मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध-Essay on my favorite book

मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध

मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध

 पुस्तकों के महासमुद्र में सभी पुस्तकों का अध्ययन कर पाना संभव नहीं है। फिर भी अभी तक मैंने जितनी पुस्तकों का अध्ययन किया है या गुरुजनों, बड़े-बुजुर्गों एवं पूर्वजों द्वारा जिनके बारे में चर्चा सुनी है, उन सबमें गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरित मानस’ मेरा सर्वाधिक प्रिय ग्रंथ है। यदि हिंदी के विशाल सागर में केवल ‘रामचरित मानस’ रह जाए, तो भी हिंदी दरिद्र नहीं हो सकती। इस महाकाव्य में नाम तो श्रीराम का है, लेकिन गाथा जन-जन की है। इसीलिए तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ भारत के महलों एवं झोंपड़ियों में समान रूप से विराजती है, साथ ही साथ पूजित भी है। 

सत्य और त्याग–ये भारतीय संस्कृति के दो बीजमंत्र हैं। इस महाकाव्य के नायक श्रीराम सत्य और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। अतः गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानस’ में भारत की संस्कृति विराजती है। इस महाकाव्य के सभी पात्र भारतीय संस्कृति के अनुरूप हैं। यह ग्रंथ राम जैसा पुत्र, भरत और लक्ष्मण जैसे भाई, सीता जैसी पत्नी, हनुमान जैसा सेवक तथा सुग्रीव एवं विभीषण जैसे मित्र का आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत करता है। 

परंपरा के अनुसार परिवार के बड़े पुत्र के रूप में श्रीराम को राजगद्दी पर आसीन होना चाहिए था, लेकिन अपने पिता की आज्ञानुसार वे राजमहल का सुख त्याग कर जंगल में एक तपस्वी की तरह मारे-मारे फिरे 

कठिन भूमि कोमल पदगामी। 

कवन हेतु विचरहु वन स्वामी॥

यह त्याग और अनुशासन का अनूठा उदाहरण है। श्रीराम एक आदर्श भाई भी हैं। लक्ष्मण को मूर्च्छित देखकर वे विलाप करते हुए कहते हैं 

अस बिचारि जिय जागहु त्राता। 

मिलई न जगत सहोदर भ्राता॥

इस प्रकरण से समाज में भाई की महत्ता स्थापित होती है। मित्र सुग्रीव के कष्ट से द्रवित होकर भगवान श्रीराम कहते हैं 

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। 

तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ इस प्रकार श्रीराम एक आदर्श मित्र भी हैं। सीता जी इस महाकाव्य की नायिका हैं। इनके द्वारा भारतीय नारी की संस्कृति का पूर्णरूपेण पालन हुआ है। श्रीराम के साथ अपने वनगमन का औचित्य ठहराते हुए वे कहती हैं 

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। 

तैसीऊ नाथ पुरुष बिनु नारी॥

इसी प्रकार इस महाकाव्य के अन्य पात्र भी पूर्णतः मर्यादित हैं। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसमें पशु-पक्षी को देवतुल्य चित्रित किया गया है; यथा-हनुमान जी, जामवंत जी, गरुड़ जी, काक भुशुंडी जी आदि। 

‘रामचरित मानस’ साहित्यिक दृष्टि से भी बेजोड़ ग्रंथ है। इसकी चौपाई, छंद, सोरठे एवं दोहे अनुपम अर्थ तथा ऊंचे भावों के साथ गेय हैं। भक्तगण तो इन्हें गा-गाकर भाव-विभोर हो नाचने लगते हैं। यह ग्रंथ प्रेरणा और ज्ञान का भंडार है। सभी वेदों के सारतत्व का निचोड़ अत्यंत सहज ढंग से इस ग्रंथ में समाहित किया गया है। रामचरित मानस’ की निम्नांकित चौपाई में ब्रह्म, माया एवं जीव की सरलतम व्याख्या प्रस्तुत की गई है 

उभय बीच सिय सोहई कैसे। 

ब्रह्म जीव बीच माया जैसे॥

धर्म-अधर्म की व्यावहारिक व्याख्या भी इस महाकाव्य में की गई है 

परहित सरिस धर्म नहिं भाई। 

परपीड़ा सम नहीं अधमाई॥

‘रामचरित मानस’ हमें कर्म करने की प्रेरणा भी देती है 

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। 

जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥

वस्तुतः ‘रामचरित मानस’ एक ऐसी कामधेनु है, जिसकी दुग्ध धारा न तो सूखी है और न कभी सूखेगी, क्योंकि इसमें भारतीय संस्कृति की आत्मा बसती है। संक्षेप में, महाकवि तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानस’ हिंदी साहित्य के ललाट पर चमचमाती एक कालजयी बिंदी है- 

सच मानो, तुलसी न होते तो हिंदी कहीं पड़ी होती,

उसके माथे पर रामायण की बिंदी नहीं जड़ी होती।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

one × one =