है, जहां वह मजबूर है, वहां उसने हर भाषा में घुसकर उसे भ्रष्ट करना शुरू कर दिया है। हिन्दी पत्रकारिता तो इस नये चलन से विशेष रूप से प्रभावित हुई है। 

एक समय था कि पत्र-पत्रिकाएं भाषा का संस्कार देने के लिए जानी जाती थीं। भाषा की समझ विकसित करने के लिए लोग स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ते थे, पर अब यही पत्र-पत्रिकाएं भूमंडलीकरण के कारण भाषा को बिगाड़ने का काम कर रही हैं। यह एक तरह से भाषा के साथ किया जाने वाला अपराध है, जो कि क्षम्य नहीं है। पाचनलो में भी बाजार की इस नई भाषा की बाढ़ सी आ गई है। खबरों और विज्ञापनों, दोनों में इस भाषा का बढ़-चढ़कर प्रयोग हो रहा है। खबर में इस भाषा की एक बानगी देखिए-टेन एक्सीडेंट की जिम्मेदारी एक्सेप्ट करते हुए रेलवे मिनिस्टिर ने अपना रिजिग्नेशन प्राइम मिनिस्टर के पास भिजवा दिया है।’ 

भूमंडलीकरण के कारण मीडिया में नारी देह की भी नुमाइश बढ़ी है। नारी मां, बहन, बेटी न होकर सिर्फ देह बनकर रह गई है, जिसे तरह-तरह से भूनाने की कोशिशें हो रही हैं। नारी के प्रति नजरिया बाजारू हो गया है। यही वजह है कि विश्व सुंदरी प्रतियोगिताओं में एक सेशन ‘बिकनी शो’ का रखा जाता है। इसका सीधा-सा संबंध अंडरगारमेंट्स के व्यापार से है। फैशन शो में कैट वॉक का प्रदर्शन चैनलों पर घंटों दिखाया जाता है। बाजारवादी मानसिकता के कारण मीडिया में स्त्री चिंतन और स्त्री विमर्श का अब कोई स्थान नहीं रह गया है। बजाय आधी दुनिया की समस्याओं को सामने आने के नारी की भोग्या छवि को स्थापित करने के प्रयास पूरे तौर पर जारी हैं। ऐसा करते हुए हमने अपने सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को ताक पर रख दिया है। 

‘भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण भाषा के साथ भी खिलवाड़ शुरू हो गया है।’

हर वस्तु के दो पहलू होते हैं भूमंडलीकरण के दौर में मीडिया का भी एक दूसरा पहलू है, जो आलोच्य नहीं वरन् आश्वस्तिदायक है। मीडिया का बदला हुआ चेहरा और संचार में आई क्रांति भूमंडलीकरण की ही देन है। आज का मीडिया आधुनिक संसाधनों से लैस है और बेहद सुगम है। ऑनलाइन जर्नलिज्म की शुरुआत भूमंडलीकरण की ही देन हैं। अब सीमाएं टूटी हैं। खबरें पंख लगाकर उड़ रही हैं। समाचारों का साम्राज्य बढ़ा है। सच तो यह है कि भूमंडलीकरण के कारण परंपरागत मीडिया की काया पलट गई है। 

भूमंडलीकरण के प्रभाव ने मीडिया को इसके मिशनरी स्वरूप से मुक्ति दिलवाई है। आज मीडिया के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं। यह क्षेत्र एक अच्छे व्यवसाय के रूप में उभरा है। मीडिया से जुड़े लोग अच्छा वेतनमान पा रहे हैं। उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है। भूमंडलीकरण ने मीडिया के तकनीकी और आर्थिक पक्ष को मजबूत बनाया है। मनोरंजन के क्षेत्र को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। यह भूमंडलीकरण की ही देन है कि अब सीमाएं | बौनी साबित हो रही हैं और ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा साकार हुई है। मीडिया के फलक को अप्रतिम विस्तार मिला है। अब बहुत कुछ वह सामने आने लगा है, जो पहले नहीं आ पाता था। चूंकि मीडिया एक अच्छे व्यवसाय के रूप में उभरा है, अतएव इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है और जब प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो परिष्कार भी होता है और अच्छे परिणाम भी सामने आते हैं। 

भूमंडलीकरण के इस दौर में मीडिया से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह इस प्रतिस्पर्धा को स्वस्थ बनाए रख कर सभी को लाभान्वित करे और खुद को भी श्रेष्ठ आयाम दे। ऐसा करते हुए जहां हमें भूमंडलीकरण के दुष्प्रभावों से बचाव करना होगा, वहीं इसके उस स्वरूप को विस्तार देना होगा, जो कि आश्वस्तिदायक है। 

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