हमारा प्यारा भारत वर्ष पर निबंध

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हमारा प्यारा भारत वर्ष पर निबंध – Mera Pyara Bharat Varsh Essay In Hindi

हमारा देश : भारतवर्ष –हम सचमुच भाग्यवान हैं कि हमारा जन्म स्वर्ग से भी सुभगतर भारतवर्ष में हुआ। स्वर्ग के अपरिमित भोग भोगनेवाले, उन्मुक्त विलासी देवगण भी जिस ‘भारत की मिट्टी में लोटने के लिए तरसते हैं, जिसकी प्रशंसा के गीत अनवरत गाते हैं, वही प्रकृति का पावन पालना हमारा देश भारतवर्ष है। ‘विष्णुपुराण’ कहता है- 

गायन्ति देवाः किल गीतिकानि ।

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते 

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥

हमारे देश का भौगोलिक विस्तार मानो विधाता की कलाकारिता का अद्भुत नमूना है। इसका मुकुट हिमधवल हिमालय है, तो हीरकहार गंगा-ब्रह्मपुत्र । इसके कटिप्रदेश में कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, और ताप्ती की मणिमालाएँ शोभती रहती हैं। इसके चरणों को हिंद महासागर अपनी फेनिल लहरों के अनगिन हाथों से पखारता रहता है। पूर्वी और पश्चिमी घाट के पर्वतसमुदाय अपने वृक्षरूपी संतरियों से इसकी सेवा के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

यहाँ कभी एक ऋतु की कठोरता का कोपभाजन नहीं होना पड़ता। बारी-बारी से आधी दर्जन ऋतुएँ आती हैं और अपनी सुषमा लुटाकर चली जाती हैं, एकरसता दूर करती रहती हैं। इन सारी विशेषताओं को ‘निरालाजी’ ने ‘भारत-वंदना’ नामक कविता में एकत्रीभूत किया है 

भारत जय, विजय करे

कनक-शस्य-कमल धरे।

लंका नभतल-शतदल

गर्जितोर्मि सागरजल

धोता शुचि चरणयुगल

स्तव कर बहु अर्थ-भरे।

तृण-तृण वन-वातावरण

अंचल में खचित सुमन

गंगा ज्योतिर्जल-कण

धवल-धार हार गले

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार

प्राण-प्रणव ओंकार

ध्वनित दिशाएँ उदार

शतमुख-शतरंव मुखरे। 

हमारा देश देवों का दुलारा, प्रकृति का प्यारा ही नहीं, लक्ष्मी का लाड़ला भी रहा है। इस देश की धरती सोने की बनी रही, नीलम का आसमाँ रहा। इस देश की नदियाँ रजत वर्षिणी रहीं। इस देश पर अभाव की काली छाया कभी मँडराती नहीं थी, दारिद्र्य के राक्षस ने कभी इसका गला दबोचा नहीं था। यहाँ के निवासी की आँखों में हर क्षण आशा का प्रत्यूष छलकता रहता था, जीवन में हर क्षण वसंत मुस्कराता रहता था, प्राणों में इंद्रधनुष मचलता था। यहाँ अन्न, जल, फूल, फल, मेवा, मिष्टान्न का कुबेरकोष था। 

भारत इसलिए भा-रत है कि यह वेदों उपनिषदों, महाभारत और रामायण की भूमि है। इसने दर्शन, साहित्य, कला और विज्ञान के ऐसे अनमोल कोहेनूर दिए हैं कि उनका मुकाबला संसार में नहीं है। एक ओर गौतम, कणाद, कपिल, शंकर, निंबार्क, चैतन्य, रामानुज हैं, तो दूसरी ओर वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति, कबीर, रहीम और तुलसीदास-इस प्रकार हमारे देश के दर्शन और साहित्य की विजय-वैजयंती संसार में सबसे ऊँचे फहरा रही है।

“भारत केवल हिंदूधर्म का घर नहीं है, वरन् यह संसार की सभ्यता की आदिभूमि है”-जैसा कि काउंट जोन्स जेनी ने लिखा है। रोम्या राला ने कहा है-“अगर संसार में कोई एक देश है, जहाँ जीवित मनुष्य के सभी सपनों को उस प्राचीन काल से जगह मिली है, जबसे मनुष्य ने अस्तित्व का सपना प्रारंभ किया है, तो वह भारत है।” मैक्समूलर ने लिखा है-“यदि हम संपूर्ण विश्व की खोज करें ऐसे देश का पता लगाने के लिए, जिसे प्रकृति ने सर्वसंपन्न, शक्तिशाली और सुंदर बनाया है, तो मैं भारतवर्ष की ओर संकेत करूँगा।

यदि मुझसे पूछा जाए कि किस आकाश के नीचे मानव-मस्तिष्क ने मुख्यतः अपने गुणों का विकास किया, जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या पर सबसे अधिक गहराई के साथ सोच-विचार किया और उनमें कुछ ऐसे रहस्य ढूँढ़ निकाले, जिनकी ओर उन्हें भी ध्यान देना चाहिए, जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया है, तो मैं भारतवर्ष की ओर संकेत करूँगा। यदि मैं अपने-आप से पूछ्रे कि किस साहित्य का आश्रय लेकर हम यूरोपीय, जो बहुत-कुछ केवल यूनानियों, रोमनों और एक सेमेटिक जाति के, यानी यहूदियों के विचार के साथ पले हैं-वह सुधारक वस्तु प्राप्त कर सकते हैं, जिसकी हमें जीवन को अधिक पूर्ण, अधिक विस्तृत और अधिक व्यापक बनाने के लिए आवश्यकता है न केवल इस जीवन के लिए, अपितु एकदम बदलते हुए और अनंत जीवन के लिए-तो मैं फिर भारतवर्ष की ओर संकेत करूँगा।” 

केवल धर्म, संस्कृति, अध्यात्म और साहित्य ही नहीं, वरन् विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत ने संसार का मार्गदर्शन किया है। एक अमेरिकन विद्वान डेलवर ने न्यूयार्क के ‘इंडियन रिव्यू’ में इसे स्वीकार किया है कि पश्चिमी संसार को जिन बातों पर अभिमान और, तरह-तरह के फल-फूल, है, वे असल में भारतवर्ष से ही वहाँ गई हैं। और तो पेड़-पौधे, जो इस समय यूरोप में पैदा होते हैं, हिंदुस्तान से ही लाकर वहाँ लगाए गए थे। मलमल, रेशम, घोड़े, टिन और इनके साथ-साथ लोहे और शीशे का प्रचार भी यूरोप में भारत से ही हआ। केवल इतना ही नहीं, ज्योतिष, वैद्यक, अंकगणित, चित्रकारी और कानून भी भारतवासियों ने ही यूरोपवालों को सिखाया। 

इसलिए हमारे कवियों ने भी भारतभूमि की इन्हीं विशेषताओं का उल्लेख किया है। सियारामशरण गुप्त के अनुसार, संसार के सभी देशों ने हमारे देश से ही सदुपदेश-पीयूष का पान किया 

है क्या कोई देश यहाँ से जो न जिया है?

सदुपदेश-पीयूष सभी ने यहाँ पिया है।

नर क्या, इसको अवलोक कर कहते हैं, सुर भी वही

जय जय भारतवासी कृती, जय जय जय भारत-मही। 

कवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार सारे संसार में हमारी समता का और कोई देश नहीं था 

देखो, हमारा विश्व में, कोई नहीं उपमान था। 

नरदेव थे हम और भारत देवलोक-समान था

भारत का अतीत जितना भव्य था, उतना ही इसका वर्तमान और भविष्य भी भव्य रहेगा, ऐसी आशा की जाती है।