सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार किसने किया |Microscope ka avishkar kisne kiya

Microscope ka avishkar kisne kiya

सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार किसने किया |Microscope ka avishkar kisne kiya

पन्द्रहवीं शताब्दी में वैज्ञानिक जीवों के अंगों की आन्तरिक रचना और ब्रह्माण्ड के संघटन प्रकृति के नियमों तथा प्रबन्धों की जटिलताओं को सुलझाने तथा अध्ययन करने में ध्यान देने लगे। मगर, उनके सामने एक बड़ी तथा अहम मुश्किल यह थी कि आंखों से देखने पर भी स्पष्ट दिखाई न देने वाली वस्तु को किस प्रकार देखा जाए, अर्थात् उन्हें एक ऐसे यंत्र की आवश्यकता थी, जिससे छोटी-से-छोटी वस्तुओं को बड़े रूप में तथा स्पष्ट देखा जा सके, इसलिए वैज्ञानिक उस आवश्यक यंत्र को तैयार करने में जुट गए। 

प्राप्त जानकारी के अनुसार सर्वप्रथम सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार हॉलैण्ड निवासी जैकरियस जैनसन ने सन् 1590 ई. में किया। सूक्ष्मदर्शी, अर्थात् सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तु को स्पष्ट व वृहद रूप में दिखाने वाला यह यंत्र है। 

तत्पश्चात् सन् 1665 ई. में विट द्वीप के फ्रेशवाटर के छोटे से शहर में जन्मे अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक ने एक सूक्ष्मदर्शी बनाया, जिससे रॉबर्ट हुक ने कोशिका के सम्बन्ध में अनेक जानकारियां प्राप्त की। 

Microscope ka avishkar kisne kiya

रॉबर्ट हुक जीवाश्मों के अवलोकनकर्ता थे। वे सूक्ष्मदर्शी के नीचे जीवाश्मों का अवलोकन करने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने एक तरफ अश्मीकृत लकड़ी और जीवाश्म खोलों तथा दूसरी ओर जीवित लकड़ी और जीवित मोलस्क खोलों की संरचनाओं के बीच नजदीकी समानताओं का अवलोकन किया। 

जीवाश्म अरस्तु के समय से ही जाने जाते थे और उन पर विचार-विमर्श होता था। सामान्यतः यह विश्वास किया जाता था कि जीवाश्म पृथ्वी के भीतर ही बनते और बढ़ते हैं। 

जीवों की भांति दिखने वाले पत्थर (जीवाश्म) वास्तव में जीवित वस्तुओं के अवशेष नहीं होते, बल्कि एक निर्मात्री बल अथवा ‘असाधारण प्रत्यस्थ प्रभावोत्पादकता’ द्वारा निर्मित किए जाते हैं।

क्लासिकी स्रोतों पर आधारित चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में कला, साहित्य और ज्ञान का महान् पुनरुद्धार अर्थात् पुनर्जागरण के दौरान कोनरैड गेस्नर जैसे विद्वानों ने जीवाश्मों को संग्रहीत किया और संग्रहालयों एवं कैबिनेट में प्रदर्शित किया। यद्यपि सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक जीवाश्मों की उत्पत्ति तथा प्रकृति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक कुछ नहीं जानते थे। यहां तक कि सत्रहवीं शताब्दी में जीवाश्मों की उत्पत्ति के लिए कई संकल्पनाएं प्रस्तावित की गई थीं। जीवाश्म पर हुक के अध्ययन ने उन्हें अनुभव कराया कि जीवाश्म ‘प्रकृति का खेल’ नहीं है, वरन् वे कभी जीवित रहे जीवों के अवशेष हैं।

Microscope ka avishkar kisne kiya

बर्नार्ड पैलसी और निकालेस स्टेना जैसे अन्य प्रकृति विज्ञानियों का मानना था कि जीवाश्म पशुओं एवं पौधों के अश्मीकृत अवशेष होते हैं, जो बाढ़ द्वारा ठोस चट्टानों में छन-छनकर प्रवेश करा दिए जाते हैं। जीवाश्मों की उत्पत्ति एवं प्रकृति को व्याख्यापित करने के लिए हुक द्वारा प्रस्तावित सिद्धान्त बाद में चलकर सही सिद्ध हुए। यद्यपि हुक ने जब अपना जीवाश्म सिद्धान्त प्रस्तुत किया, वह उनकी स्वीकृति के लिए उपयुक्त समय नहीं था, किन्तु हुक ने चार्ल्स डार्विन से करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व ही यह पूर्वानुमान लगा लिया था कि जीवाश्म रिकॉर्ड डॉक्यूमेंट्स पृथ्वी पर मौजूद जीवों के बीच परिवर्तित होते हैं। उन्होंने अनुभव किया कि पृथ्वी पर जीवन के इतिहास के दौरान प्रजातियां अस्तित्व में आई हैं और लुप्त हो गई हैं। 

हुक की माइक्रोग्रैफिया सन् 1665 ई. में ही प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में विविध क्षेत्रों को शामिल किया गया है। हुक द्वारा संयोजी सूक्ष्मदर्शी और प्रदीपन प्रणाली के साथ देखी गई, विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विस्तृत चित्र आदि इस पुस्तक में समाहित हैं। रॉर्बट हुक ने कीट, स्पंज, ब्रायोजोअंस (सूक्ष्म जल पशु जो शाखाएं बनाते हैं, मांस की तरह कॉलोनी का निर्माण करते तथा मुकुलन द्वारा जनन करते हैं) फौरे मिनिफेरा (समुद्री प्रोटोजोआ जिसका खोल कैल्सियम और नन्हें-नन्हें छिलकों से भरा होता है और जिसमें पतले तन्तु लगे होते हैं) और पक्षी के पंख जैसे भिन्न-भिन्न जीवों का अवलोकन किया।

 माइक्रोग्राफिया उनके अवलोकन का एक परिशुद्ध एवं विस्तृत रिकॉर्ड है। इसमें दिए गए 57 निदर्श चित्रों में से अधिकांश को हुक ने स्वयं चित्रित किया है और कुछ चित्र सुप्रसिद्ध क्रिस्टोफर रेन ने बनाए हैं। सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखकर बनाए गए ये चित्र इतने सटीक थे कि कोई भी एक मक्खी की आंख, एक मधुमक्खी के डंक मारने वाले अंग का आकार, पिस्सु और जूं की शरीर रचना, पंखों की संरचना और मोल्ड्स के प्रकारों को देख सकता था। रॉबर्ट हुक ने सूक्ष्मदर्शी की सहायता से पादप ऊतकों की विशेषताओं का वर्णन करने के लिए उसे ‘कोशिका’ कहा है, क्योंकि वे मोजइक कोशिकाओं जैसे थे। 

रॉबर्ट हुक के बाद सन् 1673 ई. में डच वैज्ञानिक एण्टोनी वान ल्यूवेन हॉक ने हीरे के चूर्ण में अध्ययन का उपयोग किया और एक तालयुक्त सरल सूक्ष्मदर्शी बनाया, जिसकी सहायता से वस्तु को करीब तीन सौ गुना बड़ा देखा जाना सम्भव था। एण्टोनी ने सूक्ष्मदर्शी की सहायता से अनेक जीवाणुओं, प्रोटोजोआ तथा कोशिकाओं का अध्ययन किया। उनके द्वारा बनाया गया सूक्ष्मदर्शी यंत्र भी साधारण था। 

तत्पश्चात् इटली के वैज्ञानिक मार्सिजो मैल्पिजाइ ने रॉबर्ट हुक और ल्यूवेन हॉक के यंत्रों में सुधार करके कोशिकाओं तथा विविध प्रकार के अंगों का अध्ययन किया। 

उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मनी, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि देशों के वैज्ञानिकों ने इसमें सुधार किए, जिसका प्रयोग साधारणतः सभी प्रयोगशालाओं में किया जाता है। इस यंत्र में कई प्रकार के तलों के संयोजन से वस्तु का आवर्द्धन होता है। इस कारण इसे ‘संयुक्त सूक्ष्मदर्शी यंत्र’ कहते है। इसमें वस्तु की आकृति दो हजार से तीन हजार गुनी बड़ी देखी जा सकती है। 

सन् 1843 ई. में बर्क ने एक प्रतिबिम्बक सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया। इसके बाद सन् 1900 ई. में जिगमाण्डी ने अति (अल्ट्रा) सूक्ष्मदर्शी बनाया, जिसका प्रयोग सूक्ष्म जीव-जन्तुओं के अध्ययन में होता है। 

सन् 1932 ई. में दो जर्मनी वैज्ञानिकों, ‘नोल व रूस्का’ ने इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के दो स्वरूप होते हैं 

(i) ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, (ii) स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी । 

इलैक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा वस्तु दो लाख से पांच लाख गुनी तक बड़ी देखी जा सकती है। इसमें प्रकाश-किरणों के स्थान पर इलेक्ट्रॉन किरणों तथा कांच के लेंस के स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र का प्रयोग किया जाता है। 

सन् 1935 ई. में एफ. जरनिक ने भी आकृति अन्तर करने वाला अर्थात् दशा तुलनात्मक सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया। इन्हीं दिनों डॉर्क फील्ड सूक्ष्मदर्शी का भी आविष्कार हुआ था। 

सन् 1945 ई. में कुज्ज नामक वैज्ञानिक ने अतिबिम्बक प्रतिदीप्त सम सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया। इसके अलावा अन्य सूक्ष्मदर्शियों में पराबैंगनी सूक्ष्मदर्शी की 

आवर्द्धन-क्षमता छः हजार गुनी तक होती है। इसमें क्वार्ट्ज अथवा लिथियम फ्लोराइड के लेन्सों का प्रयोग होता है।

आज सूक्ष्मदर्शी में काफी सुधार किए जा चुके हैं और आगे भी होते रहेंगे, ताकि सूक्ष्मदर्शी की नई खोज में अधिक क्षमता वाले सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार हो सके। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

18 − two =