मोबाइल से बदलती जीवन शैली पर निबंध | मोबाइल फोन पर निबंध | Mobile Phone Essay in Hindi

मोबाइल से बदलती जीवन शैली पर निबंध | मोबाइल फोन पर निबंध | Mobile Phone Essay in Hindi

मोबाइल फोन ने न सिर्फ मानव जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला है, बल्कि जीवन को सहज, सुंदर और सुखमय भी बनाया है। यही कारण है कि यह आज की जरूरत बन गया है। मानव जीवन से इसका जुड़ाव अभिन्न हो गया है। आम जन-जीवन में मोबाइल के बढ़ते हए दखल पर यदि यह कहा जाए कि भारत मोबाइलमय हो गया है, तो इसमें बेजा कुछ भी न होगा। सच तो यह है कि इस छोटे से उपकरण ने जीवन-शैली पर जितना व्यापक प्रभाव डाला है, उतना शायद किसी अन्य ने नहीं। जीवन-शैली के साथ-साथ, बाजार में भी विज्ञान के इस नायाब आविष्कार ने ‘तहलका मचा रखा है, एक क्रांति ला दी है। इसका कारोबार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है। शहर हों या गांव , कस्बे हों या महानगर सभी जगह मोबाइल की धाक देखते ही बनती है। 

“मोबाइल की बढ़ती उपादेयता के कारण ही ‘एम प्रशासन’ यानी ‘एम गवर्नेस’ की अवधारणा का जन्म हुआ और देखते ही देखते लोक जीवन से जुड़े कार्यों व प्रशासनिक कार्यों में मोबाइल का इस्तेमाल होने लगा, जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आए।” 

मोबाइल ने जीवनशैली को किस हद तक प्रभावित किया है, इसकी झलक हमें रोजमर्रा के दृश्यों में दिखती है। श्रम के स्वेद में डूबा हुआ रिक्शा चालक हौले-हौले रिक्शा चलाता है, तो एक हाथ स मोबाइल को कनपटी से चिपकाए रहता है। साइकिल वाला कान में इयरफोन लगाकर मोबाइल पर पसंदीदा नगमों की लय के साथ पैडल की लय मिलाता है। कार ड्राइवर एक हाथ से स्टीयरिंग संभालता है, तो दूसरे से मोबाइल को कान से सटाए रखकर दिल खोलकर कर बातें करता है। राशन की दुकान हो, मॉल हो, सिनेमा हाल हो, ट्रेनें हों, बसे हों सब जगह मोबाइल की माया दृष्टिगोचर होती है। सर्वव्यापी हो गया है मोबाइल, दिल से भी ज्यादा सहेजकर लोग मोबाइल को दिल के पास रखने लगे हैं। मोबाइल दिल की धड़कन बन गया है। संचार क्रांति की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी। 

आज अगर मोबाइल ने जीवन शैली पर कब्जा जमाया है, तो – उसका कारण इसके द्वारा प्रदत्त वे सुविधाएं हैं, जिन्होंने न सिर्फ जीवन को सहज बनाया है, बल्कि दरियों को भी मिटाया है। आप कहीं भी हों, बात आसानी से, जी-भरकर कर सकते हैं, क्योंकि चीनी चावल और दाल की तरह मोबाइल की काल दरें जेब पर डाका नहीं डाल रहीं हैं। मोबाइल के छोटे-छोटे सेट क्या खूब हैं। इनमें ढेर सारे फंक्शन हैं, जो दैनिक जीवन में सहायक साबित हो रहे हैं। टॉर्च, ट्रांजिस्टर, कैमरा, गेम्स, गाने, एसएमएस, मूवी, इंटरनेट की सुविधा, घड़ी, अलार्म, रिमाइंडर सहित अन्य ढेर सारी ऐसी सुविधाएं छोटा सा मोबाइल सेट मुहैया करवा रहा है, जिन्होंने जिंदगी की तर्ज ही बदल दी है। अपनी इसी उपादेयता की वजह से मोबाइल आम और खास के दिल की ‘धक-धक’ बन चुका है। आलम यह है कि यदि कुछ देर के लिए मोबाइल का साथ छूट जाए, तो विकलांगता का भयावह एहसास सताने लगता है। गोया मोबाइल नहीं, तो जीवन नहीं। यह कहना असंगत न होगा कि हालात ‘बिन मोबाइल सब सून जैसे बनते जा रहे है। यह जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन गया है। एक नई मोबाइल संस्कृति में सभी रचते-बसते जा रहे हैं। मोबाइल की बढ़ती उपादेयता के कारण ही ‘एम प्रशासन’ यानी ‘एम गवर्नेस’ की अवधारणा का जन्म हुआ और देखते ही देखते लोक जीवन से जुड़े कार्यों व प्रशासनिक कार्यों में मोबाइल का इस्तेमाल होने लगा, जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आए। आज टिकट बुकिंग से लेकर गैस बुकिंग तक मोबाइल पर संभव है। इससे कामकाज में न सिर्फ त्वरितता आई है, बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ी है। एम प्रशासन का भविष्य उज्ज्वल है। 

‘बाजार से निकला हूं, खरीदार नहीं हूं, जैसे जुमले मोबाइल धारकों के लिए नहीं हैं। बाजार में भी मोबाइल की प्रभुता देखते ही बनती है। फुटपाथों पर कैम्प लगाकर सिम बेचे जाते हैं, कहीं-कहीं तो मुफ्त बांटे जाते हैं। फ्री-टॉक टाइम दिया जाता है। एक-एक आदमी कई-कई मोबाइल रख रहा है। संवाद के लहजे में कहें तो ‘आदमी एक, मोबाइल पांच, बड़ी कामयाबी है….’ अच्छा प्रभाव पैदा करेगा। यह आंकड़ा हैरत में डाल देने वाला हो सकता है कि शहरों में आबादी के बराबर मोबाइल के कनेक्शन हैं। बाजार के आंकड़े भी कम जादुई नहीं हैं। गौरतलब है कि भारत में औसत शहरी टेलीडेंसिटी सौ प्रतिशत का आंकड़ा छू गई है। मोबाइल कंपनियों के बीच गला काट प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। बाजार की गर्माहट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर महीने तकरीबन डेढ करोड़ से भी ज्यादा ग्राहक नये कनेक्शन ले रहे हैं। कंपनियां टैरिफ की जंग में बढ़-बढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। एक से एक महंगे सेटों से बाजार पटे पड़े हैं। नई-नई तकनीकों वाले मोबाइल बाजार में बराबर आ रहें। मोबाइल बाजारों की रौनक देखते बनती है। 

“देखने में आ रहा है कि मोबाइल ने जहां जीवन को आसान बना कर जीवन-शैली में जबरदस्त बदलाव लाए हैं, वहीं कुछ विद्रूपताओं को भी जन्म दिया है। प्रभाव और कुप्रभाव दोनों सामाजिक जीवन पर अपना रंग छोड़ रहे हैं।” 

कुल मिलाकर, देखा जाए तो बाजार से लेकर जीवन-शैली तक मोबाइल का जबरदस्त प्रभाव बढ़ा है। भारतीय समाज पर मोबाइल संस्कृति छाती चली जा रही है। संचार क्रांति के ऐसे अभ्युदय के बारे में शायद किसी ने सोचा न होगा। मोबाइल ने जीवन को सहज और खुशहाल बना दिया है। जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ गया है मोबाइल। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोबाइल ने जीवन-शैली को बदल दिया है, मगर इसके कुछ नकारात्मक पक्ष भी जीवन-शैली से जुड़ गये हैं, जो चिंतनीय हैं। आज अपराधों को बढ़ावा देने में मोबाइल की मुख्य भूमिका है। सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान इसके जरिए संभव हुआ है। अपराध जगत से जुड़े लोग इसका खूब फायदा उठाते हैं। कानून और पुलिस से बचने के लिए कई-कई सिम अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। अपराधों का संचालन 

मोबाइल के जरिए आसान हुआ है। देखने में आया है कि जेल में बंद अपराधी वहां से मोबाइल के जरिए जरायम की दुनिया को आबाद रखते हैं। जेलों पर अधिकारियों द्वारा डाले जाने वाले छापों के दौरान अक्सर मोबाइल सेट और सिम कार्ड बरामद होते हैं। बढ़ते अपराधों में मोबाइल की बढ़ती संलिप्तता को देखते हुए पुलिस महकमे और सुरक्षा एजेंसियों को अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) पर खर्च करना पड़ता है। 

सिर्फ अपराधों के संचालन में ही मोबाइल मददगार साबित नहीं हो रहा है, बल्कि यह सीधे-सीधे भी अपराधों का बायस बन रहा है। आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि किसी लड़के ने गुपचुप किसी लड़की की तस्वीर उतारी और फिर अश्लील सचित्र संदेश भेज दिए। मोबाइल में अश्लील क्लिपिंग्स डाउनलोड करवाने के मामले भी अक्सर सामने आ रहे हैं। मोबाइल पर धमकाना, किसी को परेशान करना, छेड़-छाड़ करने जैसी घटनाएं भी समाज में तेजी से बढ़ रही हैं। यह मोबाइल का वह दूसरा और दागदार स्वरूप है, जो संचार क्रांति के वैचारिक प्रदूषण के रूप में समाज को तेजी से आच्छादित कर रहा है। एक नई अपसंस्कृति ने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं, जो समाज के लिए खासी घातक है। मोबाइल ने सामाजिक वर्जनाओं को भी तोड़ने का काम किया है। मान-मर्यादा पर बट्टा लगाया है तथा संस्कारहीनता की स्थिति को भी जन्म दिया है। यह संचार क्रांति के बढ़ते वैचारिक प्रदूषण का ही हिस्सा है कि मोबाइल पर व्यापक पैमाने पर बेहूदे और अश्लील संदेशों का आदान-प्रदान बराबर चला करता है। मोबाइल के ये नकारात्मक प्रभाव घर-घर पहुंच रहे हैं। प्रबुद्धजन मोबाइल के इस स्याह पहलू को लेकर काफी चिंतित भी हैं। 

हमें वाचाल बनाने के साथ-साथ मोबाइल ने हमारी चिंतनशीलता और ध्यान शक्ति को भी कम किया है। खासतौर पर छात्र जीवन पर इसका व्यापक कुप्रभाव पड़ रहा है। ध्यान और चिंतन छात्रों के लिए बहुत जरूरी है, मगर मोबाइल से बढ़ती निकटता के कारण ध्यान और चिंतन के स्तर पर छात्र पिछड़ रहे हैं। पढ़ाई में व्यवधान पैदा होता है। ज्यादा देर तक मोबाइल से चिपके रहने के कारण छात्र अपना कीमती वक्त भी जाया करते हैं। वे समय की कीमत को समझ कर इसके सीमित इस्तेमाल पर ध्यान नहीं देते हैं, जो कि उनके भविष्य को भी प्रभावित करता है। मानसिक स्तर पर भी मोबाइल ने उस शांति को छीना है, जो जीवन में सुकून के लिए आवश्यक है। 

छात्रों का बजट भी मोबाइल ने बिगाड़ा है। अब वे अपनी कॉपी-किताब व दीगर शैक्षणिक जरूरतों के बजाय मोबाइल के रीचार्ज और टॉपअप में ज्यादा खर्च कर रहे हैं। अभिभावकों की जेब पर बच्चों का मोबाइल प्रेम भारी पड़ रहा है। 

मोबाइल सेहत के लिए भी कम खतरनाक नहीं है। लोग इसे दिल से लगाकर रखते तो हैं, मगर शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि इससे निकलने वाली तरंगें दिल और दिमाग दोनों के लिए घातक होती हैं। इस बात को चिकित्सक भी स्वीकार करते हैं। मोबाइल का इयरफोन लोग सिर्फ बातचीत के लिए इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि देर तक इसे कानों में लगाकर गाने वगैरह भी सुनते हैं। इससे कान पर प्रभाव पड़ता है और बहरेपन की गुंजाइश बढ़ जाती है। इसके अलावा चक्कर आना, थकान सिरदर्द तथा रक्तचाप जैसी समस्याएं भी मोबाइल के असीमित इस्तेमाल से बढ़ी हैं। 

जैसा कि पहले भी बताया है कि मोबाइल ने लोगों के बीच ध्यान के स्तर को कम किया है। इसका घातक प्रभाव मार्ग दुर्घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। ध्यान की कमी के कारण होने वाली ज्यादातर मार्ग दुर्घटनाओं के पीछे मोबाइल का बड़ा हाथ रहता है। बाइक, स्कूटर, कार या अन्य वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना महंगा पड़ रहा है और लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। इस तरह जीवन की सुरक्षा के प्रति मोबाइल के कारण संकट बढ़ा है। 

यह भी मोबाइल से जुड़ा एक स्याह पक्ष है कि व्यावसायिक होड़ में सरपट दौड़ रही कंपनियां लोगों की निजता पर डाका डाल रही हैं। दिनभर ढेरों ऐसे मैसेज मोबाइल पर भेजे जाते हैं, जो आम आदमी के लिए अनावश्यकता के दायरे में आते हैं। उसे इन्हें खोलकर देखने में समय जाया करना पड़ता है। इसी प्रकार तमाम ऐसी काल्स भी आती हैं, जो गाने डाउनलोड कराने आदि से जुड़ी होती हैं। जरा सोचिए, इस तरह की काल्स और मैसेजेज, उस समय 

कितना अखरते होंगे, जब आप किसी जरूरी मीटिंग में बैठे हों या कोई आवश्यक काम संपादित कर रहे हों। व्यक्तिगत कामों को करते वक्त भी यह सब बहुत नागवार गुजरता है, मगर कंपनियों को इसकी परवाह कहां। वे बड़ी बेहयाई से लोगों की निजता में खलल डाल रही हैं। – 

देखने में आ रहा है कि मोबाइल ने जहां जीवन को आसान बना कर जीवन-शैली में जबरदस्त बदलाव लाए हैं, वहीं कुछ विद्रूपताओं को भी जन्म दिया है। प्रभाव और कुप्रभाव दोनों सामाजिक जीवन पर अपना रंग छोड़ रहे हैं। जहां मोबाइल ने हमें सुविधाओं के नये आयाम दिए हैं, वहीं इस संचार क्रांति की उपज वैचारिक प्रदूषण ने भी एक काली चादर तान दी है। मोबाइल के दुष्परिणाम भी समाज के आगे हैं। इन दुष्परिणामों के चलते मोबाइल को खारिज भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज के गतिशील जीवन का यह एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। जरूरत चौकन्नेपन की है। आवश्यकता इस बात की है कि हम मोबाइल के दुष्प्रभावों के प्रति सजग और चेतन रहें। बचाव के कारगार उपाय खोजें तथा खुद को इसके सुरक्षित एवं सीमित इस्तेमाल पर केन्द्रित रखकर जीवन को सुखमय बनाएं। 

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