मिस्र की मम्मी का अद्भुत रहस्य

मिस्र की मम्मी का अद्भुत रहस्य

मिस्र की मम्मी का अद्भुत रहस्य

फराहो के नाम से विख्यात प्राचीन मिस्र के शासकों ने अपने शवों को सरक्षित रखने के उद्देश्य से पिरामिडों का निर्माण करवाया। आज भी ये पिरामिड और उनमें रखी ममियां विज्ञान के लिए चुनौती बनी हुई हैं। कारण, जब भी किसी व्यक्ति ने अपनी जिज्ञासा तृप्त करने के उद्देश्य से इनकी खामोश नींद में खलल डालने की चेष्टा की है, उसे मौत का ग्रास बनना पड़ा है। रहस्य के आवरण में लिपटी हुई हजारों साल से सो रही ये ममियां आज भी अपने छूने वालों को मृत्यु-दंड देने में सक्षम हैं। 

मम्मी क्या है

पुराने मिस्री शासकों (फराहो) का विश्वास था कि आने वाले दिनों में कभी यह 1भी मुमकिन होगा कि दफनाये गये लोगों को जिंदगी बख्शी जा सकेगी। अपने इसी विश्वास के कारण तत्कालीन मिस्री शासकों ने आज से तकरीबन 4,000 साल पहले त्रिकोणाकार मकबरे (पिरामिड) बनवाये और उसमें उन शासकों की शव-पेटियां (ममी) रखी जाने लगीं। भरोसेमंद वैद्यों और कीमियागरों की मदद से शवों पर तरह-तरह के लेप, रसायन लगाये जाते और ताबूतों में बंद करके उन्हें पिरामिडों में रख दिया जाता। 

मम्मी क्या है

चलन तो यहां तक था कि शासक की रोजमर्रा की हर जरूरत की चीज मसलन, रत्न, आभूषण, खाने-पीने की चीजें भी रख दी जातीं। और तो और, कभी-कभी मत शासक की रानियां, प्रेमिकाएं, दास-दासियां, विश्वासपात्र नौकर-चाकर, पालतू पशु-पक्षी भी उसी शव के साथ जिंदा दफन कर दिये जाते। इस उम्मीद के साथ इन्हें दफनाया जाता कि मत शासक के जीवित हो उठने पर उसके हुक्मरान आदि उसका साथ निभा सकें। हैरत की बात यह है कि हजारों साल से सोयीं हुई ये आत्माएं अपने-आप में रहस्य का पिटारा हैं। पिरामिडों से प्राप्त हर चीज और ये शव ऐसी हालत में पाये गये हैं, मानो इन्हें कल ही दफन किया गया हो। रसायनों का तिलस्म उन्हें आज भी तरोताजा बनाये हुए है। 

आने वाली दनिया के लिए ये पिरामिड और सुरक्षित ‘ममियां’ एक अजबा थीं। अपनी जिज्ञासा के लिए जब कभी किसी ने इनकी खामोश दुनिया में दखल देने की जुर्रत की तो उसे मौत का ग्रास बनना पड़ा। हजारों साल से सो रही ये मत आत्माएं आज भी हमारे लिए चुनौती हैं, रहस्यों के आवरण में लिपटी हई दंत-कथाओं की तरह। 

मिस्र की मम्मी का रहस्य

 

इतिहास गवाह है कि जब कभी इन्हें छेड़ने की कोशिश की गयी तो मौला छेड़ने वालों को अपनी आगोश में ले लिया। ऐसी ही एक लोमहर्षक त्रासदी कथा हम आप को सुनाएंगे। 

ममियों को छेड़ने वाले दुस्साहसी लोगों का क्या हाल हुआ, यह जानते हए भी बहत से खब्तियों ने अपनी मनमानी करनी चाही। कदाचित व इन किवतियों से रहस्य का पर्दा हटा देना चाहते थे और इन्हें झठा ‘मिथक’ साबित करना चाहते थे पर अंततोगत्वा मौत का ही उन्हें वरण करना पड़ा। 

मम्मी क्या है

ऐसे खब्तियों में अदम्य उत्साह के धनी लार्ड कार्नवार्न का नाम हमारे सामने आता है, जिसने फराहो की ममी को खोदने का दुस्साहस किया था। लार्ड कार्नवार्न के ममी-खोजी अभियान में उसका एक विश्वसनीय सहयोगी था-आर्थर बिगाल। कार्नवान ने जब ऐसे जोखिमभरे काम को आरंभ ही किया था, तभी आर्थर बिगाल ने उसे बता दिया था कि 19वीं शताब्दी के अंत में एक मिस्री राजा के मकबरे से ताबूत उठाकर इंग्लैंड ले जाने वाले का क्या हाल हुआ था और यह भी कि उसके सहयोगियों का जीवन किस तरह तबाह हुआ था, पर कार्नवान के ऊपर इन हादसों और उनसे जुड़ी अंतहीन श्रृंखलाओं का कोई प्रभाव न पड़ा और उसने अपने मिशन को जारी रखा। 

फिर भी आर्थर बिगाल ने उससे जोर देकर सारी व्यथाओं का खुलासा किया कि ताबत लाने के तरंत बाद एकाएक बंदक की नली फट जाने से ताबत उठाकर लाने वाले की एक बाह उड़ गयी और शीघ्र ही उसकी प्रेमिका समुद्र में डबकर उसकी बाहों में समा गयी। इतना ही नहीं जिस जहाज में उस ताबूत को लाया गया था, वह भी काल ग्रस्त हो गया। जिस मकान में ताबूत को रखा गया, वह भी जलकर राख हो गया। एक फोटोग्राफर ने उस ताबूत की फोटो लेने की हिमाकत की फोटो तो उसने खींची जरूर पर न जाने किस प्रेरणा से उसने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। 

मगर कार्नवार्न पर इस भयानक हादसे की दिल दहला देने वाले विवरण का कोई असर नहीं हुआ और न ही उसने अपनी योजना को मुल्तवी किया, बल्कि उसकी खिल्ली ही उड़ायी। इन सब बातों को उसने मात्र संयोग कहा, फिर भी बिगाल ने उसे चेतावनी देने में अपना फर्ज ही समझा-“यदि इस मृत आत्मा का अपमान करोगे, तो दो माह से अधिक अवधि तक दुनिया में न रह सकोगे।” 

फिर भी कार्नवार्न न माना। वह इस अभियान की सफलता से अपनी बहादरी और दस्साहस का ढोल पीटना चाहता था। एक अलौकिक पुरुष-काउंट होमान ने भी उसे चेतावनी दी: 

मम्मी क्या है

लार्ड कार्नवान, मकबरे में कतई घुसना मत। इसकी अवहेलना करने का मतलब बहुत बड़ा खतरा मोल लेना है। जो व्यक्ति इसकी अवहेलना करेगा, उसे बीमारी घेर लेगी, उसका इलाज नामुमकिन होगा और मिस्र में ही उसकी मृत्यु निश्चित है।” 

 

यह कोई सन् 1923 की बात है। वर्षारंभ के ही दिनों में यह योजना कार्नवान ने बनायी थी और कई लोगों ने उसे आगाह भी किया था। एक भविष्यवक्ता ने कहा था कि वह दो माह के भीतर चल बसेगा, पर कार्नवार्न पर जैसे धुन सवार थी। उसने किसी की भी परवाह न की। तूतेनखामेन का मकबरा उसने खोद ही डाला। 3,000 साल पहले दफनाये गये ताबूत को खोलने पर कार्नवार्न ने मकबरे पर यह इबारत पढ़ी: 

“फराहो की नींद में खलल डालने वाला अपनी मौत को खुद ही बुलावा देगा।” 

यह इबारत पढ़कर कार्नवार्न के होश उड़ गये। मगर अब तक काफी देरी चकी थी। अब तो कछ नहीं हो सकता था। सिवा इंतजार के कि आगे-आगे देखिये होता है क्या? 

 

5 अप्रैल,1923 की सबह कार्नवान जैसे ही सोकर उठा, उसके बदन में भयकर पीड़ा उठी। वह चिल्लाने लगा, “मैं मरा जा रहा है। “जब उसका लडका उसके पास आया, तब तक कार्नवान बेहोश हो चका था और इसी बेहोशी में ही उसने मौत की आगोश में अपने कदम रखे। उसी रात कार्नवार्न दनिया से चल बसा। ततेनखामेन के मकबरे को खोदने के 6 माह के भीतर ही अभिशप्त ममी ने अपना पहला ग्रास बनाया इस खदाई अभियान के नेता कार्नवान की जान लेकर। 

कार्नवान की मौत के कुछ ही दिनों बाद उसका एक प्रमुख सहयोगी आर्थर मैस, जो पातत्त्ववेत्ता था, भी दनिया से चल बसा। एक दिन अचानक वह बेहोश हो गया और इसके पहले कि डाक्टर यह पता लगा सकें कि वह बेहोश क्यों हआ. उसने सदा के लिए इस दनिया से नाता तोड़ लिया। 

कार्नवार्न की मृत्य की खबर पाकर उसका जिगरी दोस्त जार्ज गोल्ड मिस्र पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने मकबरे का अवलोकन भी किया, पर उसका दर्भाग्य तो देखिये अगले ही दिन उसे तेज बखार चढ़ आया और बारह घंटे के भीतर उसकी मृत्यु हो गयी। 

रेडियोलॉजिस्ट आर्चीवाल्ड ने ततेनखामेन के मकबरे का एक्स-रेलिया था, उसे एकाएक घटन महसूस होने लगी। फलतः वह इंग्लैंड लौट गया, लेकिन शीघ्र ही वह भी काल का ग्रास बन गया। 

ऐसी ही परिणति कार्नवार्न के निजी सचिव की भी हई। उसका निजी सचिव रिचार्ड बैथल एक दिन अपने विस्तर पर हार्ट-अटैक से मर गया। 

ऐसा ही हश्र ब्रिटिश उद्योगपति जोयल बल का भी हआ। मकबरे को देखने वाले वह पहले व्यक्ति थे। कछ ही दिनों के अंदर रहस्यमय परिस्थितियों में ज्वराघात से उनकी भी मृत्यु हो गयी। 

अगले 6 सालों में सन् 1930 तक आते-आते, इस खोजी के एक दर्जन सदस्य क्रमशः काल के ग्रास में समा गये। 

उस अभिशप्त ममी का ऐंद्रजालिक करिश्मा तो देखिये, उसका जादू आज भी बरकरार है। मकबरे के खोदे जाने के 65 साल बाद भी उसका तिलस्म बदस्तर जारी है। 

सन 1970 तक इस अभियान दल के मात्र एक सदस्य बचे थे। 70 वर्षीय सुरक्षा प्रहरी रिचर्ड एडम्सन ने इतने दिनों जीवित बचे रहने को अपना सौभाग्य समझा और उन्होंने न जाने किस खुशफहमी में टी.वी. पर अपना एक साक्षात्कार दे डाला, जिसमें उन्होंने ततेनखामेन के मकबरे के मौत संबंधी शाप का भंडाफोड़ किया और टी.वी. दर्शकों से उन्होंने साफ-साफ कहा, “मैं क्षणभर के लिए भी इस दंत-कथा पर भरोसा नहीं करता।” 

 और यही वाकया उनके लिए काल बन गया। जस ही वह दरदशन के गेट से बाहर आये और घर जाने के लिए टैक्सी ली, उस टैक्सी की एक ट्रक से भिड़त हो गयी। वह झटके के साथ उछल कर गजों दूर सड़क पर जा गिरे। इतने में ही एक लॉरी उनके सिर के पास से गुजर गयी। यह फासला इतना कम था कि मानों मौत उन्हें छते-छ्ते कतराकर निकल गयी हो। एडम्सन ने इससे पहले भी इस दंत-कथा की दो बार खिल्ली उड़ायी थी और दोनों बार दुर्घटनाओं के शिकार हए थे। 

पहली बार तो अविश्वास प्रकट करने के 48 घंटों के अंदर उनकी पत्नी का देहावसान हो गया था और दूसरी बार जब उन्होंने इसका मजाक उड़ाया था तो उन्हें तरंत पता चला था कि एक हवाई-दर्घटना में उनके लड़के की रीढ़ की हड्डी टूट चकी थी और तीसरी बार जब वह स्वयं मरते-मरते बचे तो उन्होंने स्वीकार किया, “अब तक मझे इस बात का यकीन नहीं था कि फराहो के शाप और मेरे परिवार में घटी दर्घटनाओं में कोई संबंध है, पर अब मेरा विचार एकदम से बदल गया है और मझे फराहो के शाप में यकीन हो चला है।” 

फिर आया सन् 1972 का साल, ततेनखामेन मकबरे से जड़ी तिलस्मी कारगजारियों का सबसे रोमांचक और विलक्षण काल। उस साल मकबरों की खोज की 50वीं वर्षगांठ मनायी जा रही थी। ततेनखामेन के स्वर्ण-मखौटे को ब्रिटिश म्यजियम द्वारा आयोजित प्रदर्शनी-स्थल पर ले जाने के लिए उसे जैसे ही जहाज पर लादा गया. सोयी पडी ममी ने फिर अपना जाद का पिटारा खोल दिया और इस बार भी कइयों को उसने अपना ग्रास बनाया। इस अभियान की नमाइंदगी कर रहे थे-काहिरा संग्रहालय के प्राचीन विभाग के महानिदेशक डॉ. गमाल मेहरेज। संग्रहालय के प्राचीन विभाग में रखी 20 ममियों के सरक्षा पबंध का जिम्मा उनके ऊपर था। 

डॉ. गमाल मेहरेज को इस बात की वखवी जानकारी थी कि इससे पर्व जब ततेनखामेन के खजाने को पेरिस भेजने के अनबंध-पत्र पर उनके पर्व अधिकारी ने हस्ताक्षर ही किये थे कि चंद घटों बाद उसकी मत्य हो गयी थी। फिर भी वे इसे अध-विश्वास मानते थे। बड़े फख से वे कहा करते थ, “विश्व में किसी भी अन्य व्यक्ति की तलना में, मैं मिस्र के फराहो के मकबरे व ममियों से कहीं अधिक संबंधित रहा है तो भी मैं जीवित है। मैं इस बात की जिदा मिसाल है कि फराहो में जड़ी त्रासदियां मात्र संयोग हैं। मैं क्षणभर के लिए फराहो के शाप में यकीन नहीं करता। 

3 फरवरी 1972 को जैसे ही तूतनखामेन के स्वर्ण-मुखौटे को हवाई जहाज पर लादा गया, तत्काल डॉ. गमाल मेहरेज की अचानक मृत्यु हो गयी। 

मिस्र की मम्मी का अद्भुत रहस्य

प्रदर्शनी के आयोजकों ने इस दुर्घटना की कोई नोटिस नहीं ली। वे तैयारी में लगे रहे। स्वर्ण-मखौटे को ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स के जिस परिवहन-यान से भेजा गया. उसके चालक दल के सभी सदस्य 5 वर्ष के भीतर ही मौत के ग्रास बन गये। 

दिसंबर, 1979 में एक ब्रिटिश फिल्म कंपनी उस मकबरे के संबंध में एक कीवी फिल्म बनाने के विचार से मिस्र पहंची। कहना न होगा. फिल्म कंपनी का भटठा बैठ गया और उसके सारे कर्मचारी तबाह हो गये। अभिनेता इयान मैकशेन की वैली ऑफ किग्स’ स्थल के पास कार-दुर्घटना में टांग ही टूट गयी। दल के अन्य कर्मचारी भी कुछ न कुछ खामियाजा भुगतते ही रहे। 

इस शाप की व्याख्या कई लोगों ने अपनी तरह से की है। परमाणु वैज्ञानिक प्रोफेसर लइस बल्गारीनी की व्याख्या दिलचस्प तो है पर अविश्वसनीय प्रतीत होती है। उनका कहना है कि-“निश्चित रूप से इसकी संभावना है कि प्राचीन मिस्रवासियों ने अपने पवित्र स्थानों की सुरक्षा के लिए परमाणु विकिरण का इस्तेमाल किया हो। मकबरों के फर्श यूरेनियम से ढके गये हों। रेडियो सक्रिय चट्टानों की खानें मिस्र में चार हजार वर्ष पूर्व भी थीं। उनसे होने वाला विकिरण आज भी किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बन सकता है।” 

कहना न होगा कि तथ्यों की यह व्याख्या बचकानी है। आज से चार-पांच हजार साल पहले परमाणु भौतिकी (न्यूक्लियर फिजिक्स) का कोई वजूद नहीं था। परमाण, अण की संकल्पनाएं तो 19वीं शती के आखिर और 20वीं शती के पूर्वार्द्ध में पनपी और यहां तक आते-आते परमाणु विज्ञान परवान चढ़ा। एनरिको फर्मी ने सन् 1942 में शिकागो विश्वविद्यालय में पहली परमाणु भट्टी बनी थी, फिर सन् 1945 में परमाणु बम वजूद में आया। कहने का मतलब यह है कि यूरेनियम के फर्श की परिकल्पना अपने-आप में हास्यास्पद है। फिर जिन कुशल कारीगरों ने ऐसा कमाल कर दिखाया, वे भी तो यूरेनियम की घातक किरणों की मार से अछते कैसे रह सकते थे? 

उसकी घातक विकिरणशीलता से अपना बचाव करके कैसे उन्होंने इन मकबरों का निर्माण किया? 

फिलहाल, इन मकबरों की तिलस्मी पाश को तोड़ पाने में विज्ञान अपने को असहाय पाता है और उसकी तर्कसंगत व्याख्या भी नहीं कर सकता है। देखिये, कब टूटता है फराहो के मकबरे का इंद्रजाल।

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